क्या कुछ महिलाएं ऐसे रंग देख सकती हैं जिन्हें हम में से बाक़ी लोग नहीं देख पाते?

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- Author, डेज़ी स्टिफेंस
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
फाइन आर्टिस्ट कॉन्सेटा एंटिको का कहना है कि जब उन्हें यह एहसास हुआ कि उनके छात्र वे रंग नहीं देख सकते जो उन्हें दिखाई देते हैं, तो वह अनुभव उनके लिए "चेहरे पर शीतल पानी के छींटे पड़ने" जैसा था.
एंटिको का कहना है कि उन्हें रोज़मर्रा की चीजों में अनगिनत रंग दिखाई देते हैं. उदाहरण के लिए, जहाँ ज़्यादातर लोगों को किसी छाया में केवल एक ही रंगत नजर आती है, वहीं उन्हें कई अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं.
उन्हें हमेशा लगता था कि हर व्यक्ति दुनिया को उसी तरह देखता है जैसे वह देखती हैं. लेकिन बाद में अपने छात्रों की बातों से उन्हें समझ आया कि ऐसा नहीं है.
वह याद करते हुए कहती हैं, "मैंने बाद में किसी से पूछा, 'आपने मुझे कभी यह बात बताई क्यों नहीं तो उन्होंने जवाब दिया, 'अरे, आप तो टीचर थीं. हमें लगा कि आप कोई कलात्मक तरीका' अपना रही हैं."
बाद में एंटिको को आनुवंशिक जांच से पता चला कि उनमें टेट्राक्रोमेसी की जैविक क्षमता मौजूद है.
यह रंग देखने की एक उन्नत क्षमता है, जो किसी व्यक्ति को ऐसे रंग देखने में सक्षम बना सकती है जिन्हें दूसरे लोग नहीं देख पाते.
अलग किस्म की कोशिका

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ज़्यादातर लोगों की आंखों में कोन (Cone) नाम की विशेष कोशिकाओं के तीन प्रकार होते हैं.
हर प्रकार की कोन कोशिका अलग-अलग वेवलैंथ वाली रोशनी पर सक्रिय होती है, जो मोटे तौर पर लाल, हरे और नीले रंग से जुड़ी होती है.
इसके बाद ये कोन कोशिकाएं मस्तिष्क तक संकेत भेजती हैं. हमें कौन-सा रंग दिखाई देगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मस्तिष्क को अलग-अलग कोन कोशिकाओं से किस तरह के संकेतों का मिला हुआ रूप प्राप्त होता है.
लेकिन कुछ लोगों में चौथे प्रकार की कोन कोशिका भी हो सकती है.
सैद्धांतिक रूप से इसका मतलब यह है कि उनके मस्तिष्क को अलग-अलग प्रकार की जानकारी मिलती है. इससे दृश्य प्रकाश (जो हमें दिखता है) के पूरे स्पेक्ट्रम में रंगों को पहचानने की क्षमता बढ़ सकती है.
जीन के दो अलग-अलग प्रकार

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लाल और हरे रंग के प्रति संवेदनशील कोन कोशिकाओं को नियंत्रित करने वाले जीन एक्स (X) क्रोमोज़ोम पर मौजूद होते हैं. किसी व्यक्ति के टेट्राक्रोमेटिक होने के लिए जरूरी है कि उसके शरीर में इनमें से किसी एक जीन के दो अलग-अलग प्रकार मौजूद हों और वे सक्रिय भी हों.
चूंकि महिलाओं में दो एक्स क्रोमोज़ोम होते हैं और पुरुषों में आमतौर पर केवल एक एक्स क्रोमोज़ोम होता है, इसलिए सामान्य तौर पर केवल बायोलॉजिकल महिलाएं ही टेट्राक्रोमेटिक हो सकती हैं.
पुरुषों में यही जीन वैरिएंट अक्सर रंग पहचानने की किसी न किसी कमी का कारण बनता है. आंख की रेटिना में चौथे प्रकार की कोन कोशिका होने की स्थिति को रेटिनल टेट्राक्रोमेसी कहा जाता है.
आनुवंशिक जांच के जरिए उन लोगों की पहचान की जा सकती है जिनमें ऐसे जीन वैरिएंट मौजूद होते हैं, जिनसे चार प्रकार की कोन कोशिकाएं बनती हैं.
ब्रिटेन की न्यूकासल यूनिवर्सिटी के टेट्राक्रोमेसी प्रोजेक्ट के अनुसार, माना जाता है कि लगभग 12 प्रतिशत महिलाओं में यह आनुवंशिक क्षमता होती है. हालांकि, शोध बताते हैं कि अलग-अलग आबादी में यह प्रतिशत अलग हो सकता है.

