भारत के इंटरनेट बूम के रास्ते में समंदर के नीचे छिपी कौन-सी मुश्किल?

अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट में आयोजित एक 'सर्वधार्मिक सामूहिक विवाह' समारोह में भाग लेते हुए एक मुस्लिम दुल्हन अपने मोबाइल फोन से सेल्फी ले रही है.

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इमेज कैप्शन, सस्ते डेटा ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट बाज़ारों में से एक बनने में मदद की है
    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

भारत की सबसे बड़ी डिजिटल कमज़ोरियों में से एक मुंबई के अरब सागर तट के छह किलोमीटर लंबे हिस्से पर मौजूद है.

शहर के उत्तर-पश्चिम में घनी आबादी वाले इलाक़े वर्सोवा के आसपास, भारत की 18 अंतरमहाद्वीपीय समुद्री केबलों में से कम से कम 13, छह किलोमीटर के दायरे में समुद्र से बाहर आती हैं.

ये केबल मिलकर भारत के यूरोप, अफ़्रीका और पश्चिम एशिया से जुड़े 95% तक अंतरराष्ट्रीय बैंडविड्थ को पहुँचाती हैं.

थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन की अन्वेशा सेन कहती हैं, "यह नेटवर्क एक गंभीर जोखिम का सामना कर रहा है, क्योंकि इसकी ज़्यादातर केबलें एक ही भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित हैं."

वह कहती हैं, "अगर इनमें से कई केबलें एक साथ कट जाएं, चाहे वह दुर्घटनावश हो या जानबूझकर, तो पश्चिम एशिया, अफ़्रीका और यूरोप की दिशा में भारत की बड़ी मात्रा में बैंडविड्थ प्रभावित होगी."

केबल नेटवर्क की संरचना ऐसी होती है कि डेटा ट्रैफ़िक को दूसरे रास्तों से भेजा जा सकता है. इसलिए केबल कटने पर पूरी तरह इंटरनेट बंद नहीं होगा.

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रैफ़िक को चेन्नई और कोच्चि जैसे अन्य लैंडिंग प्वाइंट्स के ज़रिए मोड़ा जा सकता है. भारत की समुद्र-तल के नीचे बिछीं 18 केबलें मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, तूतीकोरिन और तिरुवनंतपुरम में ज़मीन पर आती हैं.

लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, नेटवर्क की गति में मामूली गिरावट भी महंगी साबित हो सकती है. डेटा के आने-जाने में थोड़ा ज़्यादा समय लगने से बैंकों, शेयर बाज़ारों, क्लाउड सेवा प्रदाताओं और सरकारी नेटवर्क पर असर पड़ सकता है.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़ा बुनियादी ढांचा इस समस्या के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो सकता है. इसकी वजह यह है कि एआई को बहुत बड़ी मात्रा में और बेहद तेज़ गति से डेटा ट्रांसफ़र की ज़रूरत होती है.

यह कमज़ोरी इसलिए भी अहम है क्योंकि दुनिया का बड़ा हिस्सा डिजिटल ट्रैफ़िक समुद्र-तल के नीचे बिछी इन केबलों पर निर्भर करता है.

भारत के लिए कितनी ज़रूरी ये केबल

भारत के 18 अंतरमहाद्वीपीय केबलों में से कम से कम 13 मुंबई के वर्सोवा बीच पर छह किलोमीटर के दायरे में ही मौजूद हैं

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ये इंटरनेट की छिपी हुई हाईवे जैसी व्यवस्था हैं.

ये समुद्र की तलहटी में बिछे ऑप्टिकल फ़ाइबर केबलों के गुच्छे हैं, जो प्रकाश के संकेतों के रूप में महाद्वीपों के बीच डेटा पहुंचाते हैं.

इंसानों ने अब तक करीब 14 लाख किलोमीटर लंबी ऐसी केबलें बिछाई हैं.

अपनी नई किताब द वेब बिनीथ द वेव्स में समंथ सुब्रमणियन लिखते हैं कि इन केबलों ने "दुनिया को मज़बूती से आपस में जोड़ रखा है."

