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अमेरिकी मियाद ख़त्म होने के बाद भी रूसी तेल ख़रीद रहा है भारत, पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया
ईरान के साथ अमेरिका और इसराइल की जंग के बाद से भारत में ऊर्जा संकट के हालात पैदा हुए हैं. भारत अब तक कच्चे तेल की कमी की समस्या से बचता रहा था क्योंकि वो रूस से काफ़ी कच्चा तेल ख़रीदता था.
लेकिन अमेरिका के भारत पर टैरिफ़ लगाने के फ़ैसले के बाद से रूसी तेल ख़रीद में गिरावट देखी गई थी.
हालांकि, ईरान के साथ अमेरिका की जंग के बाद से ट्रंप प्रशासन ने रूसी तेल की ख़रीद में छूट दी थी. पहली बार मार्च महीने में एक महीने की छूट दी गई थी.
इसके बाद 17 अप्रैल को ट्रंप प्रशासन ने दुनिया के सभी देशों को (तीन को छोड़कर) प्रतिबंधित रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पाद समुद्र के रास्ते ख़रीदने की अनुमति दी गई थी.
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने कहा था कि जहाज़ों पर लोड किए गए तेल की ख़रीद 16 मई तक की जा सकेगी.
बीते शुक्रवार को तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीज़ल के दामों में तीन-तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी. इसके साथ ही पीएम मोदी कई बार अलग-अलग मौक़ों पर तेल की बचत करने और सोना न ख़रीदने की अपील कर चुके हैं.
अब रूसी तेल ख़रीद पर अमेरिका की छूट ख़त्म होने के बाद अनुमान लगाए जा रहे हैं कि भारत में तेल के दामों में फिर बढ़ोतरी हो सकती है.
हालांकि भारत सरकार ने साफ़ कर दिया है कि भारत रूस से तेल ख़रीदता रहेगा.
अमेरिकी की तरफ़ से इस मामले में अब तक कोई बयान नहीं आया है.
विपक्ष का मोदी सरकार से सवाल
सोमवार को केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में संयुक्त सचिव (मार्केटिंग और ऑयल रिफ़ाइनरी) सुजाता शर्मा ने कहा है कि "रूस पर अमेरिकी छूट को लेकर बस मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहूंगी कि हम छूट से पहले भी रूस से ख़रीद रहे हैं, छूट के दौरान भी, और अब भी."
"असल में यह कमर्शियल समझ है जो ख़रीदने के लिए होनी चाहिए. कच्चे तेल की कोई कमी नहीं है. बार-बार काफ़ी कच्चा तेल मंगाया गया है, और छूट मिले या न मिले, इससे हमारी सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा."
इस बीच विपक्ष भी केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर है. कांग्रेस ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि "क्या अब भारतीयों को तेल की क़ीमतों में एक और बढ़ोतरी के लिए तैयार हो जाना चाहिए?"
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने अमेरिकी मियाद के ख़त्म होने की ख़बर को एक्स पर रिपोस्ट करते हुए लिखा है, "अमेरिका की वह छूट, जिसने मोदी जी की सरकार को 'डिस्काउंटेड रेट पर भी नहीं' रूसी तेल ख़रीदने की 'इजाज़त' दी थी, 16 मई को ख़त्म हो गई."
"ऐसी ख़बरें हैं कि सरकार ने अमेरिका में अपने बड़े बॉसों के पास 'छूट बढ़ाने के लिए अप्लाई' किया है, लेकिन विदेश मंत्रालय ने अभी तक ऐसी किसी रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है."
हालांकि सोमवार दोपहर को पेट्रोलियम मंत्रालय साफ़ कर चुका है कि रूस से तेल ख़रीद जारी रहेगी.
रूस से कितना तेल ख़रीदा गया?
तेल के दाम क्या बढ़ सकते हैं? इस सवाल का जवाब देने से पहले ये बारीक़ी से समझ लेना चाहिए कि अमेरिकी छूट के बाद भारत ने रूस से कितना तेल ख़रीदा.
