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आशा भोसले ने आरडी बर्मन के साथ मिलकर रचा गानों का एक नया संसार
- Author, यूनुस ख़ान
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
आशा भोसले और पंचम यानी आरडी बर्मन का आमना-सामना पहली बार तब हुआ जब पंचम अपने पिता सचिन देव बर्मन के सहायक थे. आशा भोसले तब 23 साल की थीं और पंचम थे 17 साल के एक किशोर.
वो भागकर आशा जी के ऑटोग्राफ़ लेने आए थे. ये कहते हुए कि मैंने आपके कुछ नाट्यगीत रेडियो पर सुने हैं. किसी को पता नहीं था कि आगे चलकर ये जोड़ी हिंदी फ़िल्म-संगीत को हमेशा के लिए बदल देगी.
आशा और पंचम का पहला साथ शुरू होता है सन 1966 में आई फ़िल्म 'तीसरी मंज़िल' से. नासिर हुसैन की इस फ़िल्म के लिए जब पंचम को चुना गया तो वो किसी इम्तिहान से कम नहीं था.
शम्मी कपूर ने ख़ुद बताया था कि उन्होंने पंचम से मिलने की मांग की और गाने सुनने चाहे. उनकी जोड़ी शंकर-जयकिशन के साथ पक्की थी. जयकिशन तो शम्मी के दोस्त ही थे.
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जब पंचम ने अपनी पहली ट्यून सुनायी तो शम्मी फ़ौरन पहचान गये कि ये एक नेपाली गाने 'हे कांचा मलाई सुनको तारा' से प्रेरित है.
इस घटना का ब्योरा बहुत लम्बा है इसलिए ये फिर सही. बहरहाल... 'तीसरी मंज़िल' वो पहली फ़िल्म थी-जिसमें आशा भोसले ने पंचम के लिए गाया.
'मैं तुम्हारी आवाज़ पर फ़िदा हूं'
एक से बढ़कर एक गाने. 'ओ मेरे सोना रे', 'ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली', 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा' और 'मैं इनपे मरता हूं'.
'तीसरी मंज़िल' का गाना रिकॉर्ड होना था- 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा'...पांच छह दिन तक आशा पेट का धक्का मारकर रिहर्सल ही करती रहीं- 'आ आ आजा', 'आ आ आजा'.
यहां तक कि उनके ड्राइवर को भी अजीब लगा, उन्होंने पूछा, मैडम आपकी तबीयत तो ठीक है. आशा जी ने बताया था कि उन्होंने ड्राइवर को कहा, "मैं ठीक हूं, तुम चुपचाप गाड़ी चलाओ. मैं गाने की प्रैक्टिस कर रही हूं." बहरहाल...यहां से जो साथ शुरू हुआ वो बहुत लंबा चला.
पंचम ने एक बार आशा से कहा था- "आशा, तुम्हारा सुर बहुत अच्छा है. मैं तुम्हारी आवाज़ पर फिदा हूं."
आशा के लिए पंचम गुमनाम तरीक़े से फूल भेजते रहे और एक दिन अपने जज़्बात का इज़हार भी कर दिया. आशा जी ने हमेशा ये कहा है कि "हमारे रिश्ते की बुनियाद था संगीत. आप जानते हैं कि पंचम दुनिया भर का संगीत सुनता थे. हम बीटल्स से लेकर भारतीय शास्त्रीय संगीत भी सुनते और जैज़ और रॉक भी सुनते."
लेकिन जब अस्सी का दशक ढल रहा था तो दोनों ने अलग-अलग रहना शुरू कर दिया था.
इसकी असली वजह तो पता नहीं लेकिन उनकी ओर से कहा हमेशा ये गया कि "हमारे जीने के तरीक़े एकदम अलग-अलग हैं." पर आशा का नाता पंचम से कायम रहा.
