सुप्रीम कोर्ट में अपशब्द कहने और काग़ज़ लहराने वाले शख़्स समेत दो गिरफ़्तार, परिवार क्या कह रहा है?

इमेज स्रोत, ANI
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कथित तौर पर शांति भंग करने और मुख्य न्यायाधीश को अपशब्द कहने की घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने लखनऊ यूनिवर्सिटी के दो छात्रों को गिरफ़्तार किया है.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़, इनकी पहचान 24 वर्षीय प्रबल प्रताप और 23 साल के चंद्रभान के रूप में हुई है. प्रबल एलएलबी थर्ड ईयर और चंद्रभान सेकंड ईयर के स्टूडेंट हैं.
दोनों के ख़िलाफ़ दिल्ली के तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज की गई है. एफ़आईआर की प्रति और अन्य जानकारियों के लिए जब बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने थाने के एसएचओ ब्रिजेश कुमार से संपर्क किया तो उन्होंने इस संबंध में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया.
एसएचओ ने कहा, ''यह बेहद संवेदनशील मामला है. इस पर हम फ़िलहाल कुछ भी नहीं कह सकते. एफ़आईआर का विवरण भी साझा नहीं किया जा सकता.''
उधर, परिवार का भी आरोप है कि पुलिस ने उन्हें अब तक एफ़आईआर की प्रति उपलब्ध नहीं कराई है और सुप्रीम कोर्ट की घटना के बाद से प्रबल प्रताप पुलिस की हिरासत में हैं.
परिवार के मुताबिक़, सोमवार को उनकी प्रबल से कुछ देर के लिए बात हुई थी, लेकिन उसके बाद पुलिस ने यह नहीं बताया कि उन्हें कहां रखा गया है. परिवार का आरोप है कि पुलिस इस मामले में सहयोग नहीं कर रही है.
क्या है पूरा मामला?

इमेज स्रोत, Prabal Pratap Family
दरअसल, पूरा वाक़या बीती 10 जुलाई की तारीख़ का है. लाइव लॉ के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और लखनऊ विश्वविद्यालय के एलएलबी छात्र प्रबल प्रताप ने कथित तौर पर मुख्य न्यायधीश के ख़िलाफ़ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया.
उन्होंने केस से जुड़े पेपर उछाले और कार्यवाही बाधित की. आरोप है कि सुरक्षाकर्मियों के रोकने पर उन्होंने धक्का-मुक्की भी की.
लाइव लॉ ने दिल्ली पुलिस के हवाले से लिखा है, ''10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में हुई घटना के संबंध में सुरक्षाकर्मियों की शिकायत पर तिलक मार्ग थाने में एफ़आईआर दर्ज की गई. यह घटना जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच के सामने प्रबल प्रताप सिंह की याचिका की सुनवाई के दौरान हुई.''
हालांकि, इस घटना के बाद बेंच ने कहा था कि वह समझते हैं कि याचिकाकर्ता की मनोस्थिति ठीक नहीं रही होगी और वह उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं करने जा रहे.
याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के अप्रैल 2026 के एक फ़ैसले को चुनौती दी थी.
उस केस के बारे में अदालत ने कहा, "उस फ़ैसले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं."
इसके साथ ही अदालत ने अपील ख़ारिज कर दी थी.
परिवार का क्या कहना है?

इमेज स्रोत, ANI
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
प्रबल प्रताप के चचेरे भाई सचिन यादव का कहना है कि प्रबल पढ़ाई के साथ लखनऊ की एक सॉफ़्टवेयर कंपनी में काम करते थे.
उनके मुताबिक़, कंपनी ने प्रबल और उनके ज़रिए नौकरी के लिए आए कुछ अन्य युवाओं से सिक्योरिटी मनी ली, लेकिन न तो उन्हें नौकरी दी और न ही पैसे लौटाए. सचिन का आरोप है कि कंपनी ने प्रबल की तीन महीने की तनख़्वाह भी रोक ली और उन्हें नौकरी से निकाल दिया.
सचिन के मुताबिक़, प्रबल ने कंपनी के ख़िलाफ़ विकास नगर थाने में शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने अदालत का रुख़ किया.
निचली अदालत और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश देने से इनकार किया और शिकायत दर्ज कराने का विकल्प बताया.
परिवार का कहना है कि लगातार क़ानूनी कोशिशों के बावजूद राहत नहीं मिलने से प्रबल मानसिक रूप से काफ़ी परेशान थे.
सचिन का कहना है, "इसी निराशा में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान प्रबल ने जजों को 'माई लॉर्ड' की जगह 'ज्यूडिशियल सर्वेंट' कह कर संबोधित किया और बाद में मुख्य न्यायाधीश के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया."
उनका दावा है कि उस दिन अदालत ने प्रबल के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करने की बात कही थी, लेकिन बाद में पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
परिवार का आरोप है कि उन्हें अब तक यह भी नहीं बताया गया है कि प्रबल को कहां रखा गया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



























