ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी टेक कंपनियों को निशाना बनाकर जंग की परिभाषा कैसे बदली?

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
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अमेरिका और इसराइल के साथ जंग के दौरान ईरान की जवाबी कार्रवाई पारंपरिक लक्ष्यों से आगे बढ़ गई, उसने खाड़ी देशों में अमेरिका से जुड़े डिज़िटल हब, क्लाउड इन्फ़्रास्ट्रक्चर और डेटा केंद्रों को निशाना बनाकर जंग के दायरे को और फ़ैला दिया.
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कहा कि उसने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन में डेटा हब्स पर ड्रोन हमले किए.
यह आज के जंग में एक अभूतपूर्व घटना है, जिसमें केवल साइबर घुसपैठ के बजाय आम लोगों से जुड़े क्लाउड इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर जान-बूझकर हमले किए गए हैं.
ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा कि इसका मक़सद इन डेटा सेंटरों की "दुश्मन की सैन्य और अन्य गतिविधियों में मदद करने" वाली भूमिका को सामने लाना और उसे रोकना था.
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खाड़ी के डिज़िटल इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमले क्यों?

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मौजूदा दौर में क्लाउड इन्फ़्रास्ट्रक्चर अब दोहरे इस्तेमाल वाली रणनीतिक ढांचे के तौर पर उभरा है.
यह बैंकिंग, एविएशन, हेल्थकेयर, कॉर्पोरेट कामकाज और ई-गवर्नमेंट जैसे क्षेत्रों में आम लोगों को सेवाएं देता है.
इसके अलावा, यह सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों के कामों में भी मदद करता है, जिसमें एआई-आधारित विश्लेषण, सैटेलाइट तस्वीरों की प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स की योजना बनाना और कमांड-एंड-कंट्रोल में मदद करना शामिल है.
अमेरिका ख़ास तौर पर बड़े पैमाने पर क्लाउड सेवाएं देने वाली कंपनियों पर निर्भर है. इन्हें 'हाइपरस्केलर्स' कहा जाता है.
ये कंपनियां दुनिया भर में बड़े-बड़े डेटा सेंटर चलाती हैं. इन्हें इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि ये मांग के आधार पर असीमित कंप्यूटिंग, स्टोरेज और नेटवर्किंग संसाधन उपलब्ध करा सकें.
इनमें अमेज़न, माइक्रोसॉफ़्ट और गूगल जैसी बड़ी टेक कंपनियां शामिल हैं.
ईरान का मानना है कि इन केंद्रों को निशाना बनाने से जंग की रणनीतियां पूरी तरह बदल जाएंगी और इससे संघर्ष की दिशा पर गहरा असर पड़ सकता है.
बड़ी अमेरिकी कंपनियां निशाने पर

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आईआरजीसी की इस घोषणा पर कि वह खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी टेक कंपनियों को निशाना बना रहा है, शोधकर्ता ख़ालिद वलीद ने क़तर के आर्थिक सहयोग और लंदन से प्रकाशित होने वाले अख़बार 'अल-कुद्स अल-अरबी' में एक लेख लिखा है.
उनका कहना है, "यह दिखाता है कि अब रणनीति में बड़ा बदलाव आया है. अब जगहों को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को निशाना बनाया जा रहा है जो निगरानी का काम करती हैं."
उन्होंने कहा, "इस नज़रिए से देखें तो ये कंपनियां अब सिर्फ़ तकनीकी सेवाएं देने तक ही सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सेना के फ़ैसले लेने की प्रक्रिया की चेन का हिस्सा बन गई हैं."
उन्होंने इस संदर्भ में "आम लोगों से जुड़ी कंपनियों के सैन्यीकरण" और "साइबर-स्पेस के फिर से राजनीतिकरण" होने का ज़िक्र किया.
13 मार्च को, ईरान के कट्टरपंथी अख़बार 'कीहान' ने अपने टेलीग्राम चैनल पर बताया कि आईआरजीसी ने खाड़ी देशों में काम कर रही प्रमुख अमेरिकी टेक कंपनियों, जैसे- एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट और अमेज़न के कर्मचारियों को जगह खाली करने का आदेश दिया.
इस आदेश में उन्हें दुबई, रियाद, दोहा, कुवैत सिटी, मनामा और मस्कट स्थित अपने दफ़्तर को तुरंत खाली करने का निर्देश दिया गया.
आईआरजीसी ने 31 मार्च को ने सिस्को, एचपी, इंटेल, ऑरेकल, माइक्रोसॉफ़्ट, एप्पल, गूगल, मेटा, आईबीएम, डेल, पलांटिर, नविदा, जपीएम मोर्गन, टेस्ला, जर्मन इलेक्ट्रिक, स्पायर सॉल्युशन्स, जी42 और बोइंग को अपने संभावित टारगेट के तौर पर बताया था.
2 अप्रैल को आईआरजीसी ने दावा किया कि उसने बहरीन में मौजूद अमेज़न के एक क्लाउड-कंप्यूटिंग केंद्र पर हमला किया और उसे "नष्ट" कर दिया. बाद में अमेज़न ने भी इन हमलों की पुष्टि की.
दुबई मीडिया ऑफिस ने इसे "एक छोटी-सी घटना" बताया, जो "दुबई इंटरनेट सिटी में मौजूद ऑरेकल की इमारत के बाहरी हिस्से पर मलबा गिरने" के कारण हुई.
खाड़ी देश डिज़िटल हब के तौर पर कैसे उभरे?

