'हम मर जाएंगे लेकिन भागेंगे नहीं'- केन बेतवा प्रोजेक्ट में मुआवज़े और पुनर्वास को लेकर क्यों है विवाद

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मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के धौड़नगांव के मुहाने पर खड़ीं, पार्वती बाई हाथ में डंडा लिए हुए थीं.
उनके पीछे कई और लोग भी मौजूद थे. ये लोग केन बेतवा परियोजना के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल थे जहां बुधवार दोपहर अचानक स्थिति तनावपूर्ण हो गई.
बुधवार को ज़िला प्रशासन और पुलिस की टीम बुलडोजर और कई गाड़ियों के साथ धौड़नगांव पहुंची.
ज़िला प्रशासन का दावा है कि उनकी टीम कुछ मकानों को हटाने पहुंची थी. इसी दौरान पथराव हुआ. सरकारी गाड़ियों और जेसीबी मशीनों को नुक़सान पहुंचा और प्रशासन को पीछे हटना पड़ा.
घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद केन बेतवा परियोजना में मुआवजे और पुनर्वास को लेकर उठ रहे सवाल और ग्रामीणों की शिकायतें एक बार फिर चर्चा में हैं.
धौड़नगांव की रामरती आदिवासी का घर गिरा दिया गया था. उनका आरोप है कि बिना किसी नोटिस और मुआवजे के प्रशासन ने उनका घर गिरा दिया.
रामरती ने कहा, "हमारे बच्चे घर के अंदर मौजूद थे जब उन्होंने बुलडोजर से घर गिराना शुरू किया.जैसे तैसे मैंने अपने बच्चों को निकाला".
हालांकि ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने ग्रामीणों के आरोपों को ख़ारिज करते हुए बीबीसी से कहा, "सारी कार्रवाई क़ानूनी है. इस परिवार को पिछले साल जुलाई में मुआवजा मिल चुका है इसीलिए इनका घर गिराया जा रहा था".
छतरपुर के ज़िला पुलिस अधीक्षक रजत सकलेचा ने बताया, "ग्रामीणों ने पुलिस बल पर पत्थरों से हमला किया है जिसमें एक पुलिस का जवान घायल है कुछ अन्य को भी मामूली चोटें आई है. इस मामले में 37 लोगों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 307 और 150 अन्य पर भी गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है".

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बीबीसी ने छतरपुर के कलेक्टर पार्थ जायसवाल से मौजूदा हालात के बारे में जानकारी मांगी.
उन्होंने कहा, "हमने अभी एक एफ़आईआर दर्ज़ की है. हम सभी प्रक्रियाओं का पालन कर रहे हैं. अब कंपनी का काम शुरू होगा. डैम साइट पर अब कोई नहीं है."
केन बेतवा रिवर लिंकिंग परियोजना को लेकर स्थानीय लोगों का विरोध 2024 से ही चल रहा है.
ग्रामीणों ने कई बार प्रशासन पर मुआवजे के बंटवारे में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है.
बीबीसी से बात करते हुए ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने 14 अप्रैल को कहा था, "मुआवजे और राहत पैकेज के बारे में कई लोगों की शिकायतें आ रही हैं. इसलिए हमने एक टीम बनाई है जिसने ऐसे 700-800 लोगों को चिन्हित किया है, जिनका नाम मुआवजे पाने वाले लोगों की सूची में नहीं है. हम जल्द से जल्द उन्हें जोड़कर मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू करेंगे.''
वहीं इस परियोजना से प्रभावित पार्वती बाई ने कहा, "हर आदमी को मुआवजा दिए और दोबारा बसाए बगैर सरकार कैसे उनके घर गिराने की कारवाई शुरू कर सकती है?"
केन बेतवा परियोजना में अब तक क्या हुआ?

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केन बेतवा परियोजना देश की पहली परियोजना है जिसमें दो नदियों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
इसका उद्देश्य मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 13 जिलों तक सिंचाई और पेयजल पहुँचाना है.
इस परियोजना के तहत केन नदी पर धौड़नगाँव में डैम और केन से बेतवा नदी तक 221 किलोमीटर लंबी नहर बनाई जानी है.
इस परियोजना को दिसंबर 2021 में केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिली थी.
मौजूदा अनुमान के अनुसार इसकी लागत करीब 44,605 करोड़ रुपए है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 दिसंबर 2024 को इसकी आधारशिला रखी थी.
यह परियोजना शुरुआत से ही विवादों में रही है.
प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि पुनर्वास और मुआवजे की प्रक्रिया अधूरी और अपारदर्शी है.
ग्रामीणों का आरोप है कि कई पात्र परिवारों को सूची से बाहर रखा गया है और मुआवजे के वितरण में भ्रष्टाचार हुआ है.
इसी साल 5 अप्रैल 2026 को छतरपुर जिले के धौड़नगाँव में सैकड़ों आदिवासी किसान, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ थीं, केन नदी के किनारे विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रतीकात्मक चिताओं पर लेट गए थे.
इसे "चिता आंदोलन" नाम दिया गया था.

