पश्चिम बंगाल, असम चुनाव के नतीजों में एसआईआर की कितनी भूमिका

पश्चिम बंगाल में महिलाएं

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इमेज कैप्शन, बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 200 से ज़्यादा सीटों पर बढ़त बना रखी है
    • Author, योगेंद्र यादव
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

पांच विधानसभा चुनावों के परिणामों के रुझानों से अब लगभग साफ़ हो चुका है कि कहां किसकी सरकार बनेगी.

डेटानेट के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में बीजेपी 200 से अधिक सीटों के साथ सत्तारुढ़ टीएमसी पर बढ़त बनाए हुए है. वहीं तमिलनाडु के चुनाव परिणामों के रुझानों ने सबको हैरत में डाला है.

पहली बार चुनाव में उतरी अभिनेता विजय की टीवीके ने 108 सीटों पर बढ़त बनाई हुई है. वहीं केरल में यूडीएफ़ सत्ता में वापसी करती दिख रही है.

दूसरी ओर असम और पुडुचेरी में बीजेपी गठबंधन अपनी सत्ता बरक़रार रखते दिख रहा है.

चुनाव जनमत का दिन होता है जो तमिलनाडु, केरल और कुछ हद तक असम में हुआ है वो जनता की अभिव्यक्ति है. हमें पसंद हो या नापसंद हो हमें उसका सम्मान करना चाहिए.

लेकिन जो बंगाल में हुआ है वो केवल जनमत का खेल नहीं है. जो जनमत को बदलने की कोशिश हुई है उसका एक निर्णायक खेल उसमें रहा है.

इसलिए चुनाव परिणाम की जो घड़ी सामान्यतः जनमत के उत्सव की घड़ी होनी चाहिए थी, वह अब बहुत बड़े सवाल उठाने की घड़ी बन गई है.

अब यह संदेह पैदा हो गया है कि क्या लोकतंत्र की जो आख़िरी न्यूनतम रेखा होती है, क्या हम उसे भी पार कर चुके हैं?

वीडियो कैप्शन, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के चुनावी नतीजों पर क्या कहा योगेंद्र यादव ने?

वोट प्रतिशत कैसे बढ़ा?

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग का कहना था कि दोनों चरणों में ऐतिहासिक वोटर टर्नआउट देखा गया है. इस दौरान तक़रीबन 92 फ़ीसदी मतदान हुआ था.

वहीं बीजेपी ने एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर कहा था कि इसमें वही लोग हटे जो मतदान के लिए आते ही नहीं थे. उनका यह भी कहना था कि इस प्रक्रिया ने उन लोगों को वोट देने के लिए सशक्त किया जो पहले शायद डर के कारण मतदान नहीं कर पाते थे.

इन बातों पर मुझे लगता है कि हमें इसे बहुत ध्यान और बारीकी से समझना चाहिए, क्योंकि यह लोकतंत्र के भविष्य का सवाल है.

सबसे पहले केरल की बात करें तो वहां जो हुआ, वह सामान्य राजनीतिक बदलाव था, जैसा पहले भी होता रहा है. मैं उसके लिए न किसी पार्टी को विशेष श्रेय दूंगा और न कहूंगा कि चुनाव आयोग के बावजूद ऐसा हुआ.

जहां तक वोट कटने और टर्नआउट बढ़ने की बात है, तो यह साधारण गणित है. पता नहीं लोग छठी कक्षा का गणित क्यों भूल जाते हैं. 81 बटा 100 होता है 81 प्रतिशत. लेकिन 81 बटा 89 हो जाए तो वह 92 प्रतिशत बन जाता है.

अगर आप कुल वोटरों की संख्या कम कर देंगे, तो प्रतिशत अपने आप बढ़ जाएगा. इसमें श्रेय लेने जैसी कौन-सी बात है, मुझे समझ नहीं आता.

जब आप विभाजक कम करते हैं, तो प्रतिशत स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है. वही हुआ है. इसमें न कोई हैरानी की बात है और न ही किसी बड़े श्रेय की.

चुनाव मतगणना केंद्र

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इमेज कैप्शन, तमिलनाडु में पहली बार चुनावी मैदान में उतरी टीवीके सबसे बड़ा दल बनने की ओर है

एसआईआर ने चुनाव परिणामों को कितना प्रभावित किया?

मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा हूं कि एसआईआर की वजह से चारों राज्यों के नतीजे आए. केरल में जो हुआ, वह सामान्य सत्ता परिवर्तन था. उसके लिए न किसी को दोष मिलेगा और न श्रेय मिलेगा.

मैं यह भी नहीं मानता कि कांग्रेस या यूडीएफ़ को बहुत बड़ा श्रेय मिलना चाहिए.

एलडीएफ़ को एक की जगह दो कार्यकाल मिल गए थे, जो केरल के इतिहास में असामान्य था. अब राजनीति सामान्य स्थिति में लौट आई है.