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लेकिन केवल अतिरिक्त कोन कोशिका होने का मतलब यह नहीं है कि उस व्यक्ति की रंग देखने की क्षमता भी बेहतर होगी.
अमेरिका के यूसी इरविन ब्रनसन सेंटर फॉर ट्रांसलेशनल विजन रिसर्च की डॉक्टर किम्बरली ए जेम्सन के अनुसार, अगर किसी इंसान में वास्तव में बेहतर रंग पहचानने की क्षमता विकसित हो जाती है, तो उसे फंक्शनल टेट्राक्रोमेसी कहा जाता है. हालांकि, इसे साबित करना कहीं अधिक कठिन है.
फिर भी, यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि यह आनुवंशिक क्षमता, बेहतर रंग पहचानने की क्षमता में बदल सकती है.
जेम्सन के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं में चार प्रकार की कोन कोशिकाएं थीं, वे रंगों के एक स्पेक्ट्रम को अधिक अलग-अलग रंगों में बांटती थीं.
इससे संकेत मिलता है कि वे ट्राइक्रोमैट लोगों की तुलना में अधिक अलग-अलग रंगों को पहचान सकती हैं. ट्राइक्रोमैट वे लोग होते हैं जिनकी आंखों में तीन प्रकार की कोन कोशिकाएं होती हैं.
इसका प्रमाण एनिमल वर्ल्ड से भी मिलता है.
न्यू वर्ल्ड बंदरों की कुछ प्रजातियों में नर डाइक्रोमैट होते हैं, यानी उनकी आंखों में दो प्रकार की कोन कोशिकाएं होती हैं, जबकि मादाएं ट्राइक्रोमैट होती हैं और उनमें तीन प्रकार की कोन कोशिकाएं होती हैं.
वैज्ञानिकों ने देखा है कि ट्राइक्रोमैट मादाएं लाल फलों को डाइक्रोमैट नरों की तुलना में अधिक तेजी से ढूंढकर खा लेती हैं. इससे संकेत मिलता है कि उन्हें लाल रंग अधिक स्पष्ट दिखाई देता है.
ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी की विजुअल न्यूरोसाइंटिस्ट डॉक्टर जेनी बोस्टेन के अनुसार, अगर यही बात टेट्राक्रोमेटिक इंसानों पर लागू होती है, तो अतिरिक्त प्रकार की कोन कोशिका वाली महिलाएं रंगों को बाक़ी लोगों से अलग तरीके से देख सकती हैं.
हालांकि, यह अनुभव वास्तव में कैसा होगा, इस पर अभी भी वैज्ञानिकों के बीच मतभेद है.
'ऐसे रंग जिनका वर्णन करना मुश्किल है'

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एडिलेड यूनिवर्सिटी के दार्शनिक डॉक्टर माइकल न्यूऑल ने 'टेट्राक्रोमेट लोग क्या देखते हैं' विषय पर रिसर्च पेपर लिखा है.
वह कहते हैं, "एक विचार यह है कि अगर किसी व्यक्ति में रंग पहचानने वाला एक अतिरिक्त रिसेप्टर हो, तो संभव है कि वह ऐसे रंग देख सके जिनका वर्णन करना लगभग असंभव हो. ठीक वैसे ही जैसे हम लाल-हरे रंग की पहचान में कमी वाले किसी व्यक्ति को यह नहीं समझा सकते कि लाल या हरा रंग वास्तव में कैसा दिखता है."
वह आगे कहते हैं, "एक दूसरी संभावना यह भी है कि वे लोग सामान्य रंगों के बीच बहुत सूक्ष्म अंतर को बेहतर तरीके से देख पाते हों."
वैज्ञानिक तरीके से यह जांचना कि कोई व्यक्ति वास्तव में कौन-से रंग देखता है, काफ़ी मुश्किल है.
डॉक्टर जेनी बोस्टेन कहती हैं, "सामान्य ट्राइक्रोमैट इंसान के रंग देखने के निजी अनुभव को भी सटीक रूप से मापना संभव नहीं है."
डॉक्टर किम्बरली ए जेम्सन के अनुसार, "यह विषय इसलिए भी जटिल है क्योंकि टेट्राक्रोमेसी के कई अलग-अलग प्रकार हो सकते हैं. अतिरिक्त कोन कोशिका कितनी संवेदनशील है, इसके आधार पर लोगों की रंग देखने की क्षमता में काफी अंतर हो सकता है."
हालांकि, डॉक्टर बोस्टेन कहती हैं कि लोग रंगों के बीच कितना अंतर पहचान पाते हैं या अलग-अलग रंगतों को कितना अलग मानते हैं, जैसे परीक्षणों से शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग लोग रंगों को किस तरह देखते हैं.
टेट्राक्रोमेट की पहचान कैसे करें

