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लखनऊ रेज़ीडेंसी की लड़ाई: भारतीयों की जीत के बावजूद हार की कहानी
- Author, सैयद मोज़िज़ इमाम
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
अवध रियासत पर अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा तत्कालीन हिंदुस्तान के लिए बड़ी घटना थी. अवध का इलाक़ा, गंगा-जमुना के दोआब यानी दोनों नदियों के बीच का मैदान था. उसकी राजधानी लखनऊ थी.
आज यही लखनऊ आबादी के लिहाज़ से भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी है.
बहरहाल अंग्रेज़ों ने फ़रवरी 1856 में जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह को सत्ता से बेदख़ल कर दिया, तो उन्होंने लंदन जाकर क्वीन विक्टोरिया से फ़रियाद करने का फ़ैसला किया.
लंदन जाने के लिए वह मार्च 1856 में लखनऊ से कलकत्ता के लिए रवाना हुए थे. (पहले कोलकाता को कलकत्ता कहा जाता था.)
इस वाक़ये का ज़िक्र प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर लिखी गई इतिहासकार रौशन तक़ी की किताब, 'लखनऊ 1857- द टू वॉर्स आफ़ लखनऊ डस्क ऑफ़ एन एरा' में भी मिलता है.
इतिहासकार रौशन तक़ी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "उस वक़्त अवध के बहुत से लोग नवाब वाजिद अली शाह को विदा करने कानपुर तक गए थे. उनमें बहुत से लोग गा रहे थे- 'हज़रत जाते हैं लंदन, हम पर कृपा करो रघुनंदन'."
रौशन तक़ी के मुताबिक़, "अपनी रियाया के जज़्बात से वाक़िफ़ नवाब उन्हें ज़्यादा तक़लीफ़ नहीं देना चाहते थे. उन्होंने साथ चल रहे लोगों को भरोसा दिया कि वे लौटकर लखनऊ आएँगे. ये सुनकर आधे से ज़्यादा लोग लखनऊ लौट गए और नवाब की वापसी का इंतज़ार करने लगे."
यह बात अलग है कि नवाब फिर कभी लखनऊ नहीं लौट पाए.
यह गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनूठी मिसाल थी कि इस्लाम धर्म मानने वाले एक शासक के हक़ के लिए उसकी हिंदू प्रजा अपने भगवान से प्रार्थना कर रही थी.
'कलकत्ते में ही बस गए नवाब'
इतिहासकार रवि भट्ट बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताते हैं, "नवाब वाजिद अली शाह को जनरल डलहौज़ी ने फ़रवरी 1856 में 'अयोग्य' घोषित कर सत्ता से हटा दिया था."
नवाब वाजिद अली शाह का इरादा कलकत्ता से समुद्री मार्ग से लंदन जाने का था, लेकिन वे ख़ुद नहीं जा सके.
इतिहासकार रौशन तक़ी के अनुसार, "उनके कुछ प्रतिनिधि, उनकी माँ मलका किश्वर के साथ लंदन गए थे लेकिन अवध की सत्ता उन्हें वापस नहीं मिल सकी. फिर वाजिद अली शाह कलकत्ता में ही बस गए."
रौशन तक़ी के मुताबिक़, "उनकी माँ मलका किश्वर की मौत पेरिस में हो गई थी. वहीं पर उनकी क़ब्र भी है. यह बात भी ग़लत है कि नवाब को अंग्रेज़ों ने गिरफ़्तार किया था बल्कि वह ख़ुद कलकत्ता गए थे."
नवाब के कलकत्ता जाने के बाद अवध का नियंत्रण सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में आ गया.
इतिहासकार रौशन तक़ी के मुताबिक़, "एक साल के भीतर ही लोगों में कंपनी के प्रति गहरा असंतोष पैदा हो गया था."
वह बताते हैं, "इसी दौरान यह अफ़वाह भी फैल गई कि नई इनफ़ील्ड राइफ़ल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया है."
इस ख़बर ने भारतीय सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत कर दिया और मेरठ छावनी में विद्रोह भड़क उठा.
माना जाता है कि मंगल पांडे के विद्रोही तेवरों के पीछे भी इसी कारतूस का मुद्दा था. बता दें कि साल 1856 से पहले भारतीय सिपाही 'ब्राउन बेस' नाम की बंदूक का उपयोग करते थे.
