मलेरकोटलाः पंजाब के इस नए ज़िले की क्या है ख़ासियत

मलेरकोटला

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इमेज कैप्शन, मलेरकोटला की ईदगाह मस्जिद
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मलेरकोटला - आज 7 जून को ये पंजाब का 23वाँ ज़िला बन गया. नए ज़िले का उद्घाटन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किया.

पिछले महीने मलेरकोटला को ज़िला बनाने के पंजाब सरकार के फ़ैसले की पिछले दिनों काफ़ी चर्चा हुई थी जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसकी आलोचना की थी.

योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा था - "मत और मजहब के आधार पर किसी प्रकार का विभेद भारत के संविधान की मूल भावना के विपरीत है. इस समय, मलेरकोटला (पंजाब) का गठन किया जाना कांग्रेस की विभाजनकारी नीति का परिचायक है."

मलेरकोटला ज़िला बनने से पहले ही इतिहास का एक हिस्सा रहा है. और इसे ज़िला बनाने के फ़ैसले पर सवाल उठाने का प्रयास भी शायद इसके इतिहास से जुड़ा है. क्या है मलेरकोटला का इतिहास?

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मलेरकोटला का नाम और मलेरकोटला रियासत की नींव 1454 ई. में सूफ़ी शेख़ सदरुद्दीन सदर-ए-जहाँ ने रखी थी. शेख़ सदरुद्दीन का सबसे लोकप्रिय नाम हैदर शेख़ है. वह अफ़ग़ानिस्तान के दरबन इलाके के रहने वाले शेरवानी अफ़ग़ान थे.

लैपल हेनरी ग्रिफिन की पुस्तक 'राजा'स ऑफ द पंजाब' के अनुसार, 'मालेर' शब्द का संबंध राजा मलेर सिंह के साथ है.

मलेर सिंह रानी बराह के उत्तराधिकारी थे और चंद्रवंशी राजपूत थे.

उन्होंने भुमसी गाँव के पास मलेरगढ़ का क़िला बनवाया था. कोटला शहर की स्थापना 1657 ई. में नवाब बाज़िद अली ख़ान ने की थी.

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दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने सदरुद्दीन के सूफ़ी स्वभाव के कारण अपनी बेटी ताज मुर्सा बेगम की शादी उनसे की थी.

12 गाँवों और 57 पदों की जागीर और इसे संभालने के लिए 3 लाख रुपये प्रतिवर्ष का भत्ता वसूल किया जाता था.

मलेरकोटला राज्य के नवाब शेख़ सदरुद्दीन से लेकर अंतिम नवाब इफ़्तियार अली ख़ान तक कुल 22 शासकों की यहाँ नवाबी रही है.

नवाब बाज़िद अली ख़ान बहादुर असदुल्लाह (1600-11659) के शासनकाल के दौरान विरासत विकसित हुई.

दूसरे नवाब शेर मुहम्मद ख़ान (1672-1712) के शासनकाल के दौरान मलेरकोटला के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक विकास के साथ मुस्लिम सिख समुदाय के संबंधों और सद्भाव के इतिहास ने दुनिया में एक मिसाल कायम की है.

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नवाब शेर मुहम्मद ख़ान ने 1704 ई. में "हा" का नारा लगाया और सरहिंद के गवर्नर वज़ीर ख़ान की ओर से गुरु गोबिंद सिंह जी के सबसे छोटे साहिबज़ादों फतेह सिंह और जोरावर सिंह को सरहिंद की दीवारों की नींव में जीवित चिह्नित करने के ख़िलाफ़ एक मजबूत आवाज़ उठाई.

उन्होंने वज़ीर ख़ान के इस व्यवहार के ख़िलाफ़ मुग़ल बादशाह औरंगजेब को फारसी में एक पत्र भी लिखा था.

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पत्र में कहा गया था कि छोटे साहिबज़ादे बेकसूर थे और उनको दी गई सज़ा क़ुरान की शिक्षाओं और इस्लाम के मूल सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है. इतिहास में इसे 'हा का नारा' के नाम से जाना जाता है.

गुरु गोबिंद सिंह को रायकोट में नवाब मलेरकोटला के छोटे साहिबज़ादों की शहादत के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने की जानकारी मिली. जुल्म और अन्याय के ख़िलाफ़ नवाब शेर ख़ान की बहादुरी से खुश हो कर गुरु साहिब ने नवाब, शाही परिवार और मलेरकोटला को हमेशा के लिए ख़ुश रहने का आशीर्वाद दिया.

