भारत-पाकिस्तान में सैन्य संघर्ष के एक साल बाद चीज़ें कैसे बदलीं और क्या असर हुआ

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भारत-पाकिस्तान के बीच के चार दिन चले सैन्य संघर्ष का एक साल पूरा हो गया है.

10 मई, 2025 को संघर्ष विराम की घोषणा होने के बाद से अब तक कई मौक़ों पर दोनों देशों ने इसे अपनी-अपनी जीत के रूप में पेश किया है.

इस घटना ने पाकिस्तान में सेना को फिर से लोकप्रिय बना दिया. साथ ही पाकिस्तान अब दोबारा से अमेरिका का क़रीबी भी बन गया है.

पाकिस्तान, अमेरिका-इसराइल और ईरान की जंग में मध्यस्थ की भूमिका तक पहुँचने में कामयाब रहा.

वहीं दूसरी ओर, संघर्षविराम में किसी तीसरे की भूमिका से इनकार के बाद भारत के ट्रंप प्रशासन के साथ रिश्ते चुनौतीपूर्ण बन गए. इसके बाद पूरी दुनिया ने देखा कि भारत पर 50 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ भी लगा.

भारत ने इन हालात में अवसर खोजे और यूरोपीय संघ समेत कई देशों के साथ अपने व्यापारिक और रक्षा संबंध बढ़ाए.

रूस से तेल ख़रीद पर अमेरिकी प्रतिबंध और ईरान युद्ध के दौरान संतुलन बैठाने तक, इस पूरे साल ने कई मौक़ों पर भारत के धैर्य के साथ कूटनीति की कड़ी परीक्षा ली.

द लेंस के नए एपिसोड में इसी से जुड़े तीन अहम पहलुओं पर चर्चा की गई.

पहला- सैन्य संघर्ष का भविष्य, दूसरा- पाकिस्तान की बीते एक साल की प्रतिक्रिया और तीसरा- भारतीय कूटनीति.

इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित, इस्लामाबाद से बीबीसी संवाददाता फ़रहत जावेद और अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत मीरा शंकर.

दोबारा संघर्ष हुआ तो क्या है भारत की तैयारी?

पिछले साल हुए सैन्य झड़प के दौरान ड्रोन के ज़रिए हमलों का होना और उन्हें आसमान में इंटरसेप्ट किया जाना आम लोगों ने भी देखा. भारत ने ड्रोन और क्रूज मिसाइलों से पाकिस्तान के रडार सिस्टम को निशाना बनाया.

वहीं, पाकिस्तान ने 'ड्रोन स्वॉर्म' अटैक (ड्रोन के झुंड) का दावा किया. रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि आगे कभी दोबारा संघर्ष के हालात बने तो स्थितियां अलग होंगी.

ऐसे में भारत में ड्रोन से जुड़ी किस रणनीति पर क्या और कैसे काम हो रहा है?

इस सवाल के जवाब में बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित बताते हैं, "भारत में ड्रोन का इस्तेमाल अब केवल निगरानी तक सीमित नहीं है. अब ड्रोन में हमले की क्षमता की बात हो रही है, जिसे कामिकेज़ ड्रोन या आत्मघाती ड्रोन कहा जाता है. ये ख़ुद मिसाइल की तरह काम करते हैं. इसके अलावा क्वाडकॉप्टर ड्रोन पर काम हो रहा है."

उन्होंने बताया कि छोटे ड्रोन बनाने की क्षमता भारत के पास है, मगर उसमें भी कुछ कॉम्पोनेंट के लिए चीन की निर्भरता है जो सरकार को परेशान कर सकती हैं. बात बड़े निगरानी ड्रोन और आर्म्ड ड्रोन की करें तो भारत इस क्षमता के लिए फ़िलहाल अमेरिका और इसराइल जैसे देशों पर निर्भर है.

इन रणनीतियों पर हो रहा है काम

सैन्य मामलों पर नज़र रखने वाले बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित रक्षा विशेषज्ञों के हवाले से बताते हैं कि भारत भावी सैन्य रणनीति के लिए प्रमुख चार रणनीतियों पर काम कर रहा है:

पहला एयर डिफेंस 'सुदर्शन चक्र'.

संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की ओर से बड़े पैमाने पर 'ड्रोन स्वॉर्म' का इस्तेमाल हुआ. जुगल पुरोहित बताते हैं, "इन हमलों से निपटने के लिए एयर डिफेंस को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है."

