आक्रामक बयानों के बावजूद ट्रंप के पास ईरान से बातचीत के अलावा कोई बेहतर विकल्प नहीं

इमेज स्रोत, NurPhoto via Getty Images
- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, इंटरनेशनल एडिटर, बीबीसी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों और समझौते की संभावना पर कही गई बातों को गंभीरता से देखा जा रहा है. आखिरकार वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और उनके बयान दुनिया की राजनीति पर असर डाल सकते हैं.
तुर्की में हुए नेटो शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप ने कहा, "अब मैं उनके (ईरान के) साथ कोई बातचीत नहीं करना चाहता. वे घटिया लोग हैं. जानते हो घटिया का मतलब क्या होता है?"
उन्होंने कहा, "वे बेकार लोग हैं. वे बीमार लोग हैं. उनका नेतृत्व बीमार लोग रहे हैं. वे क्रूर और हिंसक लोग हैं."
ट्रंप ने कहा, "अगर उनके पास परमाणु हथियार होगा, तो वे उसका इस्तेमाल करेंगे. मेरी नज़र में अब यह मामला खत्म हो चुका है."
लेकिन क्या इस मुद्दे पर ट्रंप की ये आखिरी राय है? शायद नहीं. वे लगातार ईरान, युद्ध और दोनों देशों के बीच प्रस्तावित समझौते (एमओयू) पर बयान देते रहे हैं.
कभी उन्होंने जीत का दावा किया. कभी ईरान को पूरी तरह तबाह करने की धमकी दी और कई बार उन्होंने बातचीत और समझौते का भी समर्थन किया.
बाद में ट्रंप ने अपनी धमकी को और सख्त करते हुए कहा कि अमेरिका "शायद आज रात फिर ईरान पर पहले से ज्यादा बड़ा हमला करेगा."
उन्होंने कहा, "मैंने उन्हें पहले ही हल्की चेतावनी दे दी है. अब हम आज रात फिर ज़ोरदार हमला करेंगे."
इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका ईरान को भारी नुकसान पहुंचाने की सैन्य क्षमता रखता है, लेकिन अब तक वह ईरान की सरकार को अपनी प्रमुख मांगों से पीछे हटने के लिए मजबूर नहीं कर पाया है.
इन मांगों में सबसे अहम है होर्मुज स्ट्रेट से होने वाले समुद्री यातायात पर अपना प्रभाव और नियंत्रण बनाए रखना.
बातचीत का रास्ता बंद नहीं

इमेज स्रोत, Reuters
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
हालांकि, ट्रंप के कड़े बयानों के बीच एक बात यह भी साफ हुई कि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है.
उन्होंने संकेत दिया कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत आगे भी जारी रह सकती है.
फिलहाल ये बातचीत रुकी हुई है, क्योंकि ईरान अपने पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार और शोक कार्यक्रमों में व्यस्त है.
28 फ़रवरी को युद्ध के पहले दिन इसराइल और अमेरिका के हमले में ख़ामेनेई की मौत हो गई थी.
ट्रंप से पूछा गया कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच हुए हमलों और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कुछ अरब सहयोगी देशों की भागीदारी के बाद अब बातचीत पूरी तरह खत्म हो गई है.
अपने प्रमुख वार्ताकारों स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर का ज़िक्र करते हुए ट्रंप ने कहा, "मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वे बातचीत करना चाहते हैं तो करें, लेकिन मुझे लगता है कि वे अपना समय बर्बाद कर रहे हैं."
ईरान की सरकार पर निशाना साधते हुए ट्रंप ने कहा, "वे झूठ बोलने वाले लोगों का एक समूह हैं."
ट्रंप के इस बयान को इस बात के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है कि तमाम सख्त बयानों के बावजूद बातचीत के अलावा उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है.
अमेरिका ने इसराइल के साथ मिलकर ईरान की सरकार को गिराने की कोशिश की, लेकिन वह अपने इस मकसद में सफल नहीं हो सका.
हालांकि, बातचीत की प्रक्रिया अभी भी बेहद नाज़ुक दौर में है. मध्यस्थता में शामिल एक सूत्र ने हाल की घटनाओं को "बड़ा झटका" बताया है. सूत्र के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच माहौल इस समय बहुत तनावपूर्ण है.
कूटनीतिक भाषा में इसका मतलब यह है कि पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने बातचीत को और मुश्किल बना दिया है.
दोनों देशों के बीच भरोसा लगभग खत्म हो चुका है. दोनों को यह विश्वास नहीं है कि समझौता होने के बाद दूसरा पक्ष अपनी बात पर कायम रहेगा.
ईरान का रुख

