इंदिरा गांधी ने रुपए को जानबूझकर कमज़ोर क्यों किया था, सोवियत संघ हुआ था नाराज़

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इमेज कैप्शन, तब एक डॉलर की क़ीमत 4.76 रुपए से बढ़कर 7.50 रुपए हो गई थी
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

भारतीय रुपया जब अमेरिकी डॉलर की तुलना में कमज़ोर हो रहा है तो कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था की सेहत दुरुस्त नहीं है.

लेकिन भारत में कुछ मौक़ों पर रुपए को जानबूझकर भी कमज़ोर किया गया.

लगभग 60 साल पहले यानी छह जून 1966 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रुपए का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन किया था.

यानी रुपए को डॉलर की तुलना में 36.5 प्रतिशत कमज़ोर किया गया था. इसका नतीजा यह हुआ कि डॉलर की क़ीमत रुपए के मुक़ाबले 57.4 प्रतिशत बढ़ गई थी. तब एक डॉलर की क़ीमत 4.76 रुपए से बढ़कर 7.50 रुपए हो गई थी.

इस फ़ैसले की देशभर में तीखी आलोचना हुई और यह लंबे समय तक राजनीतिक विवाद का विषय बना रहा. राजनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर 1966 का साल भारत के लिए एक संकटपूर्ण था.

चार साल पहले यानी 1962 में चीन से भारत की जंग हुई थी और वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदल दिया था. तीन साल बाद यानी 1965 में पाकिस्तान से भारत का युद्ध हुआ. इन दो युद्धों के बाद भारत की आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर हो चुकी थी.

इसके अलावा भयंकर सूखे ने खाद्यान्न उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था, जिसके कारण भारत को पहली बार बड़े पैमाने पर चावल और गेहूं आयात करना पड़ा था.

देश का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत सीमित था. 1965 में भारत का आयात 2,194 करोड़ रुपये का था जबकि निर्यात केवल 1,264 करोड़ रुपये था. इस तरह व्यापार घाटा 930 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था, जो 1960 के दशक में सबसे अधिक था.

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दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे अरुण कुमार कहते हैं कि भारत खाद्य संकट का सामना कर रहा था और वर्ल्ड बैंक का दबाव था कि सरकार रुपए का अवमूल्यन करे.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ''भारत को दबाव में फ़ैसला लेना पड़ा था लेकिन इसके बाद ही खाद्य सुरक्षा को लेकर कई अहम फ़ैसले किए गए. हरित क्रांति भी इसके बाद ही हुई. लेकिन रुपए के इस अवमूल्यन के बाद अमेरिका का भारत में प्रभाव बढ़ गया था.''

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ''सोवियत संघ इससे बहुत ख़ुश नहीं था लेकिन 1962 में जब चीन ने हमला किया तो अमेरिका भारत को मदद के लिए तैयार हो गया था जबकि यूएसएसआर तटस्थ रहा. ऐसे में भारत में यूएसएसआर को लेकर सरकार और जनता के बीच सहानुभूति कमज़ोर हुई. भारत ने सोवियत की चिंता की बहुत परवाह नहीं की. हालांकि 1971 में यूएसएसआर भारत के साथ खड़ा था अमेरिका पाकिस्तान के साथ. इसके बाद फिर से चीज़ें बदल गईं.''

1966 में छह जून को भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ इंडिया ने रुपए को कमज़ोर करने की ख़बर पहले पन्ने पर लीड बनाई थी.

इस रिपोर्ट में टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा था, ''खाद्यान्न आयात करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा न होने के कारण भारत ने अमेरिका से मदद मांगी. अमेरिका के फूड फॉर पीस प्रोग्राम के तहत भारत जैसे विकासशील देशों को अपनी ही मुद्रा में भुगतान करके खाद्यान्न प्राप्त करने की सुविधा थी."

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गांधी का यह फ़ैसला काफ़ी अलोकप्रिय हुआ था

इंदिरा गांधी ने यह फ़ैसला क्यों किया?

