पाकिस्तान पर ईरान भरोसा क्यों करता है?

ईरान-पकिस्तान
इमेज कैप्शन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने 16 अप्रैल, 2026 को ईरान की राजधानी तेहरान में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर से मुलाक़ात की थी
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सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों ने सोमवार को तेहरान में ईरानी नेताओं से मुलाक़ात की.

इसका मक़सद तनाव कम करना और बातचीत को फिर से शुरू करना है. ईरान पर एक बार फिर से अमेरिका और इसराइल के हमले का ख़तरा मंडरा रहा है.

सऊदी अरब के रक्षा मंत्री ख़ालिद बिन सलमान, पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर और तुर्की की ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कालिन ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के साथ बातचीत की.

ये बैठकें अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन से क़रीब एक सप्ताह पहले हो रही हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार संकेत दिया है कि कई महीनों से जारी गतिरोध के बाद वह ईरान पर फिर से बमबारी शुरू कर सकते हैं.

युद्ध की आशंकाओं के कारण ही कच्चे तेल की क़ीमत 117 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई है.

ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरआईबी न्यूज़ के मुताबिक, बैठक में ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियान ने कहा, "ईरान क्षेत्रीय सहयोग को गहरा करने, मतभेदों को सुलझाने और इस्लामी देशों की साझा क्षमताओं का इस्तेमाल करने की दिशा में क़दम उठाने के लिए तैयार है."

ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले के बाद शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में पाकिस्तान अहम मध्यस्थ के तौर पर उभरा है.

वह भी तब, जब पाकिस्तान पर ईरान के अविश्वास के कई कारण हैं. सऊदी और अमेरिका पर ईरान के अविश्वास का अतीत अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान बनने के बाद से ही अमेरिका और सऊदी का क़रीबी सहयोगी रहा है.

इसके बावजूद ईरान पाकिस्तान की मध्यस्थता को स्वीकार कर रहा है और सार्वजनिक रूप से कोई अविश्वास भी नहीं है.

अमेरिका-पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (बीच में) 11 अप्रैल, 2026 को पाकिस्तान के इस्लामाबाद पहुँचने के बाद पाकिस्तान के चीफ़ ऑफ डिफेंस फोर्सेज और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर (बाएं) के साथ पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद इसहाक़ डार

पाकिस्तान को तीनों की ज़रूरत

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दरअसल पाकिस्तान को तीनों देशों की ज़रूरत है और उसकी कोशिश रहती है कि किसी के भी मामले में रेड लाइन को क्रॉस नहीं किया जाए.

सऊदी अरब आर्थिक मदद और लाखों पाकिस्तानी कामगारों के लिए रोज़गार मुहैया कराता है.

अमेरिका अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ और अन्य अंतरराष्ट्रीय क़र्ज़दाताओं तक पहुँच सुलभ कराता है.

वहीं ईरान के साथ पाकिस्तान की साझी सीमा है, ऐसे में बलूचिस्तान में सुरक्षा सहयोग के लिए बहुत ज़रूरी है.

ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भी पाकिस्तान ईरान पर बहुत हद तक निर्भर है. ईरान से पिछले हफ़्ते व्यापार बंद हुआ तो पाकिस्तान में एक एलपीजी सिलिंडर 4500 रुपए का हो गया.

पाकिस्तान के अपने चार पड़ोसी देशों में से तीन (ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और भारत) के साथ व्यापार पहले से ही बाधित है. अगर ईरान भी पाकिस्तान का विरोधी बन जाता है, तो देश लगभग हर तरफ़ से घिर जाएगा.

पाकिस्तान की क़रीब 15–20 फ़ीसदी आबादी शिया मुसलमानों की है. ईरान के बाहर शिया आबादी वाले सबसे बड़े देशों में पाकिस्तान भी शामिल है. कई शिया मुसलमानों के लिए ईरान एक आध्यात्मिक केंद्र है, जहाँ हर साल हज़ारों जायरीन तीर्थयात्रा के लिए जाते हैं.

