पश्चिम बंगाल में ममता की हार से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष कितना हुआ कमज़ोर

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए बड़ा झटका हैं.
जो पार्टी पिछले चुनावों में 215 सीटों पर जीतकर आई थी, वह इस बार 100 सीटें भी नहीं जीत पाई है.
ममता बनर्जी केंद्र में सत्ता पर काबिज़ बीजेपी के विरोधियों के बीच इतना बड़ा चेहरा थीं कि उनके समर्थन में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव भी खड़े दिखे और बिहार में आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव भी.
लेकिन कई विपक्षी नेताओं के समर्थन के बाद भी ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने में नाकाम रही हैं.
यह न केवल एक अहम विपक्षी पार्टी के लिए झटका है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों के प्रभाव पर भी पड़ सकता है.
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी के ख़िलाफ़ बने 'इंडिया ब्लॉक' के बड़े चेहरे के तौर पर भी ममता बनर्जी को देखा जा रहा था,
उन्होंने ही लालू प्रसाद यादव और उस समय विपक्षी गुट में रहे नीतीश कुमार को विपक्षी गठबंधन की पहली बैठक पटना में करने की सलाह दी थी.
यह ऐसी सलाह थी, जो मानी भी गई और इंडिया ब्लॉक की पहली बैठक पटना में हुई थी.
इस कहानी में हम जानने की कोशिश करेंगे कि विधानसभा चुनावों में हार से ममता बनर्जी के सियासी क़द को लगे झटके का राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की सियासत पर क्या असर पड़ सकता है.
'विपक्ष कमज़ोर हुआ है'

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तृणमूल कांग्रेस केंद्र में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है. साल 2024 के लोकसभा में विपक्षी दलों में उससे ज़्यादा सीटें केवल कांग्रेस (99) और एसपी (37) ने जीती थीं.
टीएमसी को उन चुनावों में पश्चिम बंगाल की 42 में से 29 सीटों पर जीत मिली थी.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "इस जीत के साथ ही बीजेपी अब पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर सेंधमारी की कोशिश करेगी. ममता बनर्जी एक बड़ी नेता हैं और उनकी पार्टी की हार विपक्ष को कमज़ोर करेगी. इससे बीजेपी ताक़तवर हुई है."
"विपक्षी दलों में एकता नहीं है यह स्पष्ट तौर पर दिखा. एसआईआर को विपक्षी दलों ने ममता बनर्जी का सिरदर्द समझ लिया. ये सारे दल वैचारिक तौर पर अलग-अलग हैं, जबकि बीजेपी जो दक्षिणपंथी राजनीति करती है, उसका अब कोई विकल्प नहीं बचा है."
विपक्षी दलों के लिहाज से बात करें तो इन चुनावों में केवल कांग्रेस थोड़े फ़ायदे में रही है.
केरल में कांग्रेस के गठबंधन यूडीएफ़ ने सत्ता में वापसी कर ली है, हालाँकि असम में उसे फिर से हार का सामना करना पड़ा है.
जबकि तमिलनाडु में बीजेपी के विरोध में खड़े डीएमके नेता एमके स्टालिन की हार हुई है.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "कुल मिलाकर विपक्ष कमज़ोर हुआ है. विपक्ष के सारे बड़े नेता हार गए हैं. इसका एक असर यह होगा कि विपक्षी नेताओं ने बीजेपी का ज़्यादा विरोध किया और दबाव बनाने की कोशिश की, तो उनकी फ़ाइलें खोली जाएँगी. इनमें ममता बनर्जी और एमके स्टालिन दोनों ही शामिल हैं."
बीजेपी नेताओं ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी और उनकी पार्टी पर कथित तौर पर बांग्लादेशी नागरिकों को शरण देने और भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए थे.
तमिलनाडु में भी बीजेपी और डीएमके के बीच कभी हिन्दी तो कभी सनातन के नाम पर विवाद होता रहा है.
बिना विपक्ष की राजनीति

