ममता बनर्जी क्या वापसी कर पाएंगी?

    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शनिवार 9 मई को शुभेंदु अधिकारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शपथ ली.

उसी दिन राज्य की निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ब्रिगेड ग्राउंड से लगभग दो से तीन मील दूर हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित अपने आवास पर जो कहा, उसे हमेशा याद रखा जाएगा.

उस दिन ममता बनर्जी ने देश की 'वामपंथी, अति-वामपंथी और राष्ट्रीय ताकतों' से बेबाकी से उनके साथ हाथ मिलाने का आह्वान किया.

साथ ही कहा कि अब सभी को बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट होना होगा और वह अब 'शत्रु के शत्रु' को दोस्त मानने के लिए तैयार हैं.

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत किया था. उस जीत को एक अविस्मरणीय मील का पत्थर माना गया था.

सीपीएम के दौर में पार्टी का असर पश्चिम बंगाल के समाज, राजनीति, प्रशासन और दैनिक जीवन के हर कोने पर रहा. इसी वजह से यह कल्पना करना मुश्किल था कि दस-बारह साल पुरानी पार्टी उन्हें सत्ता से हटा देगी.

ममता बनर्जी ने लगभग अकेले दम पर असंभव को संभव कर दिखाया. पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों को सत्ता से बेदखल करने की उनकी क्षमता को उनके लंबे राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है.

अब ममता बनर्जी 'वामपंथी' या 'अति-वामपंथी' लोगों से हाथ मिलाने का आह्वान कर रही हैं. यह समझना मुश्किल नहीं है कि उनका राजनीतिक करियर एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है.

वामपंथी दलों का उनके प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देना एक अलग बात है. लेकिन यह कदम दिखाता है कि ममता बनर्जी चुनावी हार के सदमे से उबर चुकी हैं और फिर से अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश कर रही हैं.

ममता बनर्जी ने कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज के छात्र संगठन से कांग्रेस में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. उनका राजनीतिक करियर 50 साल से ज्यादा लंबा है. वह संसद और विधानसभा सहित 42 साल से संसदीय राजनीति में भी सक्रिय हैं.

लेकिन 71 साल की उम्र में, क्या वह राज्य पर बीजेपी की मजबूत पकड़ के बीच वापसी कर पाएंगी?

या फिर क्या ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक आत्मकथा लिखने का समय आ गया है?

यह रिपोर्ट ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर पर एक नजर डालते हुए आगे आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करती है और इन सवालों के जवाब खोजने का प्रयास करती है.

जादवपुर में सोमनाथ चटर्जी को हराकर उदय

साल 1976 में महज 21 साल की उम्र में ममता बनर्जी, कांग्रेस (आई) की पश्चिम बंगाल राज्य महिला यूनिट की महासचिव बनीं. कुछ सालों बाद वह अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव बनीं.

कोलकाता स्थित राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी ने बीबीसी को बताया, "ममता बनर्जी के विशेष गुणों में से एक उनका जुझारूपन और कड़ी मेहनत करने की क्षमता है. ममता ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बाधाओं का सामना किया है. 2001 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस लगभग खत्म हो गई थी. लेकिन उन्होंने फिर से उठकर पार्टी को दोबारा खड़ा किया. यह उनकी संघर्ष करने की क्षमता का प्रमाण है."

प्रतीची ट्रस्ट नामक एक शोध संस्थान में कोऑर्डिनेटर साबिर अहमद ने बीबीसी को बताया, "कई छोटी-छोटी घटनाएं हुईं, जिनके जरिए उन्होंने उस समय कांग्रेस के बड़े नेताओं का ध्यान आकर्षित किया. लेकिन सबसे बड़ी घटना 1984 के लोकसभा चुनाव में सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ सीपीएम नेता को हराना था."

यह वाकई एक बड़ी घटना थी. ममता बनर्जी ने कोलकाता के जादवपुर लोकसभा क्षेत्र में दिग्गज कम्युनिस्ट नेता को हराकर भारत की सबसे युवा सांसदों में से एक बनने का गौरव हासिल किया.

हालांकि 1984 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की मौत के बाद कांग्रेस को भारी संख्या में सहानुभूति के वोट भी मिले.

लेकिन जादवपुर जैसे वामपंथी गढ़ में सोमनाथ चटर्जी जैसे नेता की एक अपेक्षाकृत अनजान युवा नेता से हार ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल मचा दी.

लेकिन ममता बनर्जी की लोकप्रियता में अभी जबरदस्त उछाल आना बाकी था. तब तक वह दिल्ली में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की नजरों में भी आ चुकी थीं.

इसके बाद 1989 के चुनावों में भारतीय राजनीति में कांग्रेस-विरोधी माहौल के बीच वह जादवपुर लोकसभा सीट से हार गईं.

लेकिन कुछ समय के बाद 1991 में वह कोलकाता दक्षिण से निर्वाचित होकर लोकसभा में वापस आईं.