रिपोर्ट के मुताबिक, ''अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने भारत को लगभग 1.6 करोड़ टन गेहूं और 10 लाख टन चावल भेजने के साथ-साथ क़रीब एक अरब डॉलर की आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई ताकि भारत की वित्तीय कठिनाइयों को कम किया जा सके.''

''इंदिरा गांधी के लिए यह मदद स्वीकार करना राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय साबित हुआ. 28 फ़रवरी 1966 को अपने बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री सचिन्द्र चौधरी ने कहा था, दुनिया की सबसे अच्छी नीयत और हमारी पूरी क्षमता के बावजूद, निकट भविष्य में हम विदेशी सहायता के बिना काम नहीं चला सकते."

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा है, ''लेकिन जब सहायता में कटौती हुई और भारत पर अर्थव्यवस्था को उदार बनाने का दबाव बढ़ा तो इंदिरा गांधी ने एक बड़ा क़दम उठाया.''

''पाँच जून की रात लिए गए निर्णय के बाद छह जून 1966 को उन्होंने रुपये का अवमूल्यन कर दिया. इसके परिणामस्वरूप एक डॉलर की क़ीमत 4.76 रुपए से बढ़कर 7.50 रुपए हो गई. रुपये को 36.5 प्रतिशत कमज़ोर किया गया और इस तरह रुपये मुक़ाबले डॉलर के मूल्य में 57.4 प्रतिशत की मज़बूती आई."

इंदिरा गांधी के इस फ़ैसले की देशभर में तीखी आलोचना हुई थी. कई आलोचकों ने इसे अमेरिका और विश्व बैंक के सामने पूर्ण समर्पण तक क़रार दिया.

यहाँ तक कि कांग्रेस के भीतर भी इसका विरोध होने लगा था. सबसे मुखर विरोधी तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह थे.

कैबिनेट बैठक में ही उन्होंने रुपये के भारी अवमूल्यन को पचाना मुश्किल बताया था.

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मनुभाई शाह का तर्क था कि भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों विशेषकर जूट और कपास की मांग में कोई बदलाव नहीं आएगा.

यानी क़ीमतें कम होने से उनकी अंतरराष्ट्रीय मांग में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं होगी. उनके अनुसार केवल रुपए का अवमूल्यन कर देने से निर्यात में वह उछाल नहीं आएगा, जिसकी उम्मीद की जा रही थी.

अवमूल्यन की घोषणा के मात्र दो महीने बाद ही उन्होंने एक बड़ा क़दम उठाया. उन्होंने एकतरफ़ा तरीक़े से अवमूल्यन से पहले मौजूद निर्यात सब्सिडियों को फिर से बहाल कर दिया.

यही नहीं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि अवमूल्यन "स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी ग़लती" थी.

आर्थिक इतिहासकारों का मानना है कि इस क़दम ने अवमूल्यन के मूल मक़सद को काफ़ी हद तक कमज़ोर कर दिया.

दरअसल, अवमूल्यन का एक प्रमुख लक्ष्य निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाना और निर्यातकों को दी जा रही विशेष सब्सिडियों पर निर्भरता कम करना था.

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इमेज कैप्शन, 1966 में इंदिरा गांधी ने रुपए का अवमूल्यन किया था, जिससे डॉलर की क़ीमत रुपए की तुलना में 57 प्रतिशत बढ़ गई थी

मुश्किल फ़ैसला

टीएन निनान बिज़नेस स्टैंडर्ड के संपादक रहे हैं. निनान ने 16 अगस्त 2013 को बिज़नेस स्टैंडर्ड में ही एक लेख लिखा था कि इंदिरा गांधी को ऐसा क्यों करना पड़ा था. निनान ने लिखा था, ''तब भारत विदेशी मुद्रा के गंभीर संकट से जूझ रहा था. वर्ल्ड बैंक ने स्पष्ट कर दिया था कि रुपए के बड़े अवमूल्यन के बिना अतिरिक्त विदेशी सहायता मिलना मुश्किल होगा.''

