राहुल की 'महारैली' को सीजेपी का सपोर्ट, क्या विपक्ष अपने मक़सद में कामयाब होगा?

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, दुष्यंत कुमार
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
दिल्ली के रामलीला मैदान में हो रही इंडिया गठबंधन की रैली में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी देखी जा रही है. 'इंडिया ब्लॉक' ने रैली के लिए दस लाख लोगों के राजधानी पहुंचने का दावा किया है.
यह दावा माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने किया है. लेकिन इस आयोजन से जुड़ा बड़ा राजनीतिक सवाल कांग्रेस और राहुल गांधी के सामने है, क्या वे चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ अपने अभियान के साथ आम लोगों को जोड़ पाएंगे?
रैली से एक दिन पहले, 31 अक्तूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर सांकेतिक संसद लगाई गई. यहां मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित हुआ. राहुल गांधी ने कहा कि लोगों की आवाज़ संसद तक नहीं पहुंचने दी जा रही, इसलिए विपक्ष को बाहर जुटना पड़ा है.
कांग्रेस की इस पूरी कोशिश पर नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि संसद के भीतर अपनी मांग आगे नहीं बढ़ा पाने के बाद विपक्ष अब संसद के बाहर इस पर जनता का साथ चाहता है.
रामलीला मैदान से क्या संदेश देना चाहता है विपक्ष?

इमेज स्रोत, Sonu Mehta/Hindustan Times via Getty Images
रैली के लिए कांग्रेस ने अलग-अलग राज्यों से कार्यकर्ताओं को दिल्ली लाने की तैयारी की है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी स्टूडेंट्स और सामाजिक संगठनों समेत कई लोगों से रैली में शामिल होने की अपील की है.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता के मुताबिक़, विपक्ष जनता को यह संदेश देना चाहता है कि संसद के भीतर अपनी मांग आगे नहीं बढ़ा पाने के कारण वह अब उसका साथ मांग रहा है. इसके ज़रिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश भी हो रही है.
वह मानते हैं कि सांकेतिक संसद और रैली को एक साथ देखने की ज़रूरत है. दोनों आयोजनों का मक़सद एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ अभियान को चर्चा में बनाए रखना है.
शरद गुप्ता त्योहारों के बीच इस अभियान को जारी रखने को भी विपक्ष की रणनीति से जोड़ते हैं. उनके मुताबिक़, लोगों का ध्यान त्योहारों के दौरान दूसरी बातों में चला जाता है. विपक्ष को लगता है कि दिवाली तक निष्क्रिय रहने पर मुद्दे को दोबारा उठाने में वक़्त लगेगा.
इसी बीच व्यापारिक संगठन चैंबर ऑफ़ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने सोनिया गांधी से रैली टालने की अपील की थी. संगठन ने 12,000 करोड़ रुपये के कारोबार पर असर पड़ने की आशंका जताई थी.
हालांकि, दिल्ली पुलिस रैली के लिए अनुमति दे चुकी है. द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि रामलीला मैदान में आयोजन के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी किया गया है और आयोजकों तथा संबंधित एजेंसियों के साथ व्यवस्था को लेकर तालमेल किया जा रहा है.
कांग्रेस अपनी बात किन लोगों तक पहुंचाना चाहती है?

शरद गुप्ता बताते हैं कि इस रैली के आयोजन में कांग्रेस के सामने दो अलग-अलग चुनौतियां भी हैं.
पहली, अपने कार्यकर्ताओं और सहयोगी दलों को एक मंच पर लाना. दूसरी, उनकी भागीदारी के ज़रिए उठाए जा रहे सवालों को उन लोगों तक पहुंचाना, जो पार्टी की बैठकों या प्रदर्शनों में नियमित रूप से शामिल नहीं होते.
दिल्ली कांग्रेस ने व्यवस्था संभालने के लिए 20 समितियां बनाई हैं.
इसी बीच दस लाख लोगों के आने का दावा माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने 30 अक्तूबर को मैदान की तैयारियां देखने के बाद किया. इस संख्या को रैली में जुट चुकी भीड़ नहीं समझना चाहिए. यह आयोजक पक्ष के एक नेता का दावा है. कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती इस दावे से पैदा होने वाली उम्मीदों के बीच अपना संदेश लोगों तक पहुंचाने की भी है.
कांग्रेस की मुहिम पर सरकार का पलटवार