भारत अपनी कुल ज़रूरतों का लगभग 90 फ़ीसदी तेल आयात करता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से भारी मात्रा में रियायती तेल ख़रीदना शुरू किया था, जिससे भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़ती चली गई.
मार्च 2022 के बाद से नई दिल्ली रूसी तेल के लिए एक अहम बाज़ार बनकर उभरा है. भारत ने 2024 में रोज़ाना क़रीब 20 लाख बैरल तेल ख़रीदा और पिछले साल रूस से लगभग 44 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया.
जुलाई 2024 तक भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 44.6 फ़ीसदी तक पहुंच गई थी. हालांकि, अमेरिकी दबाव और टैरिफ़ नीतियों के कारण जनवरी 2026 तक यह घटकर 20.6% रह गई.
लेकिन अमेरिकी छूट के बाद भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात फिर तेज़ी से बढ़ा.
हेलसिंकी स्थित थिंकटैंक सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) ने एक रिपोर्ट में बताया था कि भारत की मार्च 2026 में रूस से कच्चे तेल की ख़रीद दो गुना से ज़्यादा बढ़ाकर 6.2 अरब डॉलर हो गई थी.
हालांकि, अप्रैल महीने में इसमें 15 फ़ीसदी की गिरावट हुई और रूस से तेल आयात 5.27 अरब डॉलर रह गया. सीआरईए थिंकटैंक ने इस गिरावट के लिए वाडीनार स्थित नायरा एनर्जी रिफ़ाइनरी में मेंटेनेंस वजह बताई गई थी.
अप्रैल और मई महीने में मिली अमेरिकी छूट के दौरान भारत में रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ा है.
कमोडिटी एनालिटिक्स फ़र्म केपलर के आंकड़ों के मुताबिक़, अप्रैल महीने में जहां हर दिन रूस से 15.7 लाख बैरल कच्चा तेल आ रहा था. ये आंकड़ा 14 मई तक 18.8 लाख बैरल प्रतिदिन था.
केपलर में रिफ़ाइनिंग के लीड एनालिस्ट निखिल दुबे मनीकंट्रोल से कहते हैं, "अगर रूसी तेल पर छूट नहीं बढ़ाई जाती है, तो भारतीय आयात कम हो सकता है, जो मार्च में देखे गए स्तर से थोड़ा नीचे या अप्रैल में देखे गए स्तर के क़रीब रहेगा."
"छूट न मिलने पर भारतीय रिफ़ाइनरी कंपनियों के लिए अनुमति की ज़रूरतें फिर से लागू हो जाएंगी, जिससे ज़ाहिर है कि ख़रीदारी की रफ़्तार कम हो जाएगी."
क्या बढ़ेंगे तेल के दाम?
अब अहम सवाल ये उठता है कि क्या भारत में फिर से तेल के दाम बढ़ेंगे. इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले भारत के तेल आयात को समझना चाहिए.
भारत सरकार का पेट्रोलियम मंत्रालय कहा चुका है कि उसने हाल के सालों में तेल आयात में विविधता पर ज़ोर दिया है और अब वो 41 देशों से तेल आयात करता है.
मध्य पूर्व में संकट के बाद भारत ने अमेरिका, वेनेज़ुएला, ओमान, ब्राज़ील और अंगोला से तेल ख़रीद को बढ़ाया है.
निखिल दुबे कहते हैं कि होर्मुज़ स्ट्रेट में रुकावट की वजह से दुनिया भर में दूसरी जगहों से कच्चे तेल की सप्लाई कम होने की वजह से भारत में रूस से आने वाले तेल के फ्लो में कोई बड़ी कमी आने की उम्मीद नहीं है.
हालांकि कच्चे तेल के बढ़ते दाम भी देश में तेल के दाम बढ़ने की वजह हो सकते हैं. मध्य पूर्व में संकट की शुरुआत के पहले दुनिया में जहां कच्चे तेल के दाम 72 डॉलर प्रति बैरल थे, अब वो बढ़कर 105 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुके हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.