विधानसभा चुनाव नतीजों से पहले कोलकाता में कैसा माहौल

कोलकाता में मतगणना से पहले सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं

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    • Author, मयूरी सोम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
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पश्चिम बंगाल में महीनों लंबी चुनावी प्रक्रिया का नतीजा 4 मई को सामने आ रहा है.

इस बार का चुनाव कई वजहों से सुर्खियों में रहा. सबसे बड़ा विवाद मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर था. इसमें चुनाव से कुछ दिन पहले करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए.

4 मई के नतीजे यह भी तय करेंगे कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी करती हैं या नहीं. साथ ही भारतीय जनता पार्टी के लिए भी यह चुनाव बेहद अहम है क्योंकि वह ऐसे राज्यों में पैठ बनाने की कोशिश लंबे समय से कर रही है, जहां उनकी सरकार नहीं है और इस कोशिश में पश्चिम बंगाल हमेशा से केंद्र में रहा है.

नतीजों की रात से पहले कोलकाता में माहौल शांत है. शहर के अलग-अलग हिस्सों में केंद्रीय सुरक्षा बल और राज्य पुलिस बड़ी संख्या में तैनात है. मतगणना केंद्रों के बाहर भी कड़ा पहरा है.

हालांकि इस बीच एक नया विवाद भी खड़ा हो गया है. फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में 21 मई को दोबारा मतदान कराने की घोषणा की गई है और वहां के नतीजे 24 मई को आएंगे.

बीजेपी ऑफिस

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इमेज कैप्शन, रविवार रात साल्ट लेक स्थित भारतीय जनता पार्टी का ऑफिस

चुनाव नतीजों की घोषणा से पहले बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने रविवार रात भवानीपुर लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रार्थना की.

वहीं चुनाव आयोग ने बयान जारी कर कहा, "चुनाव बाद की हिंसा के विरुद्ध कार्रवाई की शुरुआत के संदर्भ में, भारत निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी पूरी तरह सतर्क हैं. हम एक सुरक्षित चुनावोत्तर वातावरण के लिए प्रतिबद्ध हैं, जहां कानून का पालन हो और हर नागरिक की रक्षा की जाए."

"काउटिंग सेंटर्स से लेकर राज्य के सबसे दूरस्थ कोनों तक, हम चुनाव बाद की हिंसा को रोकने और कानून के पालन को सुनिश्चित करने के लिए उच्च सतर्कता पर हैं."

मुर्शिदाबाद में क्या चर्चा?

सुमन अली मंडल
इमेज कैप्शन, सुमन अली मंडल का वोट कट गया था और वो वोट नहीं डाल पाए
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(दिलनवाज़ पाशा, बीबीसी संवाददाता)

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों को लेकर लोगों में उत्सुकता और सवाल दोनों नज़र आते हैं. कोलकाता से लेकर मुर्शिदाबाद तक जहां-जहां भी हमने लोगों से बात की, सभी का यही कहना था- इस बार मुक़ाबला कड़ा है और कौन जीतेगा अभी यह कहना मुश्किल है.

मुर्शिदाबाद की तरफ़ बढ़ते हुए जगह-जगह केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात नज़र आते हैं. नादिया ज़िले में एसआईआर यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का असर नज़र आता है.

बीबीसी से बात करते हुए एक 25 वर्षीय युवा सुमन अली मंडल ने बताया कि उसके परिवार में सभी का वोट है लेकिन इस बार उसका वोट काट दिया गया है. सुमन अली मतदान नहीं कर सके. उन्हीं के साथ बैठे एक और युवा ने दावा किया कि उनके परिवार में सभी का वोट है लेकिन इस बार उनके पिता का वोट कट गया है.

ये दोनों ही युवा मान रहे हैं कि इस बार नादिया ज़िले में भी मुकाबला बेहद कड़ा है. उनकी सीट से पिछली बार टीएमसी उम्मीदवार की जीत हुई थी.

