कैंसर के ख़िलाफ़ कितनी असरदार साबित हो रही इम्यूनोथेरेपी

    • Author, जेमी डुचार्मे
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

कैंसर के इलाज के लिए कीमोथेरेपी और सर्जरी का इस्तेमाल किया जाता है और पिछले कुछ सालों से कैंसर के ख़िलाफ़ एक और हथियार चर्चा में है, नाम है इम्यूनोथेरेपी.

करीब 100 साल के विकास के बाद, शरीर के इम्यून सिस्टम (प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत करके कैंसर से लड़ने वाले इलाज अब असर दिखा रहे हैं और मरीजों की जान बचा रहे हैं.

71 साल की मॉरीन सिडरेस का साल 2008 में कोलन कैंसर का इलाज हुआ था, जिसमें उनकी सर्जरी करनी पड़ी. इलाज सफल रहा, लेकिन ऑपरेशन के बाद ठीक होना बहुत कठिन था.

14 साल बाद, न्यूयॉर्क में रहने वाली सिडरेस को इस बार इसोफेगल यानी खाने की नली का कैंसर हुआ. इस बार उनका इलाज एक क्लिनिकल ट्रायल के तहत हुआ, जो बिल्कुल अलग था. हर तीन हफ़्ते में वह मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर जाती थीं और 45 मिनट तक 'डोस्टार्लिमैब' नाम की दवा दी जाती थी.

सिर्फ़ चार महीने के इलाज के बाद उनका ट्यूमर गायब हो गया. इसके लिए सर्जरी, कीमोथेरेपी या रेडिएशन की ज़रूरत नहीं पड़ी.

उन्हें बस एक साइड इफेक्ट हुआ, जिसमें थकान रहती है. वह कहती हैं, "यह यकीन करना मुश्किल है, जैसे कोई साइंस फिक्शन हो."

लेकिन यह सच है. सिडरेस उन मरीजों में से एक हैं जिन्हें इम्यूनोथेरेपी से फ़ायदा हुआ है. यह इलाज अब तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. इससे मरीज के हिसाब से इलाज, लंबे समय तक कैंसर से राहत और कम साइड इफेक्ट की उम्मीद मिलती है.

अमेरिका के टेक्सस के एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी की प्रोफे़सर और इम्यूनोथेरेपी शोधकर्ता जेनिफर वार्गो कहती हैं कि, "मैं भावुक हो जाती हूं और मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लोग जी रहे हैं, और अच्छी गुणवत्ता वाली ज़िंदगी जी रहे हैं. हम इलाज की बात कर रहे हैं."

करेन नुडसन, जो अमेरिका की ग़ैर-लाभकारी संस्था, पार्कर इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर इम्यूनोथेरेपी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं. वो बताती हैं कि शरीर में यह प्राकृतिक क्षमता होती है कि वह "ऐसी कोशिकाओं को पहचानकर खत्म कर दे जो स्वस्थ नहीं लगतीं."

अगर सब कुछ सही तरीके से काम कर रहा हो, तो इसमें कैंसर बन चुकी कोशिकाएं भी शामिल होनी चाहिए.

लेकिन कभी-कभी कैंसर कोशिकाएं इस प्रणाली से बच निकलती हैं या इसे मात दे देती हैं, जिससे ख़तरनाक और अनियंत्रित वृद्धि होती है.

वे सामने होते हुए भी छिपी रहती हैं और आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं से अलग पहचान में नहीं आतीं.

इम्यूनोथेरेपी का लक्ष्य उन कैंसर कोशिकाओं को उजागर करना है ताकि इम्यून सिस्टम उन्हें सही रूप में पहचान सके.

यह इम्यून सिस्टम की रक्षा क्षमता को मज़बूत करता है ताकि वह कैंसर कोशिकाओं को ढूंढकर नष्ट कर सके और इसके परिणाम बेहद प्रभावशाली हो सकते हैं.

कैंसर से कैसे लड़ती है इम्यूनोथेरेपी

इम्यूनोथेरेपी के दो सबसे प्रसिद्ध रूप हैं, सीएआर-सेल थेरेपी और इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स.

सीएआर टी-सेल थेरेपी में मरीज के खून से टी-सेल (बहुत ही विशेष इम्यून सेल्स जो खास बाहरी हमलावरों को पहचानकर खत्म करती हैं) निकालना, उन्हें लैब में इस तरह बदलना कि वे कैंसर कोशिकाओं को ढूंढकर हमला कर सकें, और फिर इन मज़बूत किए गए टी-सेल्स को शरीर में वापस छोड़ देना शामिल होता है.