''यह मुद्दा 1965 से ही चर्चा में था. बीके नेहरू ने अपनी पुस्तक 'नाइस गाइज फिनिश सेकंड' में लिखा है कि जनवरी 1966 में ताशकंद जाने से पहले ही प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अवमूल्यन पर सहमत हो चुके थे. यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ को भी जून 1966 में इसकी घोषणा की संभावित तारीख़ बता दी गई थी. बताया जाता है कि दिसंबर 1965 में शास्त्री ने अपने वित्त मंत्री टीटी कृष्णामाचारी को इसलिए हटा दिया था क्योंकि वह अवमूल्यन का विरोध कर रहे थे.''

निनान ने लिखा है, ''इंदिरा गांधी के इस फ़ैसले की संसद और मीडिया में तीखी आलोचना हुई. आलोचकों का आरोप था कि यह फ़ैसला अमेरिका के दबाव में लिया गया है. स्थिति तब और ख़राब हो गई जब वर्ल्ड बैंक अतिरिक्त मदद जुटाने के अपने वादे को तुरंत पूरा नहीं कर सका. धीरे-धीरे इंदिरा गांधी का पश्चिमी देशों और उनके आश्वासनों पर भरोसा कम होता गया, जिसे बाद के वर्षों में उनकी वामपंथी आर्थिक नीतियों की ओर झुकाव का एक कारण माना जाता है.''

रुपया

निनान ने इंदिरा गांधी के इस फ़ैसले का बचाव किया है. उन्होंने लिखा है, ''लोकप्रिय इतिहास में अक्सर अहम तथ्य को नज़रअंदाज कर दिया जाता है. वो तथ्य है- अवमूल्यन का मध्यम अवधि का प्रभाव."

"1950-51 से 1965-66 के बीच भारत का निर्यात केवल 20 प्रतिशत बढ़ा था, जबकि आयात 131.3 प्रतिशत बढ़ गया था, भले ही उस पर कड़े नियंत्रण लगे हुए थे. 1950-51 में जहाँ व्यापार लगभग संतुलित था, वहीं 1965-66 तक भारत भारी व्यापार घाटे में पहुंच गया.''

''अवमूल्यन के बाद यह प्रवृत्ति बदलने लगी. निर्यात पहले की तुलना में तेज़ी से बढ़ने लगा जबकि आयात में गिरावट आई. 1970-71 तक भारत का व्यापार घाटा पांच वर्ष पहले की तुलना में लगभग दसवें हिस्से तक सिमट गया. इस दृष्टि से देखा जाए तो अवमूल्यन केवल ज़रूरी ही नहीं था बल्कि उसने अपना मक़सद भी पूरा किया.''

मार्च 1991 में एक डॉलर की कीमत 19.64 रुपये थी. महज एक साल बाद यह बढ़कर 31.23 रुपये हो गई. यानी रुपया लगभग 59 प्रतिशत कमज़ोर हुआ.

निनान कहते हैं कि इसका परिणाम यह हुआ कि 1993-94 तक भारत का व्यापार घाटा तीन साल पहले की तुलना में घटकर लगभग छठे हिस्से तक रह गया. यानी मुद्रा का कमज़ोर होना हर स्थिति में नकारात्मक नहीं होता है.

सोवियत यूनियन

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इमेज कैप्शन, सोवियत नेता एलेक्सी कोस्यगिन ने इस फ़ैसले को भारत की भूल के रूप में देखा था

सोवियत संघ हुआ था नाराज़

भारत तब अमेरिकी खेमे में नहीं था और उसे सोवियत संघ के क़रीब देखा जाता था. इंदिरा गांधी ने जब रुपए को कमज़ोर किया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया आई. सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया सोवियत संघ की ओर से आई थी.

सोवियत नेता एलेक्सी कोस्यगिन ने जुलाई 1966 की शुरुआत में भारत के वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह से साफ़ शब्दों में कहा कि अवमूल्यन एक बड़ी भूल था.

मॉस्को में भारत के राजदूत अशोक मेहता ने बाद में लिखा कि जब उन्होंने इस फ़ैसले को समझाने की कोशिश की, तो उन्हें लगभग पूर्ण चुप्पी का सामना करना पड़ा.

