दिल्ली को पूरा देश न समझे 'आप'

अरविंद केजरीवाल
    • Author, श्रवण गर्ग
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

अरविंद केजरीवाल के बेंगलुरू से स्‍वस्‍थ होकर वापस दिल्‍ली लौटने के साथ ही आम आदमी पार्टी की महत्‍वाकांक्षाओं ने अखिल भारतीय स्‍वरूप प्राप्‍त करने की अंगड़ाइयां लेनी शुरू कर दी है.

इसमें अनुचित भी कुछ नहीं है. एक प्रभावशाली पार्टी के रूप में कांग्रेस के ख़त्म होने की हालत में पहुंच जाने के बाद एक मज़बूत विपक्ष के नाम पर देश में लगभग सन्‍नाटा सा व्‍याप्‍त है.

कोई दल ऐसी स्थिति में नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को उस तरह से चुनौती दे सके, जैसी कि आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली विधानसभा के लिए हुए चुनावों में दी थी.

लेकिन सवाल यह है कि क्‍या 'आप' अपने आपको दिल्‍ली की घोर स्‍थानीयता के उन संस्‍कारों से मुक्‍त कर पाएगी, जो वास्‍तव में उसकी ताक़त और कमज़ोरी दोनों के रूपों में व्‍यक्‍त हो चुके हैं.

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एक समय था, जब केजरीवाल 'आप' को दिल्‍ली तक ही सीमित रखना चाहते थे, लेकिन दिल्‍ली विधानसभा के चुनावों में प्राप्‍त हुई 'अहंकारी' जीत ने पार्टी के स्‍थापित चरित्र को ही बदलकर रख दिया.

अब पार्टी अन्‍य राज्‍यों से भी चुनाव लड़ने का इरादा रखती है.

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के साथ जिस तरह का व्‍यवहार किया गया और उसके कारण अखिल भारतीय स्‍तर पर पार्टी की छवि को क्षति पहुंची, उससे केजरीवाल शायद चिंतित नज़र आते हैं.

हक़ीक़त तो यह है कि 'आप' उन अवसरों को पहले ही गंवा चुकी है, जब वह भ्रष्‍टाचार के ख़िलाफ़ लड़ी गई अपनी लड़ाई के दम पर देश भर में उपजी सहानुभूति को एक बड़े और व्‍यापक संगठन के रूप में बदल सकती थी.

असंतोष

प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल

अपनी-अपनी हथेलियों में मोमबत्तियां थामे हुए देश का युवा वर्ग बड़ी उम्‍मीदों के साथ 'इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन' से उपजी रोशनी की तरफ़ देख रहा था, लेकिन वैसा नहीं हुआ.

भ्रष्‍टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई की कोख से पैदा हुआ एक साफ-सुथरा आंदोलन, अपने ही द्वारा पैदा किए गए विरोधाभासों का शिकार हो गया.

अब मांग की जा रही है कि पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र और फ़ैसलों में पारदर्शिता क़ायम करने की ज़रूरत है.

आम आदमी पार्टी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर एक सशक्‍त विकल्‍प के रूप में उभर सकती है, पर उसके लिए ज़रूरी होगा कि केजरीवाल पहले उसे अपनी 'हिरासत' से आज़ाद करें.

उसे उस तरह की एकाधिकार वाली पार्टी में नहीं तब्‍दील होने दें, जैसी कि स्थिति आज अन्‍य दलों में व्‍याप्‍त है.

केजरीवाल अगर दिल्‍ली से बाहर नहीं निकलने के अपने फ़ैसले को बदलने के लिए तैयार हुए हैं तो उसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पॉलिटिकल अफ़ेयर्स कमेटी (पीएसी) से बाहर करने और ऑडियो टेपों के उजागर होने के बाद पार्टी में जिस तरह के असंतोष का विस्‍फोट हुआ है, वह दिल्‍ली में सरकार चलाने में भी मुश्किलें पैदा कर सकता है.

नुक़सान

योगेंद्र यादव

केजरीवाल किन्‍हीं और संदर्भों में की गई अपनी इस घोषणा को शायद अपनी ही पार्टी में अंजाम देने लगे हैं कि 'हां, मैं अराजकतावादी हूं.'

राहुल गांधी ने मध्‍य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा था कि 'कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है.'

आम आदमी पार्टी को अगर केजरीवाल वास्‍तव में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ले जाना चाहते हैं तो उन्‍हें उसे कांग्रेस की तरह बनने से बचाना होगा.

केजरीवाल

जो लोग कांग्रेस के कमज़ोर होने का इतिहास जानते हैं, उन्‍हें पता है कि वहां भी शीर्ष नेतृत्‍व चाटुकारों से घिरा रहा है और वहां भी 'भूषण' तथा 'यादव' जैसे लोगों को 'नेताओं' से मिलने का समय भी नहीं मिल पाया.

प्रशांत भूषण ने केजरीवाल से एसएमएस के ज़रिए मिलने का समय मांगा था, लेकिन 'आप' के नेता ने स्‍वयं मिलने के बजाए अपने नजदीकी सलाहकारों को उनसे मिलने के लिए रवाना कर दिया.

यह सही है कि दिल्‍ली देश का केंद्र है, पर केजरीवाल अगर देश को भी दिल्‍ली ही समझ लेंगे तो फिर आम आदमी पार्टी सभी जगह अपना नुक़सान कर लेगी.

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