'दुख दर्द की कहानी सुनाने बैठो तो कहते हैं पंजाब बदनाम हो रहा'- ब्लॉग

दिलजीत

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    • Author, मोहम्मद हनीफ़
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

हनी त्रेहान और दिलजीत की फ़िल्म 'सतलुज' रिलीज़ हुई और 48 घंटे में उतर भी गई. जब किसी फ़िल्म को बैन करने की कोशिश होती है, तो उसे देखने का मन करता है. इसलिए मैंने यह फ़िल्म देखी.

फ़िल्म देखकर रोंगटे खड़े हो गए. रोना भी आया. लेकिन एक बात समझ नहीं आई कि सरकार को इस फ़िल्म से एतराज़ आख़िर है क्या?

यह फ़िल्म क़रीब चार साल तक सेंसर बोर्ड में अटकी रही. पहले इसका नाम कुछ और था.

फिर इसका नाम बदलकर 'पंजाब 95' कर दिया गया. उसके बाद इसका नाम 'सतलुज' रखा गया.

फ़िल्म के डायरेक्टर का कहना है कि सेंसर बोर्ड के अधिकारियों ने इसमें 127 कट लगाने को कहा. उन्होंने यह भी कहा कि फ़िल्म से पंजाब पुलिस का नाम हटा दिया जाए.

आखिरकार डायरेक्टर ने यह फ़िल्म एक ओटीटी प्लेटफॉर्म को दे दी. वहां यह क़रीब 48 घंटे तक चली, उसके बाद इसे हटा लिया गया. इसकी कोई वजह भी नहीं बताई गई.

बुल्ले शाह ने अठारहवीं सदी में कहा था कि पंजाब की हालत बहुत बुरी हो गई है. उसके बाद भी पंजाब बुरे दौर से गुज़रता रहा, लेकिन सबसे बुरा दौर 1980 के दशक में आया, जब खालिस्तान समर्थकों ने बगावत कर दी और सरकार ने पंजाब पुलिस को खुली छूट दे दी.

बगावत ख़त्म करने के नाम पर लोगों को चुन-चुनकर मारा गया. उन्हें गायब कर दिया गया और मारने के बाद उनकी लाशें भी परिवारों को नहीं सौंपी गईं. कुछ शव जला दिए गए, तो कुछ नदियों में फेंक दिए गए.

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जब बड़ी आग लगती है, तो उसमें गीली और सूखी लकड़ी में कोई फ़र्क नहीं रह जाता. उस दौर में कई पुलिसकर्मी भी मारे गए.

इसी दौरान जसवंत सिंह खालड़ा ने लापता लोगों के परिवारों के साथ मिलकर काम किया और सरकार से हिसाब मांगा. आख़िरकार उनका भी अपहरण कर लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई.

उनकी लाश आज तक नहीं मिली. हालांकि, उनके परिवार को किसी हद तक इंसाफ़ मिला और इस मामले में दोषी ठहराए गए पाँच पुलिसकर्मियों को सज़ा हुई.

उस फ़िल्म की बस यही कहानी है. न तो इसमें भारत की पॉलिटिक्स को कोई चैलेंज किया गया है, न ही सरकार को. यह थोड़े उदास लहजे में बनी फ़िल्म है. जिसमें किसी ने पंजाब में आए बुरे वक़्त को याद करके, पुराने ज़ख्मों को याद करके , वह दुख भरा गीत बनाया हो.

पंजाब में आजकल ज़्यादातर शांति है. फ़िल्म देखकर न ही किसी ने खालिस्तान का नारा लगाना था और न ही पंजाब पुलिस पर इसका कोई फ़र्क पड़ना था.

लेकिन फिर भी, कहीं न कहीं कोई नेता या बाबू , पंजाब की इज्ज़त का रखवाला बनकर बैठा है जो चाहता है कि लोग अपना दुख-दर्द स्क्रीन पर न देखें.

इस तरह का रखवाला पंजाब के हर घर में मौजूद हैं. फ़िल्म में जब जसवंत की पंजाब सरकार नहीं सुनती तो वह कनाडा जाकर गुहार लगाता है. फ़िल्म में एक बुज़ुर्ग नेता उसे प्यार से समझाता है कि घर की बातें बाहर जाकर नहीं करनी चाहिए.

"पूरी दुनिया जानती है यह बात अब छुपानी किससे है ?"

सतलुज का पोस्टर

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पंजाबियों ने खुद को ऐसा बनाया है या दुनिया ने उन्हें ऐसा बना दिया है कि उन्हें यही कहा जाता है कि नाचो-गाओ, हंसो- हंसाओ.

अगर कोई दुख -दर्द वाली बात है तो उसे गानों में डाल दिया करो, टप्पों में डाल दिया करो, या घर पर बैठकर शिव कुमार बटालवी के गाने सुन लिया करो.

अब सतलुज के हीरो हैं दिलजीत दोसांझ. वे दुनिया के बड़े रॉकस्टार हैं. उनका एक वर्ल्ड टूर अभी ख़त्म नहीं होता कि दूसरे के टिकट खुल जाते हैं और मिनटों में बिक जाते हैं.

न्यूयॉर्क से लेकर चंडीगढ़ तक, वह स्टेडियम भर रहा है और जब यही दिलजीत दोसांझ जसवंत बनकर उसका रोल करते हुए गुहार लगाते हैं तो हम उन्हें 48 घंटे भी बर्दाश्त नहीं कर पाते.

और भी पंजाबी फ़िल्में बन रही हैं, वे बहुत अच्छा बिज़नेस कर रही हैं. कैरी ऑन जट्टा का चौथा सीक्वल है. दिलजीत की फ़िल्म जट्ट एंड जूलियट के सीक्वल भी बने हैं. ये बहुत शानदार हंसने - हंसाने वाली फिल्में हैं. बनती रहें, लोग देखते रहें.

लेकिन अगर अपने दुख-दर्द की कहानी सुनाने बैठते हैं, तो कहते हैं कि अब पंजाब बदनाम हो रहा है. भाइयों, मरने वाले भी पंजाबी हैं और मारने वाले भी ज़्यादातर पंजाबी. पूरी दुनिया जानती है यह बात अब छुपानी किससे है.

शिव कुमार बटालवी ने भी कहा था , "आंखों नी माये इहनूं रोवे बुल चिथके , जग किते सुन न लावे."

लेकिन याद रखना कि शिव ने यह गुहार भी लगाई थी- "अधी- अधी रातीं माये रोन मोए मित्रां नु साणु नींद न पवे."

रब्ब राखा

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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