पाकिस्तान: कराची का हिंदू जिमखाना जिसे गिराना चाहते थे ज़िया उल हक़

सैन्य शासक ज़िया-उल-हक़ के दौर में हिंदू जिमख़ाना की इमारत को बेचने और यहां तक कि उसे गिराने का फ़ैसला भी कर लिया गया था

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    • Author, रशीद शकूर
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, कराची से बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

यह संभव ही नहीं है कि कराची में हिंदू जिमखाना की ऐतिहासिक इमारत के पास से गुज़रने वाला कोई व्यक्ति उस पर नज़र डाले बिना आगे बढ़ जाए.

इस इमारत में एक ऐसा आकर्षण है जो हर किसी को अपनी ओर खींच लेता है.

इसे देखते ही मन मुग़ल दौर की ओर चला जाता है.

इसी वजह से पूरे भरोसे के साथ कहा जाता है कि यह कराची की पहली ऐसी इमारत थी जिसे मुग़ल शैली में बनाया गया था.

कहा जाता है कि हिंदू जिमख़ाना का नक़्शा आगरा में स्थित एतमाद-उद-दौला के मक़बरे से प्रेरित होकर बनाया गया था

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वास्तुकला

हिंदू जिमखाना का निर्माण आगा अहमद हुसैन के तैयार किए गए नक़्शे के आधार पर किया गया था. कहा जाता है कि वे कराची के पहले मुस्लिम वास्तुकार थे.

कराची की एक और ऐतिहासिक इमारत, मोहट्टा पैलेस का नक़्शा भी उन्होंने ही तैयार किया था.

कहा जाता है कि हिंदू जिमखाना का नक़्शा आगरा में स्थित एतमाद-उद-दौला के मक़बरे से प्रेरित होकर बनाया गया था.

दीवारों के निर्माण के लिए पत्थर बीजापुर से मँगाए गए थे. इमारत की छत के बाहरी हिस्से पर बनी गुंबदनुमा छतरियाँ मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा निर्मित फ़तेहपुर सीकरी से प्रेरित हैं.

मुख्य उभरे हुए झरोखे को दोनों तरफ़ से घेरने वाले अष्टकोणीय कोनों पर बने मीनारों के ऊपर छतरियाँ बनाई गई हैं. ये राजस्थानी वास्तुकला के प्रभाव को स्पष्ट रूप से दिखाती हैं.

बरामदे के कोनों पर छोटी छतरियाँ बनाई गई हैं. यह सब उस स्थापत्य शैली की विशेषताएं थीं जो मुग़ल बादशाह अकबर के दौर में प्रचलित थी.

हिंदू जिमख़ाना का निर्माण आगा अहमद हुसैन के तैयार किए गए नक़्शे के आधार पर किया गया था

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इमारत की छत के बाहरी हिस्से पर बनी गुंबदनुमा छतरियाँ मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा निर्मित फ़तेहपुर सीकरी से प्रेरित हैं

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सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र

ब्रिटिश सरकार ने 1921 में हिंदू जिमखाना के लिए 100 साल की लीज़ पर ज़मीन दी थी. इसकी इमारत का निर्माण 1925 में पूरा हुआ था.

हिंदू जिमखाना का निर्माण हिंदू समुदाय ने कराया था. इसमें सेठ राम गोपाल गोवर्धन दास मोहट्टा की प्रमुख भूमिका थी. इसी वजह से इसका नाम उनके नाम पर रखा गया था. उनका नाम आज भी इस इमारत पर प्रमुखता से दिखाई देता है.

सेठ गोपाल गोवर्धन दास मोहट्टा के दादा शिवरतन चंद्ररतन मोहट्टा ने कराची में ऐतिहासिक मोहट्टा पैलेस का निर्माण कराया था. वहां अब एक संग्रहालय मौजूद है.

हिंदू जिमखाना के निर्माण का मुख्य उद्देश्य उस दौर के हिंदू समुदाय को ऐसी जगह उपलब्ध कराना था, जहां वे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां जारी रख सकें.

उस समय हिंदू जिमखाना कराची के उच्च वर्ग के हिंदुओं के लिए एक क्लब की तरह था. हालांकि, इस बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि उस समय हिंदू जिमखाना के सदस्यों की संख्या कितनी थी. लेकिन इतिहास की किताबों में यह ज़रूर दर्ज है कि उस दौर में यह सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में अग्रणी था.