आपसी बातचीत, आपसी सम्मान और साथ काम... सब चलता रहा. पंचम के आख़िरी दिन बहुत अकेलेपन और उदासी से भरे थे. कुछ था जो दरक रहा था. कुछ था जो ठीक नहीं था. दोनों के कई क़रीबी लोग दावा करते हैं कि मुश्किल दौर में भी आशा पंचम के साथ खड़ी रहीं.
आशा के लिए पंचम हमेशा नयी चुनौती तैयार रखते
साल 1970 में आई रविकांत नागाइच की फ़िल्म 'द ट्रेन'.
इसे एक बॉन्ड स्टाइल मूवी की तरह बनाया गया था और पंचम ने इसके संगीत में किए थे ढेर सारे प्रयोग.
इस फ़िल्म में एक क्लब सॉन्ग आया- 'ओ मेरी जां मैंने कहा'. कितनी हरकतों वाला मुश्किल गाना था ये! ख़ुद पंचम इस गाने में मौजूद हैं- अपनी ख़ास शैली में गाते हुए.
आशा को इस गाने में अपनी आवाज़ को कंपाना भी था और ऊंचा भी ले जाना था.
1970 में ही आई शक्ति सामंत की फ़िल्म 'कटी पतंग' जिसके एक गाने ने अभिनेत्री बिंदु को हमेशा के लिए एक नयी पहचान दी- 'मेरा नाम है शबनम.'
इस गाने में कहीं नशीले संवाद हैं तो कहीं एकदम से ऊंचे सुर. ऐसा नाटकीय गाना पहले कभी हिंदी सिनेमा में बना नहीं था.
इसके बाद एक बार फिर नासिर हुसैन के लिए संगीत तैयार करने का मौक़ा आया. फ़िल्म थी 'कारवां.' इस फ़िल्म में पंचम ने तैयार किया- 'पिया तू अब तो आ जा' जैसा गाना. टिपिकल पंचम सिग्नेचर.
जाने कितने रेडियो स्टेशनों के प्रोग्रामों की सिग्नेचर ट्यून बन गया ये गाना. क्या नहीं था इस गाने में - सांसों के उतार-चढ़ाव, ऊंची तानें, नाज़ुक अदायगी, नाटकीयता, एक साथ सब. इसके बाद आज तक पंचम और आशा के गानों का ज़िक्र इस गाने के बिना पूरा नहीं होता.
आशा की आवाज़ का बेहतरीन इस्तेमाल
पंचम आशा और लता की आवाज़ों का इस्तेमाल बहुत सूझबूझ के साथ करते थे.
'कारवां' में जहां लता के पास आये ये गाने- 'चढ़ती जवानी', 'कितना प्यारा वादा' और 'दिलबर दिल से प्यारे' जबकि आशा के पास आए- 'दैया ये मैं कहां आ फंसी', 'गोरिया कहां तेरा देस' और 'अब जो मिले हैं' जैसा अत्यंत नशीला गाना.
इसके बाद आया सन 1972, और देव आनंद ने बनायी 'हरे रामा हरे कृष्णा' और पंचम ने इस फ़िल्म के लिए बनाया 'दम मारो दम' जैसा बेमिसाल गाना.
ये सारे गाने ऐसे हैं जिन्हें गाना किसी के लिए आसान नहीं था. इसी सिलसिले के कुछ और गाने आये हैं जैसे 'अपना देश' का 'दुनिया में लोगों को', 'मनोरंजन' का 'चोरी चोरी सोलह सिंगार करूंगी', 'खेल खेल में' का 'सपना मेरा टूट गया', 'अलीबाबा और चालीस चोर' का 'ख़तूबा', 'शालीमार' का 'मेरा प्यार शालीमार' वग़ैरह.
1972 वो साल भी था जब पंचम और गुलज़ार ने एक साथ काम करना शुरू किया था. ये फ़िल्म थी 'परिचय'. हालांकि इस फ़िल्म में आशा के हिस्से में एक ही गाना आया- 'सारे के सारे गामा को लेकर गाते चले'.