इन थेरेपी का इस्तेमाल फिलहाल खून से जुड़े कैंसर के इलाज में किया जाता है.

वहीं, इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स ऐसी दवाएं हैं जो इम्यून सिस्टम के अंदर मौजूद एक "ऑफ स्विच" को बंद कर देती हैं.

इस सुरक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है, यह बहुत जल्दी फैलने वाले प्रतिक्रिया को रोकती है, जो स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है.

लेकिन कुछ कैंसर कोशिकाएं इस "ऑफ स्विच" को चालू कर देती हैं, जिससे टी-सेल काम करना बंद कर देते हैं और वे पहचान से बच निकलती हैं.

इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स ऐसा होने से रोकते हैं, जिससे टी-सेल कैंसर कोशिकाओं को खतरे के रूप में पहचानते हैं और उन पर हमला करते हैं.

इस तकनीक को विकसित करने वाले वैज्ञानिकों को 2018 में नोबेल पुरस्कार मिला, और आज इन दवाओं का इस्तेमाल कई तरह के कैंसर में किया जा रहा है.

फिर भी, इन दोनों तरीकों की अपनी सीमाएं हैं.

हालांकि शोध जारी है, लेकिन वैज्ञानिक ठोस ट्यूमर (ब्लड कैंसर के विपरीत), पर सीएआर टी-सेल थेरेपी को प्रभावी बनाने में संघर्ष कर रहे हैं, जो नए मामलों में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा होते हैं.

यह इलाज महंगा है और इसके लिए काफी मेहनत और संसाधनों की ज़रूरत होती है.

इम्यूनोथेरेपी के साइड इफ़ेक्ट

वहीं, लंदन के फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट में मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट समरा तुराजलिक कहती हैं कि इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स के साथ "कई तरह के साइड इफेक्ट" हो सकते हैं.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इम्यून सिस्टम का "ऑफ स्विच" शरीर को अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करने से रोकता है, और इस सुरक्षा को हटाने से सिर्फ़ ट्यूमर ही नहीं बल्कि स्वस्थ कोशिकाएं भी ख़तरे में आ सकती हैं.

अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के मुताबिक, आम साइड इफेक्ट में त्वचा पर चकत्ते, दस्त और थकान शामिल हैं, जबकि दुर्लभ मामलों में यह लीवर, दिल और किडनी में सूजन भी पैदा कर सकता है.

अगर यह दवा आक्रामक कैंसर (तेज़ी से फैलने वाले कैंसर) को नियंत्रित कर ले, तो यह समझौता फायदेमंद हो सकता है. लेकिन यह हमेशा ऐसा काम नहीं करता.

तुराजलिक कहती हैं कि पूरे ऑन्कोलॉजी क्षेत्र की एक बड़ी समस्या यह है कि कोई भी इम्यूनोथेरेपी 100 फ़ीसदी मरीजों पर काम नहीं करती.

इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे ट्यूमर की बनावट से लेकर खुद इम्यून कोशिकाओं की विशेषताओं तक और ये इम्यून सिस्टम के लिए उसे पहचानना मुश्किल बना देते हैं.

सामान्य तौर पर, करीब 20 फ़ीसदी से 40 फ़ीसदी मरीज ही इम्यूनोथेरेपी पर प्रतिक्रिया देते हैं. इसका मतलब है कि बहुत से मरीज़, वास्तव में ज्यादातर मरीज, साइड इफेक्ट का जोखिम उठाते हैं, साथ ही समय और उम्मीद भी गंवाते हैं, लेकिन उन्हें ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिलता.

कई रणनीतियों पर काम कर रहे शोधकर्ता

ज़्यादा मरीज इम्यूनोथेरेपी से कैसे फ़ायदा उठा सकते हैं? इस पर शोधकर्ता कई अलग-अलग तरीकों से काम कर रहे हैं.

वार्गो का शोध, जो अभी शुरुआती चरण में है, यह सुझाव देता है कि जो मरीज ज़्यादा फाइबर वाला खाना खाते हैं, उन्हें बेहतर परिणाम मिल सकते हैं, क्योंकि इससे आंतों के माइक्रोबायोम में बदलाव आता है जो प्रतिरक्षा प्रणाली और ट्यूमर दोनों को प्रभावित कर सकता है.