मुग़ल बादशाह अकबर के दौर में प्रचलित स्थापत्य शैली की विशेषताएं इस जिमखाना के निर्माण में देखी जा सकती हैं

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कराची के हिंदू भारतीय टेस्ट क्रिकेटर

स्थापना के बाद हिंदू जिमखाना सिर्फ़ सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था. वह उस समय खेल गतिविधियों में भी काफ़ी सक्रिय था.

उस दौर में इसका अपना मैदान था. वहां विभिन्न खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित होती थीं.

हालांकि, इस मैदान पर कभी कोई फ़र्स्ट क्लास मैच नहीं खेला गया. उस समय कराची में फ़र्स्ट क्लास मैच कराची जिमखाना में हुआ करते थे.

लेकिन हिंदू जिमखाना के मंच से क्रिकेटरों को लगातार प्रोत्साहन मिलता था. इनमें नाओमल जियोमल का नाम भी शामिल है.

पाकिस्तान बनने से पहले कराची में जन्मे कई हिंदू क्रिकेटरों ने उस दौर में फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट खेली थी.

लेकिन चार ऐसे हिंदू क्रिकेटर थे जो पाकिस्तान बनने से पहले कराची में पैदा हुए थे और उन्होंने भारत की ओर से टेस्ट क्रिकेट खेली. इनमें से एक भारतीय टीम का कप्तान भी बना.

अदालतों में पेश किए गए सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, हिंदू जिमखाना का मूल क्षेत्रफल 39,178 वर्ग गज था. जो अब घटकर केवल 4,816 वर्ग गज रह गया है

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नाओमल जियोमल

17 अप्रैल 1904 को कराची में जन्मे नाओमल जियोमल को यह सम्मान प्राप्त है कि वे 1932 में लॉर्ड्स में भारत का पहला टेस्ट मैच खेलने वाली टीम के ओपनर थे.

उस दौरे में खेले गए फ़र्स्ट क्लास मैचों में उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था. उन्होंने सीके नायडू के बाद सबसे ज़्यादा रन बनाए थे. हालांकि, वे अपने करियर में सिर्फ़ तीन टेस्ट मैच ही खेल सके.

उन्होंने अपने फ़र्स्ट क्लास करियर की शुरुआत एमसीसी के ख़िलाफ़ कराची जिमखाना में खेले गए मैच से की थी.

संयोग से उनका आख़िरी फ़र्स्ट क्लास मैच भी कराची के उसी मैदान पर खेला गया था.

नाओमल ने अपने फ़र्स्ट क्लास करियर में सात शतक बनाए थे.

कराची के प्रति उनका गहरा लगाव हमेशा बना रहा. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान बनने के बाद भी उन्होंने कराची छोड़ना उचित नहीं समझा.

वे कराची में ही कोचिंग करते रहे और चयनकर्ता भी रहे.

इसके अलावा उन्होंने पाकिस्तान की फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट के सबसे बड़े टूर्नामेंट क़ायदे-आज़म ट्रॉफ़ी के पांच मैचों में अंपायरिंग भी की.

वे 1971 में भारत चले गए थे. वहां 18 जुलाई 1980 को 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था.

उनके बेटे हरि नाओमल ने भी कराची और कराची यूनिवर्सिटीज़ की ओर से तीन फ़र्स्ट क्लास मैच खेले थे.

दिलचस्प बात यह है कि जिस मैच में हरि नाओमल ने अपने फ़र्स्ट क्लास करियर की शुरुआत की थी, उस मैच में एक अंपायर उनके पिता नाओमल जियोमल थे.

हरि नाओमल अब 86 वर्ष की उम्र में राजस्थान के मुनाबाव में रहते हैं.

1932 में लॉर्ड्स के मैदान पर भारत के ख़िलाफ़ बल्लेबाज़ी करते इंग्लैंड के कप्तान डगलस जार्डिन (फ़ाइल फ़ोटो)

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पन्नन मल पंजाबी

कराची में जन्मे पन्नन मल पंजाबी ने अपने फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट करियर का शुरुआती हिस्सा कराची में खेला था. बाद में वे भारत चले गए थे.

