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ब्रिक्स: क्या ईरान और इसराइल के बीच फंस गया है भारत?
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए बुधवार शाम नई दिल्ली पहुँचे हैं.
अराग़ची के भारत आने के कुछ घंटे बाद ही इसराइल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि फ़रवरी के अंत में ईरान के ख़िलाफ़ इसराइली और अमेरिकी हमले के दौरान बिन्यामिन नेतन्याहू ने यूएई का गोपनीय दौरा किया था. ईरानी विदेश मंत्री ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि इसराइल के साथ मिलीभगत माफ़ी के लायक नहीं है.
ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को यूएई के दौरे पर जा रहे हैं.
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में चीन के पहले दौरे पर बुधवार को बीजिंग पहुंचे हैं.
दूसरी तरफ़ नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक गुरुवार से शुरू हो रही है.
ट्रंप ब्रिक्स देशों को कई बार धमकी दे चुके हैं. सबसे दिलचस्प हैं कि ब्रिक्स के संस्थापक सदस्य चीन के विदेश मंत्री नई दिल्ली नहीं आ रहे हैं. ऐसा तब है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल एससीओ समिट में शामिल होने चीन गए थे.
2026 के लिए ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है और सितंबर महीने में समिट होने वाली है. ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में चीन के विदेश मंत्री के शामिल नहीं होने से उस आशंका को बल मिलेगा कि चीनी राष्ट्रपति सितंबर में आयोजित होने वाले ब्रिक्स समिट में भारत आएंगे या नहीं.
ब्रिक्स में ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका हैं. लेकिन 2024 में रूस के कज़ान में आयोजित ब्रिक्स समिट में इसके सदस्यों की संख्या बढ़ी थी. ब्रिक्स में नए सदस्यों के रूप में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया शामिल हुए थे.
संतुलन का संकट
2023 में जी-20 समिट का आयोजन नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में हुआ था और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नहीं आए थे. मई में क्वॉड के विदेश मंत्रियों की बैठक भी नई दिल्ली में होने वाली है. इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी शरीक होंगे.
क्वॉड को रूस और चीन अपने ख़िलाफ़ देखते हैं जबकि ब्रिक्स को अमेरिका अपने ख़िलाफ़ देखता है. ऐसे में भारत के लिए ब्रिक्स और क्वॉड के बीच संतुलन बनाना चुनौती भरा होता है.
भारत के पास ब्रिक्स की अध्यक्षता तब है, एक सदस्य देश ईरान को अमेरिका और इसराइल के हमलों का सामना करना पड़ा है.
ईरान चाहेगा कि भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स अमेरिका और इसराइल की कड़े शब्दों में निंदा करे. भारत ईरान के मामले में पहले से ही निशाने पर है. ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमले से ठीक पहले भारतीय प्रधानमंत्री ने तेल अवीव का दौरा किया था. उसके बाद वहां के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की मौत के बाद भी भारत के बहुत देर से प्रतिक्रिया देने पर भी भारत सवालों के घेरे में था.
इसराइल पिछले डेढ़ दशक में भारत का अहम रक्षा सहयोगी बनकर उभरा है. ऐसे में भारत के लिए यह आसान नहीं होगा कि ईरान को भी नाराज़ ना करे और इसराइल से भी सोहबत बनी रहे.
भारत और यूएई को छोड़ ब्रिक्स के सारे सदस्य देश इसराइल की कड़ी आलोचना कर रहे हैं. ऐसे में ब्रिक्स देशों में बहुमत का समर्थन ईरान के साथ है. ये चुनौती तो अभी विदेश मंत्रियों की बैठक में है लेकिन जब सितंबर में शिखर सम्मेलन होगा तो चीज़ें और जटिल हो सकती हैं.
अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हवाई हमले शुरू किए जाने के बाद ब्रिक्स समूह युद्ध पर कोई साझा रुख़ नहीं ले पाया है. इन हमलों में ईरान के शीर्ष नेतृत्व की मौत हुई थी और इसके बाद वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया.
भारत की विदेश नीति पर सवाल
गतिरोध की सबसे बड़ी वजह यह है कि समूह के कई सदस्य इस संघर्ष में अलग-अलग पक्षों के क़रीब हैं, जिससे किसी कठोर साझा सहमति तक पहुँचना मुश्किल रहा है.
ईरान 2024 से ब्रिक्स का सदस्य है. ईरान ने अमेरिका और इसराइली हमलों के जवाब में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब पर रॉकेट दागे थे. यूएई भी 2024 में ब्रिक्स में शामिल हुआ जबकि सऊदी अरब अभी सदस्यता के निमंत्रण पर विचार कर रहा है.
चीन और रूस ईरान को समर्थन दे सकते हैं. ऐसे में भारत के लिए स्थिति और जटिल हो सकती है.
चीन और इसराइल में भारत के राजदूत रहे शिवशंकर मेनन ने इसी महीने नौ मई को निक्केई एशिया को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''ब्रिक्स की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज़्यादा है. भले ही रूस और चीन ने इसे एक पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में आकार देने की कोशिश की हो, लेकिन इसके कई नए सदस्य अमेरिका के साथ क़रीबी संबंध रखते हैं. यह समूह जनसंख्या, संसाधनों और पूंजी से समृद्ध विविध देशों को साथ लाता है. इससे इसकी आर्थिक क्षमता काफ़ी मज़बूत बनती है.''