इतिहासकार अमरेश मिश्रा की किताब 'वॉर ऑफ़ सिविलाइज़ेशन-इंडिया 1857 एडी' के मुताबिक़, "नई इनफ़ील्ड पी-53 राइफ़ल को इस्तेमाल करने से पहले कारतूस को दाँत से काटना पड़ता था. 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह शुरू हुआ और सिपाही दिल्ली की ओर कूच कर गए."
1857 के विद्रोह के साल 2026 में पूरे 169 साल हो गए हैं.
लखनऊ में पहले से सुलग रहा था विद्रोह
रौशन तक़ी अपनी किताब 'लखनऊ 1857- द टू वॉर्स ऑफ़ लखनऊ डस्क ऑफ़ एन एरा' में लिखते हैं, "कंपनी के ख़िलाफ़ लोगों का ग़ुस्सा लगातार बढ़ रहा था. मेरठ में हुए विद्रोह के बाद लखनऊ के पास मड़ियाँव इलाक़े की अंग्रेज़ छावनी में तैनात सिपाहियों ने भी विद्रोह कर दिया और वे लखनऊ में इकट्ठा होने लगे."
दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं था, जब लखनऊ में अंग्रेज़ों की सत्ता के ख़िलाफ विद्रोह हुआ.
एक साल पहले साल 1856 में भी लखनऊ में अंग्रेज़ों को सत्ता से बेदख़ल करने की एक बड़ी कोशिश हुई थी.
रौशन तक़ी के अनुसार, "तब अवध के विलय के ख़िलाफ़ विरोध जताने के लिए कई धार्मिक नेता लखनऊ में एकत्र हुए. एक सूफी संत क़ादिर अली शाह ने 11 सितंबर, 1856 को कंपनी के ख़िलाफ़ विद्रोह की तारीख़ तय की थी. उन्होंने लगभग 12,000 प्रशिक्षित लोगों की एक बड़ी सेना भी तैयार कर ली थी."
रौशन तक़ी बताते हैं, "क़ादिर अली शाह ने काबुल के शाह को मदद के लिए एक पत्र भी भेजा था. क़ादिर अली शाह के गुप्त संगठन में समाज के निम्न आर्थिक वर्ग के कई लोग शामिल थे. इससे यह आंदोलन जन-आधारित रूप ले रहा था. हालाँकि यह पूर्व-निर्धारित विद्रोह सफल नहीं हो सका. अंग्रेज़ों को इसकी जानकारी हो गई थी."
"उन्होंने इसे समय रहते दबा दिया. इसके बाद कई मौलवियों को लखनऊ के ऐतिहासिक मच्छी भवन के पास फाँँसी दे दी गई. इस घटना से साफ़ होता है कि साल 1857 के विद्रोह से पहले ही अवध में असंतोष गहराई से फैल चुका था."
इस घटना के बाद अंग्रेज़ सजग हो गए थे. वे राशन और सैन्य सामान के बंदोबस्त में लग गए.
रौशन तक़ी कहते हैं, "विद्रोह की आशंका के चलते अंग्रेज़ अधिकारी रेज़ीडेंसी में शरण लेने लगे और ज़रूरी सामान इकट्ठा करने लगे. यह काम रात के अंधेरे में किया जाता था, ताकि किसी को इसकी भनक न लगे."
रेज़ीडेंसी नाम का इलाक़ा वर्तमान लखनऊ के क़ैसरबाग के पास गोमती नदी के तट पर बसा है.
यह लगभग 33 एकड़ में फैला एक परिसर है. यहाँ अंग्रेज़ अधिकारी रहते थे. इसका निर्माण साल 1774 में नवाब शुजाउद्दौला ने करवाया था. वह अवध के तीसरे नवाब थे.
रेज़ीडेंसी लखनऊ के मुख्य गेट को बेली गारद कहा जाता है. इसे नवाब शुजाउद्दौला के बेटे नवाब सआदत अली ख़ान ने लखनऊ के रेज़ीडेंट कैप्टन बेली के सम्मान में बनवाया था.
साल 1857 में इस गेट को मिट्टी से भर दिया गया था. बेली के नाम की वजह से लखनऊ के स्थानीय लोग इसे बेली गारद भी कहते हैं.
इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं, "अवध के नवाब, अंग्रेज़ अफ़सरों की मेहमान-नवाज़ी करते थे, जिसका लाभ उठाकर उन्होंने राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा दिया. सात फ़रवरी 1856 को वाजिद अली शाह को गद्दी से हटा दिया गया."
