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कभी नज़्म सुनाती, कभी गीत गाती सयानी घोष कैसे बनीं टीएमसी की स्टार प्रचारक
पश्चिम बंगाल की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 142 सीटों पर चल रहे दूसरे और अंतिम चरण के चुनाव प्रचार का शोर सोमवार शाम पांच बजे शांत हो जाएगा.
इस चुनावी शोर में एक नाम जो बार-बार सुनाई दे रहा है और जिस पर मीडिया और सोशल मीडिया में ख़ूब चर्चा हो रही है, वो नाम है तृणमूल कांग्रेस की 33 वर्षीय सांसद सयानी घोष का.
सयानी ना सिर्फ़ आक्रामक भाषण दे रही हैं बल्कि राजनीतिक मंचों से अपने गायन से भी ध्यान खींच रही हैं.
2021 में पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने से पहले ही सयानी घोष एक चर्चित नाम थीं. हालांकि तब राजनीति का अनुभव उन्हें नहीं था.
बांग्ला भाषी फ़िल्मों में अदाकारी और गायन ने राजनीति में आने से पहले ही उन्हें पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय बना दिया था. कोलकाता के चर्चित साउथ पॉइंट हाई स्कूल से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की है.
स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही वो सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहीं और नाटकों में हिस्सा लेती रही हैं.
कैमरा के सामने खुलकर बोलने की उनकी कला ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही टीवी में रोल दिलाए और एंकरिंग के मौक़े दिलाए.
आगे चलकर उन्होंने फ़िल्मों में भी काम किया. टीवी, एंकरिंग और एक्टिंग के दौरान विकसित की गई भाषण कला ही आगे चलकर उनका राजनीतिक स्टाइल बन गई.
राजनीति में एंट्री
2021 विधानसभा चुनावों से पहले टीएमसी युवा चेहरे तलाश रही थी. सयानी इसके लिए बिलकुल फ़िट थीं. वो एक महिला और युवा होने के साथ-साथ ख़ासी चर्चित भी थीं. पार्टी में शामिल होने के बाद उन्होंने आसनसोल सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन बीजेपी के उम्मीदवार से हार गईं.
राजनीति में आने के बाद सयानी घोष विवादों में भी घिरी रहीं. साल 2021 में ही सयानी घोष को त्रिपुरा में गिरफ़्तार भी किया गया था. दरअसल त्रिपुरा में स्थानीय चुनावों के समय सयानी ने बीजेपी की एक नुक्कड़ सभा के पास से गुज़रते हुए नारा लगाया था- ‘खेला होबे.’
'खेला होबे' साल 2021 में पश्चिम बंगाल चुनाव में दिया गया ममता बनर्जी का नारा था.
इस नारेबाज़ी के बाद अगरतला के एक पुलिस थाने में सयानी घोष पर मुक़दमा दर्ज कर लिया गया था और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था. पुलिस थाने के बाहर टीएमसी समर्थकों और कुछ अज्ञात लोगों के बीच झड़प भी हुई थी.
इस घटना को याद करते हुए हाल ही में इंडिया टुडे को दिए एक साक्षात्कार में सयानी घोष ने कहा, “जब मैं त्रिपुरा में चुनाव प्रचार कर रही थी तब उन्होंने हमें रोकने के लिए सबकुछ किया. लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है, यहां कोई भी आकर प्रचार कर सकता है.”
हालांकि ये अकेला विवाद नहीं है जो सयानी से जुड़ा हो. साल 2023 में जब वो टीएमसी की यूथ विंग की अध्यक्ष थीं, पश्चिम बंगाल के कथित भर्ती घोटाले की जांच कर रही ईडी ने उनसे दस घंटों तक पूछताछ की थी.
तब सयानी ने कहा था, “मैं आगामी पंचायत चुनावों के लिए प्रचार कर रही थी, मुझे यहां ईडी दफ़्तर बुलाया गया. मैं यहा पहुंची हूं और पूरी तरह जांच में सहयोग करना चाहती हूं.”