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इंटरनेट पर खोजने पर टेट्राक्रोमेसी की जांच के कई ऑनलाइन टेस्ट मिल जाएंगे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल इनकी मदद से किसी व्यक्ति की पहचान टेट्राक्रोमेट के रूप में नहीं की जा सकती.
ज़्यादातर आधुनिक स्क्रीन केवल तीन रंग चैनलों यानी लाल, हरे और नीले का इस्तेमाल करती हैं. इसलिए अगर टेट्राक्रोमेट लोग वास्तव में ऐसे नए रंग देख सकते हैं जिन्हें बाक़ी लोग नहीं देख पाते, तो संभव है कि वे रंग स्क्रीन पर उसी तरह दिखाई ही न दें.
डॉक्टर न्यूऑल के अनुसार, इससे जांच करना कठिन हो जाता है. अगर किसी इंसान को वास्तविक दुनिया में दिखाई देने वाले रंग और स्क्रीन पर दिखाई देने वाले रंग लगातार अलग महसूस होते हैं, तो यह टेट्राक्रोमेसी का संकेत हो सकता है. हालांकि, यह इस्तेमाल की जा रही तकनीक पर भी काफ़ी निर्भर करता है.
डॉक्टर जेम्सन कहती हैं कि एक और संकेत यह हो सकता है कि किसी को हमेशा से लगे कि वह रंगों को दूसरों से अलग तरीके से देखता है.
वह कहती हैं, "ऐसे लोगों को कम उम्र से ही यह गहरा एहसास होता है कि उनकी रंग पहचानने की क्षमता दूसरों की तुलना में अधिक तेज और अधिक संवेदनशील है."
एक और दिलचस्प संकेत यह हो सकता है कि किसी व्यक्ति को तेज एलईडी रोशनी से असामान्य रूप से ज़यादा परेशानी होती हो, जबकि गर्म रंगत वाली रोशनी उसे अधिक आरामदायक लगे.
डॉक्टर जेम्सन कहती हैं, "टेट्राक्रोमेट महिलाएं ऐसी रोशनी को सहन नहीं कर पातीं जिनमें लंबी वेवलैंथ वाली रोशनी का हिस्सा पर्याप्त न हो."
वह आगे कहती हैं, "वे अपने घर के लोगों से कहती हैं, 'मुझे यह रोशनी बिल्कुल पसंद नहीं. मैं इन फ्लोरोसेंट ट्यूबों को सहन नहीं कर सकती. इनसे मुझे बेचैनी होती है और तबीयत ख़राब लगती है.'"
जिन लोगों के पिता को रंग पहचानने में हल्की कमी होती है, उनमें भी टेट्राक्रोमेट होने की संभावना अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है.
हालांकि, ये केवल संभावित संकेत हैं. इसके लिए आनुवंशिक जांच और प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण कहीं अधिक भरोसेमंद माने जाते हैं.
रेटिनल से फंक्शनल टेट्राक्रोमेसी तक

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शोधकर्ता अब भी यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि रेटिनल टेट्राक्रोमेसी आखिर किन परिस्थितियों में फंक्शनल टेट्राक्रोमेसी में बदलती है.
डॉक्टर बोस्टेन कहती हैं, "क्या इसके लिए अतिरिक्त कोन कोशिका का कोई विशेष प्रकार होना जरूरी है? या फिर यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति ने उन संकेतों का इस्तेमाल करना कैसे सीखा है?"
वह यह भी मानती हैं कि इसका संबंध दृश्य तंत्र (विजुअल सिस्टम) के अन्य हिस्सों की लचीलेपन से भी हो सकता है.
वह आगे कहती हैं, "एक और संभावना यह है कि अगर किसी व्यक्ति के जीवन में इन रंग संकेतों का कोई व्यावहारिक उपयोग हो, तभी वह उनके बीच अंतर पहचानने की क्षमता विकसित कर सके."
चित्रकार कॉन्सेटा एंटिको का मानना है कि उनके साथ यही हुआ.
वह कहती हैं, "मैंने अपनी रंग पहचानने की क्षमता को विकसित किया है. यह किसी मांसपेशी की तरह है."
वह आगे कहती हैं, "मैं बचपन से ही चित्रकारी कर रही हूं. ऐसा लगता है जैसे मैंने एक लाख घंटे रंगों को मिलाने में बिताए हैं. मैं यह काम हर दिन, लगातार करती हूं."
'एक साहसिक दावा'

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फंक्शनल टेट्राक्रोमेसी वास्तव में मौजूद है या नहीं, इस पर बहस अब भी जारी है.
डॉक्टर बोस्टेन का कहना है कि यह दावा कि कुछ लोगों में अतिरिक्त रंग देखने की क्षमता होती है, "एक साहसिक दावा" है.
हालांकि, वह कहती हैं, "जब तक कोई बिल्कुल सही प्रयोग उपलब्ध नहीं होता, तब तक अलग-अलग परीक्षणों और अलग-अलग केस स्टडी से जितनी अधिक जानकारी मिल सके, उसे एक साथ देखा जाता है."
"इसके बाद यदि सभी प्रमाण एक ही दिशा में इशारा करें, तो कहा जा सकता है कि उपलब्ध सबूत काफ़ी हद तक इस बात के पक्ष में हैं."
दूसरे लोगों के संदेह का कॉन्सेटा एंटिको पर कोई असर नहीं पड़ता. उनका कहना है कि वह ख़ुद को इस आनुवंशिक बदलाव के कारण "खुशकिस्मत" मानती हैं.
वह कहती हैं, "यह बेहद अद्भुत है कि मैं ऐसी चीजें देख सकती हूं जिन्हें दूसरे लोग नहीं देख पाते."
वह आगे कहती हैं, "इसने मेरी जिंदगी को बेहद खूबसूरत बना दिया है."
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