पश्चिम बंगालः मतदान के बाद भी क्यों जारी है सियासी घमासान, क्या है इसके पीछे की कहानी

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पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है लेकिन इस बार जो हो रहा है उसने कई राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया है.
गुरुवार को बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का आमना-सामना हुआ. कहीं ये पुलिस और प्रशासन के लोगों से बहस करते दिखे, तो कुछ लोग स्ट्रॉन्ग रूम में मशीनों को रखने को लेकर अव्यवस्था का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठ गए.
यहां तक कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कोलकाता की भवानीपुर सीट पर स्ट्रॉन्ग रूम तक पहुंच गईं. ऐसा पहली बार हुआ.
ईवीएम को लेकर गुरुवार शाम को शुरू हुआ तनाव शुक्रवार को भी जारी रहा और तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर एकतरफा फ़ैसला करने का आरोप लगाया. यही नहीं शुक्रवार को टीएमसी एक बार फिर मुख्य चुनाव अधिकारी के एक फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई.
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पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण में विधानसभा की 142 सीटों पर वोटिंग हुई थी. नतीजे 4 मई को आएंगे.
आम तौर पर मतदान तक चुनावी घमासान जारी रहता है और उसके बाद शांति हो जाती है लेकिन इस बार के बंगाल चुनावों में ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है. वैसे 2026 के विधानसभा चुनावों में बहुत सी चीज़ें पहली बार हुई हैं.
चुनाव प्रक्रिया को लेकर मुख्य प्रतिद्वंद्वी बीजेपी-टीएमसी ही नहीं राजनीतिक विश्लेषक भी बंटे हुए हैं.
इस ख़बर के लिए हमने दो वरिष्ठ पत्रकारों से बात की जो लंबे समय से बंगाल की राजनीति, समाज और चुनावों को बारीकी से देख रहे हैं और दोनों के ही विचार टीएमसी, इलेक्शन कमीशन और चुनाव प्रक्रिया को लेकर अलग मिले.
मतदान के बाद तनातनी

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टीएमसी ने विधानसभा चुनावों के लिए वोटों की गिनती के सुपरवाइज़र के तौर पर सिर्फ़ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को तैनात करने के मुख्य चुनाव अधिकारी के फैसले के ख़िलाफ़ शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.
'बार एंड बेंच' के मुताबिक़, शनिवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जे बागची की बेंच करेगी, क्योंकि वोटों की गिनती 4 मई को होनी है.
क़ानूनी ख़बरों और विश्लेषण की वेबसाइट लाइव लॉ के मुताबिक़, इससे पहले टीएमसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी जिसे हाई कोर्ट ने गुरुवार को ख़ारिज कर दिया था.
बीजेपी ने कहा है कि टीएमसी चुनाव हार रही है. बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर टीएमसी के आरोपों और ममता बनर्जी पर निशाना साधा है.
इस सियासी जंग में पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक सत्ता में रही सीपीएम भी शामिल हो गई है. सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती ने आरोप लगाया है कि वोटों की लड़ाई अब 'बदरंग' हो चुकी है.
उन्होंने कहा कि बीजेपी और टीएमसी दोनों ही पार्टियां चुनावों में ग़लत तरीके से लाभ उठाती हैं.
गहरा अविश्वास

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक समीर पुरकायस्थ कहते हैं कि चुनाव के बाद हिंसा बंगाल के लिए नई बात नहीं है लेकिन मुख्यमंत्री का खुद स्ट्रॉंग रूम में पहुंच जाना पहली बार हुआ है.
उनके अनुसार, इसकी वजह यह है कि टीएमसी और चुनाव आयोग के बीच में अविश्वास के माहौल के बीच यह चुनाव हुआ है.
वह कहते हैं, "एसआईआर हो या चुनाव प्रक्रिया दोनों के बीच में टकराव दिखा है. चुनाव आयोग का राज्य सरकार के प्रति अविश्वास था कि डीजी, मुख्य सचिव, गृह सचिव सबको बदल दिया गया. इसके अलावा चुनाव आयोग ने यह कह दिया है कि मतगणना के समय राज्य सरकार का कोई अधिकारी मौजूद नहीं रहेगा. यह चुनाव आयोग का राज्य सरकार की मशीनरी पर अविश्वास दिखाता है."
पुरकायस्थ कहते हैं, "दूसरी तरफ़ टीएमसी का आरोप है कि एसआईआर के नाम पर उसके वोट बैंक को निशाना बनाया गया है. जैसे कि मुस्लिम समुदाय और महिलाओं के बहुत सारे नाम काटे गए हैं- ख़ासकर उन महिलाओं के नाम काटे गए हैं जिन्होंने शादी के बाद अपने नाम बदले हैं. टीएमसी को लगा कि यह पूरी प्रक्रिया उसे निशाना बनाने के लिए की गई है."
"इसलिए यह अविश्वास पैदा हुआ है और चुनाव आयोग जो भी कर रहा है टीएमसी उस पर नज़र रख रही है. यह भारत के फ़ेडरल स्ट्रक्चर के लिए अच्छा नहीं है."
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और रानजीतिक विश्लेषक सुकांतो सरकार को लगता है कि इस बार चुनाव आयोग ने ठीक काम किया है.
वह कहते हैं, "इस बार चुनाव शांतिपूर्वक हुआ. इस बार मतदाताओं ने खुद अपने वोट डाले."
सुकांतो कहते हैं, "दरअसल पश्चिम बंगाल में पिछले चार-पांच दशक से ममता बनर्जी और अन्य सत्ताधारी दलों का चुनावी प्रक्रिया पर कब्ज़ा रहा. वह चुनावी प्रक्रिया और चुनावी मशीनरी को नियंत्रित करते थे. इस बार यह इंजीनियरिंग और मैकेनिज़्म वह इस्तेमाल नहीं कर पाए इसलिए वह बहुत बेचैन हैं कि जनमत क्या रहेगा. टकराव की यही वजह है."
एसआईआर सही या ग़लत?

