शी जिनपिंग से मुलाक़ात के बाद ट्रंप ने अमेरिका के दोस्त ताइवान को किस बात के लिए चेताया?

बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बातचीत में ताइवान का मुद्दा भी उठा

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    • Author, इयान ऐकमेन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ताइवान को चीन से औपचारिक रूप से आज़ादी का ऐलान करने के ख़िलाफ़ चेतावनी दी है.

शुक्रवार को अमेरिका और चीन के बीच दो दिवसीय शिखर सम्मेलन ख़त्म हुआ है.

इसके बाद ट्रंप ने फ़ॉक्स न्यूज़ से कहा, "मैं नहीं चाहता कि कोई स्वतंत्रता की ओर बढ़े."

ताइवान के राष्ट्रपति लाई-चिंग-ते पहले कह चुके हैं कि ताइवान को औपचारिक तौर पर आज़ादी के ऐलान की जरूरत नहीं है. क्योंकि वह खुद को पहले से ही एक संप्रभु राष्ट्र मानता है.

अमेरिका लंबे समय से ताइवान का समर्थन करता रहा है.

अमेरिकी कानून के तहत वह ताइवान को आत्मरक्षा के लिए संसाधन मुहैया कराने के लिए बाध्य है.

हालांकि चीन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखने के कारण अमेरिका को हमेशा से इस संतुलन को साधना पड़ा है.

ट्रंप ने इससे पहले कहा था कि स्वशासित द्वीप ताइवान को लेकर उन्होंने "किसी भी पक्ष में कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है."

चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है. वो ये कहता रहा है कि जरूरत पड़ने पर वह बल प्रयोग से उसे अपने अधीन कर सकता है.

अमेरिका ताइवान को सपोर्ट करता रहा है लेकिन वो ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन नहीं करता. लंबे समय से अमेरिका की यह आधिकारिक नीति रही है.

ताइवान पर क्या अमेरिका का रुख़ बदल गया है

शी जिनपिंग और ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ताइवान के मुद्दे पर बातचीत हुई है लेकिन उन्होंने ज्यादा ब्योरा देने से इनकार कर दिया

चीन के साथ संबंध बनाए रखने की शर्त भी यही है कि केवल एक चीन (वन चाइना) की सरकार को मान्यता दी जाए.

चीन ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते को लेकर खुलकर नाराजगी जता चुका है.

चीन पहले उन्हें "मुसीबत खड़ी करने वाला" और "दोनों किनारों के बीच शांति को नुकसान पहुंचाने वाला" बता चुका है.

ताइवान के कई लोग खुद को अलग राष्ट्र का हिस्सा मानते हैं.

हालांकि ज़्यादातर लोग मौजूदा स्थिति बनाए रखने के पक्ष में हैं. यानी वो मानते हैं कि ताइवान न तो चीन से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करे और न ही उसके साथ एकीकरण का कदम उठाए.

फ़ॉक्स न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने दोहराया कि इस मुद्दे पर अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

उन्होंने कहा, "सोचिए, हमें युद्ध लड़ने के लिए 9,500 मील दूर जाना पड़ेगा. मैं ऐसा नहीं चाहता. मैं चाहता हूं कि हालात शांत हों. मैं चाहता हूं कि चीन भी शांत रहे."

ट्रंप

वॉशिंगटन लौटते समय विमान में ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्होंने और शी जिनपिंग ने ताइवान के मुद्दे पर "काफी बात" की, लेकिन उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा या नहीं.

ट्रंप ने कहा कि शी जिनपिंग "इस मुद्दे को लेकर बेहद गंभीर हैं" और वो चाहते हैं कि ताइवान की स्वतंत्रता की दिशा में कोई भी क़दम ना उठाया जाए.

चीनी सरकारी मीडिया के मुताबिक़, बातचीत के दौरान शी जिनपिंग ने कहा, "ताइवान का मुद्दा चीन-अमेरिका संबंधों में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है."

उन्होंने चेतावनी दी, "अगर इसे सही तरीके से नहीं संभाला गया तो दोनों देश टकराव या यहां तक कि संघर्ष की स्थिति में पहुंच सकते हैं."

जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या उन्हें ताइवान को लेकर चीन के साथ संघर्ष की आशंका दिखती है, तो उन्होंने कहा, "नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता. मुझे लगता है सब ठीक रहेगा. शी जिनपिंग युद्ध नहीं चाहते."