ये केबल दुनिया के लगभग 99% संचार ट्रैफ़िक को ढोती हैं.

सस्ते डेटा ने भारत को दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट बाज़ारों में से एक बना दिया है. 2025 के अंत तक भारत में ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं की संख्या एक अरब से ज़्यादा हो गई थी.

भारत की बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र अब इन केबलों पर पहले से कहीं ज़्यादा निर्भर होते जा रहे हैं.

लेकिन इस अदृश्य बुनियादी ढांचे पर भारत की बढ़ती निर्भरता एक चुनौती भी पैदा करती है. वजह यह है कि भारत के पास खुद इस तरह का ढांचा बहुत कम है.

भारत दुनिया में डेटा की कुल खपत का लगभग 20% हिस्सा इस्तेमाल करता है. लेकिन दुनिया की केवल लगभग 3% समुद्र-तल के नीचे बिछी केबलों से ही जुड़ा हुआ है.

ब्रॉडबैंड इंडिया फ़ोरम (बीआईएफ़) के अनुसार, भारत में 21 केबल लैंडिंग स्टेशन हैं. ये वे तटीय केंद्र होते हैं जहां समुद्र के नीचे बिछी केबलें ज़मीनी नेटवर्क से जुड़ती हैं.

इसके मुक़ाबले दुनिया भर में लगभग 1,900 सक्रिय और प्रस्तावित केबल लैंडिंग स्टेशन हैं. यानी दुनिया के कुल लैंडिंग स्टेशनों में भारत की हिस्सेदारी केवल लगभग 1% है.

बीआईएफ़ की अध्यक्ष अरुणा सुंदरराजन कहती हैं, "हमें केबल लैंडिंग स्टेशनों की संख्या कई गुना बढ़ानी होगी."

विशेषज्ञों का मानना है कि यही भारत के डिजिटल बदलाव का सबसे बड़ा विरोधाभास है. देश इंटरनेट और डेटा सेंटर के क्षेत्र में बड़ी ताक़त बनता जा रहा है, लेकिन दुनिया से जोड़ने वाले भौतिक बुनियादी ढांचे पर उसका पर्याप्त नियंत्रण नहीं है.

एक हाई-स्पीड ऑप्टिकल फ़ाइबर केबल की तस्वीर जिसे 2016 में फ़्रांस में इंस्टॉल किया गया जो इसे सिंगापुर से जोड़ती है

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इमेज कैप्शन, एक हाई-स्पीड ऑप्टिकल फ़ाइबर केबल की तस्वीर जिसे 2016 में फ़्रांस में इंस्टॉल किया गया जो इसे सिंगापुर से जोड़ती है

केबलों की मरम्मत में क्या बाधा

तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के एक हालिया शोधपत्र में पाया गया है कि भारत की 18 अंतरराष्ट्रीय केबलों में से 11 की उम्र 20 साल से ज़्यादा हो चुकी है.

यानी वे समुद्र-तल के नीचे बिछी केबल प्रणालियों की अनुमानित 25 साल की परिचालन अवधि के क़रीब पहुंच रही हैं.

डिजिटल इंफ़्रास्ट्रक्चर कंपनी लाइटस्टॉर्म के ग्रुप सीईओ और प्रबंध निदेशक अमाजित गुप्ता कहते हैं, "यह सच है कि भारत में उतरने वाली केबलों का एक बड़ा हिस्सा अपनी आर्थिक उपयोग अवधि के अंत के क़रीब पहुंच रहा है. यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है."

इसके अलावा केबलों में ख़राबी आने का जोखिम भी है. यह जानबूझकर किए गए हमलों की तुलना में कहीं ज़्यादा आम समस्या है.

दुनिया भर में हर साल लगभग 150 से 200 केबल ख़राब होने की घटनाएं होती हैं. इनमें से ज़्यादातर घटनाएं तोड़फोड़ करने वालों की वजह से नहीं होतीं.