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इन चुनावों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी कि एसआईआर एक बड़ा मुद्दा बना. इसे लेकर बहुत सारे सवालों के जवाब मिलने अभी बाकी हैं.
समीर पुरकायस्थ कहते हैं, "एसआईआर की प्रक्रिया में कोई पारदर्शिता नहीं थी. इतने लोग डिलीट हुए हैं तो क्यों डिलीट हुए, उनकी क्या कमी थी? इसकी वजह से बीजेपी की कहानी कि घुसपैठ से बंगाल में डेमोग्राफ़ी बदल रही है को समर्थन मिला. जिनका भी नाम कटा है बीजेपी उन्हें घुसपैठिया या बांग्लादेशी बता रही है. चुनाव आयोग को कहना चाहिए था कि ऐसा नहीं है, लेकिन उसने स्पष्टीकरण नहीं दिया और इसकी वजह से बीजेपी को फ़ाय़दा मिला है और उसकी वजह से भी चुनाव प्रभावित हुआ है."
वो कहते हैं, "चुनाव आयोग ने जानबूझकर या अनजाने में बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाया है. इसकी वजह से भी अविश्वास बढ़ा है."
लेकिन सुकांतो सरकार समीर पुरकायस्थ की बात से सहमत नहीं.
वह कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में पिछली बार एसआईआर 2002 में हुआ था, तब लोगों को इसके बारे में पता नहीं था. अब वोटर लिस्ट में बहुत सारे मृतकों के नाम थे, स्थाई रूप से शिफ़्ट हो चुके लोगों के नाम थे. इन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए. दुर्भाग्य से हमारे राज्य में जो भी सत्ताधारी पार्टी होती थी वह इन वोटों को अपने लिए इस्तेमाल करती थी. इसलिए शुरुआत से ही सत्ताधारी दल ने इसे रोकने की कोशिश की और इसी वजह से टकराव शुरू हुआ."
सुकांतो आगे कहते हैं, "एसआईआर प्रक्रिया ठीक (फ़ेयर) थी. शुरुआत से ही राज्य सरकार ने चुनाव आयोग के साथ कोऑपरेट नहीं किया. उन्होंने काबिल सरकारी अधिकारी उपलब्ध नहीं करवाए और जो अधिकारी और अन्य स्टाफ़ डेपुटेशन पर चुनाव आयोग को उपलब्ध करवाए गए उनमें से ज़्यादातर ने काम ठीक से नहीं किया. इसके बाद चुनाव आयोग ने कुछ के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी की."
"जब सत्ताधारी दल को यह अहसास हुआ कि वह चुनाव आयोग को एसआईआर से रोक नहीं सकते तो कोर्ट चले गए. पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट लेकिन अंततः एसआईआर को रोक नहीं पाए."
चुनाव आयोग पर सवाल

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समीर पुरकायस्थ कहते हैं कि टीएमसी को लगता है और बहुत से अन्य लोगों को भी लग रहा है कि यह चुनाव टीएमसी सिर्फ़ बीजेपी से नहीं लड़ रही थी.
वह कहते हैं, "यह जो भाव बना है वह चुनाव आयोग की वजह से बना है क्योंकि वह शुरू से ही यह मानकर काम कर रहे थे कि राज्य सरकार ठीक काम नहीं कर रही है. और यह चुनाव सिर्फ़ चुनावा आयोग, बीजेपी बनाम टीएमसी तो थी ही बल्कि ईडी-सीबीआई (आईपैक के निदेशक की गिरफ़्तारी और ज़मानत) भी उनके साथ थीं."
लेकिन सुकांतो सरकार कहते हैं, "ऐसा लगता है कि इलेक्शन कमीशन का किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं था. वह किसी पार्टी के साथ खड़े थे या नहीं पता नहीं लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने अपना काम ठीक से किया."

वह कहते हैं, "दो चरणों के चुनाव के बाद ममता बनर्जी के अलावा और किसी ने ऐतराज़ नहीं किया- सीपीएम, कांग्रेस और अन्य स्थानीय दल (आईएसएफ़) किसी ने मतदान या मतदान प्रक्रिया पर ऐतराज़ नहीं जताया. सिर्फ़ ममता और उनकी पार्टी ने ही सवाल उठाए और चुनाव आयोग पर चिल्ला रहे हैं."
इतने तीखे विरोधों के बीच हमने अपने राजनीतिक विश्लेषकों से पूछा कि उनके हिसाब से इन चुनावों का निष्कर्ष क्या निकला?
पुरकायस्थ कहते हैं, "एसआईआर की वजह से इलेक्टोरेल डेमोग्राफ़ी बदल गई है. बहुत सारे विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमानों को जो प्रभाव था वह कम हो गया है. और अगर आप इसे गणित के नज़रिये से देखेंगे तो इसकी वजह से बीजेपी को फ़ायदा मिला है."
"लेकिन इसकी वजह से बहुत सारे लोगों में नाराज़गी भी पैदा हुई है और अगर यह नाराज़गी वोट में बदलती है तो गणित के हिसाब से बीजेपी को जो फ़ायदा मिला है, शायद वह न रहे."
सुकांतो कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में लोग बहुत ख़ुश हैं कि उन्होंने अपने वोट खुद डाले हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

































