पिकैक्स माउंटेन: ईरान का यह गोपनीय ठिकाना ट्रंप के निशाने पर क्यों है?

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- Author, पत्रकार रज़ा साबेती
- Author, बीबीसी वेरीफ़ाई की अतिरिक्त रिपोर्टिंग
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
हाल ही में ईरान को लेकर अपनी धमकियों में डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसी जगह का ज़िक्र किया, जो देश के दूसरे परमाणु ठिकानों जितनी मशहूर नहीं है.
जब उनसे उन ख़बरों के बारे में पूछा गया कि तेहरान ने शायद परमाणु सेंट्रीफ़्यूज 'पिकैक्स माउंटेन' में पहुंचा दिए हैं, तो ट्रंप ने कहा कि अमेरिका इस भूमिगत परिसर पर "बहुत भारी हमला करेगा... शायद बहुत जल्द."
ईरान का कहना है कि यह बेहद मज़बूत और कड़ी सुरक्षा वाला निर्माणाधीन परिसर है. यह बाद में नतांज़ स्थित एडवांस सेंट्रीफ़्यूज उत्पादन और असेंबली केंद्र की जगह लेगा. नतांज़ शहर, इस्फ़हान प्रांत में है जो राजधानी तेहरान से लगभग 220 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है.
लेकिन इस परिसर के अनुमानित आकार, इसकी सुरंगों की गहराई और अंतरराष्ट्रीय निगरानीकर्ताओं को यहां पहुंच की अनुमति न मिलने के कारण यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि पिकैक्स माउंटेन का इस्तेमाल ईरान किसी और मक़सद के लिए भी कर सकता है.
इस जगह का संबंध ईरान के उच्च स्तर तक संवर्धित यूरेनियम के भंडार को लेकर उठे सवालों से भी जोड़ा गया है. 2 जुलाई 2020 को नतांज़ परमाणु परिसर में एक विस्फोट हुआ था. ईरान ने इसे तोड़फोड़ की कार्रवाई बताया था. कई रिपोर्टों में इसके लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया गया, हालांकि इसराइल ने कभी इसकी ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की.
कुछ महीनों बाद, ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन के तत्कालीन प्रमुख अली अकबर सालेही ने घोषणा की कि एक नया केंद्र बनाया जाएगा. उनके मुताबिक़, यह केंद्र ज़्यादा आधुनिक, बड़ा और अधिक व्यापक होगा और पास के एक पहाड़ के भीतर स्थापित किया जाएगा.
इसके बाद 2020 की सर्दियों में कोलांग ग़ज़ला या पिकैक्स पर्वत में इस नए ठिकाने के संकेत दिखाई देने लगे. यह जगह नतांज़ से लगभग 2 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है.
सैटेलाइट तस्वीरों में पहाड़ के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में दो-दो सुरंग प्रवेश द्वार दिखाई देते हैं. इसके अलावा, दक्षिणी तरफ़ भी एक रास्ता या प्रवेश द्वार नज़र आता है.
इस फ़ैसिलिटी के बारे में क्या-क्या पता है?

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अमेरिका स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी (आईएसआईएस) का कहना है कि समुद्र तल से लगभग 1,608 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस पर्वत की चोटी पर कई भूमिगत स्तर हो सकते हैं. लेकिन आंतरिक योजनाओं तक पहुंच के बिना इनकी मात्रा निर्धारित करना असंभव है.
सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के अनुसार, जून 2025 में इसराइल के साथ 12 दिनों तक चले युद्ध के बाद ईरान ने इस स्थल तक पहुंच को और सख़्त कर दिया और लगभग पूरे परिसर के चारों ओर एक दीवार बना दी.
फरवरी 2026 में आईएसआईएस की ओर से किए गए विश्लेषण की उपग्रह तस्वीरों में पता चला कि सुरंग के प्रवेश द्वारों को मज़बूत किया जा रहा था.
एक तस्वीर में प्रवेश क्षेत्रों में से एक के ऊपर ताज़ा कंक्रीट बिछाया हुआ प्रतीत हो रहा था.
एक अन्य तस्वीर में दूसरी सुरंग के प्रवेश द्वार पर चट्टान और मिट्टी को समतल किया हुआ दिखाया गया. लेकिन आईएसआईएस के नवीनतम आकलन के अनुसार, यह परिसर अभी तक पूरी तरह से चालू नहीं हुआ है.