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य टकराव की सबसे बड़ी वजह ईरान का यह रुख है कि वह पहले जैसी स्थिति में लौटना नहीं चाहता.
यानी 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल के हमले से पहले जो हालात थे, ईरान अब उन्हें दोबारा स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है.
ईरान की सरकार होर्मुज स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहती है और वह इस बात से एक कदम भी पीछे खींचने को तैयार नहीं है. यह समुद्री रास्ता दुनिया के लिए बेहद अहम है.
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है. अगर ईरान इस रास्ते से जहाज़ों की आवाजाही रोकता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है.
ईरान के लिए होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण, परमाणु हथियार बनाने की संभावना से कहीं अधिक असरदार हथियार माना जा रहा है, क्योंकि इस रास्ते को प्रभावित करके वह दुनिया पर तुरंत दबाव बना सकता है.
ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. यही वजह है कि वह प्रस्तावित समझौते (एमओयू) को भी दांव पर लगाने के लिए तैयार दिख रहा है, जबकि इस समझौते से उसे कई आर्थिक और राजनीतिक फ़ायदे मिल सकते हैं.
ईरान का कहना है कि अब वह पीछे नहीं हटेगा. वह अपने रणनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए ज़रूरत पड़ने पर युद्ध जारी रखने का जोखिम भी उठाने को तैयार है.
अमेरिका और इसराइल, ईरान की सरकार को गिराने में सफल नहीं हो सके. इससे ईरान की सरकार का आत्मविश्वास और बढ़ा है.
युद्ध में मारे गए सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने भी यह दिखाया कि सरकार के पास अब भी मजबूत जनसमर्थन है.
हालांकि, देश के भीतर सरकार का विरोध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन जनवरी में सरकार ने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की थी, जिसमें हजारों लोगों के मारे जाने की बात कही गई थी.
इसके बाद से विरोध करने वाले लोग खुलकर सामने आने से बच रहे हैं.
अगर दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव रुक जाता है, तो मध्यस्थों का मानना है कि ईरान के साथ समझौता संभव है.
इस समझौते के तहत होर्मुज स्ट्रेट से जहाज़ों की आवाजाही सामान्य हो सकती है. इसके बदले विदेशों में फंसी ईरान की संपत्तियां जारी की जा सकती हैं और उसे तेल बेचने की अनुमति मिल सकती है. साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के अधिकार को भी किसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है.
इसके बदले ईरान को भी कुछ शर्तें माननी होंगी. उसे यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की सीमा तय करनी होगी और संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निरीक्षकों को फिर से जांच की अनुमति देनी होगी.
इसके अलावा ईरान को उस संवर्धित यूरेनियम का पूरा हिसाब देना होगा, जिसे ट्रंप "न्यूक्लियर डस्ट" कहते हैं. यानी ऐसा यूरेनियम, जिसे परमाणु हथियार बनाने लायक स्तर के करीब तक संवर्धित किया जा चुका है.
हालांकि, पिछले 24 घंटों में जो घटनाएं हुई हैं, वे दिखाती हैं कि ऐसे किसी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा. दोनों देशों के बीच अविश्वास और तनाव अब भी बहुत गहरा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



















