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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय का मोदी सरकार को लेकर रुख़ क्या होगा?
- Author, के सुबागुनम
- पदनाम, बीबीसी तमिल
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ विजय ने रविवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.
विजय का शपथ ग्रहण समारोह सुबह 10 बजे चेन्नई के नेहरू स्टेडियम में हुआ. इसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत विपक्ष के कई नेता भी मौजूद थे.
तमिलनाडु के राज्यपाल ने उन्हें 13 मई तक विश्वास प्रस्ताव पेश करने को कहा है.
दरअसल, पिछले पाँच दिनों में विधानसभा में बहुमत के लिए ज़रूरी 118 का आंकड़ा जुटाने के लिए विजय की टीवीके को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा.
सोमवार को आए विधानसभा चुनाव नतीजों में विजय की टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन बहुमत से दूर रही थी.
टीवीके को अब कांग्रेस, लेफ़्ट, वीसीके और आईयूएमएल दलों का समर्थन प्राप्त है. विजय ने महज दो साल पहले ही पार्टी बनाई थी.
गठबंधन की सरकार में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, क्या विजय इन चुनौतियों को पार कर पाएंगे?
गठबंधन के बीच संतुलन
बीबीसी तमिल से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार शिवप्रियन का कहना है कि टीवीके को उसी तरह से दबावों का सामना करना पड़ेगा, जिस तरह के दबाव का सामना केंद्र की बीजेपी सरकार का विरोध करते हुए डीएमके को करना पड़ा.
शिवप्रियन कहते हैं, "केए सेंगोट्टयन के अलावा टीवीके में किसी को भी सरकारी प्रशासन का अनुभव नहीं है. ऐसे में, कांग्रेस से जो लोग शामिल हो सकते हैं, उनके पास कुछ राजनीतिक अनुभव होना चाहिए. इसी तरह, तिरुमावलवन के पास भी अनुभव है. हालांकि उनके पास प्रशासनिक अनुभव नहीं है."
उन्होंने बताया, "विजय को ऐसे अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन मिलेगा. इसके अलावा, भले ही वह सेंगोट्टयन की बातों को नज़रअंदाज कर दें, लेकिन विजय कांग्रेस, लेफ़्ट और वीसीके जैसे दलों की बातों को सुनने से बच नहीं सकते. सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें इन दलों के समर्थन की ज़रूरत है."
शिवप्रियन कहते हैं, "वीसीके और वामपंथी दल विजय से सहमत नहीं हुए तो उन्हें समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है."
भले ही लेफ़्ट ने टीवीके को अपना समर्थन दे दिया है, पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि अगर नई सरकार राज्यों के अधिकारों से संबंधित मुद्दों पर सही तरीक़े से काम नहीं करती तो वे इसके ख़िलाफ़ लड़ेंगे.
वीसीके के नेता तिरुमावलवन ने कहा, "हमने टीवीके को समर्थन करने का निर्णय इसलिए लिया है क्योंकि हम नहीं चाहते कि राजनीतिक संकट का फ़ायदा उठाकर राष्ट्रपति शासन थोपा जाए. विजय की सरकार बनाने में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार एलंगोवन राजशेखरन ने बीबीसी तमिल से कहा, "हमें इंतज़ार करना होगा और देखना होगा कि सरकार बनाने के बाद विजय उनके साथ पैदा होने वाले किसी भी विवाद से कैसे निपटेंगे."
हालांकि शिवप्रियन कहते हैं, "मौजूदा माहौल में कोई भी पार्टी दोबारा चुनाव नहीं चाहती. इसलिए बिना बहुमत के बावजूद विजय का सरकार बनाना ही अच्छा समाधान था."
केंद्र की नीतियों पर क्या होगी प्रतिक्रिया?
एलंगोवन राजशेखरन के मुताबिक, डीएमके को 'राजनीतिक शत्रु' और बीजेपी को 'नीतिगत शत्रु' कहने के बावजूद, विजय के अब तक के रवैये और कामों से राज्यों के अधिकारों से संबंधित मुद्दों के प्रति उतनी प्रतिबद्धता का पता नहीं चलता है.
उन्होंने कहा, "स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपना रही है और लगातार राज्य के अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही है. लेकिन अगर हम यह पूछें कि क्या विजय भी ऐसी ही सशक्त आवाज बन पाएंगे, तो यह अब भी संदिग्ध है."
तमिलनाडु ने अब तक डीलिमिटेशन और थ्री लैंग्वेज पॉलिसी जैसे विभिन्न मुद्दों पर राज्य के अधिकारों पर कड़ा रुख़ अपनाया है.
राजशेखरन ने कहा, "सवाल यह है क्या विजय ऐसा रुख़ जारी रखेंगे या नहीं. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह देखना होगा कि वामपंथी दल और वीसीके की क्या प्रतिक्रिया होगी."
उन्होंने कहा कि इसी वजह से विजय को हमेशा बहुत सावधानी से काम लेना होगा.
हालांकि टीवीके के सामने कई समस्याएं हैं, लेकिन शिवप्रियन का कहना है कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे केंद्र के दबाव पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं.
उन्होंने कहा, "जहाँ तक तमिलनाडु के राजनीतिक दलों का सवाल है, सत्ता में कोई भी हो या न हो, नीतियां वही रहती हैं. द्विभाषा नीति या तमिलनाडु के सांस्कृतिक पहलुओं को बदलना असंभव है."
"लेकिन गठबंधन सरकार चलाना एक जटिल मामला है. चूंकि कोई भी दोबारा चुनाव नहीं चाहता, इसलिए यह कुछ हद तक सरकार के ठीक से चलने की संभावना है."
शिवप्रियन ने कहा, "हालांकि टीवीके के नेता के रूप में विजय ने इतने लंबे समय तक बीजेपी के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कहा. लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में वह इतना ख़ामोश रवैया नहीं अपना सकते."
"अगर केंद्र सरकार कहती है कि तमिलनाडु के लोगों को हिन्दी सीखनी चाहिए, तो विजय को खुलकर बोलना ही पड़ेगा."
उन्होंने कहा, "यह पता नहीं है कि वह बीजेपी विरोधी कड़ा रुख़ अपनाएंगे या नहीं. और न ही यह ज़रूरी है कि वह ऐसा करें. लेकिन यह ज़रूरी है कि जहां भी राज्य के अधिकार ख़तरे में हों, वहां वह पुरजोर आवाज़ उठाएं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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