'सतलुज': जसवंत सिंह खालड़ा के क़ातिलों को उनकी पत्नी परमजीत कौर ने कैसे दिलाई सज़ा?

इमेज स्रोत, BBC/FBkhalramission
- Author, राहुल काला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
दिलजीत दोसांझ की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी-5 से हटा दिया गया है.
पहले इस फ़िल्म का नाम 'पंजाब 95' था जिसे बदलकर 'सतलुज' रखा गया था. इसे ज़ी-5 पर 3 जुलाई को रिलीज़ किया गया था. लेकिन दो दिन बाद ही 5 जुलाई को फ़िल्म को भारत में ज़ी-5 से हटा दिया गया.
यह फ़िल्म पंजाब के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है. दिलजीत दोसांझ ने इस फ़िल्म में खालड़ा का मुख्य किरदार निभाया है.
जसवंत सिंह खालड़ा ने 1980 और 1990 के दशक के अंत में पंजाब में हज़ारों अज्ञात शवों के कथित ग़ैर-क़ानूनी अंतिम संस्कार किए जाने के मामले को उजागर किया था जिनके पीछे पंजाब पुलिस का हाथ था.
इसके बाद 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा ख़ुद भी रहस्यमय हालात में लापता हो गए थे. उनके लापता होने के बाद उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने उनके लिए इंसाफ़ की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और दोषियों को सज़ाएँ दिलवाई थीं.
परमजीत कौर ने अदालतों, मानवाधिकार संस्थाओं और सार्वजनिक मंचों पर इस मामले को लगातार उठाया.
उनकी दृढ़ता के कारण ही सीबीआई जाँच हुई. मुकदमा चला और कई पुलिस अधिकारियों को सज़ा हुई.
आगे जानते हैं कि परमजीत कौर खालड़ा कौन हैं और खालड़ा मिशन में उनका क्या योगदान रहा.
परमजीत कौर खालड़ा कौन हैं?

वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
तरनतारन के गाँव खालड़ा की रहने वाली परमजीत कौर खालड़ा इस समय 72 साल की हैं. वर्तमान समय में वह अमेरिका में अपनी बेटी नवकिरन कौर के साथ रह रही हैं. उनका बेटा जनमीत सिंह कनाडा में रहता है.
खालड़ा मिशन के तहत वह आज भी अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों के हक़ में आवाज़ उठाती हैं.
खालड़ा मिशन ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष हरमनदीप सिंह ने बीबीसी पंजाबी से बातचीत में कहा कि परमजीत कौर स्थायी रूप से अमेरिका शिफ़्ट नहीं हुई हैं. वह पंजाब आती रहती हैं. अगले महीने एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पंजाब आ रही हैं.
उन्होंने बताया कि जसवंत सिंह और परमजीत कौर शादी के बाद 1988-89 में अमृतसर चले गए थे, क्योंकि जसवंत सिंह को यहाँ नौकरी मिल गई थी.
हरमनदीप सिंह ने बताया कि परमजीत कौर ने भी बीए तक पढ़ाई की थी. इसके बाद उन्होंने लाइब्रेरियन की डिग्री हासिल की. उन्हें भी गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर में नौकरी मिल गई थी. इसलिए दोनों को अमृतसर जाना पड़ा था.
खालड़ा मिशन कमेटी के चेयरमैन बलविंदर सिंह ने बीबीसी पंजाबी को बताया कि जसवंत सिंह खालड़ा के लापता होने से पहले परमजीत कौर खालड़ा ने कभी भी हमारे मिशन में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी.
वह कहते हैं, "वह गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में बतौर लाइब्रेरियन नौकरी करती थीं. जो भी बैठकें होती थीं, वह जसवंत खालड़ा करते थे. परमजीत कौर अपनी नौकरी और घर के कामों में ही मसरूफ़ रहती थीं."
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
परमजीत कौर खालड़ा का संघर्ष

इमेज स्रोत, BBC/FBkhalramission
पंजाब के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में 1980 और 90 का दशक बहुत ही दर्दनाक और उथल-पुथल भरा रहा है. 1990 के दशक में पंजाब में कथित ग़ैर-क़ानूनी हत्याओं और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का मामला जसवंत सिंह खालड़ा ने उजागर किया था.
जसवंत सिंह खालड़ा के 1995 में लापता होने के बाद परमजीत कौर खालड़ा ने इंसाफ़ के लिए लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ी.
खालड़ा मिशन कमेटी के चेयरमैन बलविंदर सिंह झबाल ने बीबीसी पंजाबी से बातचीत करते हुए बताया कि जब जसवंत सिंह खालड़ा लापता हुए, तो उनके मिशन को आगे बढ़ाने में परमजीत कौर खालड़ा की भी काफ़ी भूमिका रही.
उन्होंने बताया, "जब 6 सितंबर 1995 में जसवंत सिंह खालड़ा लापता हो गए, तो हमारा केस सुप्रीम कोर्ट में चला गया था. दो मामले चल रहे थे. एक लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का और दूसरा जसवंत खालड़ा के लापता होने का."
"फिर परमजीत कौर ने हमारे मिशन में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी. मामलों की सुनवाई के दौरान या गवाही के लिए परमजीत कौर हमारे साथ अदालत जाने लगीं."
बलविंदर सिंह ने बताया कि जसवंत खालड़ा की तलाश के लिए परमजीत कौर ने काफ़ी संघर्ष किया, "जहाँ से भी हमें जसवंत के बारे में ख़बर मिलती, तो खालड़ा मिशन की टीम के साथ परमजीत कौर खालड़ा भी जाती थीं."
"नौकरी के साथ-साथ जसवंत का पता लगाने के लिए घर आने वाले रिश्तेदारों और अन्य लोगों का ख़याल अकेली परमजीत कौर ही रखती थीं."
जसवंत खालड़ा मामले की पैरवी

