शुभेंदु अधिकारी: ममता बनर्जी के करीबी से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बनने तक का सफ़र

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है.

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह समेत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कई नेताओं की मौजूदगी में बांग्ला भाषा में शपथ ली.

उनके साथ दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया, खुदीराम टुडू और निशिथ प्रमाणिक ने भी मंत्री पद की शपथ ली.

वहीं शुक्रवार को बीजेपी नेता और गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में घोषणा की थी कि शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री होंगे. विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने 207 सीटें जीती हैं.

गृह मंत्री अमित शाह ने शुभेंदु अधिकारी के नाम की घोषणा करते हुए कहा था, "भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्यों की बैठक यहां की गई है. उस बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने मुझे और मोहन चरण माझी जी को केंद्र की ओर से पर्यवेक्षक के रूप में भेजा था."

"कुछ समय पहले ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी हुई है. लगभग आठ प्रस्ताव और समर्थन प्राप्त हुए हैं. और सभी प्रस्ताव और समर्थन एक ही नाम के मिले हैं. दूसरे नाम के लिए भी समय दिया गया लेकिन दूसरा नाम नहीं आया है."

"मैं केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में शुभेंदु अधिकारी जी को पश्चिम बंगाल विधान मंडल दल के नेता रूप में निर्वाचित घोषित करता हूं."

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अगर तृणमूल कांग्रेस के किले को ढहाते हुए सत्ता तक पहुंचने में कामयाबी हासिल की है तो काफ़ी हद तक इसका श्रेय शुभेंदु अधिकारी को भी जाता है.

राजनीतिक सक्रियता और आक्रामक तेवरों के कारण पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की आंखों का तारा बने शुभेंदु मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार के तौर पर सामने आए थे.

शुभेंदु को साल 2020 तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नंबर दो माना जाता था. लेकिन पार्टी में अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने उनको धीरे-धीरे हाशिए पर पहुंचा दिया था. उसके बाद 2021 के चुनाव के ठीक पहले उन्होंने बीजेपी का दामन थामा था.

बीजेपी में शामिल होने के क़रीब चार महीने के भीतर हुए उस विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने पार्टी को तीन से 77 सीटों तक पहुंचा दिया था.

हालांकि पार्टी के केंद्रीय नेताओं ने तब 'अबकी बार दो सौ पार' का नारा दिया था. वह सपना तो उस समय पूरा नहीं हो सका था. लेकिन तीन से 77 सीटों तक पहुंचना भी उसके लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं थी.

अब पांच साल बाद पार्टी ने बंगाल में ममता बनर्जी की 15 साल पुरानी सरकार को सत्ता से हटा दिया है.

ज़मीन पर रहे शुभेंदु अधिकारी

इससे 'अंग-बंग और कलिंग' (बिहार, बंगाल और ओडिशा) पर काबिज़ होने का बीजेपी का पुराना सपना भी साकार हो गया है. इनमें से अंग और कलिंग पर तो वह पहले से काबिज़ थी. लेकिन पहली बार बंग पर भी उसका क़ब्ज़ा हो गया है.

पार्टी के इस सपने को पूरा करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे दिग्गज नेता तो लगे ही थे. लेकिन बंगाल में ज़मीन पर उतर कर उसके लिए ज़मीन तैयार करने में शुभेंदु की भूमिका सबसे अहम रही.

2021 में चुनाव जीतने के बाद उनको विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया था. उसके बाद बीते पांच साल के दौरान वो लगातार सरकार पर हमलावर रहे और तृणमूल के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में भी अपने आंदोलनों के ज़रिए भाजपा की ज़मीन लगातार मज़बूत करते रहे.

विधायक, दो बार सांसद और फिर नंदीग्राम सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर ममता बनर्जी सरकार के दूसरे कार्यकाल में परिवहन मंत्री बने शुभेंदु अधिकारी का नाम दिसंबर, 2020 से पहले पश्चिम बंगाल से बाहर शायद ही कोई जानता हो.

लेकिन उसी महीने में बीजेपी का दामन थामने और कुछ महीने बाद होने वाले चुनाव में नंदीग्राम सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हराने के बाद उनकी गिनती पार्टी के शीर्ष नेताओं में होने लगी.

टीएमसी में जब बने दूसरे नंबर

हालांकि उनकी कार्यशैली पर भी सवाल उठते रहे हैं. पार्टी में भी उन पर सवाल उठते रहे और केंद्रीय नेतृत्व की ओर से उनको मिलने वाली तवज्जो के कारण कई पुराने नेताओं में उनके ख़िलाफ़ नाराज़गी भी बढ़ी.

लेकिन कहा जाता है कि कामयाबी अपने पीछे तमाम अवगुणों को छिपा लेती है. बीते पांच वर्षो के दौरान केंद्रीय नेतृत्व ने भी उनको लगातार तवज्जो दी और बंगाल से संबंधित पार्टी के नीतिगत फैसलों में उनकी राय अहम रही.