अन्य शोध बताते हैं कि स्टैटिन, जो सस्ती और आसानी से मिलने वाली कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं हैं, कोशिकाओं के बीच संचार में बदलाव के जरिए इम्यूनोथेरेपी के असर को बढ़ा सकती हैं.

इलाज का समय भी महत्वपूर्ण हो सकता है, कुछ हालिया शोध बताते हैं कि दिन में जल्दी दवा लेने वाले मरीजों के परिणाम बाद में लेने वालों से बेहतर होते हैं.

इम्यूनोथेरेपी को अन्य इलाज जैसे रेडिएशन या अल्ट्रासाउंड के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना भी असर बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है.

वील कॉर्नेल मेडिकल सेंटर की सैंड्रा डेमारिया, जिन्होंने इस संयुक्त तरीके पर शोध किया है. वो बताती हैं कि, "रेडिएशन वास्तव में ट्यूमर को इम्यून सिस्टम के लिए दिखाई देने योग्य बना सकता है."

हाई फ्रीक्वेंसी वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करके ट्यूमर पर हमला करने वाली अल्ट्रासाउंड थेरेपी भी यही काम कर सकती है.

अन्य शोधकर्ता इम्यूनोथेरेपी की कस्टमाइजेशन क्षमता का लाभ उठा रहे हैं और मरीजों को उनके लिए सबसे उपयुक्त इलाज से सावधानीपूर्वक जोड़ रहे हैं.

पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन क्यों ज़रूरी

पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन कई क्षेत्रों में उत्साह पैदा कर रही है, लेकिन नुडसन जोर देती हैं कि यह ऑन्कोलॉजी के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बीमारी बहुत अलग-अलग तरह की होती है.

नुडसन कहती हैं कि, "कैंसर एक बीमारी नहीं है. यह 200 अलग-अलग बीमारियां हैं, और ये अलग-अलग वजहों से होती हैं, इसलिए इनका इलाज भी अलग-अलग तरीके से करना पड़ता है."

यहां तक कि एक ही प्रकार और स्टेज के कैंसर वाले दो मरीजों में भी कोशिका स्तर पर बीमारी अलग हो सकती है.

डेमारिया कहती हैं, "यह क्षेत्र एक अहम मोड़ पर है. अब हम सिर्फ़ कैंसर नहीं, बल्कि मरीज़ का इलाज करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं."

मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने पहले ही एक आशाजनक रणनीति का परीक्षण किया है, जो इस खोज पर आधारित है कि एक खास जेनेटिक प्रोफ़ाइल वाले ट्यूमर इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स, जैसे डोस्टार्लिमैब, पर अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं.

साल 2022 और 2024 में किए गए दो छोटे ट्रायल्स में, इस प्रोफ़ाइल वाले रेक्टल कैंसर का इलाज करने पर ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गए.

इसके बाद टीम ने अपने शोध में 117 मरीजों को शामिल किया, जिनमें इसोफेगल, ब्लैडर और पेट के कैंसर जैसे अलग-अलग प्रकार के ट्यूमर थे, लेकिन उनमें वही जेनेटिक विशेषता थी.

जिन 103 लोगों ने पूरा इलाज पूरा किया, उनमें से 84 के ट्यूमर पूरी तरह गायब हो गए और इनमें सिडरेस भी शामिल थीं. वहीं केवल दो को अतिरिक्त सर्जरी की ज़रूरत पड़ी.

एमडी एंडरसन के शोधकर्ताओं ने एक अलग चेकपॉइंट इनहिबिटर के साथ इसी तरह के परिणाम बताए हैं.

अन्य समूहों ने यह भी दिखाया है कि भले ही मरीजों को बाद में सर्जरी करानी पड़े, लेकिन अगर पहले ट्यूमर पर इम्यूनोथेरेपी से हमला किया जाए, तो कुछ मामलों में सर्जरी के नतीजे बेहतर हो सकते हैं.

मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर में सॉलिड ट्यूमर ऑन्कोलॉजी के प्रमुख लुइस डियाज कहते हैं कि हालांकि और शोध की ज़रूरत है, लेकिन ये नतीजे उम्मीद जगाते हैं, क्योंकि ये कम दर्दनाक और ज़्यादा प्रभावी इलाज के नए दौर का रास्ता खोलते हैं.

वह कहते हैं, "हमें मध्ययुगीन समय से आधुनिक समय की ओर बढ़ना होगा. रेक्टम, पेट या ब्लैडर निकालने से बेहतर तरीका खोजना होगा."