ममता बनर्जी कई घटनाओं के कारण खबरों में रहीं. उन्होंने अपनी ही पार्टी पर सीपीएम का समर्थन करने का आरोप लगाया, संसद भवन में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, एक सांसद से हाथापाई की, पश्चिम बंगाल के साथ हो रहे कथित अन्याय के विरोध में रेल मंत्री पर अपनी शॉल फेंकी और सांसद पद से इस्तीफा दिया.

ममता बनर्जी पहली बार 1991 में केंद्र सरकार में राज्य मंत्री बनीं. उस वक्त पीवी नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे.

उन्हें 1999 में रेल मंत्री की जिम्मेदारी मिली. उस वक्त उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी.

सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों की भूमिका

ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की. बहुत ही कम समय में उनकी पार्टी वाम मोर्चा शासित पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से एक बन गई.

वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान, 2005 के बाद पश्चिम बंगाल में औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए कृषि भूमि के आवंटन की कई घटनाओं को लेकर जनता में असंतोष पैदा हुआ.

सिंगूर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के माध्यम से तृणमूल Congress पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल बन गई. नंदीग्राम में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 14 लोगों की मौत के बाद पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा विरोधी भावनाएं और तेज हो गईं.

नंदीग्राम में किसानों के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने के बाद ममता बनर्जी राज्य की सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक बन गईं.

साबिर अहमद ने कहा, "पश्चिम बंगाल में एक समय ऐसा था जब लोगों को लगता था कि वाम मोर्चे को कोई नहीं हटा सकता. लेकिन ममता बनर्जी ने नेतृत्व और साहस दिखाते हुए उनका सामना किया. वह भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर आम लोगों से जुड़ने में सफल रहीं."

शिखा मुखर्जी ने कहा, "शुरुआत में उनका नारा सिर्फ 'वाम मोर्चे को हटाओ' था. लेकिन बाद में, नंदीग्राम आंदोलन के माध्यम से, ग्रामीण लोगों के बीच उनका राजनीतिक आधार तैयार हुआ. इससे ममता बनर्जी की चुनावी जीत का रास्ता तैयार हुआ."

2009 के लोकसभा चुनावों में, तृणमूल ने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे से अधिक सीटें जीतीं.

और दो साल बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में राज्य में 34 साल से सत्ता में रहे वाम मोर्चे को विधानसभा चुनावों में हरा दिया.

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. तब से वह लगातार सत्ता में बनी हुई हैं.

इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने 2016 और 2021 के चुनावों में भारी बहुमत से जीत हासिल की.

विपक्ष में ममता बनाम सत्ता में ममता

ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के स्पष्ट रूप से दो चरण हैं. शुरुआत से लेकर 2011 तक वह मुख्य रूप से विपक्ष में रहीं. उनका मुख्य लक्ष्य पश्चिम बंगाल से वाम मोर्चा को हटाना था. अगले 15 साल तक मुख्यमंत्री के तौर पर वह सत्ता के शीर्ष पर रहीं.

मुख्यमंत्री के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें और उनकी पार्टी को गहराई से प्रभावित किया है.

सादगीपूर्ण जीवनशैली लंबे समय से उनकी ईमानदारी की पहचान थी.

चुनावी रैलियों के दौरान उन्होंने कहा, "अगर कोई ग़लती करता है, तो आप मुझे थप्पड़ मारें, मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी. अगर आप मुझे कहेंगे तो मैं घर जाकर बर्तन साफ कर दूंगी. लेकिन कृपया मुझे चोर मत कहिए, मुझ पर झूठे आरोप मत लगाइए."

हालांकि, विपक्षी बीजेपी या सीपीएम ने उन पर न केवल भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है, बल्कि प्रशासक के रूप में उद्योग को आकर्षित करने और रोजगार पैदा करने में विफल रहने का भी आरोप लगाया.

विपक्ष ने कहा कि पिछले डेढ़ दशक में राज्य में एक भी बड़ा निवेश नहीं आया है.

दरअसल, दिवंगत दिग्गज वामपंथी नेता श्यामल चक्रवर्ती का मानना था कि सड़कों पर संघर्ष ने ममता बनर्जी को एक विपक्षी नेता के रूप में स्थापित किया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही खूबियां उनके लिए मुश्किल बन गईं.

ठीक दस साल पहले चक्रवर्ती ने बीबीसी से कहा था, "साहित्यकार संजीव चंद्र चटर्जी ने एक बार लिखा था कि जंगल में जंगली जानवर सुंदर होते हैं. बच्चे अपनी माताओं की गोद में होते हैं. मैं इसे थोड़ा घुमाकर कहना चाहूंगा कि जंगल में जंगली जानवर सुंदर होते हैं और ममता बनर्जी विपक्षी दल में."

व्यक्तिगत लोकप्रियता में कमी?