शुभेंदु ने वर्ष 2006 के विधानसभा में पहली बार कांथी दक्षिण सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था.

उसके बाद वर्ष 2009 में उन्होंने तमलुक सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते. 2014 के चुनावों में भी उन्होंने अपनी सीट पर क़ब्ज़ा बनाए रखा.

उसके बाद वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने नंदीग्राम सीट से चुनाव जीता और ममता मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री बनाए गए. धीरे-धीरे उनको सरकार में नंबर दो माना जाने लगा था.

उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत तो छात्र राजनीति से उसी समय हो गई थी जब वो कांथी स्थित पीके कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे.

वर्ष 1989 में वो कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद के प्रतिनिधि चुने गए थे. शुभेंदु 36 साल की उम्र में पहली बार 2006 में कांथी दक्षिण सीट से विधायक चुने गए.

इसके बाद उसी साल उनको कांथी नगरपालिका का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. शुभेंदु वर्ष 2009 और 2014 में तमलुक लोकसभा सीट से चुनाव जीते थे.

लेकिन वर्ष 2016 में ममता ने उनको नंदीग्राम सीट से मैदान में उतारा और वो आसानी से जीत गए. शुभेंदु का राजनीतिक करियर भले ही 1990 के दशक में शुरू हुआ हो. लेकिन वर्ष 2007 में नंदीग्राम के अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने एक कद्दावर नेता के तौर पर उनकी पहचान स्थापित की.

नंदीग्राम आंदोलन के मुख्य आर्किटेक्ट

लो प्रोफाइल सांसद रहे शुभेंदु अपनी सांगठनिक कौशल के कारण आगे चलकर बहुत कम समय में तृणमूल कांग्रेस में सत्ता का वैकल्पिक केंद्र बन गए.

पूर्व मेदिनीपुर ज़िले को अधिकारी परिवार का गढ़ माना जाता है. शुभेंदु के पिता और भाई भी तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा और विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में जिस नंदीग्राम आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी उसके मुख्य आर्किटेक्ट शुभेंदु ही थे.

वर्ष 2007 में कांथी दक्षिण सीट से विधायक होने के नाते तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के ख़िलाफ़ भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमिटी के बैनर तले स्थानीय लोगों को एकजुट करने में उनकी भूमिका सबसे अहम रही थी.

तब नंदीग्राम में प्रस्तावित केमिकल हब के लिए ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू ही हुई थी. उस दौर में इलाके में हल्दिया के सीपीएम नेता लक्ष्मण सेठ की तूती बोलती थी.

लेकिन यह शुभेंदु ही थे जिनके कारण से इलाक़े के सबसे ताक़तवर नेता रहे सेठ को हार का सामना करना पड़ा था.

जंगलमहल के नाम से कुख्यात रहे पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा ज़िलों में तृणमूल कांग्रेस का मज़बूत आधार बनाने में भी शुभेंदु का ही हाथ था. अब उनकी वजह से ही बीजेपी ने उन इलाकों में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शुभेंदु ने अपनी महत्वाकांक्षा के कारण ही तृणमूल कांग्रेस से नाता तोड़ा था.

हालांकि, उनके विरोधियों की दलील है कि भ्रष्टाचार के कई मामलों में शामिल होने के कारण ईडी और सीबीआई की कार्रवाई से बचने के लिए वो मजबूरन बीजेपी में शामिल हुए थे.

शुभेंदु अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगते रहे हैं. वो नारदा स्टिंग वीडियो में काम कराने के एवज़ में कथित तौर पर पैसे लेते देखे गए थे. इसके अलावा सारदा चिटफ़ंड घोटाले में भी उनका नाम सामने आया था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान इस घोटाले का ज़िक्र करते हुए तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर भ्रष्टाचार में डूबे रहने के आरोप लगाए थे. शुभेंदु उस समय तृणमूल कांग्रेस में थे. उस समय बीजेपी ने इस स्टिंग वीडियो का इस्तेमाल टीएमसी को घेरने के लिए किया था.

बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत और मुख्यमंत्री के तौर पर शुभेंदु का नाम सबसे ऊपर रहने के बाद सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के उस भाषण का वीडियो वायरल हो रहा था. उसके साथ जो वीडियो वायरल है उसमें शुभेंदु कथित तौर पर अख़बार में लिपटी नोटों की गड्डियां लेते देखे जा रहे हैं.

लेकिन बीते पांच साल में अपनी सक्रियता के कारण बीजेपी ने तृणमूल के गढ़ समझे जाने वाले इलाकों में सेंध लगाते हुए उससे कई सीटें छीनने में कामयाबी हासिल की है. इसमें शुभेंदु अधिकारी का अहम योगदान रहा है.

अब छह साल पहले तक ममता बनर्जी सरकार में नंबर दो रहे शुभेंदु बीजेपी की सरकार में नंबर वन यानी मुख्यमंत्री बनेंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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