ब्रिक्स समिट में बड़े नेता आ गए लेकिन भारत के लिए अब भी कई चीज़ें हैं दांव पर

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- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
अमेरिका ब्रिक्स का सदस्य नहीं है, लेकिन 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स समिट में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का असर दिख सकता है.
समिट में 11 देशों के नेता शामिल होंगे. इसमें मेज़बान भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ़्रीका, चीन, रूस, ब्राज़ील, ईरान और यूएई शामिल हैं.
वहीं सऊदी अरब भी आमंत्रित सदस्य के तौर पर इसमें शामिल होगा. ये देश कई अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे, लेकिन इन सभी मुद्दों में राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों का असर सबसे अहम हो सकता है.
ईरान जंग और अमेरिका की ओर से लगाए जाने वाले टैरिफ़ के ख़तरे ने अमेरिका के दुश्मन देशों और उसके सहयोगी देशों के लिए, दुनिया के ग्लोबल एनर्जी मार्केट को अस्थिर कर दिया. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर भी लगातार अनिश्चितता बनी हुई है.
इस माहौल के बीच ब्रिक्स में शामिल देश समिट कर रहे हैं. हालांकि, इस बात की संभावना कम है कि ब्रिक्स कोई ऐसा साझा बयान जारी करे, जिसमें खुले तौर पर अमेरिकी की आलोचना हो या ट्रंप की नीतियों और जिओपॉलिटिक्स का मुक़ाबला करने के लिए कोई साझा रणनीति बनाई जाए.

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ऐसा इसलिए भी क्योंकि ब्रिक्स में शामिल देश ही इस बात को लेकर बँटे हुए हैं कि अमेरिका का मुक़ाबला करने के लिए किस हद तक जाना चाहिए.
अटलांटिक काउंसिल में सीनियर फ़ेलो माइकल कुगलमैन ने बीबीसी से कहा, "भारत ऐसा साझा बयान जारी करने का जोखिम नहीं उठा सकता, जिसमें अमेरिका की आलोचना की जाए."
कुगलमैन का मानना है कि अमेरिकी नीतियों की आलोचना स्पष्ट या सीधे तौर पर नहीं होगी. इसकी वजह है कि ब्रिक्स के विस्तार के बाद इसमें शामिल देशों के हित एक-दूसरे से काफ़ी अलग हैं.
जहाँ एक तरफ रूस और ईरान ब्रिक्स से चाहेंगे कि वो राष्ट्रपति ट्रंप के ख़िलाफ़ ज़्यादा स्पष्ट रुख़ अपनाए. लेकिन ब्रिक्स में शामिल देशों के बीच जिओपॉलिटक रियलिटी के कारण ऐसा करना मुश्किल होगा.
रिपोर्ट्स भी आई है कि भारत अमेरिका से ट्रे़ड डील करने के अंतिम चरण में है. ऐसे में वो ऐसा कोई बयान नहीं चाहेगा, जिससे कि अमेरिका नाराज़ हो. चीन भी शायद ऐसा नहीं दिखाना चाहेगा कि वह ब्रिक्स का इस्तेमाल अमेरिका को निशाना बनाने के लिए कर रहा है.
वहीं, यूएई की बात करते हैं तो उस पर ईरान ने अमेरिका और इसराइल के हमले के जवाब में हमले किए. यूएई में अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी हैं. इस कारण उसके ऐसे किसी बयान का समर्थन करना मुश्किल है, जिसमें ईरान का फ़ायदा हो.
कुगलमैन का कहना है कि ब्रिक्स के विस्तार के बाद यह ग्रुप ज़्यादा अहम हो गया है, लेकिन इसमें शामिल सभी देशों के बीच एक राय बनाना भी मुश्किल हो गया है.
कुगलमैन के अनुसार, ऐसे कई देश शामिल हो गए हैं, जिनके आपस में अच्छे रिश्ते नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत के सामने चुनौती यह है कि उसे ऐसे देशों को एक साथ लाना है, जिनके ग्लोबल ऑर्डर को लेकर रुख़ काफ़ी अलग-अलग हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स के ख़िलाफ़ लगातार बोलते रहे हैं.
खासकर ब्रिक्स की उस कोशिश को लेकर जिसमें दुनियाभर में हो रहे ट्रेड में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात कही जाती है. आम तौर पर इसे डॉलर से दूरी बनाना या 'डी-डॉलराइजेशन' कहा जाता है.