लेकिन एक शर्त यह है कि करीब 5 फ़ीसदी ट्यूमर में ऐसा जेनेटिक ढांचा होता है, जो बिना सर्जरी वाली इम्यूनोथेरेपी के लिए उपयुक्त है, जिस पर डियाज और उनकी टीम ने अध्ययन किया.

वह कहते हैं, "बाकी 95 फ़ीसदी के लिए भी उतना ही अच्छा इलाज चाहिए."

कैंसर वैक्सीन की उम्मीद

इस दिशा में, शोधकर्ता नई इम्यूनोथेरेपी विधियों की तलाश जारी रखे हुए हैं और पुरानी विधियों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जैसे कैंसर वैक्सीन.

पारंपरिक वैक्सीन शरीर को किसी रोगजनक, जैसे वायरस, के हिस्सों से परिचित कराती है, ताकि शरीर असली हमले के ख़िलाफ़ इम्यून सिस्टम का अभ्यास कर सके.

नुडसन कहती हैं कि ऐसा ही विचार कैंसर में भी काम कर सकता है, फर्क यह है कि इसका उपयोग बीमारी को रोकने के बजाय इलाज करने के लिए किया जा सकता है.

कैंसर कोशिकाओं की सतह पर कई तरह के प्रोटीन होते हैं.

नुडसन बताती हैं कि वैक्सीन तकनीक का उपयोग करके शोधकर्ता मरीज की इम्यून सिस्टम को इन प्रोटीनों को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए प्रशिक्षित कर सकते हैं, जिससे उनके खास कैंसर के ख़िलाफ़ मज़बूत प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है.

इस तरीके के समर्थन में शुरुआती सबूत पहले से मौजूद हैं.

अमेरिका के डाना-फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने हाल ही में किडनी कैंसर के एक प्रकार से पीड़ित नौ लोगों के लिए व्यक्तिगत वैक्सीन बनाई.

उनके ट्यूमर सर्जरी से हटाने के बाद, मरीजों को वैक्सीन दी गई ताकि शरीर में बची हुई कैंसर कोशिकाएं खत्म हो जाएं.

साल 2025 में प्रकाशित शोध में टीम ने बताया कि सभी नौ मरीजों में कैंसर के ख़िलाफ़ टारगेटेड इम्यून प्रतिक्रिया हुई और वे सर्जरी के बाद कई सालों तक कैंसर-मुक्त रहे.

पर्सनलाइज़्ड वैक्सीन ने मेलेनोमा के इलाज में भी उम्मीद दिखाई है.

नुडसन कहती हैं कि, "यह एक नई और साहसिक दुनिया है. यह प्रिसिजन मेडिसिन की परिभाषा है. अब हम शायद बहुत तेज़ी से आपके खास ट्यूमर के ख़िलाफ़ वैक्सीन रणनीति विकसित कर सकते हैं."

इस उत्साह के बावजूद, आगे का रास्ता लंबा है.

इन तरीकों को साबित करने के लिए और शोध की ज़रूरत है, जहां डॉक्टर मरीज़ों को उनके खास कैंसर के मुताबिक सही इलाज से सटीक तरीके से जोड़ सकें.

डेमारिया चेतावनी देते हुए कहती हैं, "कई ऐसे लक्ष्य और नई दवाएं रही हैं जो शुरुआती क्लिनिकल ट्रायल से आगे नहीं बढ़ पाईं."

डियाज कहते हैं कि यह संभव है कि कुछ मरीज किसी भी तरह की इम्यूनोथेरेपी से ठीक न हों.

वह कहते हैं कि कैंसर की अलग-अलग विशेषताएं होती हैं जो उन्हें बढ़ने में मदद करती हैं, और कुछ के ख़िलाफ़ इम्यून सिस्टम बेहतर काम करता है, जबकि कुछ के ख़िलाफ़ नहीं.

लेकिन जिन मरीजों पर यह असर करता है, उनके लिए इम्यूनोथेरेपी जीवन बचाने वाली और जीवन बदलने वाली साबित हो रही है.

सिडरेस न्यूयॉर्क की वह मरीज़ हैं, जिन्होंने डियाज के ट्रायल में हिस्सा लिया. वो खुद को ऑन्कोलॉजी के उज्ज्वल भविष्य का हिस्सा मानती हैं.

वह कहती हैं, "हम बहुत अच्छी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. एक डॉक्टर ने मुझसे कहा कि 10 साल के भीतर कीमो और रेडिएशन करना खून निकालने (पुराने इलाज) जैसा लगने लगेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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