कई विशेषज्ञों का मानना है कि किसी एक पक्ष का साथ देने से देश में विभाजन हो सकता है.

1980 और 1990 के दशक में सुन्नी संगठनों को सऊदी अरब से और शिया संगठनों को ईरान से मिलने वाली आर्थिक मदद ने पाकिस्तान को दोनों देशों की प्रतिद्वंद्विता का मैदान बना दिया था.

ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या के बाद पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन हुए थे. इसलिए, ईरान के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना पाकिस्तान में घरेलू शांति कायम रखने की रणनीति का भी हिस्सा है.

पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान और ईरान के संबंधों में अमेरिका को अहम कारक माना जाता है

पाकिस्तान यह संतुलन कैसे बनाए रखता है?

सऊदी अरब की रक्षा करना, लेकिन ईरान पर हमला नहीं करना. पाकिस्तान सऊदी अरब की सुरक्षा कर रहा है, लेकिन उसने ईरान के ख़िलाफ़ आक्रामक सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया है.

2015 में पाकिस्तान की संसद ने यमन युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया था, हालांकि सऊदी अरब के क्षेत्र की रक्षा करने का वादा किया था.

इसराइल के थिंक टैंक आईएनएसस के विश्लेषकों का कहना है कि यह दोहरी भूमिका तभी कारगर है, जब सैन्य तैनाती पूरी तरह रक्षात्मक, समयबद्ध और स्पष्ट रूप से सीमित रहे.

पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इसहाक़ डार का कहना है कि पाकिस्तान ने ईरान को सऊदी के साथ अपने रक्षा समझौते की याद दिलाई.

उनके मुताबिक, इससे ईरान की ओर से सऊदी अरब और ओमान के ख़िलाफ़ सीमित प्रतिक्रिया देने में मदद मिली. इस तरह रियाद के साथ पाकिस्तान के संबंध तनाव बढ़ने से रोकने का एक माध्यम बन गए.

पाकिस्तान ईरान और खाड़ी देशों, दोनों पर होने वाले हमलों की निंदा करता है और बातचीत की अपील करता है. इससे वह अपने सुन्नी और शिया नागरिकों, दोनों को संबोधित कर पाता है.

तीनों देश पाकिस्तान की इस भूमिका को क्यों स्वीकार करते हैं?

अमेरिका को ऐसे मध्यस्थ की ज़रूरत है, जिससे ईरान वास्तव में बातचीत करने को तैयार हो.

सऊदी अरब को पाकिस्तानी सैनिकों का सहयोग और बिना तेहरान से सीधे बातचीत किए ईरान के साथ संपर्क का एक माध्यम मिलता है.

ईरान दुनिया के ज़्यादातर देशों से अलग-थलग है और उसके पास विकल्प सीमित हैं. इसके बावजूद ईरान का विदेश मंत्रालय पाकिस्तान को अब भी एक महत्वपूर्ण साझेदार बताता है.

पाकिस्तान वह बिंदु है, जहाँ इन तीनों देशों के हितों का मेल होता है. इससे उसे कूटनीतिक प्रभाव हासिल होता है.

ईरान-पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर (बाएं) ने 16 अप्रैल, 2026 को ईरान की राजधानी तेहरान में ईरान के शीर्ष वार्ताकार और संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ (दाएं) से मुलाक़ात की थी

यह संतुलन कहाँ टूट सकता है?

विश्लेषकों को संदेह है कि पाकिस्तान वास्तव में तटस्थ रह सकता है. ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स का तर्क है कि सऊदी अरब, चीन और खाड़ी देशों से मिलने वाली आर्थिक मदद के साथ उसके संबंध वास्तविक तटस्थता को "संरचनात्मक रूप से असंभव" बनाते हैं.

कहा जाता है कि जितनी अधिक प्रतिबद्धताएं, उतनी मुश्किल स्थिति. हर नई सुरक्षा प्रतिबद्धता से यह जोखिम बढ़ता है कि पाकिस्तान को किसी एक पक्ष को चुनने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

द फ्राइडे टाइम्स भी यही तर्क देता है कि खाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तान की भूमिका जितनी अधिक सक्रिय सैन्य भूमिका में बदलेगी, तेहरान को भरोसा दिलाना उतना ही कठिन होगा.

