अज़रबैजान के विदेश मंत्री ने जयशंकर के सामने ही कही मतभेद वाली बात

भारत के विदेश मंत्री और अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव
इमेज कैप्शन, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव से मुलाक़ात की
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भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर अज़रबैजान के दौरे पर हैं.

शुक्रवार को जयशंकर ने वहाँ के राष्ट्रपति इलहाम अलियेव से मुलाक़ात की.

यह संयोग ही है कि इसी वक़्त पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उप प्रधान मंत्री इसहाक़ डार तुर्की के दौरे पर हैं. तुर्की और अज़रबैजान के बीच पिछले कुछ हफ़्तों में तनाव बढ़ा है.

अज़रबैजान ने स्कूलों में लड़कियों के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था और तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की पार्टी के नेताओं ने इसकी खुलकर आलोचना की थी.

अज़रबैजान ने इन आलोचनाओं को अपने आंतरिक मामलों में दख़ल की तरह लिया था.

एस जयशंकर का यह दौरा इसलिए भी अहम है क्योंकि बीते सालों में भारत के साथ अज़रबैजान के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं. पिछले साल भारत के ऑपरेशन सिंदूर की अज़रबैजान ने आलोचना की थी.

ताज़ा दौरे में उसकी एक झलक तब मिली जब अज़रबैजान के विदेश मंत्री जेहुन बेरामोव ने एस जयशंकर के सामने ही कहा, "यह छुपा नहीं है कि अलग-अलग मुद्दे पर हमारे बीच मतभेद हैं. लेकिन आज हमारे बीच लंबी, सकारात्मक और लाभकारी बातचीत हुई."

अज़रबैजान शिया मुस्लिम बहुल देश है लेकिन ईरान से इसकी नहीं बनती है और इसराइल से दोस्ती है. अज़रबैजान की इसराइल से क़रीबी न तो ईरान को रास आता है और न ही तुर्की को. लेकिन अज़रबैजान ने अब तक इसकी परवाह नहीं की है.

एस जयशंकर ने अपनी इस यात्रा के दौरान शुक्रवार को अज़रबैजान की राजधानी बाकू में स्थित प्राचीन हिंदू मंदिर का दौरा किया.

एस जयशंकर से मुलाक़ात के बाद तुर्की के राष्ट्रपति की ओर से एक बयान जारी किया गया. इस बयान में कहा गया है, ''अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने 23 अक्तूबर को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात की. जयशंकर ने बिश्केक में अज़रबैजान के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री के बीच हुई मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए बताया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर अज़रबैजान के दौरे पर आए हैं.''

''राष्ट्रपति ने बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई अपनी मुलाक़ात और उस दौरान विचारों के आदान-प्रदान को संतोष के साथ याद किया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर भारत के विदेश मंत्री के अज़रबैजान दौरे को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह यात्रा दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों की मौजूदा स्थिति और उनके विकास की संभावनाओं पर चर्चा करने के लिहाज से अहम है.''

जयशंकर के दौरे को कैसे देखा जा रहा है?

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बाकू की ख़ज़ार यूनिवर्सिटी में लेक्चरर वासिफ़ हुसेनोव का कहना है कि जयशंकर का दौरा अज़रबैजान-भारत के रिश्ते में एक नया मोमेंटम हैं.

उन्होंने एक्स पर लिखा कि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर आठ साल में किसी भारतीय विदेश मंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा पर बाकू पहुँचे हैं. उन्होंने इसे 'बिश्केक में हुई बैठक की निरंतरता' बताया.

संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अज़रबैजान के विदेश मंत्री जेहुन बेरामोव ने दोनों देशों के बीच पुराने मतभेदों का ज़िक्र करने से परहेज नहीं किया. उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के बीच मतभेदों ने "द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के भीतर सहयोग को प्रभावित किया है."

उन्होंने कहा, "आज हमने इन मुद्दों पर खुलकर और रचनात्मक तरीक़े से चर्चा की. हम जल्द ही इस चर्चा के नतीजे देखेंगे." जयशंकर ने कहा कि दोनों देश अपने संबंधों को अगले स्तर पर ले जा सकते हैं.

वासिफ़ हुसेनोव के अनुसार, आर्थिक सहयोग की काफ़ी संभावनाएं हैं. इस साल की पहली छमाही में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 60 करोड़ डॉलर तक पहुँच गया, जो 2025 के पूरे साल में दर्ज 40 करोड़ डॉलर से काफ़ी ज़्यादा है. हालांकि, अज़रबैजान के विदेश मंत्री इस आंकड़े को "दोनों देशों की क्षमता से कम देखते हैं.

