मध्य प्रदेश: कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द, चुनाव आयोग के बाहर धरने पर बैठे नेता

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- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 13 मिनट
मध्य प्रदेश में राज्यसभा की कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द हो गया है. बीजेपी ने जहां इसे 'सत्य की जीत' बताया है, वहीं कांग्रेस ने इसे 'सीट चोरी' कहा है.
इसके बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश, भूपेश बघेल, सचिन पायलट और केसी वेणुगोपाल समेत कई पार्टी नेता नई दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ़्तर पहुंचे हैं.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने चुनाव आयोग के दफ़्तर के बाहर सुरक्षाकर्मियों से दरवाज़ा खोलने के लिए कहा. उनका कहना है कि वो अपनी याचिका देने के लिए आए हैं. इसके बाद पार्टी नेता वहीं धरने पर बैठ गए.
केसी वेणुगोपाल ने कहा कि जब तक उन्हें अंदर नहीं जाने दिया जाता तब तक वो धरने पर बैठेंगे.
केसी वेणुगोपाल ने चुनाव आयोग के दफ़्तर जाते हुए पत्रकारों से नामांकन रद्द होने को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि लोकतंत्र की हत्या हो गई है.
मध्य प्रदेश में बीजेपी ने निर्वाचन अधिकारी के आगे मंगलवार की सुबह आपत्ति दर्ज कराई थी. बीजेपी का आरोप था कि नटराजन ने एक क़ानूनी मामले के बारे में नामांकन दस्तावेज़ों में जानकारी नहीं दी थी.
इसके बाद मंगलवार शाम को अपने आदेश में रिटर्निंग अधिकारी अरविंद शर्मा ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेज़ों की जांच के बाद यह पाया गया कि मीनाक्षी नटराजन ने नामांकन के साथ जमा किए गए फ़ॉर्म 26 में "उक्त न्यायालय परिवाद का उल्लेख नहीं करके अपना शपथ पत्र अपूर्ण प्रस्तुत किया है."
नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश के मंत्री और बीजेपी नेता राकेश सिंह ने इसे सत्य की जीत बताते हुए कहा कि मीनाक्षी नटराजन ने जो जानकारियां दी थीं वो ग़लत थीं और उन्होंने मामले को छिपाया था.
वहीं कांग्रेस नेता ने नामांकन रद्द होने को 'सीट चोरी' बताते हुए कहा है कि मीनाक्षी के ख़िलाफ़ कोई आपराधिक मामला दर्ज ही नहीं है.

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रिटर्निंग अधिकारी ने क्या बताया?
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नामांकन निरस्तीकरण के आदेश के मुताबिक़, जिस मामले का ज़िक्र बीजेपी द्वारा शिकायत में किया गया है उसमें अदालत पहले ही संज्ञान ले चुकी है और नटराजन को पेश होने के लिए समन भी जारी किए जा चुके हैं इसलिए "मामला न्यायालय में चल रहा है यह सिद्ध पाया गया."
रिटर्निंग अधिकारी ने यह भी कहा कि नटराजन ने उस मामले में अदालत के सामने अपना जवाब भी दाखिल किया है, जिससे "उन्हें इस प्रकरण की पूर्ण जानकारी होना सिद्ध पाया गया है."
आदेश में कहा गया है कि निर्वाचन आयोग के नियमों के तहत "अधूरा अपूर्ण एफिडेविट फॉर्म 26 रखा जाना तथा अभ्यर्थी द्वारा तथ्यों का छुपाया जाना" उनके खिलाफ सिद्ध पाया गया. अधिकारी के अनुसार, इससे मतदाताओं को उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिल पाती. इसी आधार पर निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त कर दिया गया.
कांग्रेस की ओर से पेश हुए अधिवक्ता अजय गुप्ता ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि, "यह पूरी तरह असंवैधानिक फ़ैसला है."
उन्होंने कहा, "जिस नोटिस का उल्लेख किया जा रहा है वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223(1) के तहत जारी किया गया था."
यह प्रावधान मजिस्ट्रेट को किसी निजी शिकायत पर अपराध का संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपी को सुनवाई का अवसर देने के लिए बाध्य करता है.
गुप्ता का कहना है कि, "अदालत ने अभी मामले का संज्ञान नहीं लिया था और न ही कोई समन जारी किया गया था, इसलिए इसे लंबित आपराधिक प्रकरण नहीं माना जा सकता. और क्योंकि यह लंबित आपराधिक प्रकरण नहीं है इसलिए क़ानूनन इसके बारे में ज़िक्र करने के लिए हम बाध्य नहीं हैं."
हालांकि रिटर्निंग अधिकारी ने अपने आदेश में कहा कि अदालत मामले का संज्ञान ले चुकी है, नटराजन को समन जारी हो चुके हैं और उन्होंने स्वयं उस मामले में जवाब भी दाख़िल किया है. इसलिए फ़ॉर्म 26 में इसका उल्लेख न करना तथ्यों को छिपाने के बराबर है."