आज यह संरक्षित इमारत खंडहर में तब्दील हो चुकी है. यहाँ गोलियों के निशान अब भी देखे जा सकते हैं.
इसमें चर्च, मस्जिद और इमामबाड़ा भी है. यहाँ पर पर्यटक भी ख़ूब आते हैं. रेज़ीडेंसी के भीतर अजायबघर यानी म्यूज़ियम है. इसमें 1857 की क्रांति के इतिहास को दिखाया गया है.
चिनहट की लड़ाई में अंग्रेज़ों की हार
अवध के दूसरे बादशाह नासिरुद्दीन हैदर की बेगम विलायत, जिनका नाम मख्दरह आलिया भी था, उनकी रिहाइश भी रेज़ीडेंसी में थी.
वह बेगम कोठी में रहती थीं. यहाँ पर लगे एक बोर्ड में बताया गया है कि "वह यूरोपीय मूल की थीं. उनकी सौतेली बहन अशरफुन्निसां ने मस्जिद और इमामबाड़े का निर्माण करवाया था."
रवि भट्ट कहते हैं, "आज यह जर्जर अवस्था में है. हालाँकि यहाँ सभी इमारतें वैसी ही हैं, जैसे 1857 की क्रांति के बाद थीं. सिर्फ़ संरक्षण का काम किया गया है."
इतिहासकार रौशन तक़ी के मुताबिक़, "अंग्रेज़ों ने रेज़ीडेंसी को इसलिए वैसा ही छोड़ दिया ताकि वे ख़ुद को पीड़ित साबित कर सकें. वास्तव में सत्ता दोबारा हासिल के बाद उन्होंने शहर का बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया था."
हालाँकि रेज़ीडेंसी की घेराबंदी से पहले अंग्रेज़ों को 'चिनहट की लड़ाई' में पराजय का सामना करना पड़ा था.
चिनहट की लड़ाई 30 जून, 1857 को लड़ी गई थी, जो एक सुनियोजित रणनीति का परिणाम थी.
रौशन तक़ी के मुताबिक़, भारतीय विद्रोहियों के अगुवा बरक़त अहमद और शहाबुद्दीन ने अंग्रेज़ों को भ्रमित कर जाल में फँसाया.
"उन्होंने जानबूझकर अपनी स्थिति कमज़ोर दिखाई. इससे कंपनी के सैन्य अफ़सर हेनरी लॉरेंस को लगा कि विद्रोही पीछे हट गए हैं. वास्तव में भारतीय विद्रोहियों की सेना पूरी तैयारी के साथ घात लगाकर बैठी थी."
वह लिखते हैं, "इस सेना में सिपाहियों के साथ स्थानीय राजा- जैसे, राजा जयलाल सिंह और राणा बेनी माधो भी शामिल थे. जैसे ही अंग्रेज़ आगे बढ़े, वे संख्या और रणनीति दोनों में पिछड़ गए. भारतीय विद्रोहियों की घुड़सवार सेना का नेतृत्व एक जर्मन युवक श्मिड्ट कर रहे थे, जो पहले अवध की सेना में अधिकारी रह चुके थे."
सैन्य अफ़सर हेनरी लॉरेंस की लगभग 600 सैनिकों की टुकड़ी इस हमले से घबरा गई और पीछे हटने लगी. इतिहासकार रौशन तक़ी बताते हैं, "अंग्रेज़ हार गए थे."
इतिहासकार अमरेश मिश्रा ने अपनी किताब 'वॉर ऑफ़ सिविलाइज़ेशन- इंडिया एडी 1857' में इसका ज़िक्र किया है.
रौशन तक़ी कहते हैं, "लॉरेंस की सेना जल्दबाज़ी में लखनऊ लौट आई और रेज़ीडेंसी में शरण ले ली थी."
चिनहट की विजय ने ब्रिटिश सेना के अजेय होने के मिथक को तोड़ दिया. लखनऊ और अवध के दरवाज़े विद्रोहियों के लिए खुल गए.
इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं, "ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार, इस युद्ध में 112 यूरोपीय सैनिक मारे गए और 44 घायल हुए, कर्नल केंस और कैप्टन मैक्लीन मारे गए, जबकि कर्नल आइन्स और मेजर बैंक्स घायल हुए. भारतीय पक्ष के हताहतों का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है."