उनके लिए वह पल बहुत भावुक था, जब वे 1954-55 में वीनू मांकड़ की टीम के साथ पाकिस्तान आए थे. उन्होंने अपना आख़िरी टेस्ट भी कराची में ही खेला था.

गोगुमल किशनचंद

गोगुमल किशनचंद ने भारत की ओर से पांच टेस्ट मैच खेले थे. वे कराची की स्कूल क्रिकेट में अपनी शानदार बल्लेबाज़ी की वजह से पहचान में आए थे.

उन्होंने फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट में 15 शतक बनाए थे. पाकिस्तान बनने से पहले वे भारत चले गए थे. 1997 में उनका निधन बड़ौदा (अब वडोदरा) में हुआ था.

किशनचंद को एक ख़ास वजह से याद किया जाता है. 1947-48 में सिडनी के चार दिवसीय मैच में सर डॉन ब्रैडमैन ने उनकी गेंद पर एक रन लेकर फ़र्स्ट क्लास क्रिकेट में अपना 100वां शतक पूरा किया था.

गुलाब राय रामचंद

कराची में जन्मे इन चार हिंदू टेस्ट क्रिकेटरों में गुलाब राय रामचंद को टेस्ट क्रिकेट में भारत की कप्तानी का सम्मान भी मिला था.

उन्होंने बाकी तीन क्रिकेटरों की तुलना में ज़्यादा, यानी 33 टेस्ट मैच खेले थे.

उन्होंने अपने फ़र्स्ट क्लास करियर की शुरुआत दिसंबर 1945 में कराची में की थी. हालांकि बाद में वे भारत चले गए थे.

वे 1954-55 में पाकिस्तान दौरे पर आई भारतीय टीम का हिस्सा थे. इस सीरीज़ का आख़िरी टेस्ट कराची के नेशनल स्टेडियम में खेला गया था.

इस मैच में रामचंद ने अपने टेस्ट करियर की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ी करते हुए छह विकेट लिए थे.

हिंदू जिमखाना को गिराने का आदेश

ब्रिटिश सरकार ने 1921 में हिंदू जिमखाना के लिए 100 साल की लीज़ पर ज़मीन दी थी. इसकी इमारत का निर्माण 1925 में पूरा हुआ था

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पाकिस्तान बनने के बाद बड़ी संख्या में हिंदू भारत चले गए थे. इसलिए हिंदू जिमखाना का नियंत्रण भी पाकिस्तान सरकार के पास आ गया था.

समय के साथ इसकी ज़मीन अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न संस्थाओं को दी जाती रही.

साठ के दशक में भगवान दास चावला, सेठ मोतन दास और खूबचंद भाटिया ने हिंदू जिमखाना को हिंदू समुदाय को सौंपने के लिए आंदोलन भी चलाया था.

अदालतों में पेश किए गए सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, हिंदू जिमखाना का मूल क्षेत्रफल 39,178 वर्ग गज था. जो अब घटकर केवल 4,816 वर्ग गज रह गया है.

इस दौरान पुलिस विभाग को 27,346 वर्ग गज ज़मीन दी गई. फ़ेडरल सर्विस कमीशन को 6,700 वर्ग गज ज़मीन दी गई. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ओल्ड ब्वॉयज़ एसोसिएशन को 4,164 वर्ग गज ज़मीन दी गई.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ओल्ड ब्वॉयज़ एसोसिएशन ने इसके लिए बाक़ायदा भुगतान किया था.

इतना ही नहीं, सैन्य शासक ज़िया-उल-हक़ के दौर में हिंदू जिमखाना की इमारत को बेचने और यहां तक कि उसे गिराने का फ़ैसला भी कर लिया गया था.

इसकी वजह यह बताई गई थी कि इमारत की हालत ख़राब हो चुकी है. इसलिए उसे गिरा दिया जाना चाहिए.

हिंदू जिमखाना का नामोनिशान मिटने से पहले ही हेरिटेज फ़ाउंडेशन ने समय रहते दख़ल दिया. इस तरह इमारत को ध्वस्त होने से बचा लिया गया.

इसके बाद हिंदू जिमखाना की इमारत तो बनी रही, लेकिन उसका मालिकाना हक़ और उसे सौंपे जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया.

यह मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.