पश्चिमी भारत के एक व्यस्त कारखाने में, तकनीशियन चौबीसों घंटे काम करते हुए कांच को बाल के समान पतले फाइबर-ऑप्टिक तारों में बदलते हैं, जो वैश्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती मांग को पूरा करने वाले डेटा केंद्रों के लिए होते हैं.

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इमेज कैप्शन, पश्चिमी भारत की एक फैक्ट्री में तकनीशियन डेटा केंद्रों के लिए फाइबर-ऑप्टिक स्ट्रैंड बनाने का काम कर रहे हैं

ऐसी समस्याएं आमतौर पर मछली पकड़ने की गतिविधियों, जहाज़ों के लंगरों, प्राकृतिक आपदाओं या उपकरणों में ख़राबी के कारण होती हैं.

गुप्ता कहते हैं, "हम लाल सागर में व्यवधान के दौरान इस तरह की स्थिति का एक उदाहरण देख चुके हैं." उस समय इंटरनेट ट्रैफ़िक को पूर्व दिशा में सिंगापुर के रास्ते अमेरिका तक पहुंचाया गया था.

जब समुद्र के नीचे बिछी कोई केबल टूट जाती है, तब भारत की एक और बड़ी कमज़ोरी सामने आती है. भारत के पास समुद्र-तल की केबलों की मरम्मत करने वाला कोई घरेलू जहाज़ नहीं है.

केबल मरम्मत के लिए जहाज़ विदेशों से बुलाने पड़ते हैं. उन्हें भारतीय समुद्री क्षेत्र में काम करने की अनुमति भी लेनी पड़ती है.

सेन कहती हैं, "भारतीय समुद्री क्षेत्र में होने वाली हर केबल ख़राबी के लिए दुबई या सिंगापुर से आने वाले विदेशी मरम्मत जहाज़ों पर निर्भर रहना पड़ता है."

वह कहती हैं, "जब किसी विदेशी जहाज़ को यह काम सौंपा जाता है, तब उसे भारतीय जलक्षेत्र में काम करने के लिए लाइसेंस हासिल करना पड़ता है. इससे पहले से ही लंबी प्रक्रिया में कई हफ़्तों की और देरी जुड़ जाती है."

विदेशी मरम्मत क्षमता पर यह निर्भरता ही असल और गहरी कमज़ोरी है.

गुप्ता कहते हैं, "भारत के लिए बड़ा ढांचागत मुद्दा ट्रैफ़िक को दूसरे रास्तों से भेजने की क्षमता नहीं है, बल्कि मरम्मत की क्षमता है."

वह कहते हैं, "विदेशी मरम्मत क्षमता पर निर्भरता और रेगुलेटरी मंज़ूरियों में लगने वाला समय, दोनों मिलकर असली बाधा पैदा करते हैं."

समुद्र में केबल बिछाना कितना जटिल

सिंगापुर को फ्रांस से जोड़ने वाला एक हाई-स्पीड सबमरीन केबल दक्षिणी फ्रांस में स्थापित किया जा रहा है.

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इमेज कैप्शन, सिंगापुर को फ्रांस से जोड़ने वाला एक हाई-स्पीड सबमरीन केबल दक्षिणी फ्रांस में स्थापित किया गया (फ़ाइल फ़ोटो)

लेकिन मरम्मत इस चुनौती का केवल एक हिस्सा है.

गुप्ता का मानना है कि सवाल यह नहीं है कि भारत पुरानी केबलों को हटाकर नई केबलें लगा रहा है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या नई ज़मीनी और समुद्र-तल की केबल क्षमता एआई से पैदा हो रही मांग के साथ क़दम मिला पाएगी.

वह कहते हैं, "उद्योग केवल मांग के पीछे चलकर काम नहीं चला सकता. उसे मांग से आगे रहना होगा."

यह बढ़ती मांग डेटा सेंटरों के तेज़ी से विस्तार को भी बढ़ावा दे रही है. डेटा सेंटर वे कंप्यूटिंग केंद्र हैं जहां डेटा स्टोर किया जाता है. और एआई मॉडल को प्रशिक्षित किया जाता है तथा चलाया जाता है.