अज़रबैजान और भारत के रिश्तों में पिघलती बर्फ़ को कुछ लोग इसराइल से जोड़ रहे हैं. तुर्की की टीसी बातमन यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर दुनया बसोल ने लिखा है, ''यह काफ़ी दिलचस्प है और दर्शाता है कि अज़रबैजान भी इसराइल की राह पर चल रहा है और उसके साथ तालमेल बिठाकर काम कर रहा है. भारत-अज़रबैजान संबंधों में नई गति लाने में इसराइल की भूमिका इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अज़रबैजान पूरी तरह स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. यह मुझे 1990 के दशक में तुर्की और इसराइल के संबंधों की याद दिलाता है.

तुर्की और अज़रबैजान के संबंध कभी पूरी तरह निचले स्तर पर नहीं पहुंचेंगे, जैसा कि 1990 के दशक से 2010 के दशक के बीच तुर्की और उज्बेकिस्तान के संबंधों के साथ हुआ था. इसकी वजह यह है कि दोनों देशों के लोग राजनीति से परे नस्ली एकजुटता की मज़बूत भावना साझा करते हैं.''

लेकिन बाकू की ख़ज़ार यूनिवर्सिटी में लेक्चरर वासिफ़ हुसेनोव इस व्याख्या को सही नहीं मानते हैं. उन्होंने बसोल को जवाब देते हुए लिखा है, ''यह अज़रबैजान और इसराइल के संबंधों की ग़लत व्याख्या है. अज़रबैजान के इसराइल के साथ अच्छे संबंध हैं, जैसे उसके कई अन्य साझेदारों के साथ हैं. लेकिन वह अपनी विदेश नीति का समन्वय किसी तीसरे देश के साथ नहीं करता और न ही किसी अन्य देश के साथ तालमेल बिठाने के लिए अपनी साझेदारियों को आकार देता है. स्वतंत्र विदेश नीति का यही अर्थ है.''

वासिफ़ ने लिखा है, ''भारत के साथ संबंधों में आई नई गति के अपने अलग कारण हैं. इनमें बिश्केक में राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पहली मुलाक़ात, अप्रैल में विदेश कार्यालय स्तर पर हुई वार्ता, दशकों पुराने ऊर्जा संबंध और संपर्क सुविधाओं को बढ़ाने में बढ़ती रुचि शामिल हैं. हाल तक दोनों देशों के संबंध काफ़ी गहरे थे. उनके बीच व्यापक कारोबारी सहयोग था, पर्यटकों की संख्या बढ़ रही थी और सप्ताह में 20 तक सीधी उड़ानें शुरू करने की योजना थी. इसलिए, नई दिल्ली के साथ बातचीत शुरू करने के लिए बाकू को किसी की मध्यस्थता की ज़रूरत नहीं थी.''

''यही बात पाकिस्तान पर भी लागू होती है. भारत के साथ संबंध बढ़ाने का मतलब पाकिस्तान की क़ीमत पर ऐसा करना नहीं है. इस्लामाबाद के साथ अज़रबैजान के संबंध मज़बूत बने हुए हैं और वे बातचीत के लिए कोई सौदेबाज़ी का विषय नहीं हैं. अज़रबैजान अपनी साझेदारियों को ऐसा खेल नहीं मानता, जिसमें एक पक्ष के लाभ का मतलब दूसरे पक्ष का नुक़सान हो. वह अपने साझेदारों से भी यही दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा करता है.''

पाकिस्तान के नज़रिए से इस दौरे को कैसे देखा जा रहा है?

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार और तुर्की के विदेश मंत्री हकान फ़िदान
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार तुर्की के दौरे पर हैं और वहां उन्होंने तुर्की के विदेश मंत्री हकान फ़िदान से मुलाक़ात की

जयशंकर की अज़रबैजान यात्रा को पाकिस्तान के नज़रिए से भी देखा जा रहा है.

अज़रबैजान डॉ. अहमद शाहिदोव बदलती जियोपॉलिटिक्स पर गहरी नज़र रखते हैं. उन्होंने जयशंकर के दौरे पर कहा है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री के इस्तांबुल और भारतीय विदेश मंत्री के बाकू दौरे को राजनयिक अहमियत से परे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से देखने की ज़रूरत है.

डॉ. शाहिदोव ने एक्स पर लिखा, "क्या अज़रबैजान और तुर्की अपने साझा हितों की रक्षा करने और दोनों पक्षों में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए आपसी तालमेल से क़दम उठा रहे हैं, या दोनों भाईचारे वाले देशों के बीच मतभेद गहरे हो रहे हैं?"

उन्होंने कहा, "मुझे भरोसा है कि बाकू और अंकारा अपनी विदेश नीतियां साझा हितों के आधार पर तय करते हैं और क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित करने वाले अहम क़दमों पर पहले से एक-दूसरे से सलाह-मशविरा करते हैं."