पश्चिम बंगाल में लोगों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता चाहे कितने भी भ्रष्ट क्यों न हों, पार्टी की शीर्ष नेता पर कभी कोई दाग नहीं है.

कई लोगों का मानना था कि वह व्यक्तिगत रूप से भ्रष्टाचार से पूरी तरह दूर हैं.

ममता बनर्जी के बेहद करीबी रहे बुद्धिजीवी और कवि सुबोध सरकार ने एक बार कहा था कि आम लोगों के साथ उनका असाधारण जुड़ाव ही उनकी अपार लोकप्रियता का कारण था.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "जिस तरह से वे समाज के सबसे ग़रीब तबके के लोगों के साथ घुलमिल जाती थीं, जिस तरह से वे उनके आंगनों में बैठकर उनकी भाषा में बात करती थीं, उसी वजह से वे जनता की चहेती बन गईं. याद रखिए, 34 साल में जनता और कम्युनिस्टों के बीच एक बहुत बड़ी दूरी पैदा हो गई थी."

एक ज़माने में कांग्रेस नेता और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर ओम प्रकाश मिश्रा को लगा कि वह संसदीय राजनीति की गरिमा बनाए नहीं रख सकतीं.

डॉ मिश्रा ने एक बार बीबीसी से कहा था, "मैं ममता के व्यक्तित्व, हाव-भाव या भाषा कौशल के बारे में कुछ नहीं कहूंगा. लेकिन मुझे यह कहना ही पड़ेगा कि वह सारी सत्ता अपने हाथों में लेना चाहती हैं."

यह इंटरव्यू देने के कुछ सालों बाद डॉ मिश्रा खुद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए.

लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता या उनकी अपनी छवि अब पार्टी की सभी विफलताओं को छिपाने और तृणमूल कांग्रेस को जिताने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

क्या अब वापसी मुमकिन है?

कभी संघ परिवार के करीबी रहे और अब स्थानीय स्तर पर सक्रिय नागरिक संस्था से जुड़े अनुभवी पत्रकार रंतिदेव सेनगुप्ता के मुताबिक, ममता बनर्जी को राजनीति में अप्रासंगिक मानना एक गंभीर गलती होगी.

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "कुछ लोग कह रहे हैं कि ममता बनर्जी अप्रासंगिक हो गई हैं. कुछ लोगों ने इसे सच मान लिया है और हरीश चटर्जी स्ट्रीट से दूरी बनाए हुए हैं. मैं उन्हें याद दिला दूं कि ममता बनर्जी के पास 80 विधायक हैं. लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर 42 सांसद हैं और अभी भी उनके पास 41 प्रतिशत वोट बाकी हैं."

"किसी को रातोंरात अप्रासंगिक घोषित करने से पहले प्रणब मुखर्जी और अटल बिहारी वाजपेयी के उदाहरणों को याद रखें. राजनीति एक लंबी रेस है और केवल संख्या के आधार पर किसी को अप्रासंगिक घोषित करना मूर्खता होगी. यह बेहद बड़ी मूर्खता होगी."

हालांकि बीबीसी ने पिछले कुछ दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले कई लोगों से बात की है. उनका मानना है कि ममता बनर्जी के लिए स्थिति को पलटना बहुत मुश्किल होगा.

उनके अनुसार यह मुख्य रूप से तीन प्रमुख बातों पर निर्भर करेगा.

सबसे पहले, क्या ममता अपनी पार्टी को एकजुट रख पाएंगी?

इस शर्मनाक हार के बाद, तृणमूल कांग्रेस बिखर सकती है या विजयी खेमे में शामिल हो सकती है. यह एक संभावना है जो अब उभर रही है.

दूसरा, यह देखना दिलचस्प होगा कि वह टीम में अभिषेक बनर्जी के फैक्टर को कैसे संभालती हैं.

ममता बनर्जी के अघोषित उत्तराधिकारी उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और अहंकार के व्यापक आरोपों के चलते नेताओं और कार्यकर्ताओं में विरोध से जुड़ी कई बातें अब खुलकर सामने आने लगी हैं.

केंद्रीय एजेंसियां भी अभिषेक बनर्जी के खिलाफ भ्रष्टाचार मामलों में कार्रवाई कर सकती हैं.

लेकिन तीसरी बात शायद सबसे महत्वपूर्ण है.

एक सफल विपक्षी नेता के रूप में ममता के उल्लेखनीय ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, क्या वह राज्य की राजनीति में अपनी पुरानी पहचान को फिर से हासिल कर सकती हैं?

इसके लिए ममता को नई बीजेपी सरकार की 'ग़लतियों' का इंतजार करना होगा.

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि एक बार इस राज्य की जनता किसी पार्टी को सत्ता से बेदखल कर देती है, तो उसे दोबारा सत्ता में वापस आने नहीं देती.

ममता बनर्जी इस नियम का अपवाद बन पाएंगी या नहीं, यह काफी हद तक उन्हीं पर निर्भर करेगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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