मीनाक्षी नटराजन ने क्या कहा?
मीनाक्षी नटराजन ने पत्रकारों से कहा, "जब बीजेपी ने जीत के लिए मध्य प्रदेश विधानसभा में ज़रूरी (58) वोट न होते हुए भी तीसरा उम्मीदवार उतारा तो वहीं से यह साफ़ हो गया था कि यह एक साज़िश है और बीजेपी सीट चोरी करना चाहती हैं. जैसे इन्होंने पिछले समय में चुनावों में हेरफेर की है वैसे ही इन्होंने इस बार राज्यसभा के चुनाव में किया."
उन्होंने आगे कहा, "सबसे पहले उन्होंने एक कैंडिडेट उतारा, फिर जब उन्हें यह पता चला गया कि हम सब एक हैं और कोई अलगाव नहीं होगा यानी उनका तीसरा उम्मीदवार नहीं जीतेगा, क्यूंकि कांग्रेस एकजुट है तो उन्होंने एक नोटिस को आधार बनाया."
"इस मामले में अभी किसी अदालत द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया गया है, बावजूद इसके यह नामांकन रद्द कर दिया गया. यह सिर्फ़ मेरे राज्यसभा नामांकन की बात नहीं है बल्कि हमारे देश के सामने यह एक गंभीर परिस्थिति है, सवाल है कि क्या भारत का लोकतंत्र बचेगा? "
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन ख़ारिज किए जाने पर कहा, "कांग्रेस पार्टी इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ पूरी ताक़त से लड़ेगी."
उन्होंने कहा, "इन घटनाओं से जुड़े कानूनी और चुनावी आरोपों को लेकर हमारे कानूनी विशेषज्ञों ने अपना पक्ष रखा था. जो कानूनी आधार हमने रखे, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया गया. जो हुआ वह पूरी तरह राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित कार्रवाई है."

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बीजेपी और कांग्रेस अब आमने-सामने
मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर बीजेपी ने निर्वाचन अधिकारी के समक्ष मंगलवार की सुबह आपत्ति दर्ज कराई थी.
मंगलवार को प्रदेश बीजेपी महामंत्री राहुल कोठारी की ओर से दी गई शिकायत में कहा गया कि "मीनाक्षी नटराजन का नाम हैदराबाद की एक अदालत में लंबित एक निजी आपराधिक परिवाद (प्राइवेट कंप्लेंट) में आरोपी क्रमांक चार के रूप में दर्ज है."
बीजेपी का आरोप था कि अगर नामांकन दाख़िल किए जाने के समय यह मामला लंबित था और इसकी जानकारी उम्मीदवार के शपथपत्र (फ़ॉर्म 26) में दर्ज नहीं की गई, तो इसे अधूरा या ग़लत माना जा सकता है.
नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश के मंत्री और बीजेपी नेता राकेश सिंह ने इसे सत्य की जीत बताते हुए कहा कि मीनाक्षी नटराजन ने जो जानकारियां दी थीं वो ग़लत थीं और उन्होंने मामले को छिपाया था.
"उन सभी आधार पर दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क लगे क्योंकि उनके फ़ॉर्म गंभीर त्रुटियां थीं और तेलंगाना में दर्ज मामले को छिपाया गया था. इस आधार पर रिटर्निंग अफ़सर ने उनके फ़ॉर्म को ख़ारिज किया है."
कांग्रेस नेता विवेक तनखा ने नामांकन रद्द होने को 'सीट चोरी' बताया है.
उन्होंने कहा, "मीनाक्षी नटराजन जी के नॉमनोनेशन के बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है . कोई क्रिमिनल केस रजिस्टर्ड नहीं है. मात्र एक नोटिस आया है कि उनके और अन्य लोगो के खिलाफ 10 करोड़ के मुआवज़े की कार्यवाही क्यों ना की जाए जिस नोटिस का मीनाक्षी जी के वकील ने जवाब दिया है. एफ़आईआर दर्ज नहीं है."
अब आगे क्या होगा?
हालांकि अब मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द हो गया है लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव, अवधेश प्रताप सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "रिटर्निंग ऑफ़िसर ने नामांकन रद्द कर दिया है तो ऐसे में नामांकन वापस लेने की तारीख़ तक कांग्रेस के पास अपील का मौक़ा है. इस दौरान या तो चुनाव आयोग या कोर्ट ही कुछ दख़ल दे सकते हैं. "
उन्होंने कहा, "अगर इस दौरान तक कोई भी सक्षम व्यवस्था फिर चाहे वो चुनाव आयोग या कोर्ट हो अगर किसी भी तरह से हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो जो तीन प्रत्याशी उतारे गए हैं वो सीधा राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हों जायेंगे."
बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार से चुनाव हुआ था दिलचस्प
एक सीट पर जीत के लिए कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्याबल था. इसके बावजूद पार्टी ने अपने विधायकों को कर्नाटक भेजने का फ़ैसला किया था.
कांग्रेस का कहना था कि यह क़दम संभावित क्रॉस वोटिंग और राजनीतिक जोड़-तोड़ की आशंकाओं को देखते हुए उठाया गया है.
वहीं बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार ने एक ऐसे चुनाव को अचानक राजनीतिक रूप से अहम बना दिया था जिसे कुछ दिन पहले तक औपचारिक प्रक्रिया माना जा रहा था.
मंगलवार 9 जून को कांग्रेस विधायक भोपाल में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के निवास पर इकट्ठा हुए, जहां से उन्हें विशेष विमान से बेंगलुरु ले जाने की तैयारी की गई थी. कांग्रेस ने इसके लिए एक विशेष विमान की व्यवस्था की थी.
इस बार मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव होना है. कांग्रेस ने पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था, जबकि बीजेपी ने केंद्रीय नेता तरुण चुघ, राज्य इकाई के महासचिव रजनीश अग्रवाल और महेश केवट को मैदान में उतारा है.
18 जून को होने वाले मतदान से पहले सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या यह चुनाव केवल संख्या बल से तय होगा या फिर दलों की संगठनात्मक एकजुटता और राजनीतिक प्रबंधन भी इसकी दिशा तय करेंगे.
राजनीतिक हलकों में सबसे ज़्यादा चर्चा बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार महेश केवट को लेकर थी.
विधानसभा में बीजेपी के पास अपने दो उम्मीदवारों को निर्वाचित कराने लायक संख्या बल है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता होगी.
संख्या का गणित

