नीट परीक्षा कराने में क्या कोई ख़ामी है और कहाँ हो सकता है पेपर लीक?

    • Author, शुभांगी मिश्रा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

3 मई 2026 को भारत भर में 22 लाख से अधिक स्टूडेंट्स उस परीक्षा में शामिल हुए, जिससे उन्हें उम्मीद थी कि वह उनकी ज़िंदगी बदल देगी.

नौ दिन बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनसीटी) ने पहली बार मेडिकल कोर्सों में दाख़िले के लिए होने वाली नीट (यूजी) की पूरी परीक्षा रद्द कर दी.

दोबारा परीक्षा की नई तारीख़ों की अभी घोषणा नहीं की गई है, जिससे स्टूडेंट्स और पैरेंट्स में प्रवेश प्रक्रिया में संभावित देरी को लेकर चिंता बढ़ गई है.

मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने कहा कि एजेंसी को 7 मई को परीक्षा के चार दिन बाद, एक व्हिसलब्लोअर से जानकारी मिली थी कि एक 'गेस पेपर' का पीडीएफ़ व्हाट्सऐप पर सर्कुलेट किया गया था, जिसमें वास्तविक नीट परीक्षा जैसे ही प्रश्न थे.

अभिषेक सिंह ने कहा, "परीक्षा में किसी भी तरह का उल्लंघन हमारी ज़ीरो-टॉलरेंस नीति के ख़िलाफ़ है और इससे उन 22 लाख छात्रों के भविष्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है जिन्होंने इस परीक्षा के लिए कड़ी मेहनत की थी."

नीट-यूजी भारत की एकमात्र एकीकृत मेडिकल प्रवेश परीक्षा है, जो देशभर में स्नातक मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश तय करती है.

पहले होने वाली कई राज्य-स्तरीय मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की जगह इस मानकीकृत परीक्षा ने ले ली थी, जो सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मान्य है.

लेकिन कथित पेपर लीक ने एक बार फिर बड़े पैमाने की परीक्षाएं निष्पक्ष और सुचारु रूप से कराने की एनटीए की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

परीक्षा रद्द होने के एक दिन बाद, फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत की निगरानी में परीक्षा दोबारा कराने और एनटीए को बदलने या उसके बुनियादी पुनर्गठन की मांग की.

साल 2024 में भी यह परीक्षा पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स देने में अनियमितताओं के आरोपों में घिरी रही थी, जिसके बाद हज़ारों अभ्यर्थियों को असामान्य रूप से अधिक नंबर मिलने पर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे.

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इन ताज़ा आरोपों की जांच कर रहा है. पूरे भारत में कई गिरफ्तारियां और हिरासत में लिए जाने की घटनाएं हुई हैं.

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नीट परीक्षा आयोजित कराना क्या बेहद मुश्किल है?

एनटीए से पहले केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) मेडिकल के लिए नीट और इंजीनियरिंग के लिए जेईई जैसी परीक्षाएं आयोजित करता था, जबकि राज्य बोर्ड और विश्वविद्यालय अपनी अलग प्रवेश परीक्षाएं कराते थे.

एनटीए की स्थापना नवंबर 2017 में भारत की उच्च शिक्षा प्रवेश परीक्षा व्यवस्था में सख्ती, मानकीकरण और विश्वसनीयता लाने और स्टूडेंट्स को कई परीक्षाओं के बोझ से राहत देने के उद्देश्य से की गई थी.

यह एजेंसी 15 से अधिक परीक्षाएं आयोजित कराती है.

लेकिन एनटीए लगातार समस्याओं से घिरी रही है और उस पर पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही की कमी के आरोप लगे हैं.

साल 2024 में सरकार को "परीक्षा की शुद्धता प्रभावित होने" का हवाला देते हुए यूजीसी-नेट परीक्षा पूरी तरह रद्द करनी पड़ी थी. इसी दौरान पेपर लीक के आरोप भी सामने आए, जिससे भारी आलोचना हुई.

हालांकि सरकार ने भ्रष्ट प्रथाओं पर कार्रवाई का वादा किया है, आलोचकों का कहना है कि इससे भी गहरी संरचनात्मक समस्याएं हैं जिन्हें देखे जाने की ज़रूरत है.

विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या परीक्षा केंद्रों, निरीक्षकों और कर्मचारियों के लिए आउटसोर्सिंग पर एजेंसी की भारी निर्भरता है, क्योंकि एनटीए अपने परीक्षा ढांचे के बड़े हिस्से पर सीधे नियंत्रण नहीं रखती, जिससे कमज़ोरियां पैदा होती हैं.

अभिषेक सिंह ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "परीक्षा सुचारु रूप से आयोजित हुई. 3 मई को कोई समस्या नहीं थी. परीक्षा से पहले या तुरंत बाद कोई शिकायत नहीं आई. हमने ओएमआर शीट्स की जांच शुरू की और सब कुछ वापस आ चुका था. परिवहन या परीक्षा संचालन में कोई समस्या नहीं थी."

उन्होंने कहा, "सरकार ऐसी परीक्षा कराने के लिए प्रतिबद्ध है जो घोटाला-मुक्त हो, जिसमें किसी तरह की गड़बड़ी न हो, और हमें यह सुनिश्चित करना होगा."

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'पेन और पेपर'

इंजीनियरिंग की जेईई जैसी परीक्षाएं अब ऑनलाइन हो चुकी हैं और कई शिफ्टों में आयोजित होती हैं, जबकि इसके उलट नीट अब भी पारंपरिक पेन-और-पेपर परीक्षा है.

आलोचकों का कहना है कि इससे भारी लॉजिस्टिक चुनौती पैदा होती है. हज़ारों प्रश्नपत्र सुरक्षित वाहनों से देशभर के लगभग 5,500 परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने पड़ते हैं, जिससे पूरी परिवहन श्रृंखला सुरक्षा उल्लंघन के लिए संवेदनशील हो जाती है.

अभिषेक सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "यह (कंप्यूटर आधारित परीक्षा) तय करना एनटीए का काम नहीं है. यह फ़ैसला संबंधित मंत्रालय को लेना है."

एनटीए कुछ सुरक्षा उपाय अपनाती है. बताया जाता है कि प्रश्नपत्र सुरक्षित डिजिटल लॉक में रखे जाते हैं और परीक्षा से 45 मिनट पहले अपने आप खुलने चाहिए.

इन बक्सों को परीक्षा केंद्रों पर कड़ी सुरक्षा वाले स्ट्रॉन्गरूम में रखा जाता है.

हालांकि कई लोगों का दावा है कि एनटीए के सामने अब भी लॉजिस्टिक चुनौतियां बनी हुई हैं.

कोटा में कोचिंग सेंटर मोशन एजुकेशन के संस्थापक और सीईओ नितिन विजय ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कहीं ओर लाखों स्टूडेंट्स की पेन और पेपर से परीक्षा एक ही दिन, एक ही शिफ्ट में कराई जाती है."

"इस परीक्षा के लिए 5,500 केंद्रों और 550 शहरों में दो लाख से अधिक वॉलंटियर्स, वेंडर्स और अधिकारी शामिल होते हैं. इतने बड़े पैमाने पर परीक्षा कराने से ख़ामियों की संभावना बढ़ जाती है."

नितिन विजय ने कहा कि एनटीए ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के प्रयास किए और केंद्रों पर नक़ल रोकने पर ध्यान दिया, लेकिन "लगता है कि पेपर केंद्र तक पहुंचने से पहले ही लीक हो गया."

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ जांचकर्ताओं का मानना है कि कथित पेपर लीक परीक्षा से कुछ दिन पहले राजस्थान में शुरू हुआ था.

एजुकेशन पोर्टल करियर 360 के संस्थापक और चेयरमैन महेश्वर पेरी ने कहा, "सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फ़ीस 2 से 4 लाख रुपये है, जबकि निजी संस्थान एक करोड़ रुपये तक वसूल सकते हैं. अगर सरकारी और निजी सीट के बीच 85-90 लाख रुपये का अंतर है, तो स्टूडेंट्स 30 लाख रुपये देकर पेपर ख़रीदने से नहीं हिचकता."