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बीते कुछ साल में कई राज्यों में सत्ता गँवाने के बाद विपक्षी दल केंद्र के स्तर पर कमज़ोर हुए हैं.
हाल के वर्षों में बीजेपी ने क़रीब तीन दशक बाद दिल्ली में सत्ता में वापसी की है. जबकि कुछ ही दिन पहले बिहार में पहली बार सम्राट चौधरी के तौर पर बीजेपी को अपना पहला मुख्यमंत्री मिला है.
बीजेपी के पास अब उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, असम जैसे कई राज्यों में सरकार है.
इसके साथ ही बिहार जैसे कुछ राज्यों में उसकी गठबंधन सरकार भी है.
पश्चिम बंगाल में जीत ने बीजेपी के लिए नया दरवाज़ा खोल दिया है. अब बीजेपी उन राज्यों में भी अपनी सरकार बनाने के लिए पूरे मनोबल के साथ आगे बढ़ सकती है, जहाँ उसे कमज़ोर माना जाता है.
एएन सिन्हा इंंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ (पटना) के पूर्व निदेशक और राजनीतिक विश्लेषक डीएम दिवाकर कहते हैं, "बीजेपी को बिना विपक्ष की राजनीति चाहिए. इस जीत से उसका मनोबल बढ़ेगा. इस हार के बाद विपक्ष को ख़ुद पर फिर से विचार करना होगा. संसदीय राजनीति में अवसरवाद इतना हावी है कि सब अपने बारे में सोचते हैं."
"विपक्ष या क्षेत्रीय दल टुकड़ों में बँट चुके हैं. लगता है कि पश्चिम बंगाल में जिस तरह से बीजेपी की जीत हुई है, उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही होगा. अब राजनीति बीजेपी बनाम छोटे-छोटे दलों की बची हुई है. यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही दुखद है."
रशीद किदवई कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में वाम दल, एआईएमआईएम, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस थे, जिनमें कथित धर्मनिरपेक्ष वोट बँट जाता है, जबकि बीजेपी बहुसंख्यकों की राजनीति करती है और उसका वोट किसी पार्टी में नहीं बँटता है."
"विपक्ष के आगे बढ़ने में एक समस्या यह भी है कि उसकी एकता या रणनीति केवल काग़ज़ों पर बनती है. अगर कांग्रेस ने तमिलनाडु में विजय की पार्टी से समझौता कर लिया होता, तो उसके लिए बड़ा फ़ायदेमंद होता, लेकिन पी चिदंबरम ने मना किया तो कांग्रेस साथ नहीं गई."
विपक्ष के सामने क्या हैं रास्ते?

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23 जून, 2023 को पटना में साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी का मुक़ाबला करने के लिए विपक्षी दलों की बैठक हुई थी.
पटना की मीटिंग में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी के लालू प्रसाद यादव के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती समेत कई नेता शामिल हुए थे.
इस बैठक के कुछ ही महीने बाद ही नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव से पहले ही विपक्षी गुट का साथ छोड़ दिया और बीजेपी से हाथ मिला लिया.
यह विपक्षी गठबंधन के लिए पहला बड़ा झटका था.
इसके बाद बाक़ी के विपक्षी दलों के बीच भी लोकसभा चुनाव में पूरी एकता नहीं देखी गई. दिल्ली से लेकर पंजाब और पश्चिम बंगाल से लेकर बिहार तक इस एकता में दरार देखने को मिली.
डीएम दिवाकर कहते हैं, "पश्चिम बंगाल की हार से विपक्ष का मनोबल टूटेगा. लेकिन विपक्ष अगर सकारात्मक हो जाए और बिहार में हार के बाद जिस तरह निष्क्रिय होकर बैठ गया, वैसा न करे तो उसके लिए बेहतर होगा."
"ममता बनर्जी के मामले में एंटी इंकम्बेंसी थी और बीजेपी जिस तरह से आक्रामक थी तो यह दिख रहा है कि उन्हें ताक़त के ज़रिए हराया गया है. इसमें एसआईआर कराना भी शामिल है. चुनाव आयोग का काम है कि वह चुनावों में लोगों की भागीदारी बढ़ाए, लेकिन वह घटाने में लगा है. यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है."
विपक्ष के सामने एक बड़ी समस्या यह है कि जब राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बिहार में वोट अधिकार रैली कर रहे थे, तब इसमें ममता बनर्जी शामिल नहीं हुईं, और जब पश्चिम बंगाल में एसआईआर हो रहा था तब भी विपक्षी दलों ने पूरी ताक़त से इस मुद्दे पर उनका साथ नहीं दिया.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "ममता बनर्जी की इस हार के बाद विपक्ष के सामने रास्ता यही है कि वो कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करे और कांग्रेस भी बड़ा दिल दिखाए. अगर ऐसा हो जाता है तो विपक्ष आगे बढ़ पाएगा. यह समय न केवल विपक्षी दलों के लिए अहम है, बल्कि बीजेपी के लिए भी अहम है कि अब विपक्ष की क्या रणनीति रहती है."
वहीं, रशीद किदवई का मानना है, "बीजेपी अगर हारती है तो उसी दिन से अगली तैयारी में लग जाती है, जबकि विपक्ष हार के बाद उदासीन होकर बैठ जाता है, जैसे बिहार में हार के बाद विपक्ष उदासीन होकर बैठ गया, उन्हें वहाँ जनता के मुद्दों से कोई मतलब नहीं दिखता."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित




