कुछ स्रोतों के अनुसार, "केवल 11 विद्रोही मारे गए, मौलवी अहमदुल्लाह शाह घायल हुए थे."
रेज़ीडेंसी की घेराबंदी
चिनहट की लड़ाई में मिली पराजय के बाद अंग्रेज़ों को रेज़ीडेंसी में शरण लेने पर मजबूर होना पड़ा था.
इतिहासकार रवि भट्ट कहते हैं, "इस विद्रोह का नेतृत्व बेगम हज़रत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने किया."
वह बताते हैं कि इसके बाद, "क्रांतिकारियों ने वाजिद अली शाह और बेगम हज़रत महल के बेटे बिरजिस क़द्र को अवध का नवाब घोषित कर दिया."
रवि भट्ट के मुताबिक़, "यह घेराबंदी उस वक़्त तकरीबन पाँच महीने चली. नवंबर में अंग्रेज़ों को यहाँ से भागने में कामयाबी मिल गई थी. इससे पहले गोलाबारी में कई अंग्रेज़ों की मौत हो गई थी."
"घेराबंदी के वक़्त रेज़ीडेंसी में अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ तकरीबन 1500 लोग लड़ने वाले थे. दूसरी ओर, 1200 महिलाएँ, बच्चे-बच्चियाँ और आम लोग थे. इसके अलावा अंग्रेज़ों के पास 30 तोपें और 23 लाख रुपए थे. बाहर तकरीबन 8000 से 15000 भारतीय सैनिकों ने घेराबंदी कर रखी थी."
अभी भी रेज़ीडेंसी के भीतर ये तोपें मौजूद हैं. जो रेज़ीडेंसी के भीतर म्यूज़ियम वाली बिल्डिंग के बाहर लगी हैं.
रेज़ीडेंसी में डॉक्टर फ़ेयरर रेज़ीडेंट सर्जन थे. उनकी कोठी के सामने लगे एक बोर्ड पर लिखा है, "घेराबंदी के दौरान सैन्य प्रमुख सर हेनरी लॉरेंस को घायल अवस्था में दो जुलाई को यहाँ लाया गया था और चार जुलाई को उनकी मौत हो गई थी."
इसके बाद सितंबर तक यह घेराबंदी चली थी, लेकिन 22 सितंबर 1857 को कानपुर से अंग्रेज़ों के लिए पहला बचाव दल रेज़ीडेंसी पहुँचा.
सर हेनरी हैवलॉक के नेतृत्व में भेजी गई यह सेना ख़ुद घेराबंदी में फँस गई.
इतिहासकार रौशन तक़ी के मुताबिक़, "इस दिन को अंग्रेज़ 'फ़र्स्ट रिलीफ़' के नाम से याद करते हैं. हालाँकि घेराबंदी तोड़ने की कोशिश के दौरान 25 सितंबर को कर्नल नील शेर दरवाज़े के पास मारे गए."
वह बताते हैं कि आज भी क़ैसरबाग़ में 'नील गेट' है जो इस घटना की याद दिलाता है. यह गेट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से संरक्षित है.
रौशन तक़ी बताते हैं, "इन पाँच महीनों के दौरान अंग्रेज़ 22 नवंबर को रेज़ीडेंसी छोड़कर भाग निकलने में सफल हो गए और कुछ समय के लिए अवध पर भारतीयों का नियंत्रण रहा."
हालाँकि यह स्थिति ज़्यादा दिन नहीं रही. मार्च 1858 में अंग्रेज़ों ने अवध पर फिर कब्ज़ा कर लिया.
अंग्रेज़ सेना के अफ़सर सर कॉलिन कैम्पवेल ने सिख और गोरखा फ़ौजियों की मदद से इस जीत को हासिल किया था.
मार्क्सिस्ट इंटरनेट आर्काइव के मुताबिक़, 30 अप्रैल 1858 को न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून के अंक 'द फ़ॉल ऑफ़ लखनऊ' में फ़्रेडरिक एंगेल्स ने भारतीय विद्रोह पर एक संपादकीय लेख लिखा.
इसमें कहा गया, "भारतीय विद्रोह के दूसरे संकटपूर्ण काल की समाप्ति हो गई है. पहले संकटकाल का केंद्र दिल्ली था. उसका अंत उस शहर पर हमले के बाद क़ब्ज़ा करके किया गया. दूसरे का केंद्र लखनऊ था और अब उसका भी पतन हो गया है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.