शुभेंदु अधिकारी कोलकाता के किस ऐतिहासिक भवन से सरकार चलाएंगे?

    • Author, प्रत्यूष राय
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला, दिल्ली
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारी जीत के बाद छह मई को बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने पत्रकारों से कहा था- "हमारी सरकार राइटर्स बिल्डिंग से चलेगी."

लाल रंग की यह इमारत स्वाधीन भारत में कोलकाता और उससे पहले ब्रिटिश शासन के दौरान पूरे देश की सत्ता का केंद्र रही है.

सत्ता का केंद्र होने के कारण ही बंगाल के स्वाधीनता सेनानी विनय, बादल और दिनेश ने इस इमारत पर हमला किया था. अब इन तीनों की प्रतिमाएं इस इमारत के सामने के परिसर में सिर उठाए खड़ी हैं.

लेकिन वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने करीब दो साल बाद यहां से सचिवालय हटा लिया था.

उस समय यहां काम करने वाले ज़्यादातर विभाग दूसरी जगह चले गए.

हुगली नदी के पार हावड़ा जिले के शिवपुर में जो बहुमंजिला इमारत पहले हुगली रिवर ब्रिज कमिश्नर और सरकारी वस्त्र विपणन समिति का दफ्तर थी, वही पश्चिम बंगाल सरकार का मुख्य सचिवालय बन गई.

नवान्न नामक इस 14-मंजिला इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दफ्तर बन गया.

राइटर्स बिल्डिंग से सचिवालय को नवान्न में ले जाते समय सरकार ने दलील दी थी कि यह इमारत बहुत पुरानी हो गई है,. राज्य का लोक निर्माण विभाग वर्ष 2013 से ही उसकी मरम्मत और जीर्णोद्धार का काम कर रहा है. अब तक यह काम पूरा नहीं हो सका है.

लेकिन राइटर्स बिल्डिंग से सचिवालय हटाने के बाद बीते करीब 13 साल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार भी नहीं कहा कि वो नवान्न छोड़ कर इस ऐतिहासिक इमारत में लौटने की इच्छुक हैं.

अब बीजेपी ने सचिवालय को राइटर्स बिल्डिंग में शिफ्ट करने का फैसला किया है. इस पर सोशल मीडिया में मजाकिया लहजे में कहा जा रहा है कि सरकार नीली इमारत से लाल इमारत में लौट रही है. दरअसल नवान्न का रंग सफेद और नीला है और राइटर्स का लाल.

लेकिन राइटर्स बिल्डिंग क्यों और कैसे सत्ता का केंद्र बन गई?

राइटर्स बिल्डिंग का इतिहास

वर्ष 1777 में थॉमस लियोन नामक एक ब्रिटिश वास्तुकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए 'राइटर्स बिल्डिंग' का डिजाइन और नक्शा तैयार किया था.

वह कंपनी उस समय भारत में अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को व्यवस्थित करना चाहती थी. इसी सिलसिले में वह तत्कालीन बंगाल प्रांत में ब्रिटिश शासन की ओर से उगाहे जाने वाले टैक्स का हिसाब-किताब एक ही छत के नीचे लाना चाहती थी.

इतिहास से संबंधित सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वाले रेडियो होस्ट दीपांजन घोष बताते हैं, "इस समय जहां राइटर्स बिल्डिंग है वहां पहले एक चर्च था. 1756 में एक युद्ध के दौरान इसे ढहा दिया गया था. बाद में इस ज़मीन को प्रशासनिक सहूलियत के लिए ले लिया गया."

दीपांजन बताते हैं, "उस समय सरकारी दस्तावेज हाथ से तैयार किए जाते थे. यह काम करने वाले कर्मचारियों के कामकाज और रहने के लिए इस इमारत को बनाया गया था."

इन कर्मचारियों को औपचारिक तौर पर राइटर के नाम से जाना जाता था. इसी वजह से इस इमारत का नाम राइटर्स बिल्डिंग पड़ा.

राइटर्स बिल्डिंग की यूरोपीय सजावट

सरकारी कर्मचारियों को बांग्ला में 'करनिक' या आम तौर पर प्रचलित भाषा में 'किरानी' कहा जाता है. कई भाषाविदों का मानना है कि इसी कारण इस भवन को बांग्ला में 'महाकरन' के नाम से जाना जाने लगा.

राइटर्स बिल्डिंग में संरक्षित पुराने दस्तावेजों से पता चलता है कि तत्कालीन कलकत्ता (अब कोलकाता) के फोर्ट विलियम को केंद्र में रखते हुए गठित फोर्ट विलियम प्रेसीडेंसी के तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने इस परियोजना की देख-रेख का जिम्मा संभाला था.

राइटर्स बिल्डिंग कलकत्ता की पहली तीन मंजिला इमारत थी.

