बिहार: जाति आधारित गाने बजाने पर चिराग पासवान और लालू यादव समर्थकों में मारपीट, ऐसे गानों का ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है?

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

बिहार के वैशाली के कथौलिया गांव में तनावपूर्ण शांति है. पासवान समुदाय के देवता बाबा चौहरमल मंदिर के पास गणेश पासवान का घर है. उनके यहां लोगों का आना जाना लगा हुआ है. गणेश पासवान के सबसे बड़े बेटे पिंटू कुमार की बीती 18 अप्रैल को शादी थी.

गणेश के घर ये चहल-पहल शादी को लेकर नहीं है, बल्कि शादी से पहले हुई एक घटना को लेकर है.

दरअसल इस शादी में एक गाना बजा था, जिस पर यादव जाति के लोग नाराज़ हुए. ये नाराज़गी इतनी बढ़ी कि गांव में गाने को लेकर ही ईंट पत्थर चले. इसके बाद स्थानीय थाने को मामला शांत कराना पड़ा.

वैशाली एसपी विक्रम सिहाग ने बीबीसी से कहा, "ये पूरा विवाद गाने से जुड़ा हुआ है. गाने में एक जाति को ग्लोरिफाई किया गया, जबकि दूसरी जाति को अपमानित करने की भावना थी."

"इस गाने की वजह से दो पक्षों में लड़ाई हुई. इस मामले में पांच लोगों को हिरासत में लिया गया था. किसी भी पक्ष ने इस घटना के बाद आवेदन नहीं दिया है. पुलिस ने निरोधात्मक कार्रवाई की है और दोनों पक्षों की तरफ़ से बॉन्ड भरवाया गया है."

क्या है पूरा मामला?

ये घटना वैशाली के कथौलिया गांव के वार्ड नंबर 11 की है. इस वार्ड की आबादी तकरीबन 1500 है और इसमें यादव और पासवान जाति के लोग रहते हैं. बिहार में यादव पिछड़ा वर्ग में आते हैं जबकि पासवान महादलित हैं.

कथौलिया गांव, बिदुपुर प्रखंड में स्थित है. बिदुपुर प्रखंड, राघोपुर विधानसभा में पड़ता है. यहां से नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव विधायक हैं. वहीं लोकसभा क्षेत्र की बात करें तो ये हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. हाजीपुर लोकसभा से सांसद लोजपा(आर) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान हैं.

वार्ड में रहने वाले गणेश पासवान के बड़े बेटे पिंटू कुमार की 18 अप्रैल को शादी थी. पांच बच्चों के पिता गणेश पासवान निर्माण मजदूर हैं. 22 साल के पिंटू कुमार भी बेंगलुरु में मजदूरी करते हैं.

18 अप्रैल की शाम तकरीबन 7 बजे, गणेश पासवान के घर की महिलाएं 'बिलौकी' नाम की एक रस्म कर रही थीं. इस रस्म में महिलाएं गांव में घूमती हैं. इन महिलाओं के साथ डीजे भी था जिसमें गाना बज रहा था.

पिंटू कुमार की मां बुधनी देवी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए दावा करती हैं, "हम लोग जब यादवों के घर के पास से गुजरे तो उन्होंने कहा कि तुम लोग डीजे बजाओगे और चिराग पासवान का गाना चलाओगे? यहां पासवान का गाना नहीं बजेगा."

उनका दावा है, "इसके बाद लड़ाई हो गई. हम लोग महिलाएं थीं तो उन लोगों ने हमारी साड़ी पकड़ ली, बाल पकड़े और घर से निकलकर ईंट फेंकने लगे. बाद में पुलिस आई तो सब कुछ शांत कराया गया."

"बाद में जब मेरे बेटे की बारात निकलने लगी तो इन लोगों ने गाड़ी रोक दी. फिर से पुलिस वाले आए, तब बेटे की गाड़ी जाने दी."

हालांकि, बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को गणेश पासवान के परिवार ने चिकित्सीय पर्चे भी दिखाए, जिसमें 19 अप्रैल की तारीख में इलाज दर्ज़ है.

'मैं अपनी पत्नी को यहां नहीं रखूंगा'

"वो लालू का गाना बजाएं, चिराग पर जलन क्यों होती है?"

पिंटू कुमार जिनकी शादी थी, उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "बिलौकी (एक रस्म) में दूल्हा भी जाता है इसलिए हम भी गए थे. हमारे नेता आदरणीय चिराग पासवान, राम विलास पासवान हैं तो उनका गाना बजाएंगे."

उन्होंने कहा, "उन लोगों के नेता लालू यादव हैं तो वो लोग चाहते हैं कि हम उनका गाना बजाएं. हम अपने नेता को सपोर्ट करते हैं, लेकिन हमारे नेता चिराग पासवान या हमारी जाति का कोई पासवान विधायक हमारे पक्ष में नहीं आया. ऐसे तो यादव लोगों का मन बढ़ता जाएगा. क्या पासवान लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होता रहेगा?"