1993 में कोलकाता में पैदा हुईं सयानी घोष आज पश्चिम बंगाल की राजनीति के सबसे चर्चित युवा चेहरों में से एक हैं. बांग्ला फ़िल्मों ने उन्हें समूचे बंगाल में पहचान दी और राजनीति में आने से पहले ही वो सांस्कृतिक जगत का एक चर्चित चेहरा बन चुकी थीं.
जब उनसे राजनीति में आने के बारे में सवाल किया गया था तब उन्होंने कहा था, “मैं अब फ़ुल टाइम एक्टर से फ़ुल टाइम राजनेता बन रही हूं.”
2021 विधानसभा चुनाव में हार के बाद सयानी घोष ने 2024 में टीएमसी के टिकट पर जाधवपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.
संसद में आक्रामक और चुटीला अंदाज़
संसद के भाषणों ने उन्हें एक अलग पहचान दी. उनके भाषण सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं. वो बांग्ला, हिंदी और अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह भाषण देती हैं.
संसद में हाल ही में दिए एक चर्चित भाषण में उन्होंने भारतीय संविधान को अपने लिए भगवद् गीता बताया था.
इस भाषण में घोष ने कहा, “जिस तरह से ये संसद प्रधानमंत्री के लिए एक मंदिर है, इसी तरह ये हमारे लिए भी एक मंदिर है और भारत का गणतंत्र हमारी पूजा है. संविधान हमारी भगवद् गीता है.”
अप्रैल में बजट पर चर्चा के दौरान अपने संसदीय भाषण में घोष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ़ इशारा करते हुए कहा था, “हम लड़ते हैं आपसे, संविधान हाथ में लेकर लड़ते हैं, हाथ में हमारे तलवार नहीं है सर.”
इस भाषण में सयानी घोष ने भारत की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा था, “भारत किससे तेल ख़रीदेगा कितने दिनों के अंदर ख़रीदेगा, किससे दोस्ती निभाएगा किससे दुश्मनी बरक़रार रखेगा, कोई और देश का राष्ट्रपति हमें ट्विटर पर आकर लेक्चर देता है और आप कहते हैं कि हम विरोध ना करें और हम चुप बैठे.”
सयानी अपने भाषणों में गीतों और शायरी का भी ख़ूब इस्तेमाल करती हैं.
इसी भाषण में प्रधानमंत्री की तरफ़ इशारा करते हुए शायराना अंदाज़ में सयानी ने कहा, “तू लाख बेवफ़ा है मगर सर उठा के चल, दिल रो पड़ेगा तुझे पशेमान देखकर.”
संसद में उन्होंने बेरोज़गारी, महंगाई, सांप्रदायिकता, संघवाद और केंद्र के पश्चिम बंगाल के साथ कथित भेदभाव के मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठाया है.
पिछले साल जून में ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में चर्चा के दौरान सयानी घोष ने कहा था, “हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, आस्तिक-नास्तिक सब भारतवासी है.”
घोष ने कहा, “आपने ईंट का जवाब ईंट से दिया, देश चाहता था कि आप ईंट का जवाब पत्थर से दें.”
इसी भाषण में भारतीय मीडिया पर निशाना साधते हुए घोष ने कहा, “इस लड़ाई में शायद आप जीत गए लेकिन नैरेटिव की लड़ाई में आप हार गए. आप देश को बता नहीं पाए कि पाकिस्तान से आप जीत गए. प्रेस-मीडिया ने लोगों को बहकाने का काम किया. ख़बर ऐसे बनाते थे कि आज कोलकाता में सोने जाऊंगी, कल कराची में नींद खुलेगी मेरी. आज लखनऊ में डिनर करूंगी, कल लाहौर में ब्रेकफ़ास्ट. ऐसे नहीं चल सकता.”
धर्मनिरपेक्ष छवि
सयानी संसद में तृणमूल कांग्रेस की एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरी हैं. संसद के बाहर वो पार्टी के लिए क्राउड पुलर हैं. उनकी रैलियों और जनसभाओं में जमकर भीड़ जुट रही है. वो ना सिर्फ़ भाषणों बल्कि अपनी गायकी से भी ध्यान खींच रही हैं.