उन्होंने इस अनुभव को "बहरों के बीच संवाद" बताया था. सोवियत नेतृत्व ने इस क़दम को इस संकेत के रूप में देखा कि भारत पश्चिमी खेमे की ओर झुक रहा है.

हालांकि असंतोष के बावजूद सोवियत संघ ने भारत को मिलने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता में चुपचाप वृद्धि की.

कई विश्लेषकों ने इसे दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बनाए रखने की सोवियत रणनीति के रूप में देखा. उधर अमेरिका में भी इस फ़ैसले को लेकर बाद में निराशा दिखाई दी.

जुलाई 1967 में, अवमूल्यन के लगभग एक वर्ष बाद, अमेरिकी उद्योगपति जॉन डी. रॉकफेलर ने विश्व बैंक के अध्यक्ष जॉर्ज वुड्स को लिखे एक पत्र में कहा था, ''अवमूल्यन नाकाम रहा. भारत ने वे नीतिगत बदलाव नहीं किए, जिनकी हमें उम्मीद थी."

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि जिन पश्चिमी संस्थाओं ने अवमूल्यन का समर्थन किया था, वे भी बाद में नतीजों से संतुष्ट नहीं थीं.

उनका मानना था कि भारत ने कुछ ही महीनों में आर्थिक उदारीकरण की दिशा से पीछे हटना शुरू कर दिया था.

भारत में अमेरिकी राजदूत रहे चेस्टर बाउल्स ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा कि अवमूल्यन के ख़िलाफ़ भारतीय समाज में व्यापक विरोध था.

उन्होंने उल्लेख किया कि यह विरोध केवल वामपंथी या राष्ट्रवादी समूहों तक सीमित नहीं था. यहाँ तक कि अमेरिका में शिक्षित कई भारतीय, जिनसे पश्चिमी आर्थिक नीतियों के प्रति सहानुभूति की उम्मीद की जा सकती थी, वे भी इस फ़ैसले के आलोचक थे.

अर्थव्यवस्था

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इमेज कैप्शन, इस फ़ैसले पर मोरारजी देसाई ने भी आपत्ति जताई थी

भारत में भी तीखी बहस

इस तरह 1966 का अवमूल्यन केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं था, बल्कि शीत युद्ध की राजनीति, विदेशी सहायता, आर्थिक संप्रभुता और भारत की विकास रणनीति पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया था.

1966 में रुपए के अवमूल्यन पर बहस केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि भारत के बौद्धिक और आर्थिक जगत को भी गहराई से विभाजित कर गई थी.

इसी बहस के बीच इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने 1966 में अपना पहला महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित किया, जिसमें अवमूल्यन और उससे जुड़े आर्थिक प्रश्नों पर व्यापक चर्चा की गई.

अर्थशास्त्री जगदीश भगवती और टी.एन. श्रीनिवासन ने बाद में अपने नेशनल ब्यूरो ऑफ़ इकोनॉमिक रिसर्च स्टडी में लिखा कि कई ऐसे अर्थशास्त्री थे जो निजी तौर पर अवमूल्यन का समर्थन करते थे.

लेकिन उनका मानना था कि अमेरिका और वर्ल्ड बैंक के दबाव ने इस फ़ैसले की राजनीतिक स्वीकार्यता को कमज़ोर कर दिया.

उनके अनुसार, स्थिति ऐसी बन गई थी कि अगर कोई अर्थशास्त्री सार्वजनिक रूप से अवमूल्यन का समर्थन करता, तो उसे विदेशी हितों का समर्थक या एजेंट समझे जाने का जोखिम था.

इसलिए कई समर्थक भी खुलकर इसके पक्ष में नहीं आ सके. व्यापार जगत में भी प्रतिक्रिया मिश्रित रही. उद्योगपति जे.आर.डी. टाटा उन गिने-चुने बड़े कारोबारी नेताओं में थे जिन्होंने इसे कड़वी दवा कहा था.

उनका कहना था कि यह फ़ैसला दर्दनाक ज़रूर है, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए ज़रूरी भी हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.