इमेज स्रोत, ANI
विपक्ष जहां वोट के अधिकार को अपने अभियान का केंद्र बता रहा है, वहीं सरकार और बीजेपी उससे चुनावी नतीजों का जवाब मांग रही हैं.
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने 31 अक्तूबर को कांग्रेस से पूछा कि 2024 में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त नहीं थे, फिर पार्टी लगातार तीसरा लोकसभा चुनाव क्यों हारी?
रिजिजू ने मृतकों, दूसरी जगह जा चुके लोगों और दोहराए गए नामों को वोटर लिस्ट से हटाने पर कांग्रेस का रुख़ भी पूछा.
इससे पहले, गृह मंत्री अमित शाह ने 30 अक्तूबर को लखनऊ में यूपी बीजेपी कार्यकारिणी की बैठक में विपक्ष को संसद में एसआईआर पर चर्चा की चुनौती दी थी. उन्होंने इसके लिए विशेष सत्र बुलाने की बात कही. यह पेशकश थी, सत्र बुलाने की औपचारिक घोषणा नहीं.
शाह ने आरोप लगाया कि विपक्ष संसद में चर्चा नहीं चाहता और बाहर मॉक पार्लियामेंट लगाकर उसकी गरिमा को नुकसान पहुंचाता है. उन्होंने चुनावी हार के बाद आयोग को दोष देने की तुलना मैच हारने के बाद अंपायर को दोष देने से की.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं को डराने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि पार्टी जीतने पर अपनी काबिलियत बताती है और हारने पर चुनाव आयोग को दोष देती है. बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने पूछा कि कथित वोट चोरी पर कांग्रेस के बूथ स्तर के एजेंटों ने स्थानीय आपत्तियां क्यों नहीं कीं.
बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने सांकेतिक संसद पर तंज़ करते हुए कहा कि कांग्रेस को सांकेतिक आम चुनाव कराकर ख़ुद को विजेता और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री घोषित कर देना चाहिए.
रैली से पहले सांकेतिक संसद का क्या संदेश था?

इमेज स्रोत, Rahul gandhi Youtube
जनता के बीच जाने से पहले विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ अपने आरोप संसद जैसी कार्यवाही में रखे. खड़गे के आवास पर हुए आयोजन की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की. समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद और टीएमसी के सौगत रॉय उपाध्यक्ष की भूमिका में थे.
खड़गे ने प्रस्ताव पेश किया और मुख्य चुनाव आयुक्त पर वोटर लिस्ट में गड़बड़ी तथा निष्पक्ष होकर काम नहीं करने समेत छह आरोप लगाए. सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी के अलावा सांसदों, सामाजिक और युवा संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए.
समापन भाषण में राहुल गांधी ने संसद में लोगों की आवाज़ नहीं पहुंचाने का आरोप लगाया.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई इसे विरोध के पुराने सांकेतिक तरीक़ों की कड़ी में देखते हैं. वह वामपंथी संगठनों के नुक्कड़ नाटकों और बोफ़ोर्स के दौर के प्रदर्शनों का उदाहरण देते हैं. बोफ़ोर्स का संदर्भ राजीव गांधी सरकार के समय का है. 1986 के तोप सौदे में रिश्वत के आरोप अप्रैल 1987 में सामने आए थे.
किदवई की इस तुलना से यह समझने में मदद मिलती है कि सांकेतिक आयोजन का इस्तेमाल अपनी बात समझाने के लिए कैसे किया जाता रहा है. कांग्रेस और उसके सहयोगी भी मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ अपने आरोप इस तरह लोगों के सामने रखना चाहते हैं कि उन पर चर्चा हो.
संसद के भीतर मांग आगे क्यों नहीं बढ़ी?

इमेज स्रोत, Sanjeev Verma/Hindustan Times via Getty Images
सांकेतिक संसद में प्रस्ताव पारित होने से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया नहीं जा सकता. इसके लिए संविधान में अलग प्रक्रिया है. विपक्ष इससे पहले वास्तविक संसद में भी उन्हें हटाने की कोशिश कर चुका है. 12 मार्च को लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ नोटिस दिए गए थे.
इन नोटिसों को स्वीकार करना या नहीं करना संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को तय करना था. छह अप्रैल को लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने इन्हें स्वीकार नहीं किया. इसलिए मामला प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान तक नहीं पहुंचा. इसके बाद 24 अप्रैल को राज्यसभा में 73 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ नया नोटिस दिया गया.
नोटिस देने और हटाने का प्रस्ताव पारित कराने की शर्तें अलग हैं. नोटिस के लिए लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए. लेकिन प्रस्ताव दोनों सदनों में अलग-अलग पारित होना ज़रूरी है.
चुनावी नतीजों से समर्थन परखने पर क्या उलझन है?