"प्रधानमंत्री मोदी ने 'सुदर्शन चक्र' प्रोजेक्ट की बात कही जो एयर डिफेंस में अहम भूमिका निभा सकता है."

दूसरा ऑटोनोमस प्लेटफॉर्म

भारत में ऐसे हथियार बनाने पर काम हो रहा है, जिसके लिए सैनिकों की शारीरिक मौजूदगी की ज़रूरत न हो. लेकिन जुगल कहते हैं, "इसमें भी चुनौती यह है कि क्या हम उन्हें अपने देश में ही बना पाएंगे?"

तीसरा एन्हांसर्स

इसका मतलब हवा में ईंधन भरने की क्षमता और 'एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम' से है.

इस बारे में जुगल पुरोहित समझाते हैं, "जैसे कि अगर आपके विमान हवा में हैं तो क्या आप उन्हें हवा में ही फ्लाइट रीफ्यूलिंग (ईंधन भरना) कर सकते हैं? भारत के पास यह क्षमता है लेकिन इसे और बढ़ाने पर काम हो रहा है."

चौथा स्वदेशीकरण

रक्षा उपकरणों के भारत में निर्माण की ज़रूरत को लेकर जुगल पुरोहित का कहना है, "पहली तीन रणनीतियों को क्या हम भारत में ज़्यादा से ज़्यादा बना पाने में सक्षम हैं? साथ ही, अगर ये बन सकती हैं तो कैसे बन सकती हैं? और अगर नहीं बन सकती तो इसमें कैसी चुनौतियां आ रही हैं?"

रक्षा के मामले में भारत आगे की तैयारियों को लेकर किन सहयोगियों के साथ काम कर रहा है?

इसके जवाब में जुगल पुरोहित यह कहते हैं, "रूस के साथ भारत के रिश्ते पुराने हैं और एस-400 जैसे सिस्टम के साथ सुखोई विमानों के कारण रूस अब भी इस तस्वीर का हिस्सा है."

साथ ही वह बताते हैं, "अमेरिका की भूमिका लगातार बढ़ रही है, क्योंकि भारत के 'तेजस' कार्यक्रम के इंजन की तकनीक भी अमेरिका पर निर्भर है."

इसके अलावा "फ्रांस और इसराइल के साथ भी साझा उत्पादन पर काम चल रहा है."

पहलगाम हमला और ऑपरेशन सिंदूर के अनसुलझे सवाल

भले ही सैन्य तैयारियां ज़ोरों पर हों, लेकिन पहलगाम चरमपंथी हमले के साथ 'मिलिट्री ऑपरेशन' से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष अब भी कुछ बुनियादी सवाल उठा रहा है, क्या इस पर अब तक कोई जवाब आया है?

इसके जवाब में जुगल पुरोहित का मानना है कि मुख्य रूप से पहलगाम हमले के समय 'इंटेलिजेंस' की विफलता और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारतीय वायु सेना को हुए शुरुआती नुक़सान की स्पष्टता को लेकर जवाबदेही अब भी एक बड़ा सवाल है.

जुगल के मुताबिक, "मेरे हिसाब से अभी तक विपक्ष ने जो सवाल उठाए थे, उन सवालों का दायरा तीन मुख्य बिंदुओं में समेटा जा सकता है, इसमें पहला है कि पहलगाम हमला क्यों हुआ? दूसरा यह कि क्या इंटेलिजेंस नहीं था या टाइमली इंटेलिजेंस नहीं था? तीसरा इसको लेकर जवाबदेही तय हुई या नहीं ?"

उन्होंने बताया कि हाल में जब ऑपरेशन सिंदूर के एक साल होने को लेकर एक प्रेसवार्ता की गई तो हमने इसको लेकर सवाल पूछा था. उनका कहना है कि "अब भी इसको लेकर मुझे लगता है कि चुप्पी है."

साथ ही जुगल चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के हवाले से याद दिलाते हैं कि "भारत के इस ऑपरेशन में कुछ शुरुआती लॉस हुए थे."

जुगल पुरोहित पूछते हैं कि "ये लॉस क्या थे, क्यों हुए थे?" वे संदर्भ देते हैं कि "पाकिस्तान का यह दावा है कि उसने भारत के कई विमानों को गिरा दिया था."

एक साल में कैसे बदली पाकिस्तान की वैश्विक भूमिका?

भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले साल हुए युद्ध के बाद से अब तक क्या-क्या बदला है?

पाकिस्तान के कूटनीतिक प्रयासों को लेकर वहँ क्या कहा जाता रहा है?

इस सवाल के जवाब में पाकिस्तान में बीबीसी संवाददाता फ़रहत जावेद कहती हैं, "एक साल के दौरान पाकिस्तान में एक बड़ा बदलाव आया है. पाकिस्तान की रणनीतिक पोजिशन में एक ख़ालीपन था, उससे पाकिस्तान आगे बढ़ा है."

वह कहती हैं, "पहले पाकिस्तान को आर्थिक रूप से कमज़ोर और कूटनीतिक रूप से अप्रासंगिक मुल्क भी समझा जाता था. अमेरिका के साथ ताल्लुकात खासे तनावपूर्ण थे. साथ ही अन्य पश्चिमी देशों को भी पाकिस्तान आर्थिक रूप से भरोसेमंद नहीं नज़र आ रहा था."

"लेकिन अभी हमने देखा कि ईरान, अमेरिका-इसराइल के युद्ध में पाकिस्तान एक मध्यस्थ की भूमिका में है."

उनके मुताबिक, तो साफ़ तौर पर ऐसा लगता है कि मई-2025 में हुआ भारत और पाकिस्तान का संघर्ष एक अहम मोड़ का बिंदु साबित हुआ. पाकिस्तान में कूटनीतिक नयापन उसी वक़्त शुरू हुआ.

वह कहती हैं, "पाकिस्तान और अमेरिका के बीच बढ़ती नज़दीकी का एक बड़ा कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'ट्रांजेक्शनल' विदेश नीति को माना जा रहा है."

राष्ट्रपति ट्रंप और पाकिस्तान सेना प्रमुख की ट्यूनिंग

बीबीसी संवाददाता फ़रहत जावेद के मुताबिक, "राष्ट्रपति ट्रंप का सेना प्रमुख आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच देना एक बड़ी घटना है."

"इससे संकेत मिलते हैं कि ट्रंप प्रशासन ने अपनी 'ट्रांजेक्शनल' विदेश नीति के ज़रिए पाकिस्तान में चली आ रही 'सेना समर्थित फ़ैसले लेने की नीति' को स्वीकार किया है."

पाकिस्तानी सेना जश्न क्यों मना रही, आगे की क्या तैयारी? क्या इस संघर्ष के बाद पाकिस्तान में सैन्य क्षमता को बढ़ाने को लेकर नया काम चल रहा है?

इसके जवाब में फ़रहत जावेद कहती हैं, "सैन्य तैयारियों के मोर्चे पर पाकिस्तान पिछले संघर्ष को अपनी 'जीत' के रूप में पेश कर रहा है."

वह बताती हैं, "पिछले एक साल के दौरान पाकिस्तान में काफ़ी उत्सव का माहौल रहा है. पाकिस्तान ने इस जंग में जीत का दावा किया है. पाकिस्तान की सेना अब पहले से अधिक आक्रामक रुख़ अपना रही है."

पाकिस्तानी सैन्य प्रवक्ता के हवाले से वह कहती हैं, "अभी तक जो पाकिस्तान ने सात मई, 2025 के संघर्ष में जो अपनी ताक़त दिखाई है, वह पाकिस्तान की कुल ताक़त का केवल 10 से 15 प्रतिशत ही है."

वह सैन्य अफसरों के हवाले से बताती हैं कि पिछले पांच साल से जारी रिफॉर्म का सिलसिला थमा नहीं है. साथ ही आगामी बजट में सैन्य खर्च बढ़ने की उम्मीद है और पाकिस्तान ने चीन के अलावा तुर्की के साथ अपने रक्षा सहयोग को और अधिक मज़बूत किया है.

भारत ने जिन्हें 'आतंकी ठिकाना' कहा, वहाँ का हाल क्या है?

भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के जिन नौ ठिकानों पर हमले किए थे और उन्हें 'आतंकी संगठन' से जुड़ा बताया गया था, उन जगहों की अब क्या स्थिति है?

इस सवाल के जवाब में संवाददाता फ़रहत कहती हैं, "भारत के निशाना बनाए गए कथित आतंकी ठिकानों वाले स्थानों का पुर्नर्निमाण चल रहा है और पाकिस्तान इन क्षेत्रों में किसी भी सक्रिय उग्रवादी गतिविधि से इनकार करता है और इन्हें सरकारी नियंत्रण वाला बुनियादी ढांचा बताता है."