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230 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास 164 विधायक हैं.
कांग्रेस के पास 64 विधायक थे, लेकिन दतिया से विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता दो साल से अधिक की सज़ा मिलने के बाद समाप्त हो चुकी है.
वहीं बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे लंबे समय से बीजेपी के साथ खड़ी दिखाई देती रही हैं.
ऐसे में कांग्रेस की प्रभावी संख्या 62 के आसपास मानी जा रही है.
मध्य प्रदेश में एक राज्यसभा उम्मीदवार को जीत के लिए 58 मतों की जरूरत होती है.
इस गणित के आधार पर बीजेपी दो और कांग्रेस एक सीट जीतने की स्थिति में दिखाई देती है.
बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार को लेकर अटकलें नामांकन से पहले ही शुरू हो गई थीं.
राज्य के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिए थे कि पार्टी तीसरा उम्मीदवार उतार सकती है.
सोमवार को कांग्रेस विधायकों के कर्नाटक शिफ्ट होने की अटकलों के बीच कैलाश विजयवर्गीय ने पत्रकारों से कहा, "उन्हें (कांग्रेस को) अगर अपने विधायकों पर विश्वास नहीं है तो वो उन्हें बाहर ले जाएंगे. हमें अपने विधायकों पर विश्वास है कि सब डंके की चोट पर बीजेपी के साथ हैं."
बीजेपी की ओर से तीसरा उम्मीदवार उतारे जाने को केवल चुनावी गणित नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तीसरे उम्मीदवार ने चुनाव को संख्या बल की लड़ाई से आगे बढ़ाकर दलगत अनुशासन और विधायकों की निष्ठा की परीक्षा में बदल दिया है.
कांग्रेस सतर्क क्यों है?

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कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उन्हें अपने विधायकों पर पूरा भरोसा है, लेकिन बीजेपी की राजनीतिक रणनीति को देखते हुए वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते.
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि पार्टी को अपने सभी विधायकों पर विश्वास है, लेकिन बीजेपी की "तोड़फोड़ की राजनीति" को देखते हुए सतर्कता ज़रूरी है.
इसी वजह से कांग्रेस ने अपने विधायकों को मतदान तक एक साथ रखने का फ़ैसला किया है.
एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "देखिए मामला ऐसा है कि विधायक यहां रहेंगे तो कई तरह की संभावना पैदा होगी. बीजेपी की रणनीति किसी से छिपी नहीं है. पार्टी में भी कई लोगों की अपनी मजबूरियां हैं जिनका इस्तेमाल बीजेपी अपने फ़ायदे के लिए कर सकती है. इसलिए पार्टी ने यह फ़ैसला लिया है कि सबको एक साथ कर्नाटक भेजा जाए."
हालांकि बीजेपी ऐसे आरोपों को ख़ारिज करती रही है. उसका कहना है कि वह पूरी तरह अपने राजनीतिक और संगठनात्मक आधार पर चुनाव लड़ रही है.
कांग्रेस के सामने क्या है चुनौती?