लेकिन यहां से एक इतिहास लिखा जाना शुरू हुआ. पंचम, आशा, गुलज़ार का इतिहास. ऐसे बेमिसाल गाने बने हैं जिनका कोई जोड़ नहीं है.
सन 1975 में आई 'ख़ुशबू'. इस फ़िल्म में आशा के दो गाने थे. 'घर जायेगी तर जायेगी' और 'बेचारा दिल क्या करे'. ये आसान गाने नहीं हैं.
आशा और पंचम की जोड़ी की ख़ासियत ये रही कि आशा ने पंचम को अपने प्रयोग करने दिए. हर चुनौती को स्वीकारा. पंचम ने जैसे गाने दिये-वैसे गाने गाये. लता से पंचम अलग तरह के गाने गवाते रहे, जिसे बेहद मुश्किल माना जाता रहा है.
एक बार आशा भोसले, पंचम और गुलज़ार ने विविध भारती पर संगीत सरिता कार्यक्रम में एक सिरीज़ की थी- मेरी संगीत यात्रा.
इसकी एक कड़ी में गुलज़ार साहब ने आशा के जवाब में कहा था, 'मेरे लिए लता और आशा में कौन बेहतर हैं, इसका एक ही जवाब है. नील आर्मस्ट्रॉंग और एडविन ऑल्ड्रिन. दोनों ने चांद पर क़दम रखा. पर एक के बाद एक रखा. दोनों ही चांद पर क़दम रखने वाले पहले इंसान बने.'
इसी सिरीज़ में आशा भोसले ने कहा था कि अलबम 'दिल पड़ोसी है' में पंचम ने राग 'तोड़ी' पर आधारित एक गाना बनाया था- 'भीनी-भीनी भोर आई'. ये उनके लिए एक मुश्किल चुनौती थी. ये इस अलबम का पहला गाना भी था.
ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म 'ख़ूबसूरत' में आशा भोसले ने कुछ प्यारे गाने गाये हैं. 'सुन सुन दीदी तेरे लिए एक रिश्ता आया है' जैसा शरारती गाना भी और 'सारे नियम तोड़ दो' जैसा बग़ावती गाना भी.
पर इस फ़िल्म में आशा को मिला 'पिया बावरी' जैसा गाना. साथ में अशोक कुमार थे. ये गाना राग बिहाग पर आधारित था. इसे ध्यान से सुनें. बिल्कुल आसान नहीं है ये अपनी अदायगी में.
अब तक आशा जो क्लब गीत गाती रहीं- ऊंची तान के नशीले गाने. ये उनसे एकदम अलग है. एक संयत और पेचीदा गाना.
मुझे फ़िल्म 'सितारा' का कम सुना गाना बहुत ही प्रिय है. ये अमूमन रेडियो पर भी ज़्यादा सुनायी नहीं पड़ता- 'ये साये हैं, ये दुनिया है परछाइयों की'.
गुलज़ार, आशा और पंचम की तिकड़ी के गानों का अनमोल नगीना है ये. और 'नमकीन' के दो गानों में तो आशा किस तरह खिली और खुली हैं. 'रोज़ रोज़ डाली डाली' और 'होठों पे बीती बात आयी है'.
डिस्को की आंधी में भी जलवा कायम रहा
सन 1982 आ गया था. संगीत पूरी तरह से बदल रहा था. डिस्को की आंधी चल रही थी. पर गुलज़ार और पंचम ने आशा को दिए कुछ बहुत नाज़ुक गाने.
इस बरस 'नमकीन' में आशा ने गाया- 'आंकी चली बांकी चली'. 'पांता भाते तात्का बैगुन पोरा' जैसा ग़ज़ब का जुमला इस गाने में है. उम्मीद है कि आपको बांग्ला लोगों के इस प्रिय भोजन के बारे में पता होगा.