दबाव के संकेत पहले से दिख रहे हैं. ईरान के सांसद अब पाकिस्तान को हस्तक्षेपकर्ता कह रहे हैं. सीमा बंद होने और एलपीजी की आपूर्ति रोके जाने की घटनाएं भी इसी दिशा में इशारा करती हैं.

पाकिस्तान पूरी तरह तटस्थ नहीं है. उसका झुकाव सऊदी और अमेरिका की ओर है, लेकिन वह ईरान के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध बनाने से बचता है.

यह संतुलन इसलिए बना हुआ है क्योंकि फ़िलहाल तीनों पक्षों को पाकिस्तान के इस संतुलन से ज़्यादा लाभ मिलता है, बजाय इसके कि वे उसे किसी एक पक्ष को चुनने के लिए मजबूर करें.

ईरान का पाकिस्तान पर भरोसा समय के साथ बढ़ता और घटता रहा है. शाह के शासनकाल में दोनों देशों के संबंध क़रीबी थे.

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान का रुख़ सतर्क और व्यावहारिक हो गया. हाल के वर्षों में ईरान ने पाकिस्तान के प्रति एकजुटता भी दिखाई है और संदेह भी जताया है.

दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे कुछ सहयोग की मिसाल इस भरोसे का आधार हैं, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान, सऊदी अरब और बलूच आबादी वाले साझा सीमावर्ती क्षेत्र से जुड़े मुद्दे इसे लगातार कमज़ोर करते रहे हैं.

पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी (मेज़ के सबसे दूर वाले छोर पर) पाकिस्तान के राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्ज़ा (मेज़ के शीर्ष छोर पर), मिर्ज़ा के दाईं ओर तुर्की के प्रधानमंत्री अदनान मेंडेरेस बैठे हैं. शाह के दाईं ओर इराक़ के नूरी सईद बैठे हैं, जबकि शाह के बाईं ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एच. एस. सुहरावर्दी बैठे हैं

1947–1979: शाह के शासनकाल में क़रीबी सहयोगी

ईरान 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान को मान्यता देने वाला शुरुआती देश था. मार्च 1950 में शाह पाकिस्तान की आधिकारिक यात्रा करने वाले पहले राष्ट्राध्यक्ष बने. दोनों देशों ने 1950 में मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए.

शीत युद्ध के दौरान एक ग़ैर-अरब मुस्लिम देश के रूप में पाकिस्तान कम्युनिस्ट गुट के विरोध में था. इस वजह से वह शाह के नेतृत्व वाले ईरान का स्वाभाविक साझेदार बना. दोनों देश 1955 में सेंटो और 1964 में क्षेत्रीय सहयोग संगठन आरसीडी के सदस्य थे.

भारत से युद्ध के दौरान 1965 में ईरान ने पाकिस्तान को नर्सें, मेडिकल सामग्री और 5,000 टन पेट्रोलियम भेजा था.

कहा जाता है कि पाकिस्तानी विमानों ने ईरान के सैन्य ठिकानों का भी इस्तेमाल किया. एक स्कॉलर के मुताबिक, 1971 में शाह ने पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार पहुंचाने के लिए अमेरिकी क़ानून का उल्लंघन किया था.

बताया जाता है कि 1971 के बाद शुरू हुए बलूच विद्रोह को दबाने में ईरान ने मदद की थी. बलूच जातीय समुदाय के लोग दोनों देशों की सीमा के आर-पार रहते हैं और उनसे जुड़ी सुरक्षा संबंधी चिंताएं आज भी दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करती हैं.

पाकिस्तान ने 1971 में खाड़ी क्षेत्र के टुनब द्वीपों और अबू मूसा पर ईरान के क़ब्ज़े का समर्थन किया था.