डेटा सेंटर भी वैश्विक क्लाउड और इंटरनेट नेटवर्क से तेज़ और भरोसेमंद कनेक्शन पर निर्भर करते हैं.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, स्थापित डेटा सेंटर क्षमता 2020 में 375 मेगावाट थी. अब यह बढ़कर लगभग 1,575 मेगावाट हो गई है.

इससे क्षमता के बीच असंतुलन पैदा होने की आशंका बनती है.

सुंदरराजन कहती हैं, "समुद्र-तल की केबलों की योजना बनाने में ही तीन से चार साल लग जाते हैं. इसके बाद केबल बिछाने में भी उसकी लंबाई के अनुसार दो साल तक लग सकते हैं."

वह कहती हैं, "इस वजह से नई डेटा सेंटर क्षमता की ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त समुद्र-तल केबल क्षमता उपलब्ध होने में कुछ देरी हो सकती है."

भारत की नौकरशाही भी रोड़ा

सबसे बड़ी बाधा शायद भारत की नौकरशाही व्यवस्था हो सकती है.

सुंदरराजन कहती हैं कि दूरसंचार, रक्षा, गृह मंत्रालय, नौवहन, बंदरगाह, पर्यावरण और राज्य सरकारों समेत 16 अलग-अलग एजेंसियां समुद्र-तल की केबलों के निर्माण, संचालन और मरम्मत की मंज़ूरी प्रक्रिया में शामिल होती हैं.

उनके अनुसार, केवल एक केबल लैंडिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए ही कम से कम 16 मंत्रालयों से लगभग 50 मंज़ूरियां लेनी पड़ सकती हैं.

वह कहती हैं, "मुख्य समस्या तकनीकी क्षमता की कमी नहीं है, बल्कि बिखरी हुई प्रशासनिक व्यवस्था है."

वह चाहती हैं कि भारत का दूरसंचार विभाग इस प्रक्रिया का प्रमुख निकाय बने. साथ ही मरम्मत जहाज़ों को अनुमति देने के लिए एकल-खिड़की व्यवस्था लागू की जाए, ताकि प्रक्रियाएं तेज़ हो सकें.

सुंदरराजन कहती हैं कि सरकार को दोनों तटों और द्वीपीय क्षेत्रों में केबल लैंडिंग के कई स्थान पहले से चिन्हित और पूर्व-स्वीकृत कर देने चाहिए.

वह कहती हैं कि इसके लिए मानक शर्तें तय की जानी चाहिए, ताकि केबल कंपनियों को हर बार मंज़ूरी की प्रक्रिया शुरू से न करनी पड़े.

उनका कहना है कि अगर भारत वास्तव में क्षेत्रीय केबल हब बनना चाहता है, तो उसे "पूर्वानुमान योग्य नियम, खुला बुनियादी ढांचा और तेज़ मरम्मत व्यवस्था" विकसित करनी होगी.

उनके मुताबिक, इसी तरह का माहौल सिंगापुर को अधिक केबलों और डेटा ट्रैफ़िक को आकर्षित करने में मदद कर चुका है.

भारत क्या कदम उठा रहा

ऑप्टिकल फाइबर केबल

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इमेज कैप्शन, समुद्र तल पर बिछी लगभग 870,000 मील लंबी ऑप्टिकल फाइबर श्रृंखला वैश्विक संचार यातायात का लगभग 99% वहन करती है.

ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर पूजा भट्ट कहती हैं कि इस असंतुलन को नज़रअंदाज़ करना अब लगातार मुश्किल होता जा रहा है.

वह कहती हैं, "भारत की युवा आबादी और 'डिजिटल इंडिया' की महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए यह समझदारी भरा कदम होगा कि देश सुरक्षा और प्रशासनिक ज़रूरतों के लिए अपना इंटरनेट बुनियादी ढांचा खुद बनाए और उसका रखरखाव करे."

भारत इस दिशा में एक क़दम पहले ही उठा चुका है.