सोशल मीडिया पर उनकी रील्स में बॉलीवुड से लेकर बंगाली हिट्स की धूम है तो मंच से वो धार्मिक गीत गाकर भी लोगों से जुड़ रही हैं. हाल ही में एक चुनावी मंच से उन्होंने बंगाली नज़्म गई जिसका हिंदी अनुवाद है, “मेरे दिल में काबा है, आंखों में मदीना है.”
उनके इस अंदाज़ को जहां एक तरफ़ सराहा गया वहीं कुछ लोगों ने इसे मुसलमानों के वोट खींचने की कोशिश बताते हुए उन्हें ट्रोल भी किया. इसके बाद की चुनावी सभाओं में उन्होंने हनुमान चालीसा का भी पाठ किया और अन्य धर्म ग्रंथों से भी पाठ किए.
एक और रैली में उन्होंने पहले क़लमा पढ़ा और फिर हनुमान चालीस का पाठ किया. इसी भाषण में सयानी घोष ने कहा, “बहती गंगा भी पानी है, आबे ज़म-ज़म भी पानी है , पंडित पिए मुल्ला पिए , पानी का मज़हब क्या होगा?”
वह अपने भाषणों में बार-बार धर्मनिरपेक्षता का ज़िक्र करती हैं और सभी धर्मों के लोगों से ममता बनर्जी के लिए वोट देने की अपील करती हैं.
ममता की क़रीबी
सयानी घोष ख़ुद को ममता बनर्जी की क़रीबी की तरह पेश करती हैं और अपने भाषणों में बार-बार ममता बनर्जी का ज़िक्र करती हैं.
सयानी ममता बनर्जी की तरह ही साड़ी पहनती हैं और कई बार उन्हीं की तरह चप्पल पहनकर सभाएं करती हैं.
हाल ही में एनडीटीवी के पत्रकार ने जब उनसे ममता बनर्जी के स्टाइल को कॉपी करने के बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, “क्या ये अच्छी बात नहीं है, मैं अपनी नेता को फ़ॉलो करती हूं, मैं नरेंद्र मोदी को फ़ॉलो नहीं करती हूं, ये अच्छी बात है क्योंकि अगर मैं नरेंद्र मोदी को फ़ॉलो कर रही होती तो आठ हज़ार करोड़ के जेट में चल रही होती, मेरी नेता बहुत सरल इंसान हैं, आम लोगों की तरह हैं, हम बाक़ी सबकी तरह ही आम लोगों जैसे हैं.”
सयानी घोष अपने भाषणों में बार-बार कहती हैं, “ममता दीदी की जीत ही हमारी जीत है, अगर ममता जीतती हैं तो यह बंगाल की जीत होगी.”
उन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के क़रीबी और वफ़ादार के रूप में देखा जाता है. टीएमसी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के बाहर त्रिपुरा और असम में भी चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी दी जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर छवि बनाने में मदद मिली.
मीडिया और सोशल मीडिया पर तो वो काफ़ी लोकप्रिय हैं लेकिन उनका अपना कोई मज़बूत ज़मीनी आधार नहीं है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनका उभार नेता के तौर पर हुआ है, एक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने काम नहीं किया है.
टीएमसी में सयानी का उभार पार्टी की बदलती संगठनात्मक नीति को भी दिखाता है. टीएमसी कार्यकर्ता आधारित पार्टी रही है लेकिन हाल के सालों में ममता बनर्जी ने कई सेलिब्रिटी नेता शामिल किए हैं, जिनमें सयानी घोष भी एक हैं.
टीएमसी के कुल 29 सांसदों में 11 महिलाएं हैं और प्रतिशत के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा महिला सांसद टीएमसी में ही हैं. सयानी घोष ने महुआ मोइत्रा जैसी चर्चित महिला नेताओं के बीच पार्टी में अपनी जगह बनाई है.
सयानी फ़िलहाल चर्चा में हैं लेकिन पश्चिम बंगाल और देश की राजनीति में वो आगे कहां तक पहुंचती हैं ये कुछ हद तक आगामी पश्चिम बंगाल चुनावों के नतीजों और बहुत हद तक एक राजनेता के रूप में उनके काम पर निर्भर करेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.