ब्रिक्स समिट में भारत न आकर बांग्लादेश ने क्या अपना ही नुक़सान कर लिया?

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भारत ने पिछले हफ़्ते ब्रिक्स समिट में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान को भी आमंत्रित किया था लेकिन उन्होंने नहीं आने का फ़ैसला किया.
बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा था कि भारत ने तारिक़ को बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स समिट में शामिल होने का न्योता दिया था. इसे द्विपक्षीय निमंत्रण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. बिम्सटेक बंगाल की खाड़ी के सात देशों का क्षेत्रीय संगठन है.
हुमायूं कबीर के इस तर्क पर मंगलवार को भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने कहा, "हमने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री को द्विपक्षीय यात्रा के लिए भी आमंत्रित किया था. इसके बाद उन्हें बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी आमंत्रित किया गया. उन्हें दो निमंत्रण मिले थे. एक द्विपक्षीय यात्रा के लिए और दूसरा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए."
बांग्लादेश में भी इस बात पर बहस हो रही है कि जिस गुट में ढाका शामिल होना चाहता है, उसके समिट में न जाकर क्या हासिल किया? क्या बांग्लादेश ने इस फ़ैसले से अपना ही नुक़सान किया है?
अपने लोग ही उठा रहे सवाल
बांग्लादेश की अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट द बिज़नेस स्टैंडर्ड से अमेरिका में बांग्लादेश के राजदूत रहे हुमायूं कबीर ने कहा, ''अब अगर हम वहाँ जाते, तो उससे क्या हासिल हो सकता था? वहाँ कुछ नया आकार लेता हुआ नज़र आ रहा है. हालांकि मैंने अभी इसका अंतिम नतीजा नहीं देखा है. वे सहयोग को और गहरा करने की कोशिश कर रहे हैं और इसी सिलसिले में डिजिटल करेंसी के स्तर पर तालमेल बढ़ाने के साथ-साथ हर देश की अपनी मुद्रा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश हो रही है.''
हुमायूं कबीर ने कहा, ''दूसरे शब्दों में, अगर आप भारत में कारोबार करते हैं तो भारतीय मुद्रा में कर सकते हैं और चीन में चीनी मुद्रा में. यानी वे एक वैकल्पिक आर्थिक या वित्तीय ढांचा तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं. बांग्लादेश जैसे देश के लिए, जो सभी के साथ काम करता है और जिसका इन सभी 11 सदस्य देशों के साथ व्यापार और वाणिज्यिक संबंध हैं, यह काफ़ी अहम है.''
हुमायूं कबीर ने कहा, ''ऐसी स्थिति में अगर हम इस वित्तीय नेटवर्क या इसी तरह की किसी व्यवस्था से जुड़ पाते, तो हमारी स्थिति कुछ मज़बूत होती. तब मुझे यह चिंता नहीं करनी पड़ती कि रूस से परमाणु ऊर्जा संयंत्र लेने के बाद हम पर अमेरिकी प्रतिबंध लग सकते हैं. क्योंकि अगर रूस के साथ हमारा व्यापार टका या रूबल में होता है, तो डॉलर के ज़रिए लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का असर काफ़ी कम हो जाता है.
हुमायूं कबीर कहते हैं, ''वहाँ 11 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख मौजूद थे. ऐसे में हमारी मौजूदगी से उनके साथ बातचीत करने, अपने विचार और प्राथमिकताएं साझा करने और इसी तरह के अन्य अवसर मिल सकते थे. इसका अपना एक कूटनीतिक महत्व है. हम वहाँ मौजूद नहीं थे, इसलिए हमें यह मौक़ा नहीं मिला. इस लिहाज से वहाँ जाना बेहतर होता.''

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बांग्लादेश ने ऐसा क्यों किया?
थिंक टैंक सेंटर फोर सोशल एंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के सीनियर फेलो कॉन्स्टैनटिनो ज़ेवियर का मानना है कि तारिक़ रहमान भारत के साथ तोल मोल कर रहे हैं.
ज़ेवियर ने एक्स पर लिखा है, ''वे एक बड़े द्विपक्षीय समझौते और अलग से दिल्ली यात्रा के लिए कुछ और मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं. बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना अभी भी इतनी मज़बूत है कि इस समय दिल्ली में होने वाली किसी बहुपक्षीय बैठक में शामिल होने की महज तस्वीरें और इसका राजनीतिक संदेश प्रधानमंत्री और बीएनपी के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक क़ीमत चुका सकता है.''
ज़ेवियर ने लिखा है, ''बांग्लादेश ने भारत के साथ एक द्विपक्षीय मुद्दे को बिम्सटेक के अध्यक्ष के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियों से ऊपर रखा है, जिसका असर दूसरे सदस्य देशों के हितों पर भी पड़ा है. बांग्लादेश किसी मंत्री या किसी अन्य वरिष्ठ प्रतिनिधि को भी भेज सकता था.''

