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बांग्लादेश के मीडिया में शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने पर हो रही है ऐसी चर्चा
पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी सरकार बनी है. शनिवार को शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजे और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम को पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में बहुत ध्यान से देखा जा रहा है.
वहां के मीडिया में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, तीस्ता जल बँटवारा संधि और राज्य में बीजेपी के आने पर काफ़ी बातें हो रही हैं.
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एक तरफ़ तीस्ता मुद्दे के हल होने की उम्मीद जताई जा रही है तो दूसरी तरफ़ अल्पसख्यकों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की जा रही है.
चुनावी नतीजे आने के दो दिन बाद ही बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद तीस्ता जल बँटवारा समझौते पर तत्काल विचार करने की अपील की थी.
उधर, साल 2024 में छात्र आंदोलनों से निकली नेशनल सिटिजंस पार्टी (एनसीपी) के नेता नाहिद इस्लाम ने कहा, "हम पश्चिम बंगाल में हाल की घटनाओं को लेकर गहरी चिंता जता रहे हैं. इनमें मताधिकार से वंचित करने, डराने-धमकाने और कमज़ोर समुदायों को सांप्रदायिक आधार पर निशाना बनाए जाने की ख़बरें शामिल हैं. हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करते हैं कि भारत में सभी अल्पसंख्यकों और कमज़ोर वर्गों के अधिकार, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क़दम उठाए जाएं."
साथ ही उन्होंने कहा, "हमारा लक्ष्य है कि बांग्लादेश दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के लिए सबसे सुरक्षित देश बने."
जमात-ए-इस्लामी ने की अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की अपील
बांग्लादेश के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार ढाका ट्रिब्यून ने बांग्लादेश में विपक्ष के नेता जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफ़ीक़ुर रहमान के उस बयान को प्रकाशित किया है, जिसमें उन्होंने शनिवार को भारत सरकार से अपील की थी कि धर्म, जाति या नस्लीय आधार पर किसी व्यक्ति या समुदाय को नुकसान पहुंचाने से रोकने को सुनिश्चित किया जाए.
ढाका ट्रिब्यून के अनुसार, शनिवार को पत्रकारों से बात करते हुए शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा, "हम भारत सरकार से अपील करेंगे कि किसी भी धर्म, जाति या जातीय समूह को निशाना बनाकर नुक़सान न पहुंचाया जाए."
उन्होंने कहा कि भारत अपने संविधान के मुताबिक़, एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसलिए इस्लाम समेत किसी भी धर्म को अलग करके निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, "हम पश्चिम बंगाल समेत दुनिया में कहीं भी निर्दोष लोगों पर होने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़े रहेंगे. जहां भी ऐसा होगा, हम हमेशा पीड़ित लोगों के साथ खड़े रहेंगे."
बांग्लादेश में कैसी बहस
ढाका से निकलने वाले एक अन्य अख़बार डेली स्टार ने एक लेख प्रकाशित किया है, जिसमें इस बात पर चिंता ज़ाहिर की गई है कि शेख़ हसीना सरकार के पतन के बाद जिस तरह से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं और पश्चिम बंगाल और असम में जिस तरह अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बयानबाज़ियां बढ़ी हैं, उससे नई सरकार के सामने नई चुनौती आ गई है.
लेख के अनुसार, "बीजेपी की बड़ी जीत को बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में हिंदू बहुसंख्यक राजनीति के मज़बूत होने के तौर पर देखा जा रहा है. अब यह स्थिति पहले से तनावपूर्ण माहौल को और भड़का सकती है. अगस्त 2024 में शेख़ हसीना सरकार के गिरने के बाद सत्ता में बने ख़ालीपन के बीच अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ हिंसा में बढ़ोतरी हुई थी."
इस लेख में कहा गया है, "यह ताज़ा मामला (अल्पसंख्यकों पर हमले) बांग्लादेश के लंबे और गंभीर ऐतिहासिक घटनाक्रम से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है. देश में हिन्दू आबादी 1942 में क़रीब 28 प्रतिशत थी, जो अब घटकर लगभग 7.95 प्रतिशत रह गई है. इसके पीछे लगातार उत्पीड़न, ज़मीन कब्ज़ाने की घटनाएं, असुरक्षा और भारत की तरफ़ पलायन को वजह माना जाता है."
"बांग्लादेश के कट्टरपंथी समूहों के बीच बीजेपी को सिर्फ़ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है. पश्चिम बंगाल में इतनी बड़ी जीत और अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और निर्वासन को लेकर बीजेपी के चुनावी वादों को अब एक बड़े ख़तरे के रूप में पेश किया जा रहा है."
लेख में मौजूदा हालात को पश्चिम बंगाल की नई सरकार के लिए अहम चुनौती बताई गई है. इसमें कहा गया है, "भारी जनादेश मिलने के बाद सरकार के पास निष्पक्ष क़ानून व्यवस्था लागू करने, धर्म या पुरानी राजनीतिक निष्ठा से ऊपर उठकर सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी तरह की बहुसंख्यक राजनीति की अति को रोकने का अवसर है."
