'ना बच्चों को स्कूल ना मुर्दों को कब्रिस्तान'

बर्मा के रोहिंग्या
    • Author, अविनाश दत्त
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

दिल्ली में कई दिनों से 1500 के ऊपर बर्मा से विस्थापित रोहिंग्या लोग आए थे. ये लोग संयुक्त राष्ट्र से शरणार्थी का दर्ज़ा लेने आए थे लेकिन ज़िल्लत और प्रकृति के प्रकोप के अलावा उनके हाथ कुछ नहीं लगा.

भारत में शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायोग (यूएनएचसीआर) के अनुसार उनके पास 2000 हज़ार रोहिंग्या लोग नामजद हैं जिन्होंने भारत में शरण के लिए प्रार्थना की है.

हामिद अपनी उम्र 25 साल बताते हैं और वो भारत में अलीगढ़ में रहते हैं. मायूस दिख रहे हामिद ने बताया कि उनकी बस एक ही मांग थी कि यूएनएचसीआर उन्हें शरणार्थी का दर्ज़ा दे.

हामिद कहते हैं, "यूएनएचसीआर ने अभी जो कार्ड दिया है वो फालतू है. उसके सहारे तो स्कूल में दाखिला नहीं मिलता. जिन लोगों को रिफ्यूजी कार्ड मिल गया है उन्हें तो विदेश भी ले गए हैं उनको हर महीने पैसे मिलते हैं. "

हामिद के अनुसार बर्मा से जो भी गैर मुसलमान आए हैं उन्हें तो यह कार्ड मिला है लेकिन मुसलमानों को नहीं मिला.

जम्मू से आए मोहम्मद आलम ने कहा, " बिना शरणार्थी कार्ड के हमारे बच्चों को ना स्कूलों में दाखिला मिलता हैं ना मुर्दों को कब्रिस्तान में."

पेचीदगियां

यूएनएचसीआर के अनुसार भारत के अलग अलग हिस्सों में बसे रोहिग्या वैसे तो बर्मा के मूल निवासी हैं लेकिन इनमे से कई ऐसे हैं जिन्हें भटकते भटकते पुश्तें बीत गईं.

कई सीधे बर्मा से भारत आ गए कुछ बांग्लादेश के ज़रिये भारत आये हैं. इनमे से कई ऐसे हैं जिन्होंने बर्मा देखा भी नहीं है और कई अपनी मूल ज़ुबान भी भूल गए हैं.

मोंत्सेरात फिक्सास विए
इमेज कैप्शन, यूएनएचसीआर की भारत में प्रमुख मोंत्सेरात फिक्सास विए

यूएनएचसीआर के हिसाब से अधिकांश रोहिंग्या लोगों के मूल स्थान को स्थापित करना मुश्किल है.

इसके अलावा यूएनएचसीआर को शक है कि इन बेघरबार लोगों में कई को मानव तस्करी के ज़रिये भी भारत में झूठे वायदे कर के लाया गया है.

कुछ राहत

यूएनएचसीआर की भारत में प्रमुख मोंत्सेरात फिशास विए ने इन शरणार्थियों और भारत सरकार से लम्बी बातचीत करने के बाद बताया कि भारत सरकार इनकी दिक्कतों को दूर करने के लिए मान गई है.

मोंत्सेरात के अनुसार भारत ने उन्हें यह आश्वासन दिया है कि वो इन शरणार्थियों को भारत से बाहर नहीं निकालेगें और साथ ही उनके शरण मांगने के आवेदन के आधार पर उन्हें लम्बी अवधि का वीजा भी देंगे.

यूएनएचसीआर के एक बड़े अधिकारी ने नाम ना बताने की शर्त पर बताया लो इन लोगों को शरणार्थी का दर्ज़ा इसलिए भी जल्दबाजी में नहीं देना चाहता क्योंकि बर्मा में राजनीतिक हालात तेज़ी से बदल रहे हैं.

यूएनएचसीआर को उम्मीद है कि शायद बर्मा में हो रहे राजनीतिक सुधारों के चलते यह शरणार्थी जल्द ही वापस बर्मा जा सकें लेकिन वहाँ से आ कर अलीगढ़ में बसे मोहम्मद नूर कहते हैं, " वापस कैसे जाउंगा वहां तो मुसलामानों को गोली मार रहे हैं. "

इतना कह कर वो सबूत के तौर पर अपने हाथ पर दो निशान को दिखा कर कहते हैं, "मैं पहले गोलियां खा चुका हूँ."