फ़रहत जावेद कहती हैं, "पिछले साल जब सात मई को संघर्ष शुरू हुआ तो मैं कश्मीर (पाकिस्तान प्रशासित) में मुज़फ्फ़राबाद की उस मस्जिद के इलाक़े में पहुंचीं, जिसे इंडिया ने आतंकी कैंप बताकर टारगेट किया था."

"वहाँ के स्थानीय लोगों के मुताबिक़, 'मस्जिद तो नहीं लेकिन एक और लोकेशन, जिसे टारगेट किया गया, वो साल 2010 से पहले प्रतिबंधित हथियारबंद संगठन लश्कर ए तैयबा का कैंप हुआ करता था, लेकिन उसके ऑपरेशंस ख़त्म कर दिए गए थे'."

उन्होंने बताया कि टारगेट मस्जिद के दोबारा निर्माण में स्थानीय प्रशासन मदद कर रहा है.

उन्होंने बताया, "बहावलपुर और मुरीदके में जब हमारी टीम पहुंची तो उनको वहाँ जाने की इजाज़त नहीं दी गई. लेकिन उन भवनों का भी निर्माण होते हमने देखा."

"ये वही जगहें थीं, जिन्हें टारगेट करने की जानकारी देते हुए भारतीय सेना ने दावा किया था कि यहां मौलाना मसूद अज़हर से जुड़े कैंप चलते थे."

'युद्ध ने पाकिस्तान सेना को दी संजीवनी'

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद हुए कूटनीतिक प्रयासों में दोनों ही देशों में से किसे कितनी सफलता मिली?

इस सवाल के जवाब में पूर्व राजनयिक मीरा शंकर कहती हैं, "इस युद्ध के बाद अमेरिका से पाकिस्तान की नज़दीकी बढ़ना उसके लिए 'लाइफ लाइन' साबित हुआ."

उनके मुताबिक, "अमेरिका ने पाकिस्तान की सैन्य लीडरशिप को जो अहमियत दी, वह चौंकाने वाली थी. पाकिस्तान के अंदर सेना की स्थिति इमरान ख़ान को जेल में डालने के बाद डगमगाई हुई सी थी, वो दोबारा संभल गई. आसिम मुनीर को फील्ड मार्शल बना दिया और एक्सटेंशन भी मिल गया."

उन्होंने कहा, "ट्रंप साहब ने आसिम मुनीर को व्हाइट हाउस बुलाया, जो पहले कभी नहीं हुआ था क्योंकि अमेरिका हमेशा पाकिस्तान की सिविलियन लीडरशिप का समर्थन करता था."

"अब ईरान को लेकर जो मीडिएशन हो रहा है, उसमें पाकिस्तान की अहम भूमिका है."

ट्रंप से रिश्तों के बीच भारतीय कूटनीति

संघर्ष के बाद भारत के कूटनीतिक प्रयास को किस तरह देखा जाए और भारत को कूटनीतिक रूप से क्या चुनौतियां आईं?

इस सवाल के जवाब में अमेरिका में भारत की राजदूत रहीं मीरा शंकर ने कहा, "ट्रंप प्रशासन ने भारत पर भारी 'टैरिफ' लगाए और रूसी तेल की ख़रीद बंद करने का दबाव बनाया. अमेरिका के नेताओं ने हर मौक़े पर कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया."

मीरा शंकर कहती हैं, "ट्रंप जैसे नेता हर चीज़ को व्यक्तिगत तौर पर लेते हैं. इस बार उनके पास कोई 'चेक एंड बैलेंस' करने वाले सलाहकार भी नहीं थे."

इस चुनौतीपूर्ण समय में भारतीय कूटनीति के रवैये पर मीरा शंकर का कहना है, "भारत ने काफ़ी परिपक्वता दिखाई है. एकदम से ऐसा नहीं किया कि रूठ गए और उसी पर अटके रहे."

वह उदाहरण देती हैं, "शुरुआत में भारत ने अपने ऊपर लग रहे व्यापार टैरिफ़ पर कोई विरोध नहीं जताया. लेकिन जब मामला मुक्त व्यापार समझौते का आया तो भारत ने अपनी आर्थिक ज़रूरतों और किसानों के हितों पर कोई समझौता नहीं किया."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.