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वरिष्ठ पत्रकार देशदीप सक्सेना ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "कांग्रेस के लिए यह चुनौती तो है. बीजेपी ने महेश केवट को उतारा है और उनकी कोशिश भी पूरी रहेगी कि कांग्रेस को तोड़ पाएं. हालांकि बीजेपी को अपना तीसरा उम्मीदवार जिताने के लिए 8-10 वोटों की ज़रूरत है, जिसे जुटाना बहुत कठिन नहीं है.'' लेकिन ये बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि बीजेपी ने पहले भी ऐसी राजनीति की है.''
वहीं, मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और बीजेपी की राजनीति को लंबे समय से देखने वाले नितेंद्र शर्मा कहते हैं, "बीजेपी ने साल 2020 में इसी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के 22 विधायक तोड़ कर अपने पाले में शामिल कर लिए थे. ये तब हुआ था जब कांग्रेस सत्ता में थी. और अब तो बीजेपी खुद ही सत्ता में है. ऐसे में यह आश्चर्यजनक नहीं होगा अगर इस बार भी इस तरह की राजनीति करने में बीजेपी फिर कामयाब हो जाए.''
उन्होंने कहा, "हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा. क्योंकि राज्यसभा की वोटिंग ओपन वोटिंग है, जो भी क्रॉस वोट करेगा उसकी पहचान ज़ाहिर हो जाती है. ऐसे में बीजेपी के लिए यह भी एक चुनौती है. दूसरी बात ये है कि ये मामला एक या दो वोट का नहीं है बल्कि लगभग 8-10 वोट चाहिए, बीजेपी को तीसरी सीट जीतने के लिए. इसलिए भी यह थोड़ा कठिन है."
मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी को लेकर कांग्रेस में कैसी चर्चा थी?

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राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद कांग्रेस के भीतर मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी को लेकर भी खूब चर्चा हुई.
कुछ नेताओं का मानना था कि पार्टी किसी ऐसे चेहरे को उम्मीदवार बना सकती थी जिसका राज्य की मौजूदा राजनीति और संगठन में अधिक प्रत्यक्ष आधार हो.
हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से नटराजन के समर्थन में एकजुटता दिखाई है.
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने नटराजन की उम्मीदवारी का समर्थन किया है.
इस बीच वरिष्ठ कांग्रेस नेता नरेश ज्ञानचंदानी ने नटराजन की उम्मीदवारी पर सवाल उठाते हुए सार्वजनिक टिप्पणी की और बाद में पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व का ध्यान अपनी चिंताओं की ओर आकर्षित करने की कोशिश की थी.
हालांकि कांग्रेस नेताओं का कहना था कि एक व्यक्ति के इस्तीफ़े को व्यापक असंतोष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और पार्टी पूरी तरह एकजुट है.
कौन हैं मीनाक्षी नटराजन?

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मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की उन नेताओं में गिनी जाती हैं जिनकी पहचान संगठनात्मक राजनीति से जुड़ी रही है.
वो भारतीय युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं और बाद में कांग्रेस महासचिव की ज़िम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं.
पार्टी के भीतर उन्हें संगठनात्मक अनुशासन और अपेक्षाकृत साफ सार्वजनिक छवि वाले नेता के रूप में देखा जाता है.
उनका राजनीतिक सफर लंबे समय से कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के साथ जुड़ा रहा है और उन्हें राहुल गांधी के क़रीबी नेताओं में भी गिना जाता है.
हालांकि मध्य प्रदेश कांग्रेस की वर्तमान राजनीति में उनका अपना कोई बड़ा विधायकों का गुट नहीं है.
वहीं बीजेपी नेताओं का कहना है कि महेश केवट की उम्मीदवारी केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं है.
केवट समुदाय से आने वाले महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर बीजेपी ने पिछड़े वर्गों और पारंपरिक मछुआरा समुदाय के बीच अपनी पहुंच मज़बूत करने का प्रयास किया है.
राज्य की राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व लगातार महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है और पार्टी इस उम्मीदवारी के ज़रिए व्यापक सामाजिक संदेश देने की कोशिश करती दिखाई देती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

