उनके अनुसार, "अज़रबैजान और तुर्की के बीच भाईचारा सिर्फ़ भावनात्मक रिश्तों पर ही नहीं, बल्कि आपसी भरोसे और रणनीतिक साझेदारी पर भी टिका है. इस रिश्ते को बनाए रखना और मज़बूत करना दोनों देशों के साझा हितों के लिए बेहद ज़रूरी है."

मध्य पूर्व मामलों के जानकार और पत्रकार अहमद क़ुरैशी ने भारत की पहलकदमी को अहम बताया है.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "भारत के ईरान और आर्मीनिया के साथ क़रीबी संबंध रहे हैं, जबकि अज़रबैजान पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है. पाकिस्तानी सेना ने आर्मीनिया और ईरान के साथ अज़रबैजान के विवाद में बाकू का समर्थन किया. पाकिस्तान ने इस साल आर्मीनिया के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए. यह क़दम बाकू के साथ तालमेल और अज़रबैजान-आर्मीनिया के बीच शांति स्थापित करने की अमेरिकी कोशिशों के अनुरूप उठाया गया."

अज़रबैजान पाकिस्तान का साथ क्यों देता रहा है?

अज़रबैजान

अज़रबैजान ने मुख्य रूप से पारस्परिक समर्थन के आधार पर पाकिस्तान का साथ दिया. पाकिस्तान ने अज़रबैजान के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय विवाद नागोर्नो-काराबाख के मुद्दे पर उसका समर्थन किया था और इसके बदले अज़रबैजान ने कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख़ का समर्थन किया.

तुर्की के साथ दोनों देशों की साझा रणनीतिक साझेदारी और आर्मीनिया के साथ भारत के बढ़ते रक्षा संबंधों ने भी इस निकटता को मज़बूत किया. यह केवल धार्मिक एकजुटता का मामला नहीं था, जिसने भारत के साथ अज़रबैजान के ऐतिहासिक संबंधों पर हावी होकर उसकी विदेश नीति तय की.

अज़रबैजान के लिए नागोर्नो-काराबाख और आसपास के क्षेत्रों पर दोबारा नियंत्रण हासिल करना एक प्रमुख राष्ट्रीय मक़सद था. पाकिस्तान ने आर्मीनिया के ख़िलाफ़ अज़रबैजान के क्षेत्रीय दावे का लगातार समर्थन किया. 2020 के युद्ध में अज़रबैजान की सैन्य जीत के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से वहाँ की सरकार और जनता को बधाई दी थी.

पाकिस्तान ने नागोर्नो-काराबाख के मुद्दे पर अज़रबैजान का समर्थन किया. अज़रबैजान ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख़ का समर्थन किया.

दोनों देशों ने उन मुद्दों पर तुर्की के साथ तालमेल किया, जिन्हें वे अपने राष्ट्रीय हितों के लिए महत्वपूर्ण मानते थे.

पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान की निकटता तुर्की को शामिल करने वाली तीन देशों की साझेदारी का भी हिस्सा है. इन तीनों देशों के विदेश मंत्रियों की पहली त्रिपक्षीय बैठक नवंबर 2017 में बाकू में हुई थी.

दूसरी बैठक जनवरी 2021 में इस्लामाबाद में हुई, जिसमें एक घोषणा-पत्र जारी किया गया. इसमें राजनीतिक, रणनीतिक, आर्थिक और रक्षा क्षेत्रों में सहयोग का खाका पेश किया गया था.

7 मई 2025 को भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता व्यक्त की और उन सैन्य हमलों की निंदा की, जिनके बारे में उसके बयान में कहा गया था कि उनमें 'आम नागरिक मारे गए और घायल हुए.'

इसके उलट, भारत ने कहा था कि उसके शुरुआती हमले आतंकवादी ठिकानों पर केंद्रित थे और उनकी प्रकृति लक्षित, संतुलित के साथ तनाव न बढ़ाने वाली थी. ये दोनों सरकारों के अपने-अपने रुख़ थे, न कि घटनाओं का कोई साझा विवरण.

पाकिस्तान के एक थिंकटैंक वायर पीके एंड न्यू पाकिस्तान के सीईओ अली के चिश्ती ने एक्स पर लिखा, "अज़रबैजान के राष्ट्रपति के साथ जयशंकर की मुलाकात को भारतीय ऐसे मना रहे हैं, मानो यह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई कूटनीतिक जीत हो. अज़रबैजान हक़ीक़त जानता है और पाकिस्तान भी इसे जानता है. कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं. भारतीय युद्ध अपराधी नेतन्याहू के ट्रोल और एजेंट बन गए थे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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