इमेज स्रोत, FB@khalramission
6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा लापता हो गए थे. 8 सितंबर 1995 को उनके लापता होने का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले की जाँच सौंपी.
1999 से 2000 के बीच सीबीआई ने जाँच पूरी करके चार्जशीट दायर की. इसके बाद मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई.
खालड़ा मिशन कमेटी के चेयरमैन बलविंदर सिंह ने बताया कि परमजीत कौर ने ख़ुद इस मामले की पैरवी की थी. इस दौरान परमजीत और खालड़ा मिशन की टीम को कई चुनौतियों से गुज़रना पड़ा.
"जब बीबी खालड़ा मामले की सुनवाई के लिए जाती थीं, तो कोई उनकी गाड़ी के टायर पंक्चर कर देता था. इस तरह की मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा."
खालड़ा मिशन ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष हरमनदीप सिंह ने कहा कि जसवंत खालड़ा अपहरण मामले के कारण उन पर कई तरह का दबाव डालने की कोशिश की गई. लेकिन परमजीत कौर ने तब तक हार नहीं मानी, जब तक मुलज़िमों को सज़ा नहीं हो गई.
हरमनदीप सिंह ने कहा कि इस मामले की सख़्त पैरवी और गवाहों के कारण साल 2005 में सीबीआई अदालत, पटियाला हाउस कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया और मुलज़िमों को सज़ा दी.
चुनाव लड़ने का मक़सद

इमेज स्रोत, FB@khalramission
बलविंदर सिंह ने बताया कि परमजीत कौर ने अगस्त 1999 में अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था. इस्तीफ़े के बाद परमजीत कौर खालड़ा ने 1999 का लोकसभा चुनाव तरनतारन सीट से लड़ा था.
उन्होंने यह चुनाव सरब हिंद शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार के रूप में लड़ा था. यह पार्टी गुरचरण सिंह टोहड़ा ने बनाई थी. इस चुनाव में परमजीत कौर खालड़ा को जीत नहीं मिली.
बलविंदर सिंह झबाल ने बताया कि परमजीत कौर खालड़ा का चुनाव लड़ने का मुख्य उद्देश्य सिर्फ़ संसद में जाना नहीं था, बल्कि अपने पति जसवंत सिंह खालड़ा के उठाए गए मानवाधिकारों के मुद्दों और पंजाब में कथित ग़ैर-क़ानूनी हत्याओं और लापता हुए लोगों के मामलों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना था.
"यही कारण था कि बाद में 2019 में भी उन्होंने खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. हालांकि, तब भी वह लोकसभा जाने में कामयाब नहीं हो पाईं."
2019 में परमजीत कौर खालड़ा ने पंजाबी एकता पार्टी के टिकट से खडूर साहिब से चुनाव लड़ा था. लेकिन वह यह चुनाव नहीं जीत सकीं.
जब 2019 में बीबीसी पंजाबी से बातचीत के दौरान भी परमजीत कौर खालड़ा ने कहा था कि उनका मक़सद मानवाधिकारों के मुद्दे को लोगों तक पहुँचाना था.
परमजीत कौर ने दावा किया था कि पूरे भारत में लोगों के लापता होने के मामले देखने को मिलते हैं. यह सिर्फ़ पंजाब में ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर, मणिपुर और तमिलनाडु में भी अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है.
बीबीसी पंजाबी के साथ उस समय इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पंजाब में मुद्दों पर चुनाव नहीं लड़े जाते. यानी मुद्दों की राजनीति नहीं हो रही है. उन्होंने किसानों के मुद्दों जैसे कर्ज़ माफ़ी, युवाओं में बेरोज़गारी और नशे के मुद्दों को चुनावों में उठाने की बात कही थी.
हालांकि, खालड़ा मिशन कमेटी ने दावा किया है कि परमजीत कौर खालड़ा अब कोई भी चुनाव नहीं लड़ेंगी. लेकिन बलविंदर सिंह झबाल कहते हैं कि यह सब हालात पर निर्भर करता है. अगर परिस्थितियाँ बनीं, तो परमजीत कौर खालड़ा को वापस चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है.
उन्होंने 2024 में अमृतपाल सिंह के लिए चुनाव प्रचार किया था. इस दौरान वह रोड शो, रैलियों और घर-घर जाकर वोट माँगते हुए नज़र आई थीं.
अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार भारी जीत हासिल की थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

