9 जुलाई 2026 की सैटेलाइट तस्वीरों से संकेत मिलता है कि कुछ प्रवेश द्वार अब भी खुले हैं और वहां तक पहुंचा जा सकता है.
वहीं, सैटेलाइट तस्वीरों में नतांज़ या ईरान की अन्य परमाणु सुविधाओं- फ़ोर्दो और इस्फ़हान में पुनर्निर्माण के प्रयासों के बहुत कम संकेत दिखाई देते हैं. इन ठिकानों पर अमेरिका और इसराइल ने हमला किया था.
बीती 22 जुलाई को ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि पिकैक्स माउंटेन पर कोई परमाणु गतिविधि नहीं हो रही है.
आईएसआईएस का अनुमान है कि यह परिसर इतना बड़ा है कि इसमें छोटे पैमाने का यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) केंद्र स्थापित किया जा सकता है. इसमें उन्नत सेंट्रीफ़्यूज़ लगाए जा सकते हैं, जिनकी अलग करने की क्षमता (सेपरेटिव कैपेसिटी) अधिक होती है.
इसका मतलब है कि कम संख्या में मशीनों का इस्तेमाल करके भी उतनी ही मात्रा में संवर्धित यूरेनियम तैयार किया जा सकता है. साथ ही, इसके लिए कम जगह की आवश्यकता पड़ती है.
हालांकि, आईएसआईएस के पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वहां ऐसी सेंट्रीफ़्यूज़ श्रृंखलाएं (कैस्केड) स्थापित की जा चुकी हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि सैटेलाइट तस्वीरों में वे संकेत दिखाई नहीं देते जो आम तौर पर किसी परमाणु रिएक्टर के निर्माण से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए, वहां कूलिंग टावर, इस्तेमाल किए जा चुके ईंधन (स्पेंट फ़्यूल) को रखने का पूल, या बड़े पैमाने का जलापूर्ति नेटवर्क नज़र नहीं आता.
इस पृष्ठभूमि में पिकैक्स माउंटेन का नाम कई तरह की अटकलों में लिया जाने लगा है. लेकिन आईएईए की किसी आधिकारिक रिपोर्ट, सार्वजनिक ख़ुफ़िया दस्तावेज़ या सत्यापित तस्वीर में इस बात का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं मिला है.
अमेरिका ने बंकर बस्टर बम से हमले के लिए क्या तैयारी की थी
अमेरिका ने ईरान की फ़ोर्दो परमाणु सुविधा पर जीबीयू-57 बंकर बस्टर बम से हमला किया था. यह 13.6 टन वज़नी बम है, जिसे मिट्टी, चट्टानों और मज़बूत कंक्रीट की कई परतों को भेदने के बाद विस्फोट करने के लिए बनाया गया है.
हालांकि, ऐसे हमले की सफलता कई बातों पर निर्भर करती है. इनमें चट्टानों का प्रकार, परिसर की गहराई और बम के प्रहार का कोण शामिल हैं.
फ़ोर्दो पर हमले से पहले अमेरिका और इसराइल ने वर्षों तक उस स्थल के बारे में जानकारी जुटाई थी. लेकिन मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के परमाणु शोधकर्ता मैथ्यू शार्प ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि पिकैक्स माउंटेन पर हमला करने पर अमेरिका को वैसी सफलता मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.
इसकी वजह यह है कि यह परिसर ज़्यादा गहराई में बना है और इसकी संरचना के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. अगर परमाणु सामग्री पिकैक्स माउंटेन परिसर के सबसे गहरे हिस्सों में रखी गई है, तो यह साफ़ नहीं है कि हवाई हमला उसे नष्ट कर पाएगा या नहीं. हालांकि, ऐसा हमला वहां तक पहुंच और गतिविधियों को बाधित कर सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सुरंगों के प्रवेश द्वार, पहुंच मार्ग, बिजली आपूर्ति और वेंटिलेशन सिस्टम अपेक्षाकृत ज़्यादा संवेदनशील हो सकते हैं. हमला भविष्य में इस परिसर के इस्तेमाल को भी मुश्किल या असंभव बना सकता है.
संभव है कि यही वजह हो कि हाल के दिनों में ट्रंप ने पिकैक्स माउंटेन को लेकर धमकियां दी हैं. इसकी ज़्यादा गहराई, कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और ईरान के परमाणु कार्यक्रम में संभावित भूमिका के कारण यह परिसर अमेरिकी अधिकारियों के लिए विशेष ध्यान का केंद्र बन गया है.
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