और है आशा की आवाज़ का चुलबुलापन. उनकी हंसी. इसी फ़िल्म में जो मेरा सबसे पसंदीदा गाना है वो है- 'फिर से अइये बदरा बिदेसी'. इस गाने को जब और जितनी बार सुनो- मन भीग भीग जाता है.
सन 1989 में गुलज़ार की एक ऐसी फ़िल्म आई जो कल्ट बन गयी. इसका संगीत अनमोल बना. सब गाने आशा भोसले की आवाज़ में. इजाज़त फ़िल्म के सब गाने पंचम के बनाए और गुलज़ार के लिखे.
'मेरा कुछ सामान', 'छोटी-सी कहानी से', 'क़तरा क़तरा मिलती है' और 'ख़ाली हाथ शाम आई है' जैसे गाने आज भी लोगों की जुबां पर चढ़े हुए हैं.
क्या और कितनी बातें करें इन गानों के बारे में. दुनिया की हलचलों और असर से दूर गुलज़ार, पंचम और आशा ने जो काम किया है- उसकी परतें आज तक बस खुलती ही चली जा रही हैं.
'मेरा कुछ सामान' के लिए आशा भोसले को सर्वश्रेष्ठ गायिका का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला. उन्हें जो दूसरा फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला है वो 'उमराव जान' के गाने 'दिल चीज़ क्या है' के लिए मिला है.
'मेरा कुछ सामान' को पंचम लगेज सॉन्ग कहते रहे. सामान का गाना. विविध भारती के संगीत सरिता कार्यक्रम में और अपने तमाम इतर इंटरव्यूज़ में गुलज़ार साहब ने बताया था कि किस तरह पंचम इस गाने की इबारत सुनकर बोल उठे थे कि 'कल को तुम कोई अख़बार उठा लाओगे और कहोगे इसकी ट्यून बना दो'.
मज़े की बात ये है कि इस गाने को पढ़कर आशा जी ने अनायास गुनगुनाया था- 'लौटा दो'. और इसी से पंचम ने वो ट्यून तैयार कर ली थी.
बहरहाल.. एक और नायाब एलबम की बात ज़रूरी है यहां. आशा जी ने बताया था कि कई बरस से वो पंचम और गुलज़ार साहब से कहे जा रही थीं कि हम सब मिलकर एक साथ कोई एलबम करते हैं. एक दिन पंचम घर पर जेम्स बॉन्ड फ़िल्म देख रहे थे. फ़िल्म में एक ट्यून आई. पंचम ने टीवी बंद किया और उसे गुनगुनाने लगे.
और बस इस तरह उन्होंने इस अलबम की तैयारी शुरू की. गुलज़ार इसे रिश्तों का अलबम कहते हैं.
क्या तो गाने हैं इस अलबम में. 'भीनी भीनी भोर आई', 'कोई दिया जले कहीं', 'मांझी रे मांझी', 'जूठे तेरे नैन', 'जाने दो', 'उम्मीद होगी कोई', 'शाम से आंख में नमी', 'रिश्ते बनते हैं', 'रात क्रिसमस की थी', 'रात चुपचाप' और 'सातों बार बोले बंसी' वग़ैरह.
इन गानों को आंख बंद करके सुना जा सकता है अनगिनत बार. जीवन के किसी भी थपेड़े को सुनते हुए. कुछ गाने, कुछ अलबम बस बन जाते हैं. और अमर हो जाते हैं. ये ऐसा ही अलबम है.
आशा का पूरा जीवन असल में लता-रूपी बरगद की छांह में अपने हिस्से की धूप खोजने की यात्रा रहा है. ऐसे में उन्होंने कठिन रास्ता चुना. प्रयोगधर्मिता का रास्ता. हर मुश्किल चुनौती को निभाने का रास्ता. आशा और पंचम प्रयोगधर्मिता और चुनौतियों की राहों के कड़ियल मुसाफ़िर थे.
(लेखक विविध भारती में उद्घोषक हैं और फ़िल्म-संगीत पर लगातार लिखते रहे हैं.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.