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16 अप्रैल को प्रशासन ने ग्रामीणों की शिकायतें सुनने का आश्वासन दिया. इसके बाद आंदोलन स्थगित किया गया था.
इसके बाद 13 मई, बुधवार को प्रशासन और पुलिस की टीम धौड़नगाँव पहुँची.
प्रशासन के मुताबिक़, यह कार्रवाई उन घरों को हटाने के लिए की जा रही थी जिनके मालिक मुआवजा लेने के बाद दूसरी जगह जा चुके हैं.
लेकिन गांव की रहने वाली रामरती आदिवासी का कहना है कि उनका परिवार उस समय घर के अंदर मौजूद था.
रामरती कहती हैं, "हम घर में थे. बच्चे खाना खा रहे थे. तभी पुलिस और अधिकारी आए और बोले घर खाली करो, इसे तोड़ना है."
उनका कहना है कि उन्होंने अधिकारियों से कहा कि छोटे बच्चे घर के अंदर हैं, लेकिन इसके बावजूद कार्रवाई शुरू कर दी गई.
रामरती के मुताबिक,"हम चिल्लाए तो गांव के लोग आ गए. हमने बच्चों को अंदर से निकाला. दो तीन बच्चों को चोट लगी."
वो कहती हैं कि उनके पांच बच्चे हैं और वे और उनके पति दिहाड़ी मजदूरी करते हैं.
रामरती का आरोप है कि उन्हें अब तक न मुआवजा मिला है और न ही नए मकान के लिए कोई पैकेज.
वे कहती हैं, "ये हमारा एक ही घर था. अब सरकार ने इसे भी तोड़ दिया. अब बच्चे सड़क पर हैं."
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन "चोरों की तरह" घर तोड़ने आया था.
प्रशासन का दावा- 'जिन्हें मुआवज़ा मिला उन्हीं के घर तोड़े जा रहे'

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ग्रामीणों और प्रशासनिक अमले के बीच बुधवार को ही झड़प धीरे धीरे पथराव में बदल गई.
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान पुलिस और महिलाओं के बीच हाथापाई हुई, जिसमें एक महिला घायल हुई.
हालांकि ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने आरोपों को खारिज़ करते हुए बीबीसी से कहा कि प्रशासन उन घरों को हटाने गया था जिनके मालिकों को पहले ही मुआवजा दिया जा चुका है और जो खाली पड़े थे.
उन्होंने कहा, "जैसे ही एक घर गिराया गया, ग्रामीण इकट्ठा हो गए. जेसीबी और गाड़ियाँ तोड़ी गईं. पुलिस पर पथराव हुआ."
गाँव के ही वीरू अहिरवार कहते हैं, "आज रामरती और आज़ाद आदिवासी का घर गिराया है, कल हमारा गिराएँगे. प्रशासन लोगों को बसाने के पहले ही गाँव खाली करा लेना चाहता है. यह कहाँ का न्याय है? आख़िर हम लोग अपने परिवारों के साथ कहाँ जाएँगे?"
वे कहते हैं, "हमसे किसी ने नहीं पूछा कि हम गाँव छोड़ना चाहते हैं या नहीं. हमारी कुछ नहीं सुनी जा रही है. हमें घर के बदले घर, ज़मीन के बदले ज़मीन और गाँव के बदले गाँव जैसी व्यवस्था चाहिए. सरकार तो करोड़ों रुपए खर्च कर रही है इस परियोजना में हमें एक ढंग की ज़िंदगी क्यों नहीं दे देती?"
वीरू अहिरवार कहते हैं, "हम मर जाएँगे लेकिन भागेंगे नहीं. जल जंगल जमीन हमारे पूर्वजों की है."
पार्वती बाई और वीरू अहिरवार अन्य ग्रामीणों के साथ अपनी ज़मीन और गाँव छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं.
वहीं दूसरी ओर गाँव में अब भी पुलिस बल तैनात है और कई परिवारों में आगे की कार्रवाई को लेकर डर बना हुआ है.
(छतरपुर से जय प्रकाश की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित


