पहले पूरी तरह व्यावहारिक इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए इस भवन का निर्माण किया गया था. राइटर्स बिल्डिंग के कुछ पुराने स्केच से इसका पता चलता है.

उस समय इस इमारत में मौजूदा दौर की तरह ग्रीक और रोमन शैलियों की झलक नजर नहीं आती थी. बिना किसी खास साज-सज्जा के इस सामान्य भवन के शुरुआती दौर में 19 आवासीय कमरे थे. हर कमरे में खिड़कियों की तीन-तीन कतारें थी.

'द गार्डियन' अखबार में छपे अपने लेख 'कलकत्ता-ए हिस्ट्री आर सिटीज इन फिफ्टी डेज' में श्रीनाथ पेरू का दावा है कि उस समय यह इमारत अपनी 'बदसूरती' के कारण अंग्रेजों के लिए एक 'भद्दी' चीज़ या 'आंखों की किरकिरी' बन गई थी.

बंगाल में नवाबों के पतन के बाद भारत में ब्रिटिश सरकार के व्यावसायिक हित धीरे-धीरे बढ़ने लगे थे. उसके बाद सरकार के कई दफ्तर धीरे-धीरे इस इमारत में शिफ्ट होने लगे.

वर्ष 1800 से 1882 के बीच कई सरकारी ट्रेनिंग कॉलेज, रेलवे मुख्यालय और बंगाल प्रेसीडेंसी के कई सचिवालयों को इस भवन में स्थानांतरित कर दिया गया.

दीपांजन घोष बताते हैं, "राइटर्स बिल्डिंग में इस समय यूरोपीय सौंदर्य बोध की जो झलक नजर आती है वो वर्ष 1882 और 1889 के बीच की है. राइटर्स को उसी दौरान ग्रीको-रोमन स्वरूप मिला था."

इस भवन के केंद्रीय हिस्से में प्रवेशद्वार के पास बना पोर्टिको या यूरोपीय शैली की छतरी और लाल ईंटों से बना बाहरी हिस्सा इस स्थापत्य शैली की खासियतों में शामिल था.

विक्टोरिया कालीन ब्रिटिश प्रशासन इस सरकारी इमारत को सत्ता का एक प्रत्यक्ष प्रतीक बनाना चाहता था. इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ही 'राइटर्स बिल्डिंग' को फ्रांसीसी पुनर्जागरण शैली में नए सिरे से डिजाइन किया गया था.

राइटर्स बिल्डिंग के दस्तावेजों से पता चलता है कि इस पुनर्निर्माण और सुधार के तहत ही भवन की छत पर यूरोपीय शैली के प्राचीर या चारदीवारी का निर्माण किया गया. उसके बाद वर्ष 1883 में विलियम फ्रेडरिक वुडिंगटन की बनाई गई कलात्मक मूर्तियों को छत के किनारे स्थापित किया गया था.

केंद्रीय पोर्टिको के ठीक ऊपर रोमन देवी मिनर्वा की प्रतिमा स्थापित की गई. मिनर्वा को ज्ञान, कला, वाणिज्य और रणनीतिक युद्ध की देवी माना जाता है और उनको ग्रीक देवी एथेना के समकक्ष रखा जाता है.

स्वाधीनता संग्राम में राइटर्स बिल्डिंग

राइटर्स बिल्डिंग जैसे-जैसे सत्ता का केंद्र बनती गई, स्वाधीनता सेनानियों की नज़र में यह शोषण का केंद्र भी बनी.

इस इमारत के बरामदे में ऑपरेशन राइटर्स बिल्डिंग के तहत स्वाधीनता सेनानियों का हमला इस भवन के इतिहास से जुड़ा है. वर्ष 1930 में आठ दिसंबर को भूमिगत क्रांतिकारी दल बंगाल वॉलंटियर्स के सदस्य विनय बसु, बादल गुप्त और दिनेश गुप्त राइटर्स बिल्डिंग की ओर रवाना हुए थे.

उन्होंने यूरोपीय पोशाक पहन रखी थी ताकि देखने में वो राइटर्स बिल्डिंग के भारतीय कर्मचारी लगें. लेकिन उन तीनो ने अपनी पोशाक में गोलियों से भरी रिवॉल्वर छिपा रखी थी.

इस भवन में भीतर घुसते ही उन लोगों ने पुलिस के कुख्यात आईजी एनएस सिम्पसन की गोली मारकर हत्या कर दी. सिम्पसन जेल में रहने वाले भारतीय स्वाधीनता सेनानियों पर निर्मम अत्याचार के लिए कुख्यात थे.

उनकी हत्या के बाद विनय, बादल और दिनेश ने पूरे भवन पर कब्जा कर लिया और उसके बरामदों में शीघ्र दोनों और से फायरिंग शुरू हो गई.

लेकिन कोलकाता पुलिस के जवानों की भारी तादाद के कारण यह तीनों ज्यादा देर तक मुकाबले में नहीं टिक सके और घिर गए.