पिंटू कुमार और उनका परिवार इस मामले की एफआईआर स्थानीय थाने में दर्ज़ कराना चाहते थे.

बुधनी देवी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बताती हैं, "हम लोग केस करने थाने में गए थे, लेकिन वहां मौजूद लोग बोले कि गांव में सबको रहना है तो मिल जुलकर रहना चाहिए."

"हम लोगों ने केस नहीं किया, लेकिन अब वो लोग (यादव जाति) के लोग हम लोगों को डरा रहे हैं कि रास्ते में मिल जाओगे तो तुम लोगों को मारेंगे."

डराने धमकाने के आरोप पर यादव जाति समूह से आने वाले चंद्रेश्वर राय बीबीसी से कहते हैं, "हम लोगों ने कोई केस नहीं किया और किसी को डराया नहीं है. हम लोग चाहते हैं सब शांति से रहें. जैसे हमारे पूर्वज रहते आए हैं वैसे रहे."

लेकिन इस घटना के बाद पिंटू कुमार ने अपनी नई नवेली दुल्हन को अपने साथ बेंगलुरु ले जाने का फ़ैसला लिया है.

वो कहते हैं, "उन लोगों ने हम लोगों को एफआईआर नहीं करने दी, लेकिन हमारे नेताओं को तो कोई एक्शन लेना चाहिए. यहां पर अपनी पत्नी को हम नहीं रखेंगे. मैं उसे अपने साथ ले जाऊंगा."

स्थानीय अंजय पासवान कहते हैं, "जब वो लोग लालू जी का गाना बजाते हैं तो हम लोगों को कोई तकलीफ़ नहीं होती. हमारी जाति बिरादरी के नेता चिराग पासवान का गाना बजाने पर जलन क्यों होती है?"

यादव समुदाय का क्या कहना है?

गणेश पासवान के घर से महज़ 500 मीटर की दूरी पर ये लड़ाई शुरू हुई.

यादव समुदाय से संबंध रखने वालीं उर्मिला देवी के घर में कुछ दिनों बाद शादी है. उनके बाएं घुटनों के नीचे नीला निशान है. ये निशान दिखाते हुए वो दावा करती हैं कि 18 अप्रैल की शाम हुए झगड़े में उन्हें ये चोट लगी है.

घटना के बारे में जानकारी देते हुए उर्मिला बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहती हैं, "दस लड़के डीजे लेकर मेरे घर के सामने से गुजरते हुए गलत-गलत गाने बजा रहे थे. जिस पर हम लोगों ने कहा कि ऐसे क्यों कर रहे हो? आगे जाकर गाने बजाओ जिस पर लड़ाई शुरू हो गई."

वे दावा करती हैं, "उस लड़ाई के वक़्त इनके घर की औरतें नहीं थीं. उनको पहले ही इन लोगों ने घर भेज दिया था और हम लोगों पर ईंट चलाकर लड़ाई शुरू की."

उर्मिला देवी ने जहां बीबीसी से कहा कि गानों में चिराग पासवान और तेजस्वी यादव की बात हो रही थी, वहीं यादव जाति के पुरुषों ने इस बात से इंकार किया. कितनी संख्या में लोग डीजे के साथ आए और क्या उसमें महिलाएं भी शामिल थीं, इसके बारे में भी अलग-अलग जानकारी मिलती है.

पेशे से ड्राइवर अमित कुमार बताते हैं, "हमारे परिवार के लोग गाय दुह रहे थे और ये लोग अश्लील गाने बजा रहे थे. हम लोगों का कहना था कि आगे जाकर गाना बजाओ. लेकिन ये लोग नहीं माने."

वे कहते हैं, "उस समय कोई राजनीतिक या जाति का गाना नहीं चल रहा था. अश्लील गाना चल रहा था जिसका विरोध स्वाभाविक है. ईंट पत्थर चलाना भी उन्हीं लोगों ने शुरू किया था."

उर्मिला देवी के अलावा यादव जाति से संबंध रखने वाले चंद्रेश्वर राय ने भी अपने सिर पर लगी चोट दिखाई. हालांकि इन दोनों ने ही बीबीसी को किसी तरह का चिकित्सीय पर्चा नहीं दिखाया.

ऐसी घटनाएं पहले भी घटी

गानों को लेकर दो जाति समूहों में विवाद की ये पहली घटना नहीं है.

स्थानीय मीडिया में ऐसे मामले रिपोर्ट होते रहते हैं जिसमें जातीय गानों को लेकर एक जाति समूह की दूसरी जाति समूह से नाराज़गी रहती है.

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 में नवादा में दलित महिलाओं को लेकर एक गाना वायरल हुआ था जिसके बाद रजौली थाना में एक एफ़आईआर दर्ज हुई थी.

इसी तरह अक्तूबर 2024 में नवभारत टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मूर्ति विसर्जन के दौरान जातिसूचक भोजपुरी गाना बजाने को लेकर दो गुटों में जमकर मारपीट हुई जिसमें तीन पुलिसकर्मी घायल हुए.