1979–2001: क्रांति और संबंधों में बढ़ती दूरी

पाकिस्तान इस्लामी रिपब्लिक ऑफ ईरान को मान्यता देने वाला पहला देश था. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बाद पाकिस्तान अपने हितों के कारण सऊदी अरब के क़रीब चला गया.

अमेरिका तक ईरान की पहुँच, यह दोनों देशों के बीच भरोसे का सबसे महत्वपूर्ण आधार है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मार्च 1992 से ईरान का राजनयिक कार्यालय अमेरिका में पाकिस्तान के दूतावास के भीतर काम कर रहा है. उस समय पाकिस्तान ने अल्जीरिया से यह ज़िम्मेदारी संभाली थी. अमेरिका में ईरान की यही एकमात्र आधिकारिक मौजूदगी है.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम में पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों की मदद के पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण हैं. इसका संबंध ए. क्यू. ख़ान नेटवर्क से है.

1990 के दशक में पाकिस्तान ने सुन्नी तालिबान का समर्थन किया, जबकि ईरान तालिबान विरोधी नॉर्दर्न अलायंस के साथ था. दोनों देशों के संबंधों में सबसे ख़राब दौर 1998 में आया, जब मज़ार-ए-शरीफ़ में ईरानी राजनयिकों की हत्या कर दी गई. पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक हिंसा ने भी ईरान के संदेह को बढ़ाया.

पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के लिए तीनों देशों के साथ संबंधों में संतुलन बनाना कई बार चुनौती भरा भी रहा है

संबंधों का पैटर्न

अप्रैल 2015 में पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से सऊदी अरब के नेतृत्व वाले यमन युद्ध में तटस्थ रहने का फ़ैसला किया.

यह निर्णय ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ की इस्लामाबाद यात्रा के एक दिन बाद आया था.

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पाकिस्तान पर खाड़ी देशों के बजाय ईरान का पक्ष चुनने का आरोप लगाया. ईरान इस फ़ैसले को याद रखता है.

ईरान लंबे समय से पाकिस्तान पर जैश अल-अदल के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाता रहा है. जैश अल-अदल बलूच सुन्नी उग्रवादी संगठन है.

ईरान का कहना रहा है कि उसने पाकिस्तान के साथ इस संगठन के ठिकानों की जानकारी साझा की, लेकिन इसके बावजूद पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई.

ईरान ने बलूचिस्तान में उन ठिकानों पर हमला किया, जिन्हें उसने जैश अल-अदल के ठिकाने बताया था.

इसके दो दिन बाद पाकिस्तान ने ईरान के भीतर जवाबी हमले किए. यह पहली बार था, जब पाकिस्तान ने ईरान की सीमा के अंदर सैन्य कार्रवाई की. दोनों देशों ने जल्द ही तनाव कम किया और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई.

2025–2026: एकजुटता, फिर संदेह

जून 2025 में पाकिस्तान ने इसराइल के हमले की निंदा की और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत ईरान के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया. इससे 2026 में मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका को तेहरान में विश्वसनीयता मिली.

सऊदी अरब का सवाल फिर उठा. सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा समझौता लागू होने के बाद ईरान के टिप्पणीकारों ने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान अब भी निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है.

ऐसा माना जाता है कि ईरान का पाकिस्तान पर भरोसा तीन प्रमुख बातों पर टिका है-

दोनों देशों का पड़ोसी होना और बलूचिस्तान से जुड़े साझा सुरक्षा हित.

ईरान के लिए अमेरिका तक संपर्क का माध्यम बनने में पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही भूमिका.

ऐसे मौक़े, जब पाकिस्तान ने ईरान के ख़िलाफ़ पक्ष लेने से इनकार किया, जैसे 2015 में यमन युद्ध और 2025 में इसराइली हमलों के दौरान.

जब भी पाकिस्तान सऊदी अरब के क़रीब जाता है, सुन्नी उग्रवादी संगठनों का समर्थन करता है या सीमा पार हमलों को रोकने में नाकाम रहता है, ईरान का भरोसा कमज़ोर होता है.

पिछले 75 वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में यह उतार-चढ़ाव बार-बार देखने को मिला है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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