द बिज़नेस स्टैंडर्ड से ही बांग्लादेश की जहांगीरनगर यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स की प्रोफ़ेसर और अध्यक्ष रह चुकीं डॉ दिलारा चौधरी ने कहा, ''भारत की वजह से ब्रिक्स से दूर रहने का क्या कारण है? यह कोई द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है और न ही भारत के साथ कोई विवाद है. मौजूदा तनाव की वजह से भारत की द्विपक्षीय यात्रा को ठुकराना एक अलग बात है, लेकिन ब्रिक्स पूरी तरह अलग मामला है. ब्रिक्स एक बहुपक्षीय संगठन है और मेरा मानना है कि बांग्लादेश को इसमें शामिल होना चाहिए था.''
दिलारा चौधरी ने कहा, ''बांग्लादेश के लिए इन सभी बहुपक्षीय संगठनों में शामिल होना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि देश का आर्थिक विकास व्यापार और निवेश पर निर्भर करता है और बहुपक्षीय मंच ऐसे ही अवसरों को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं. तो फिर हम वहाँ क्यों नहीं गए? भारत के साथ तनाव की वजह से सिर्फ़ इससे दूर रहने का मुझे कोई औचित्य नज़र नहीं आता.''
बांग्लादेश भारत के लिए अहम पड़ोसी देश है. क़रीब 18 करोड़ आबादी वाले बांग्लादेश से भारत की 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. इसका इतिहास राजनीतिक अस्थिरता से भरा रहा है, जिसकी शुरुआत 1975 में हुई, जब शेख मुजीब-उर रहमान और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई थी. पूर्वोत्तर भारत से संपर्क के लिए बांग्लादेश काफ़ी अहम है . ऐसे में भारत के साथ संबंधों में गर्मजोशी दोनों देशों के लिए मायने रखती है.

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तारिक़ रहमान को किसने रोका?
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस से 17 सितंबर को बातचीत में बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रहे पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने कहा, ''मुझे लगता है कि भारत विरोधी लॉबी की बात प्रभावी रही और उसने तारिक़ रहमान को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने से रोक दिया.''
चक्रवर्ती ने कहा, ''बांग्लादेश भारत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता और न ही सभ्यतागत साझी विरासत के कारण भारत की जगह किसी दूसरे देश को ले सकता है. लाखों बांग्लादेशी इलाज के लिए भारत आते हैं. दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार और कनेक्टिविटी है. यह ऐसा रिश्ता है, जिसे नज़रअंदाज़ करना बांग्लादेश के लिए अपने ही जोखिम पर होगा.''
''भारत की ओर से पर्याप्त पहल की जा चुकी है. अब फ़ैसला ढाका को करना है. वे कह सकते हैं कि हम इस रिश्ते को सीमित स्तर पर बनाए रखेंगे. इसमें कोई दिक्क़त नहीं है. हम पहले भी इस तरह के रवैये को देख चुके हैं. भारत मुख्य रूप से दोनों देशों के रिश्तों के बुनियादी स्तंभों पर ध्यान देगा. आज बांग्लादेश की मुख्य समस्या आर्थिक है. हम अपनी क्षमता के अनुसार, उसे ईंधन और बिजली उपलब्ध करा रहे हैं.''
पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने कहा, ''तारिक़ रहमान की बीएनपी अलग-अलग हितों वाले समूहों का एक मेल है. इसमें कारोबारी लॉबी, पाकिस्तान समर्थक लॉबी और जमात-ए-इस्लामी की लॉबी शामिल हैं. इसमें कुछ ऐसे लोग भी हैं जो भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन उनकी आवाज़ दब जाती है. भारत और बांग्लादेश के बीच 54 साझी नदियां हैं और हमारे बीच केवल एक जल समझौता है, जिसकी अवधि दिसंबर में ख़त्म होने वाली है, यानी गंगा जल संधि. तीस्ता समझौता नहीं हो सका, क्योंकि पश्चिम बंगाल ने इसका विरोध किया था.''

तारिक़ रहमान के ब्रिक्स समिट में नहीं आने पर बांग्लादेश के अंग्रेज़ी अख़बार डेली सन ने सुनहरा मौक़ा गँवाने की तरह देखा है. डेली सन ने लिखा है, ''पूरे घटनाक्रम पर बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय की रणनीतिक सोच पर सवालिया निशान है. विदेश नीति को कथित राजनयिक अपमान, प्रोटोकॉल विवाद या निमंत्रण की संकीर्ण व्याख्या के आधार पर प्रतिक्रियाओं की एक सिरीज़ के रूप में नहीं चलाया जा सकता. इसके लिए दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता और कई क़दम आगे की सोचने की क्षमता ज़रूरी होती है.''
डेली सन ने लिखा है, ''विडंबना यह है कि बांग्लादेश ने यह अवसर इसलिए नहीं गंवाया कि ब्रिक्स ने उसके लिए अपने दरवाज़े बंद कर दिए थे. बल्कि उसके अपने विदेश मंत्रालय ने कमरे के बाहर खड़े होकर निमंत्रण में इस्तेमाल किए गए शब्दों पर बहस करना चुना. बांग्लादेश जैसे आकार, रणनीतिक स्थिति और आर्थिक महत्वाकांक्षाओं वाले देश के लिए यह ऐसी विलासिता है, जिसे वह वहन नहीं कर सकता.''
''कूटनीतिक अवसर शायद ही कभी हमेशा के लिए बने रहते हैं. वे परिस्थितियों, व्यक्तियों और बदलते जियोपॉलिटिक्स समीकरणों से पैदा होते हैं और उतनी ही तेज़ी से ख़त्म भी हो सकते हैं. एक परिपक्व विदेश नीति ऐसे मौक़ों को पहचानती है और उन पर कार्रवाई करती है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसा ही एक मौक़ा था और बांग्लादेश को वहाँ मौजूद होना चाहिए था.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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