सरकार अब समुद्र-तल की केबल प्रणालियों को महत्वपूर्ण दूरसंचार बुनियादी ढांचे के रूप में मान्यता देती है और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी में उनके महत्व को स्वीकार करती है.

सुंदरराजन कहती हैं कि इस दर्जे से मंज़ूरियां तेज़ी से मिलने में मदद मिलनी चाहिए. इसके साथ ही आपातकालीन मरम्मत व्यवस्था, भारतीय केबल मरम्मत क्षमता और केबलों की सुरक्षा के लिए क़ानूनी प्रावधान भी विकसित होने चाहिए.

वह कहती हैं कि लैंडिंग स्टेशनों और केबल मार्गों के आसपास क़ानूनी रूप से संरक्षित क्षेत्र बनाए जाने चाहिए. इन क्षेत्रों में लंगर डालने और ट्रॉलिंग गतिविधियों पर प्रतिबंध होना चाहिए.

तकनीक भी इस समस्या का समाधान करने में मदद कर सकती है.

डिस्ट्रिब्यूटेड अकॉस्टिक सेंसिंग नामक एक तकनीक, ऑप्टिकल फ़ाइबर को सेंसर में बदल सकती है. इससे जहाज़ों, लंगरों या पानी के भीतर चलने वाले वाहनों से पैदा होने वाले कंपन का पता लगाया जा सकता है.

इससे केबल कटने से पहले संभावित ख़तरों की पहचान की जा सकती है.

लेकिन तत्काल समाधान शायद कहीं ज़्यादा व्यावहारिक हैं.

इनमें अधिक लैंडिंग स्टेशन, बेहतर भौगोलिक विविधता, तेज़ मंज़ूरी प्रक्रिया, सुरक्षित केबल मार्ग और भारतीय मरम्मत क्षमता शामिल हैं.

गुप्ता कहते हैं, "ऐतिहासिक रूप से कनेक्टिविटी मुंबई के आसपास केंद्रित रही है, क्योंकि वहां पहले से ही ज़रूरी पारिस्थितिकी तंत्र, बुनियादी ढांचा और मांग मौजूद थी."

वह कहते हैं, "लेकिन यही केंद्रीकरण वह जोखिम है जिससे उद्योग को अब दूर जाने की योजना बनानी होगी."

स्पेन के समुद्र के नीचे फ़ाइबर ऑप्टिक केबल बिछाने की फ़ाइल फ़ोटो

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इमेज कैप्शन, स्पेन के समुद्र के नीचे फ़ाइबर ऑप्टिक केबल बिछाने की फ़ाइल फ़ोटो

यह बदलाव अब शुरू भी हो चुका है.

चार नई समुद्र-तल केबल प्रणालियां शुरू की जा रही हैं. इसके अलावा तीन और प्रणालियां प्रस्तावित हैं.

लाइटस्टॉर्म उन कंपनियों के समूह का नेतृत्व कर रही है जो इनमें से एक प्रणाली आई-2एसईए का निर्माण कर रहे हैं. यह परियोजना भारत को मलेशिया और सिंगापुर से जोड़ेगी.

इस प्रणाली के भारत में दो लैंडिंग प्वाइंट होंगे. एक मछलीपट्टनम में होगा, जिससे हैदराबाद तक समुद्र-तल के रास्ते की दूरी कम हो जाएगी.

दूसरा लैंडिंग प्वाइंट दक्षिण चेन्नई में एक नए स्थान पर होगा. इससे मौजूदा मार्गों के अलावा एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होगा.

ऐसे देश के लिए, जहां डेटा की खपत बेहद तेज़ी से बढ़ रही है, उसे ढोने वाला बुनियादी ढांचा आश्चर्यजनक रूप से कमज़ोर बना हुआ है.

भारत लगातार नए डेटा सेंटर जोड़ रहा है और एआई आधारित भविष्य की तैयारी कर रहा है.

अब सवाल यह है कि क्या उसकी केबलें, लैंडिंग स्टेशन और मरम्मत क्षमता इस बढ़ती मांग के साथ क़दम मिला पाएंगे.

हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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