तमिलनाडु में जो हुआ है, वह बहुत बड़ा परिवर्तन है. वहां की राजनीति में भूचाल आया है. लेकिन उसमें चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं है, और होनी भी नहीं चाहिए.

तमिलनाडु में एसआईआर के दौरान वोट कटे, लेकिन ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि इससे डीएमके को नुक़सान हुआ या बीजेपी-एआईएडीएमके को फायदा हुआ हो.

जनता बदलाव चाहती थी. लेकिन वह एआईएडीएमके की ओर जाने में हिचक रही थी इसलिए उसने एक नए चेहरे को चुना. तमिलनाडु में यह पहले भी हुआ है. अन्नादुरई और एमजीआर ये कर चुके हैं.

लोग बदलाव के लिए नए चेहरे को पसंद करते हैं, लेकिन वह द्रविड़ राजनीति के ढांचे के भीतर होना चाहिए. वह उससे बाहर नहीं है. वह पेरियार, आंबेडकर और कामराज को अपना नायक बताते हैं. वह तमिल राष्ट्रवाद की बात करते हैं. यानी सारी बातें द्रविड़ राजनीति की ही हैं.

तो डीएमके के विकल्प के रूप में लोगों ने एक नया चेहरा चुना. इसमें चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं है.

असम में जो हुआ, उसमें चुनाव आयोग की भूमिका ज़रूर है. वहां मुद्दा एसआईआर नहीं, बल्कि परिसीमन था. निर्वाचन क्षेत्रों को इस तरह बनाया गया कि बीजेपी को फ़ायदा पहुंचे.

लेकिन इसके बावजूद मैं कहूंगा कि इससे अधिकतम 10 सीटों का फ़ायदा बीजेपी को हुआ होगा. असम के परिणाम को केवल इसी आधार पर नहीं समझा जा सकता.

आख़िरकार वहां बीजेपी, जो सत्तारूढ़ पार्टी थी, सत्ता में बनी रही.

उसमें कांग्रेस और विपक्ष की कमज़ोरी भी थी. बीजेपी ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी किया. तो परिणाम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, परिसीमन और विपक्ष की कमज़ोरी- इन सबका मिश्रण था.

लेकिन आख़िर में कहेंगे कि यह लोकप्रियता की वजह से हुआ.

बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव
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पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणाम क्या अलग हैं?

अब बंगाल की बात करें, तो वहां बहुत अभूतपूर्व स्थिति रही.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि 15 साल पुरानी टीएमसी सरकार के ख़िलाफ़ जनता में असंतोष था और यह स्वाभाविक है.

यह भी सच है कि बीजेपी ने बहुत मेहनत की, जबकि कांग्रेस और अन्य दल उतनी मेहनत नहीं कर पाए.

लेकिन इसके अलावा तीन और बातें हैं जिन पर ग़ौर करना होगा.

पहला, जिस तरह हिंदू-मुसलमान का ध्रुवीकरण किया गया और चुनाव आयोग बैठकर देखता रहा. दुनिया के किस देश में ऐसा हो सकता है?

सोमवार की सुबह भी बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी एक इंटरव्यू में 10 मिनट में 15 बार 'हिंदू-मुसलमान' कह रहे थे.

दूसरा, केंद्र सरकार ने बंगाल की टीएमसी सरकार के हर काम में अड़ंगा लगाया और संसाधन नहीं दिए.

बाकी राज्यों में चुनाव से पहले 10,000 रुपये ट्रांसफ़र करने का चलन बन गया है. टीएमसी ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि उसके पास पैसा नहीं था.

केंद्र सरकार पैसा नहीं दे रही थी. अगर देती, तो परिणाम बदल सकता था.

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था एसआईआर.

मैं यह नहीं कह रहा कि एसआईआर में जितने वोट कटे, वे सभी टीएमसी समर्थकों के थे.

पहले चरण में जो 58 लाख वोट कटे, वे वैसे ही थे जैसे बाकी राज्यों में कटे. वे वोट टार्गेटेड नहीं थे.

लेकिन दूसरे चरण में जो 27 लाख वोट काटे गए, वैसा किसी और राज्य में नहीं हुआ.

अब स्पष्ट है कि वे टार्गेटेड तरीक़े से काटे गए. अपीलीय ट्राइब्यूनल के फैसलों से भी यह स्पष्ट हो रहा है कि वे गलत तरीके से हटाए गए थे.

यानी चुनाव से ठीक पहले 27 लाख लोगों के नाम काट दिए गए. यह 4.3 प्रतिशत है.

और अभी जो आंकड़े आए हैं, उनमें बीजेपी सीटों में आगे दिख रही है, लेकिन वोट प्रतिशत में सिर्फ 3 प्रतिशत आगे है.

अब आप ही बताइए, अगर उन 4.3 प्रतिशत लोगों को वोट डालने दिया जाता जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे और बाकी भी बड़े पैमाने पर टीएमसी समर्थक थे तो क्या यही नतीजा आता? नहीं आता. यही सबसे बड़ा चिंता का विषय है.

बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित से बातचीत पर आधारित

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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