मुर्शिदाबाद में मतगणना केंद्रों के बाहर केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवान मुस्तैद खड़े नज़र आते हैं. इस ज़िले की 22 विधानसभा सीटों में से पिछली बार टीएमसी ने 20 पर जीत हासिल की थी और दो सीटें बीजेपी को मिली थी.

यहां कई लोग जिनसे हमने बात की उनको लग रहा है कि इस बार नतीजे बदल सकते हैं और दोनों ही दलों के बीच सीधी कांटे की टक्कर है.

स्थानीय संवाददाता सुकुमार महतो के मुताबिक़ इस बार नतीजों में टीएमसी को नुक़सान उठाना पड़ सकता है.

वहीं, एक दुकानदार का कहना था, "चुनाव नतीजे किसी भी तरफ़ जाएं लेकिन ये तय है कि मुर्शिदाबाद में इस बार टीएमसी को कुछ नुक़सान उठाना पड़ेगा."

2011 की जनगणना के मुताबिक़ क़रीब 70 लाख की आबादी वाले इस ज़िले की लगभग दो-तिहाई आबादी मुसलमान है. इस ज़िले की 22 सीटों में से पिछली बार 17 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत हुई थी. पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले विधायकों में मुर्शिदाबाद की बड़ी हिस्सेदारी है.

2021 के चुनाव नतीजों के बाद यहां हिंसा की कई घटनाएं हुईं थीं. इस बार भी चुनाव के दौरान देसी बम फेंके जाने की घटना में कई लोग घायल हुए.

चुनाव नतीजों से पहले शहर शांत है. हालांकि यहां हर ज़बान पर यही सवाल है- 'कल क्या होगा?'

केरल में कैसी चर्चा?

एग्जिट पोल के अनुमानों में केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ गठबंधन को बढ़त दिखाई गई है

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इमेज कैप्शन, एग्जिट पोल के अनुमानों में केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ गठबंधन को बढ़त दिखाई गई है

(इमरान क़ुरैशी, बीबीसी हिन्दी के लिए)

क्या केरल के मतदाता 2021 जैसा फैसला फिर से दोहराएंगे या वे सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एलडीएफ से थक चुके हैं और उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे?

यही सवाल इन दिनों केरल में आम लोगों के साथ-साथ सभी दलों के कार्यकर्ताओं और राजनीतिक जानकारों के बीच जोर-शोर से चर्चा में है.

2021 में मतदाताओं ने सबको चौंकाते हुए एलडीएफ को दोबारा सत्ता सौंप दी थी. हालांकि इससे पहले केरल में एक पुरानी परंपरा रही है. यहां के वोटर कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट मोर्चा यानी यूडीएफ और एलडीएफ को बारी-बारी से सत्ता में लाते रहे हैं.

दिसंबर में यहां स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव हुए थे. इन चुनावों में यूडीएफ को 38.81 प्रतिशत और एलडीएफ को 33.45 प्रतिशत वोट मिले थे, जो पिछली बार से 4.5 प्रतिशत कम हैं. वहीं नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस यानी एनडीए का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी करती है. उसे इन चुनावों में 14.71 प्रतिशत वोट मिले थे, जो पिछली बार से 0.29 प्रतिशत कम हैं.

यूडीएफ के इस अच्छे प्रदर्शन और अच्छी पोलिंग ने उसके समर्थकों में यह उम्मीद जगा दी है कि इस बार उनका मोर्चा सरकार बनाएगा.

मतदान के दिन मतदान प्रतिशत 79.63 दर्ज किया गया था लेकिन आज यह आंकड़ा 0.7 प्रतिशत और बढ़ गया है.

केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. रतन यू. केलकर ने बीबीसी हिन्दी को बताया कि मतदान प्रतिशत इसलिए बढ़ा है, क्योंकि 1 मई तक सरकारी सेवाओं में काम करने वाले मतदाताओं के 20 हजार 28 डाक मतपत्र यानी पोस्टल बैलेट मिले हैं.

एक वरिष्ठ राजनीतिक जानकार ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी हिन्दी से कहा, "आम धारणा यह है कि यूडीएफ बढ़त में है, लेकिन नतीजों का इंतजार करना ही बेहतर होगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.