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सालों तक खाड़ी में सुरक्षा का मसला ऊर्जा से ही तय होता था. रिफ़ाइनरी, बंदरगाह, शिपिंग लेन और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स ही क्षेत्रीय तनाव की प्रमुख वजहें और निशाने थे.
अब यह तस्वीर बदल गई है, क्योंकि खाड़ी देशों ने रणनीतिक और आर्थिक फ़ायदे के प्रयास में ग्लोबल एआई और क्लाउड कंप्यूटिंग हब बनने के लिए भारी निवेश किया है.
ख़ास तौर पर यूएई और सऊदी अरब एआई के क्षेत्र में ख़ुद को दुनिया और अपने इलाक़े के सबसे बड़े हब के तौर पर पेश करने के लिए काफ़ी उत्सुक रहे हैं.
यूएई सरकार ने कहा, "अप्रैल 2022 में शुरू की गई 'डिज़िटल इकॉनमी स्ट्रैटेजी' का मक़सद देश की जीडीपी में डिज़िटल इकोनॉमी के योगदान को 10 सालों के अंदर दोगुना करना है. यानी 2022 के 9.7% से बढ़ाकर 19.4% तक पहुँचाना."
"इसका मक़सद यूएई को अपने इलाक़े और दुनिया भर में डिज़िटल इकोनॉमी के एक हब के तौर पर उसकी स्थिति को और मज़बूत करना भी है."
रिपोर्ट्स में बताया गया है कि माइक्रोसॉफ़्ट साल 2029 तक यूएई में अपना कुल निवेश बढ़ाकर 15 अरब डॉलर करने की योजना बना रहा है.
इसके अलावा 'स्टारगेट यूएई' प्रोजेक्ट भी काफ़ी अहम है. उम्मीद है कि इसमें आख़िरकार पाँच गीगावाट तक बिजली की क्षमता होगी और इसे अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा एआई डेटा-सेंटर कॉम्प्लेक्स बताया जा रहा है.
अमेज़न वेब सिरीज़ (एडब्ल्यूएस) भी सऊदी अरब में एक नया रीजन डेवलप कर रहा है, जो 5.3 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा का है.
डिज़िटल इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमला कितना बड़ा नुक़सान?

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विश्लेषकों का तर्क है कि डिज़िटल ठिकानों पर हमलों से असल आर्थिक और रणनीतिक नुक़सान होता है.
रिपोर्टों से पता चला कि एडब्लूएस हमलों के बाद यूएई और बहरीन में बैंकिंग सिस्टम और फिनटेक सेवाओं में रुकावटें आईं. इससे एयरलाइंस, राइड-हेलिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म प्रभावित हुए. ग्राहकों को सलाह दी गई कि वे अपने वर्कलोड को कहीं और ले जाएं.
सऊदी अशर्क न्यूज़ की वेबसाइट ने बताया कि डेटा सेंटर और आईटी सिस्टम में रुकावटों का नुक़सान बहुत बड़ा होता है. औसतन प्रति घंटे लाखों डॉलर, और कुछ मामलों में तो यह दस लाख डॉलर से भी ज़्यादा हो जाता है.
कंपनियों को काम रुकने, सेवाओं में देरी और महंगी रिकवरी या जगह बदलने की कोशिशों से और भी ज़्यादा आर्थिक नुक़सान होता है.
इसके अलावा, इन ठिकानों को फिर से बनाना बहुत महंगा हो सकता है, क्योंकि आधुनिक डेटा सेंटर दुनिया के सबसे महंगे तकनीकी और इन्फ़्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में गिने जाते हैं.
यह सवाल भी उठते हैं कि क्या खाड़ी देश बड़े डेटा हब के आस-पास क्लाउड सुरक्षा रणनीतियों को बेहतर बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे?
और क्या उन्हें जोखिम के ज़्यादा सख़्त आकलन और शायद धीमे विदेशी निवेश का सामना करना पड़ेगा.
एक और जोखिम यह है कि ईरान की ओर से अमेरिकी टेक कंपनियों को "वैध सैन्य टारगेट" बताने से जंग में डिज़िटल इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर रणनीतिक ठिकाने के तौर पर हमले को औपचारिक रूप मिल सकता है. चाहे ऐसे ठिकाने आम लोगों की सेवा से जुड़े हों या सैन्य मक़सद के लिए हों.
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान के ये कदम एक ऐसी मिसाल कायम करते हैं जिसकी नकल भविष्य के संघर्षों में दूसरे देश भी कर सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