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हाल के वर्षों में चीन ने ताइवान के आसपास अपने सैन्य अभ्यास काफी बढ़ा दिए हैं. इससे क्षेत्र में तनाव बढ़ा है और अमेरिका के रणनीतिक संतुलन की भी परीक्षा हो रही है.

पिछले साल के अंत में ट्रंप प्रशासन ने ताइवान को 11 अरब डॉलर के हथियार बेचने की घोषणा की थी.

इसमें अत्याधुनिक रॉकेट लॉन्चर और कई तरह की मिसाइलें शामिल थीं. चीन ने इस कदम की कड़ी आलोचना की थी.

ट्रंप ने कहा कि वह जल्द फैसला करेंगे कि यह हथियार सौदा आगे बढ़ेगा या नहीं.

उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर उनकी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की "विस्तार से चर्चा" हुई है.

उन्होंने कहा, "मुझे उस व्यक्ति से बात करनी होगी जो इस समय ताइवान चला रहा है. आप जानते हैं मैं किसकी बात कर रहा हूं."

ताइवान का क्या कहना है

ताइवान के राष्ट्रपति लाई-चिंग-ते

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इमेज कैप्शन, ताइवान के राष्ट्रपति लाई-चिंग-ते पहले कह चुके हैं कि उनके देश को औपचारिक तौर पर आज़ादी के ऐलान की जरूरत नहीं है. वो पहले से संप्रभु देश है
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अमेरिका के ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं. हालांकि दोनों के बीच मजबूत अनौपचारिक रिश्ते हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति आमतौर पर ताइवान के नेता से सीधे बातचीत नहीं करते. ऐसा करना चीन के साथ बड़ा तनाव पैदा कर सकता है, क्योंकि चीन ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते को अलगाववादी मानता है.

ताइवान के उप विदेश मंत्री चेन मिंग-चीन ने शनिवार को कहा कि ट्रंप की टिप्पणियों का सही मतलब समझने के लिए ताइवान को और स्पष्टता की जरूरत होगी.

चेन ने यह भी कहा कि ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री अमेरिकी कानून के तहत स्वीकृत व्यवस्था है.

उन्होंने कहा, "ताइवान-अमेरिका हथियार सौदे हमेशा से क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की बुनियाद रहे हैं.''

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, राष्ट्रपति लाई के प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिकी हथियार बिक्री ताइवान के प्रति "अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धता" का हिस्सा है और यह "क्षेत्रीय ख़तरों के ख़िलाफ़ साझा प्रतिरोध" का काम करती है.

ट्रंप ने फ़ॉक्स न्यूज़ से यह भी कहा, "हम युद्ध नहीं चाहते. अगर मौजूदा स्थिति बनी रहती है, तो मुझे लगता है कि चीन भी इससे संतुष्ट रहेगा. लेकिन हम यह नहीं चाहते कि कोई यह कहे कि 'चलो आजादी का ऐलान कर देते हैं क्योंकि अमेरिका हमारा समर्थन कर रहा है."

इससे पहले भी अमेरिका पर ताइवान की स्वतंत्रता के मुद्दे पर अपना रुख नरम करने का आरोप लगने पर चीन नाराज हो चुका है.

फरवरी 2025 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट से वह बयान हटा दिया था, जिसमें वॉशिंगटन ने ताइवानी स्वतंत्रता के विरोध को दोहराया था.

चीन ने कहा था कि इससे "अलगाववादी ताकतों को गलत संकेत" जाता है.

उस समय ताइवान में अमेरिकी अधिकारियों ने कहा था, "हम पहले से कहते रहे हैं कि मौजूदा स्थिति को कोई भी पक्ष अकेले बदलने की कोशिश करे, तो हम उसका विरोध करते हैं."

ताइवान

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इमेज कैप्शन, ताइवान में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि चीन के साथ उनके संबंधों की यथास्थिति बनी रहे

ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने कहा कि उनकी टीम अमेरिका-चीन शिखर वार्ता पर लगातार नजर बनाए हुए थी.

उन्होंने कहा कि ताइवान ने अमेरिका और अन्य देशों के साथ अच्छा संवाद बनाए रखा.

इससे ताइवान-अमेरिका संबंधों को स्थिर और मजबूत बनाया जा सकेगा और ताइवान के हितों की रक्षा होगी.

उन्होंने कहा कि ताइवान हमेशा से क्षेत्र में "शांति और स्थिरता का रक्षक" रहा है.

साथ ही उन्होंने चीन पर अपने "आक्रामक सैन्य कदमों और सत्तावादी दमन" के ज़रिये क्षेत्र में खतरा बढ़ाने का आरोप लगाया.

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