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ब्रिक्स क्या हासिल कर सकता है?

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ट्रंप कई बार ब्रिक्स को चेतावनी दे चुके हैं. ख़ासकर अमेरिकी डॉलर के विकल्प के तौर पर कोई नई करेंसी या ग्लोबल ट्रेड में डॉलर के दबदबे को कम करने वाले क़दम को लेकर.
नवंबर 2024 में ट्रंप ने कहा था कि अगर ब्रिक्स देश मज़बूत अमेरिकी डॉलर की जगह किसी दूसरी मुद्रा का समर्थन करते हैं तो उन पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया जाएगा.
ऐसे में सवाल है कि ब्रिक्स क्या हासिल कर सकता है?
पिछले एक दशक में ब्रिक्स की जियोपॉलिटिकल और आर्थिक ताक़त काफी बढ़ी है. हालांकि ग्रुप अमेरिका या पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ खुलकर रुख़ अपनाने से बचेगा.
इसके बावजूद ब्रिक्स अपनी अब तक की उपलब्धियों को आगे बढ़ाएगा और यह दिखाने की कोशिश करेगा कि वह जी-20 और जी-7 जैसे समूहों के विकल्प के तौर पर उभर सकता है.
बीबीसी मॉनिटरिंग के विश्लेषण के अनुसार, ब्रिक्स में शामिल देशों में दुनिया की 49 फ़ीसदी आबादी रहती है. ये समूह दुनिया की 40 फ़ीसदी जीडीपी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के 26 फ़ीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है.
ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि न्यू डेवलपमेंट बैंक है. इस बैंक ने बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर की मंज़ूरी दी है. इनमें से कई परियोजनाएं ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों में हैं.
इस समूह ने वित्तीय संकट का सामना कर रहे सदस्य देशों की मदद के लिए 100 अरब डॉलर का एक रिज़र्व फ़ंड भी बनाया है. हालांकि, अब तक इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है.
ब्रिक्स के नेता स्थानीय मुद्राओं में देशों के बीच भुगतान को आसान बनाने के तरीक़ों पर भी चर्चा कर सकते हैं. इसमें रूस और ईरान की ख़ास दिलचस्पी होगी, क्योंकि दोनों ही अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं.

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भारत के लिए क्या मौक़ा है?