"पेपर लीक करने वाले जानते हैं कि इतनी ऊंची क़ीमत पर भी ख़रीदार मौजूद हैं."

विशेषज्ञों का कहना है कि नीट अब भी पेन और पेपर से इसलिए होता है ताकि सभी आर्थिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि के छात्रों को समान अवसर मिले, क्योंकि कंप्यूटर ग़रीब या ग्रामीण छात्रों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकते. लेकिन इस तर्क पर अब सवाल उठ रहे हैं.

पूर्व इसरो अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सात सदस्यीय पैनल ने कथित तौर पर पेन और पेपर से होने वाली परीक्षा से कंप्यूटर आधारित परीक्षा की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की सिफारिश की थी.

नितिन विजय कहते हैं, "कहा जाता है कि कंप्यूटर आधारित परीक्षा ग्रामीण छात्रों के साथ अन्याय करेगी, लेकिन पिछले 5-10 सालों में इंटरनेट की पहुंच काफ़ी बढ़ी है. हमें परीक्षा का प्रारूप बदलने की कोशिश करनी चाहिए."

हालांकि पेरी ने चेतावनी दी कि ऑनलाइन परीक्षा आयोजित होने से कुल भागीदारी कम हो सकती है.

परीक्षा में चूक

कर्मचारियों की कमी एक और समस्या है. हालांकि एजेंसी कई परीक्षाएं आयोजित करती है, दिसंबर 2024 तक उसके पास केवल 22 स्थायी कर्मचारी थे, साथ ही 38 संविदा और 138 आउटसोर्स कर्मचारी थे.

दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने कहा, "सवाल यह है कि वह इतनी सारी परीक्षाएं और इतने परीक्षा केंद्रों का प्रबंधन कैसे करेगी."

"यह ऐसा निकाय नहीं लगता जो पूरे राष्ट्रीय स्तर पर इतनी परीक्षाएं कराने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हो."

राधाकृष्णन समिति ने एनटीए के पुनर्गठन और दो लाख से अधिक अभ्यर्थियों वाली परीक्षाओं के लिए कई सत्रों की सिफारिश की थी.

इनमें से कुछ सिफ़ारिशों को सरकार ने लागू किया है, जिनमें 16 स्थायी नेतृत्व पद जोड़ना शामिल है.

क्या बहुत अधिक केंद्रीकरण समस्या है?

लॉजिस्टिक्स से आगे, कई शिक्षाविदों और आलोचकों ने एक बुनियादी आपत्ति उठाई है कि केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली एक त्रुटिपूर्ण मॉडल है.

उनका कहना है कि एक हाई-स्टेक्स परीक्षा भारत के विशाल और महंगे कोचिंग उद्योग के पक्ष में माहौल बना देती है और उन छात्रों को नुकसान पहुंचाती है जो इसका ख़र्च नहीं उठा सकते.

महेश्वर पेरी ने कहा, "प्रवेश परीक्षा उन छात्रों के ख़िलाफ़ काम करती है जो कोचिंग का ख़र्च नहीं उठा सकते."

"हमें छात्रों के भविष्य को एक ही प्रवेश परीक्षा पर निर्भर रहने से कम करना चाहिए. स्कूल परीक्षाओं के प्रदर्शन को भी महत्व दिया जाना चाहिए."

प्रख्यात शिक्षाविद अनीता रामपाल ने भी कहा कि केंद्रीकृत परीक्षाएं उन बच्चों को फ़ायदा देती हैं जो कोचिंग का ख़र्च उठा सकते हैं.

वहीं नितिन विजय एक संतुलित राय देते हुए कहते हैं कि एनटीए का अस्तित्व समस्या नहीं है, लेकिन उसकी प्रक्रियाओं में तत्काल सुधार की ज़रूरत है, जिसमें अधिक स्थायी कर्मचारी, मज़बूत संस्थागत क्षमता और कंप्यूटर आधारित परीक्षा की ओर गंभीर क़दम शामिल है.

भारत एक ऐसा देश है जहां सामाजिक उन्नति के साधन के रूप में परीक्षाओं पर बहुत भरोसा किया जाता है. फ़िलहाल, छात्रों को एक बार फिर इंतज़ार करना होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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