इस घटना से साबित होता है कि राइटर्स बिल्डिंग पर कब्जा करना क्रांतिकारियों के लिए सत्ता पर कब्जा करने के बराबर हो गया था.

आजादी के बाद राइटर्स बिल्डिंग

भारत के स्वाधीन होने के बाद राइटर्स बिल्डिंग या 'महाकरन' से ही राज्य का शासन चलने लगा. वामपंथी सरकार के 34 साल के शासनकाल के दौरान इस भवन के सामने कई विरोध प्रदर्शन, धरना और जुलूस आयोजित किए गए.

इनमें सात जनवरी, 1993 को तत्कालीन कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुआ विरोध प्रदर्शन सबसे प्रमुख है. तीन घंटे के प्रदर्शन के बाद पुलिस ने उनको जबरन राइटर्स बिल्डिंग से निकाल दिया था.

अखबारो में छपी खबरों के मुताबिक, ममता बनर्जी ने उस समय कसम खाई थी कि वो मुख्यमंत्री नहीं बनने तक कभी राइटर्स बिल्डिंग में कदम नही रखेंगी. उन्होंने अपनी इस कसम को निभाया भी. हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद वो महज दो साल ही इस भवन से काम कर सकीं थीं.

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष ने हालांकि राइटर्स बिल्डिंग से ही सरकार के संचालन की बात कही है. लेकिन जानकारों का कहना है कि सरकार के गठन के फौरन बाद बीजेपी के मंत्रियों के लिए इस भवन से काम करना संभव नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि इसकी मरम्मत का काम अब तक पूरा नहीं हो सका है.

लेकिन राज्य के लोक निर्माण विभाग ने अगर काम की गति बढ़ाई तो कुछ दिन अस्थायी ठिकाने से काम करने के बाद सरकार इस भवन में शिफ्ट हो सकती है.

राइटर्स में सचिवालय लौटाने में समस्या कहां है?

दीपांजन घोष बताते हैं कि किसी भी सचिवालय के लिए सुरक्षा का एक प्रोटोकॉल होता है. मंत्रियों की सुरक्षा के लिए उस इमारत के आस-पास कई तरह की बैरिकेडिंग होती है और ट्रैफिक की आवा-जाही भी नियंत्रित की जाती है.

उनका कहना था, "राइटर्स से सचिवालय हट जाने के बाद आम लोगों को उसके सामने वाली सड़क से बेरोकटोक आवाजाही करने का मौका मिला था. उस इलाके में ट्रैफिक जाम की समस्या भी काफी हद तक नियंत्रण में है. ऐसे में अब सचिवालय उसी भवन में शिफ्ट करने पर कोलकाता के इस व्यस्ततम इलाके में ट्रैफिक की समस्या गंभीर होने की आशंका है. इसके अलावा नवान्न में सचिवालय के लिए तमाम सुख-सुविधाएं हैं."

दीपांजन घोष इस बात पर चिंता जताते हैं कि राइटर्स बिल्डिंग जैसी एक पुरानी इमारत को आधुनिक दौर में सरकार के संचालन के लिए किस हद तक उपयोगी बनाया जा सकता है.

हालांकि कोलकाता स्थित वास्तुकार और प्राचीन भवन जीर्णोद्धार विशेषज्ञ मनीष चक्रवर्ती ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "किसी पुरानी इमारत को आधुनिक काम के लिए तैयार करना आम तौर पर चुनौतीपूर्ण है. लेकिन राइटर्स बिल्डिंग के मामले में ऐसी समस्या नहीं है. इसकी वजह यह है कि इस भवन का निर्माण शासन के संचालन के लिए ही किया गया था."

मनीष कहते हैं, "यह बिल्डिंग इस महानगर की एक पहचान है. हर बिल्डिंग सिर्फ़ ईंट-पत्थर से बना एक ढांचा ही नहीं होता, उसके पीछे एक विचार छिपा होता है. इस बिल्डिंग के स्थापत्य में वह विचार है- सत्ता. इसी वजह से मौजूदा दौर के साथ ताल मिलाते हुए दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक का भी जीर्णोद्धार करना पड़ा है."

वो कहते हैं कि इस समय तमाम शहर देखने में एक जैसे बनते जा रहे हैं. चक्रवर्ती का कहना था, "ट्रैफिक की आवाजाही के लिए राइटर्स बिल्डिंग की स्थिति बेहद अहम है. इसलिए इसके लिए सटीक योजना बनानी होगी. हालांकि हमारे देश में योजना को लागू करने का स्तर उतना बेहतर नहीं है."

मनीष कहते हैं, "सचिवालय का इस भवन में लौटना पूरी दुनिया को एक संदेश दे सकता है कि हम साझा सांस्कृतिक इतिहास पर भरोसा करते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.