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ब्रिक्स ख़ुद को विकासशील देशों के लिए खड़े रहने वाले के तौर पेश करना जारी रखेगा. ये ग्रुप संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग भी करेगा.
कई विकासशील देशों का मानना है कि यह संगठन आज की बदलती वैश्विक व्यवस्था को सही तरीक़े से नहीं दर्शाती हैं.
ख़ास तौर पर भारत के लिए ये शिखर सम्मेलन ग्लोबल साउथ की अगुवाई के अपने दावे को मज़बूत करने का मौक़ा है.
भारत की विदेश नीति की कई प्राथमिकताएं ब्रिक्स के एजेंडे से मेल खाती हैं. इनमें बहुपक्षीय व्यवस्था, ज़्यादा बहुध्रुवीय दुनिया, विकासशील देशों को ज़्यादा प्रतिनिधित्व और वैश्विक व्यापार को ज़्यादा खुला बनाने की कोशिश शामिल हैं.
लेकिन भारत को ब्रिक्स के अंदर चीन के बड़े प्रभाव और विकासशील देशों में उसकी बढ़ती मौजूदगी के बीच भी रास्ता निकालना होगा.
मोदी सरकार ने ग्लोबल साउथ के नेता या उसकी आवाज़ बनने पर काफ़ी ज़ोर दिया है, लेकिन कुगलमैन का कहना है कि अफ़्रीका और लैटिक अमेरिका में भारत की पहुंच बढ़ाने की कोशिशों को सीमित सफलता मिली है. इन क्षेत्रों में चीन भारत के मुक़ाबले ज़्यादा सफल रहा है.
ज़्यादातर ब्रिक्स सदस्य देश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं वाले हैं. कुगलमैन का कहना है कि ब्रिक्स के विस्तार से भारत को इथियोपिया, ब्राज़ील और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ रिश्ते मज़बूत करने और अफ़्रीका के साथ लैटिन अमेरिका में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का मौक़ा मिलता है.
भारत के लिए असली टेस्ट यह होगा कि क्या वह सभी सदस्य देशों की सहमति से संयुक्त बयान जारी करवा सकता है. इसे अक्सर मेज़बान देश की कूटनीतिक सफलता का पैमाना माना जाता है.
लेकिन ईरान जंग, अमेरिका के साथ रिश्तों और ग्लोबल ट्रेड के भविष्य को लेकर देशों के बीच गहरे मतभेद हैं. ऐसे में साझा बयान पर सहमति बनाना मुश्किल होगा.
इस चुनौती का अंदाज़ा मई में ही हो गया था. उस समय ब्रिक्स में शामिल देशों के विदेश मंत्रियों के बीच ईरान जंग को लेकर मतभेदों के कारण संयुक्त बयान को लेकर पर सहमति नहीं बनी थी. इसके बाद मेज़बान भारत ने बैठक का सारांश जारी किया.
भारत को 2023 में जी20 की मेज़बानी का अनुभव काम आएगा. उस समय भी रूस-यूक्रेन जंग को लेकर देशों के बीच गहरे मतभेद थे, लेकिन भारत संयुक्त बयान जारी करवाने में सफल रहा था.
लेकिन भारत ये भी चाहेगा कि अहम घोषणाएं हों और ब्रिक्स की अब तक की उपलब्धियों को भी सामने रखना चाहेगा. इस मुद्दे पर सदस्य देश शायद सहमत होंगे. कोई भी नहीं चाहेगा कि ब्रिक्स को सिर्फ़ 'बातचीत करने वाला मंच' कहकर ख़ारिज कर दिया जाए.
ब्रिक्स में शामिल होने वाले देश वित्तीय सहयोग बढ़ाने के तरीक़ों पर बात कर सकते हैं और कुछ बड़े एलान भी हो सकते हैं. वे दुनिया के बड़े मुद्दों पर भी चर्चा करेंगे. अमेरिका को लेकर बयान में ऐसे शब्द रखे जाएंगे, जिससे अमेरिका के साथ सीधा टकराव न हो. वहीं, अमेरिका भी इस बैठक पर क़रीबी नज़र रखेगा.
इस समिट में कई अहम द्विपक्षीय बैठकें भी होंगी. शनिवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात पर सबकी नज़र रहेगी.
भारत और चीन धीरे-धीरे अपने रिश्ते सुधार रहे हैं, लेकिन अब तक की प्रगति उतनी तेज़ नहीं रही है, जितनी दोनों देशों ने उम्मीद की थी.
पीएम मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाक़ात हुई है.
मोदी ने पिछले महीने बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान पुतिन से शांति की अपील की थी.
कुछ लोगों ने उनकी इस बात को रूस की आलोचना के तौर पर देखा, लेकिन रूस ने इसे इस तरह नहीं लिया. रूस ने सार्वजनिक तौर पर मोदी की शांति की कोशिशों का स्वागत किया.
जियोपॉलिटिक्स के अलावा, रूस और चीन के साथ भारत का बढ़ता व्यापार घाटा भी दोनों देशों के साथ होने वाली बातचीत में अहम मुद्दा रह सकता है.
लेकिन आख़िर में, ब्रिक्स का पूरा ध्यान एक सफल शिखर सम्मेलन करने पर होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि इससे ब्रिक्स का प्रभाव और मज़बूत होगा.
मेज़बान भारत के लिए भी यह एक बड़ी कूटनीतिक और जियोपॉलिटिकल सफलता होगी.
खासकर ऐसे समय में, जब भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव फिर से मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है. कुगलमैन का कहना है कि इस समिट में भारत के लिए काफ़ी कुछ दांव पर है.
उनके मुताबिक, हाल के दिनों में मध्य-पूर्व में पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका के कारण भारत कुछ हद तक पीछे छूटता हुआ दिखा है. ईरान जंग को लेकर मध्यस्थता की कोशिशों में भी पाकिस्तान की भूमिका रही है.
उन्होंने कहा, "यह भारत के लिए दुनिया में अपनी अहमियत और नेतृत्व को फिर से मज़बूत करने का एक अहम मौक़ा है. यही वजह है कि इस सम्मेलन में काफ़ी कुछ दांव पर है."
कुगलमैन का कहना है कि यह समिट पूरे ब्रिक्स से ज़्यादा मेज़बान भारत के लिए अहम है.
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
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