ढाका के सामने नई वास्तविकता
डेली स्टार ने 'पश्चिम बंगाल का भगवा का आना और ढाका के सामने नई वास्तविकता' नाम से एक लेख प्रकाशित किया है.
शाहाब इनाम ख़ान ने इस लेख में लिखा है कि 'अब भौगोलिक रूप से बांग्लादेश चारों तरफ़ से भगवा राजनीति से घिरा हुआ माना जा रहा है. त्रिपुरा में बीजेपी की सरकार है.'
"असम में हिमंत बिस्वा सरमा हैं, जिन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव में शुभेंदु अधिकारी के लिए प्रचार किया था और लोगों को सीमा पार धकेलने जैसी बात कही थी. ढाका ने 30 अप्रैल को असम के मुख्यमंत्री की टिप्पणी पर विरोध जताते हुए भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त को तलब किया था."
"लेकिन चार दिन बाद ही पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने लगभग उसी मुद्दे को केंद्र में रखकर चुनाव जीत लिया. बाद की परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा रहा है कि यह विरोध उस राजनीति को रोकने की बजाय और मज़बूत कर गया."
दरअसल, अप्रैल में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक निजी समाचार चैनल के इंटरव्यू में कहा था कि वो 'हमेशा भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भारत और बांग्लादेश के आपसी संबंध बेहतर न हों.'
बांग्लादेश की चिंताओं में आर्थिक गतिविधियां भी प्रमुख हैं.
शाहाब इनाम ख़ान ने लिखा है, "ढाका-कोलकाता कॉरिडोर, जिस पर कोलकाता न्यू मार्केट, पार्क स्ट्रीट की अर्थव्यवस्था और पश्चिम बंगाल के छोटे और मझोले कारोबार काफ़ी हद तक निर्भर थे, अब लगभग ठप पड़ चुका है. बांग्लादेशी ख़रीदार, कारोबारी, छात्र और मरीज़ भी इस आर्थिक ढांचे का अहम हिस्सा थे. ममता बनर्जी न तो दिल्ली पर दबाव बना सकीं और न ही कोई वैकल्पिक रास्ता पेश कर पाईं."
लेख में कहा गया है, "बीजेपी ने इस आर्थिक गिरावट को ख़राब प्रबंधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया. पार्टी लंबे समय से ममता सरकार पर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए ज़मीन न देने का आरोप लगाती रही है."
लेख के अनुसार, "अब यही वह नेता हैं, जिनके साथ ढाका को पानी बँटवारे, बॉर्डर हाट और आर्थिक मामलों पर बातचीत करनी पड़ सकती है. साथ ही उन भारतीयों का मुद्दा भी सामने है, जिनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं. ऐसे में तीस्ता नदी का मुद्दा भी राजनीतिक ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल होने की आशंका जताई जा रही है."
लेख में चिंता जताई गई है कि भारत का बांग्लादेश के प्रति रुख़ आगे भी पहले की तरह चुनिंदा मुद्दों और राजनीतिक हितों के आधार होने की आशंका है.
लेख के अनुसार, "बीजेपी की घरेलू राजनीति में 'बांग्लादेशी घुसपैठिया' का मुद्दा पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम में लगातार चुनावी हथियार बना रह सकता है, चाहे दोनों देशों के बीच आधिकारिक स्तर पर कितनी भी नरम भाषा में बातचीत क्यों न हो."
तीस्ता मुद्दा हल होने की उम्मीद
बांग्लादेश के अख़बर प्रोथोम आलो में सौम्या बंदोपाध्याय ने अपने एक लेख में तीस्ता जल बंटवारे के बहुप्रतिक्षित समझौते को लेकर उम्मीद ज़ाहिर की है.
लेख में कहा गया है, "लेकिन क्या आशा की कोई वजह नहीं है? 2011 से तीस्ता जल बंटवारा समझौता लगातार अटका हुआ है. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी, दोनों ने भारत की संघीय व्यवस्था का हवाला देते हुए इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से पीछे हटने की बात कही थी."
"इसके पीछे ममता बनर्जी के विरोध और केंद्र सरकार की मजबूरी को वजह बताया जाता रहा. लेकिन अब जब कोलकाता और दिल्ली, दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तो यह तर्क पहले जैसा नहीं रह गया है."
वो लिखते हैं, "उत्तर बंगाल पर भी अब बीजेपी की मजबूत पकड़ मानी जा रही है. यह भी याद रखना चाहिए कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान असम में बीजेपी नेताओं के विरोध की वजह से बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो सके थे."
उन्होंने उम्मीद जताते हुए लिखा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने उन आपत्तियों को दरकिनार करते हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. अगर वह तीस्ता समझौते में भी ऐसी ही भूमिका निभाते हैं, तो दोनों देशों के रिश्तों का इतिहास अलग तरीके से लिखा जा सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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