हिंदू जिमखाना की इमारत तो बनी रही, लेकिन उसकी मालिकी और उसे सौंपे जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया

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कराची के क्लिफ़्टन इलाक़े में स्थित श्रीरत्नेश्वर महादेव वेलफ़ेयर सेवा मंडली समिति के उपाध्यक्ष अशोक मोटवानी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा, "2005 में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में ज़िया मोहिउद्दीन पर विशेष कृपा करते हुए हिंदू जिमखाना की मूल हैसियत ख़त्म कर दी गई. वहां नेशनल एकेडमी ऑफ़ परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स स्थापित कर दी गई और उन्हें इस एकेडमी का प्रमुख बना दिया गया."

यहां यह बताना ज़रूरी है कि इस एकेडमी में थिएटर और संगीत की शिक्षा तीन वर्षीय डिप्लोमा कोर्स के तहत दी जाती है.

फ़िलहाल इस एकेडमी में 111 छात्र पढ़ रहे हैं.

डॉ. अशोक मोटवानी कहते हैं, "2007 में हमने सिंध हाई कोर्ट में हिंदू जिमखाना को हिंदुओं के हवाले करने और एकेडमी को यहां से हटाने की याचिका दायर की थी. इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया."

"2014 से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. हमारी याचिका यह थी कि हिंदू जिमखाना जिस उद्देश्य के लिए बनाया गया था, उसका इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए."

यह भी बताना ज़रूरी है कि 2008 में सिंध सरकार ने नेशनल एकेडमी ऑफ़ परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स, जिसे संक्षेप में 'नापा' कहा जाता है, को नोटिस भेजा था.

नोटिस में कहा गया था कि वह इमारत खाली करे क्योंकि उसने कथित तौर पर इमारत के भीतर निर्माण कार्य कराया है, जिसकी समझौते के तहत अनुमति नहीं थी.

नापा ने इमारत में किसी भी प्रकार के ग़ैरक़ानूनी निर्माण से इनकार किया था.

अदालत ने 2018 में नापा को किसी दूसरी जगह स्थानांतरित करने का आदेश भी दिया था. हालांकि, इस पर अमल नहीं हो सका.

अक्तूबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गुलज़ार अहमद ने हिंदू जिमखाना को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने का आदेश दिया था.

हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि जब तक एकेडमी को कोई वैकल्पिक स्थान नहीं मिल जाता, वह वहीं काम करती रहे.

लेकिन अदालत ने नापा को स्थानांतरित करने में हो रही देरी पर कड़ी नाराज़गी भी जताई थी.

2021 में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू जिमखाना को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने का आदेश दिया था

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सुप्रीम कोर्ट ने 2021 की एक अन्य सुनवाई में यह सवाल भी उठाया था कि अगर हिंदू जिमखाना हिंदू समुदाय को सौंपा जाए, तो उसे किसके हवाले किया जाए.

डॉ. मोटवानी कहते हैं, "हमने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट को कुछ सुझाव भी दिए थे. हमने कहा था कि जो कुछ बचा है, वह हिंदू समुदाय को दे दिया जाए ताकि हम अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियां फिर से शुरू कर सकें."

"सरकार चाहे तो अपना एक प्रतिनिधि भी इसमें शामिल कर सकती है. हम सिर्फ़ हिंदू जिमखाना को उसके मूल स्वरूप में फिर से देखना चाहते हैं. हम भी पाकिस्तान के नागरिक हैं. हमने इस धरती को नहीं छोड़ा और यहीं रह गए हैं."

डॉ. मोटवानी कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत हम लोग अपने विशेष त्योहारों के मौक़े पर नापा की इमारत में कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं. इसके लिए हमें सिंध सरकार से आवेदन देकर अनुमति लेनी पड़ती है."

यह उल्लेखनीय है कि कराची में इस समय कराची जिमखाना और कराची क्लब के रूप में निजी सदस्यों के दो बड़े केंद्र मौजूद हैं.

ये दोनों संस्थान सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध हैं.

इन दोनों क्लबों में बड़ी संख्या में हिंदू सदस्य मौजूद हैं. वे वहां होने वाली हर गतिविधि में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि यह सब करने के लिए उनके पास अपनी कोई अलग और निजी जगह नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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