इमेज स्रोत, Reuters
विपक्ष के आरोपों का केंद्र एसआईआर है, यानी वोटर लिस्ट का विशेष गहन पुनरीक्षण. विवाद केवल नाम हटने की संख्या का नहीं, इस प्रक्रिया में योग्य मतदाताओं के अधिकार और आयोग के फ़ैसले लेने के तरीक़े का भी है. आयोग अपने फ़ैसलों और प्रक्रिया का बचाव करता रहा है.
चुनाव आयोग ने 26 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में दिए जवाब में कहा था कि एसआईआर से जुड़े तीनों आदेश सभी तीन सदस्यों की सहमति से जारी हुए थे. उसका कहना था कि किसी आयुक्त का सवाल या सुझाव अपने आप में आयोग का अंतिम फ़ैसला नहीं होता.
आयोग ने फ़ॉर्म 6 में बदलाव का आरोप भी ख़ारिज किया. उसके मुताबिक़, एसआईआर के लिए अतिरिक्त घोषणा अलग दस्तावेज़ है. चुनाव आयोग ने कहा कि संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के आदेश के बिना किसी नाम को जोड़ा, हटाया या बदला नहीं जाता.
क्या ये जनसमर्थन वोट में तब्दील होगा?

इमेज स्रोत, ANI
जनसमर्थन को चुनावी नतीजों से परखने के सवाल पर शरद गुप्ता एक उलझन की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनके मुताबिक़, विपक्ष का आरोप ही यह है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हो रहे. इसलिए वह उन्हीं नतीजों को अपने समर्थन की कसौटी मानने पर सवाल उठा रहा है.
पश्चिम बंगाल का विवाद इसकी मिसाल है. वहां करीब 60 लाख नाम अलग जांच के लिए भेजे गए थे. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक अधिकारियों ने उनकी जांच की. इनमें करीब 27.16 लाख नाम हटाने का फ़ैसला हुआ.
इसी विवाद में टीएमसी सांसद डेरेक ओब्रायन ने 31 विधानसभा सीटों के नतीजे रद्द करने की मांग की थी. उनका तर्क था कि वहां एसआईआर में हटे नामों की संख्या जीत-हार के अंतर से अधिक थी. आयोग ने जवाब में कहा कि टीएमसी ने भी ऐसी 21 सीटें जीतीं, जहां जीत का अंतर न्यायिक जांच के बाद हटे नामों से कम था.
सीजेपी का समर्थन कांग्रेस के लिए क्या मायने रखता है?

इमेज स्रोत, Getty/ANI
चुनाव आयोग को लेकर इसी विवाद के बीच कॉकरोच जनता पार्टी, यानी सीजेपी, ने भी रैली का समर्थन किया है. संगठन ने 28 अक्तूबर को अपने बयान में एसआईआर के दौरान योग्य मतदाताओं के नाम बाहर होने पर चिंता जताई और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग दोहराई.
सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने भी एक्स पर इस रैली के समर्थन की घोषणा की. संगठन का कहना है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए संघर्ष करने वाले सभी संगठनों का समर्थन करेगा. समर्थन की यह घोषणा कांग्रेस में शामिल होने या उसके पूरे राजनीतिक कार्यक्रम से सहमति की घोषणा नहीं है.
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई युवाओं, बुद्धिजीवियों, आम लोगों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी को अहम मानते हैं.
किदवई की राय में ऐसे अभियानों में आम लोगों का जुड़ना अहम है. सीजेपी का समर्थन इसी सवाल को सामने लाता है. क्या चुनाव आयोग को लेकर एक जैसी शिकायतें रखने वाले समूह कांग्रेस और उसके सहयोगियों के साथ लगातार काम करेंगे? फिलहाल समर्थन रैली का है. इससे आगे की राजनीतिक दिशा अभी तय नहीं मानी जा सकती.
शरद गुप्ता जहां मुद्दे को चर्चा में बनाए रखना विपक्ष की रणनीति मानते हैं, वहीं किदवई का ज़ोर राजनीतिक दलों के बाहर तक पहुंचने पर है. दोनों ही राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस के सामने दोनों चुनौतियां हैं. अपनी बात लगातार रखना और उसे उन लोगों तक पहुंचाना, जिनका समर्थन वह मांग रही है और दूसरा, लोगों को ये बताने रहना कि इस सरकार में चुनाव प्रक्रिया कॉम्प्रोमाइज़ हुई है.
फिलहाल कांग्रेस की मांग मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की है. इसके लिए संसद में दिए गए नोटिस आगे नहीं बढ़ सके और सांकेतिक संसद के प्रस्ताव का कोई क़ानूनी असर नहीं है. रामलीला मैदान की रैली के ज़रिए पार्टी अब इसी मांग के पीछे जनता का समर्थन दिखाना चाहती है. इस दबाव से मांग आगे बढ़ेगी या नहीं, इसका जवाब अभी बाकी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.






