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इमेज कैप्शन, गुरुद्वारा 'हा का नारा'

मलेरकोटला में ब्रिटिश अधिकारियों ने कूका सिखों को तोपों से उड़ाया

मलेरकोटला की एक और शानदार उपलब्धि जनवरी 1872 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भागीदारी थी. अमृतसर, रायकोट और मलेरकोटला में नामधारी सिखों को बूचड़ख़ानों पर हमला करने के लिए, लगभग 66 कूका सिखों को तोपों से उड़ा कर मौत की सज़ा सुनाई गई थी. इनमें 12 साल का एक लड़का भी था.

भारतीय स्वतंत्रता के साथ पंजाब के विभाजन के दौरान भी मलेरकोटला की भूमि पर शांति और भाईचारा कायम रहा. भारत और पाकिस्तान के विभाजन के कारण जनसंख्या विनिमय के दौरान लगभग दस लाख लोग विस्थापित हुए थे.

स्वतंत्रता के बाद के राष्ट्रीय आपातकाल, धर्म युद्ध मोर्चा, पंजाब में आतंकवाद और बाबरी मस्जिद जैसी घटनाओं के दौरान मलेरकोटला निवासियों ने राष्ट्रीय हित में गिरफ़्तारी और अपनी शहादतें भी दी थीं.

लेकिन मलेरकोटला के लोगों ने विरासती सहयोग और आपसी समझ को बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कायम किया है.

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इमेज कैप्शन, कूका लहर के शहीदों का स्मारक

वास्तुकला के कई उदाहरण मौजूद हैं मलेरकोटला में

वास्तुकला के क्षेत्र में पंजाब के सबसे पुराने राज्यों में से एक होने के नाते, मलेरकोटला मध्ययुगीन काल से भारतीय-ईरानी वास्तुकला का एक प्रसिद्ध केंद्र रहा है.

मुबारक मंज़िल, शीश महल, हैदर शेख़ की दरगाह, शाही मक़बरा, मोती बाज़ार, जैन मंदिर, काली माता मंदिर, कोटला का क़िला, जामा मस्जिद, सरकारी कॉलेज और नामधारी शहीद स्मारक यहाँ की वास्तुकला के कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हैं.

सद्भावना विरासत और शिक्षा केंद्र में सामंजस्यपूर्ण विरासत और शिक्षाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला ने मलेरकोटला में नवाब शेर मोहम्मद ख़ान संस्थान की स्थापना की.

इसी तरह, पंजाब सरकार ने यहाँ पंजाब उर्दू अकादमी और खालसा सजना के तीन सौ साल के स्मरणोत्सव समारोह के दौरान फतेहगढ़ साहिब में 'नवाब शेर मोहम्मद ख़ान मेमोरियल गेट' का निर्माण किया है.

मलेरकोटला

मलेरकोटला के अधिकांश लोग जन सधारण के जीवन के निर्माण के काम में मध्यम वर्ग से संबंधित हैं.

यह शहर अपनी आजीविका और साइकिल, सिलाई मशीन, खेल उपकरण, बैडमिंटन, फुटबॉल आदि जैसे लघु उद्योगों के लिए राष्ट्रीय प्रतिष्ठा रखता है.

यहाँ के किसान मध्यमवर्गीय हैं और सब्जियों के उत्पादन और बिक्री में भी इसने अपनी पहचान बनाई है.

यहाँ के घरेलू उद्योगों में, सैनिकों के लिए ताम्र पत्र और सैन्य वर्दी के बैचों को हस्तनिर्मित शिल्प से तैयार करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख़रीदा और बेचा जाता है.

मलेरकोटला बाज़ार

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आबादी का 60 फ़ीसद हिस्सा हैं मुसलमान

मलेरकोटला की आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम है. अधिकांश मुसलमान मुस्लिम कम्बोज हैं.

हिंदू, सिख और जैन क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर हैं.

मलेरकोटला ज़िले के लोगों में प्राचीन सहयोग, सांप्रदायिक एकता, नम्रता, सद्भाव, शांति और विरासत में मिली धार्मिक सहिष्णुता की भावना आज भी जीवित है.

मलेरकोटला के लोग मुस्लिम सिख यूनाइटेड फ्रंट की ओर से दिल्ली में चल रहे किसान संघर्ष में लगातार भाग ले रहे हैं.

रमजान का उपवास, ईद, बकरीद, हैदर शेख़ का मेला और दिवाली का त्योहार मलेरकोटला के ऐसे भाईचारे और भाइचारे के माहौल को क़रीब से देखने के महत्वपूर्ण अवसर हैं.

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