साल 2022 में आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक गोपालगंज में खेसारीलाल यादव का गाना बजाने को लेकर विवाद हुआ और मारपीट हुई.

दो दशकों से भी ज्यादा समय से भोजपुरी फ़िल्मों से जुड़े रंजन सिन्हा कहते हैं कि ज्यादातर लोग अपनी जाति से आने वाले गायक को अपना हीरो मानते हैं और उन्हें जातीय अस्मिता से जोड़कर देखते हैं.

टुनटुन यादव, खेसारी लाल,पवन सिंह, गुंजन सिंह, चंदन चंचल जैसे गायक बेहद पॉपुलर हैं.

रंजन सिन्हा बताते हैं, "गायक जानते हैं कि जातिसूचक गाने गाकर मिलियन-मिलियन व्यूज़ आते हैं. ऐसे गाने सुनने वालों का एक बड़ा वर्ग है, इसलिए ऐसे गाने बनते और गाए जाते हैं."

वे कहते हैं, "बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो गायक की टीआरपी ही इसी बात से तय होती है कि किस गायक के गाने डीजे में बजे."

जाति और स्त्री के नाम पर गाने

कई भोजपुरी गानों पर अश्लील और द्विअर्थी होने के आरोप लगे हैं, लेकिन बीते एक दशक में भोजपुरी गीत जाति के इर्द-गिर्द रचे जाने लगे.

भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली संस्था आखर के सदस्य और पत्रकार रहे निराला बिदेसिया कहते हैं कि भोजपुरी गीतों में जाति के सवाल को मोटे तौर पर चार चरणों में देखा जा सकता है.

वो बताते हैं, "जातीय गीतों की पुरानी परंपरा रही है. दलितों का पचरा गायन है तो चरवाहों के बिरहा गीत हैं जिनमें कोई दिक़्क़त नहीं है. माडर्न लिटरेचर में भिखारी ठाकुर और हीरा डोम आते हैं जो जाति और सामाजिक समस्याओं पर सवाल उठाते हैं. हीरा डोम 'अछूत की शिकायत' नाम की कविता लिखते हैं."

बिदेसिया कहते हैं, "इसके बाद जातियों पर राजनीतिक गाने लिखे जाते हैं, जिसमें आक्रामकता है और अपनी जाति के नायक को ग्लोरिफाई भी किया जाता रहा. लेकिन बीते दस सालों में इन गानों में जाति और स्त्री का कॉकटेल तैयार किया गया."

"यानी गानों में अपनी जाति को ग्लोरिफाई करना और किसी दूसरी जाति की स्त्री को शामिल करके उसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. इसके चलते बिहार और पूर्वांचल में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जिसमें जातिसूचक गीतों के नाम पर लड़ाई होती है."

भोजपुरी गानों पर लगाम

बीते साल बिहार पुलिस मुख्यालय ने एक आदेश निकालकर डीआईजी और आईजी को भोजपुरी के अश्लील गानों के प्रसारण को पूरी तरह समाप्त करने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया था.

इस साल भी फरवरी माह में गृह मंत्री रहते हुए सम्राट चौधरी ने भी ऐसा ही आदेश जारी किया था. इन निर्देशों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर स्थितियों में कोई सुधार नहीं दिखता.

महिलाओं और बच्चों के बीच शिक्षा के मुद्दे पर काम कर रही इबराना कहती हैं, "टेंपों में बैठने पर, सार्वजनिक स्थानों में भद्दे गाने बजाए जाते हैं. किसी शादी में चले जाइए तो ऐसे ऐसे जाति-सूचक गाने चलते हैं जिनके बारे में सोच-सोचकर भयानक लगता है."

वे कहती हैं, "हैरानी की बात ये है कि इन सब चीजों का सामान्यीकरण होता जा रहा है. सरकार आदेश जारी कर रही है कि लगाम लगाएंगे, लेकिन वो सब सिर्फ़ कागज़ पर है."

वहीं समाज विज्ञानी पुष्पेन्द्र भी कहते हैं, "जाति की पहचान की राजनीति, सत्ता की राजनीति जिसमें जाति मोबिलाइजेशन का महत्वपूर्ण फैक्टर है, पितृसत्ता और राजनीति के लिए सांस्कृतिक तरीकों के इस्तेमाल ने इस तरह के गीतों को रचने और उनके पॉपुलर होने की जमीन तैयार की है."

वे कहते हैं, "डीजे में ऐसे गानों को बजाया जा रहा है जिसमें किसी दल और जाति को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति दिखती है. इस तरह के गानों का नतीजा ये हुआ है कि समाज में जो समरसता और एकता थी, शादी जैसे मौकों पर जो सार्वजनिक खुशी होती थी वो अब कनफ्लिक्ट में तब्दील होती जा रही है."

पुष्पेन्द्र कानून व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहते हैं, "कानून व्यवस्था का हाल भी बिहार में बहुत बिगड़ा हुआ है और ऐसे मामलों में पुलिस भी देखती है कि विवाद में आए दोनों पक्ष किसके साथ (जाति/राजनीतिक दल) जुड़े हुए हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)