मेनन ने कहा था, ''इसके विपरीत, संयुक्त राष्ट्र अब प्रभावी ढंग से अपना काम नहीं कर पा रहा है. जब सदस्य देश आपसी संघर्ष में हों, तो संस्था लगभग निष्क्रिय हो जाती है. सुधार करना भी बेहद कठिन है, क्योंकि इसकी मूल संरचना और चार्टर इस तरह बनाए गए थे कि संस्थापक शक्तियों का प्रभुत्व बना रहे. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनना अब पहले जैसा महत्वपूर्ण नहीं रह गया है.
अव्यवस्था और भ्रम के इस दौर में सहयोग उन देशों के बीच होना चाहिए जिनके पास किसी विशेष मुद्दे पर न केवल इच्छा बल्कि क्षमता भी हो.''
मेनन ने कहा था, ''मिसाल के तौर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा का मुद्दा क्वॉड जैसे समूह संभाल सकते हैं, जबकि साइबर सुरक्षा या ऊर्जा सुरक्षा के लिए पूरी तरह अलग साझेदारियां और मंचों की ज़रूरत होगी. देशों को हर समस्या के अनुसार, अपने साझेदार चुनने होंगे और उसी आधार पर बहुपक्षीय ढांचों को नए सिरे से तैयार करना होगा.''
ब्रिक्स की प्रासंगिकता
कई लोगों का मानना है कि अगर ब्रिक्स मौजूदा दौर के सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर ठोस प्रतिक्रिया देने में नाकाम रहता है, तो उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े होंगे.
इस युद्ध ने विशेष रूप से भारत को कूटनीतिक दुविधा में डाल दिया है और ब्रिक्स में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका के कारण यह दबाव और बढ़ गया है.
भारत के अमेरिका और इसराइल दोनों के साथ क़रीबी संबंध हैं. दूसरी ओर भारत के ईरान के साथ भी ऐतिहासिक संबंध हैं और भारत होर्मुज से गुजरने वाले तेल और गैस पर काफ़ी निर्भर है.
इसके अलावा भारत के यूएई और अन्य खाड़ी देशों के साथ भी मज़बूत आर्थिक संबंध हैं. खाड़ी के देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं.
ब्रिक्स को खुलकर बोलने के लिए प्रेरित करने का दबाव अब सार्वजनिक रूप से भी दिखा है. मार्च महीने में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़श्कियान ने पीएम मोदी से कहा था कि ब्रिक्स को "ईरान के ख़िलाफ़ आक्रमण रोकने और क्षेत्रीय शांति के साथ स्थिरता की रक्षा करने में स्वतंत्र भूमिका निभानी चाहिए. यह जानकारी भारत में ईरानी दूतावास ने दी थी.
ईरान पर इसराइली और अमेरिकी हमले के दौरान भारत के रुख़ के लेकर देश के भीतर भी सवाल उठते रहे हैं. भारत की विदेश नीति पर भी सवाल खड़े किए गए.
शिवशंकर मेनन ने इस दौरान भारत की विदेश नीति को लेकर निक्केई एशिया से कहा, ''भारत कई स्तरों पर प्रभावित हो रहा है. अगर होर्मुज़ बंद होता है और कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़ती हैं, तो ऊर्जा और उर्वरक की लागत में भारी उछाल आएगा, जिसका सीधा असर शासन और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.''
मेनन ने कहा, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस मुद्दे पर चुप्पी कुछ असामान्य लगती है. यह पारंपरिक भारतीय कूटनीति की शैली नहीं रही है. हालांकि, मध्यस्थ के रूप में आगे न बढ़ना एक समझदारी भरा फ़ैसला था. किसी भी मध्यस्थ को तटस्थ होना पड़ता है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में 90 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है. इसका मतलब है कि भारत वास्तव में पूरी तरह तटस्थ नहीं रह सकता.''
''साथ ही यह तर्क भी ग़लत है कि भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" वाली विदेश नीति अपनी सीमा तक पहुंच गई है. लोग स्वायत्तता और तटस्थता को एक-दूसरे से भ्रमित कर रहे हैं. स्वायत्तता का अर्थ यह है कि किसी भी समय अपने हित में सबसे उपयुक्त विकल्प चुनने का अधिकार होना. भारत की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं, आर्थिक विकास और अपने लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना.''
युद्ध से पहले इसराइल दौरा
भारत में विपक्षी पार्टियां सवाल पूछती रहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले से महज दो दिन पहले तेल अवीव में क्यों थे.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर में विजिटिंग सीनियर रिसर्च फेलो श्रीनाथ राघवन ने अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से इस मामले में कहा था, "यह लापरवाह क़दम था और इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी."
राघवन ने कहा था, ''मध्य-पूर्व में भारत की नीति संतुलन पर आधारित थी, जिसे वह अब तक संभालता आया था. लेकिन अब भारत को इस युद्ध में पूरी तरह आक्रामक पक्ष के साथ खड़ा माना जा रहा है. यह ऐसा युद्ध है, जिसे क्षेत्र के अधिकांश बड़े देश नहीं चाहते थे, भले ही अब वे ईरान के ख़िलाफ़ दिखाई दे रहे हों क्योंकि उनका मानना है कि ईरान ने उन्हें इस संघर्ष में खींच लिया.''
राघवन के मुताबिक़, ''मोदी की विदेश नीति काफ़ी हद तक व्यक्तिगत संबंधों और इस विश्वास पर आधारित है कि दूसरे नेता उनके प्रति सम्मान रखते हैं. हालांकि हाल में ट्रंप के साथ संबंधों ने दिखाया है कि चीज़ें हमेशा इस तरह नहीं चलतीं.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.