बांग्लादेश में फिर सड़कों पर उतरे लोग, क्या है वजह?

इमेज स्रोत, SHAMIM-US-SALEHIN / AFP via Getty Images
रविवार को बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग से जुड़े करीब 10 लाख मजदूरों का प्रदर्शन इतना बढ़ गया कि देश की 529 फ़ैक्ट्रियों में काम ठप रहा.
बीबीसी न्यूज़ बांग्ला के मुताबिक, रविवार को देश के लगभग 9 लाख, 87 हज़ार मज़दूरों ने कपड़ा फ़ैक्ट्रियों में काम नहीं किया.
रविवार को बड़ी संख्या में कपड़ा मजदूर सड़कों पर अपनी मांगों को लेकर उतरे मगर इनकी संख्या ज्ञात नहीं है.
इंडस्ट्री मालिकों को आशंका है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो सोमवार को भी उत्पादन प्रभावित हो सकता है.
ये प्रदर्शन राजधानी ढाका के कई इंडस्ट्रियल इलाकों में हो रहे हैं. रविवार को हुए प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़, सड़क जाम और पुलिस के साथ झड़पों की घटनाएं भी सामने आई हैं. पुलिस ने आंसू गैस के गोले भी छोड़े.

इमेज स्रोत, Mamunur Rashid/NurPhoto via Getty Images
साल 2024 में छात्र आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने, अंतरिम सरकार के गठन और फिर आम चुनावों के बाद तारिक रहमान की सरकार के सत्ता में आने तक बांग्लादेश ने एक के बाद एक कई हिंसक प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर देखा है.
ताज़ा प्रदर्शन में कपड़ा फ़ैक्ट्री के मजदूर अपने न्यूनतम मासिक वेतन को 30 हज़ार टका (लगभग 21 हज़ार रुपये) मासिक न्यूनतम वेतन तक बढ़ाने की मांग कर रहे हैं. अभी उनका मौजूदा वेतन 12,500 टका (लगभग 8,800 रुपये) है. यानी वे इसे दोगुना करने की मांग कर रहे हैं.
मज़दूरों का कहना है कि खाने-पीने की चीज़ों, मकान किराए, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत ने उनकी ख़रीदने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है.
उनकी मांग को देखते हुए रविवार को देश के श्रम एवं रोज़गार मंत्री आरिफ़ुल हक़ चौधरी ने रविवार को छह सदस्यीय एक वेतन बोर्ड का गठन किया है और मजदूरों से प्रदर्शन न करने की अपील की है.
कुछ कपड़ा उद्योग के मज़दूरों ने बीबीसी बांग्ला को बताया कि सरकार ने भले ही वेतन बोर्ड का गठन कर दिया हो, लेकिन उनका आंदोलन जारी रहेगा.
उनका कहना है कि जब तक न्यूनतम वेतन की घोषणा नहीं की जाती, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे.
इमरजेंसी बैठक के बाद सरकार ने क्या कहा?

इमेज स्रोत, Angelina Katsanis/Bloomberg via Getty Images
बीबीसी न्यूज़ बांग्ला के मुताबिक़, प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर कपड़ा उद्योग के मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा पर आपात बैठक की है.
रविवार रात सचिवालय में हुई इस बैठक में मंत्रियों और सलाहकारों ने हिस्सा लिया.
बैठक में क़ानून-व्यवस्था एजेंसियों को निर्देश दिया गया कि रेडीमेड कपड़ा उद्योग की फ़ैक्ट्रियों में उत्पादन जारी रखा जाए और लोगों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.
गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद और श्रम एवं रोज़गार मंत्री आरिफ़ुल हक़ चौधरी ने कहा कि बैठक में हिंसा से सख़्ती से निपटने का फ़ैसला लिया गया है.
गृह मंत्री ने कहा कि आंदोलन के दौरान पुलिस पर हमले हुए, वाहनों में तोड़फोड़ की गई और फ़ैक्ट्रियों में आगज़नी की घटनाएं हुईं. उन्होंने बताया कि कालियाकैर में एक झूट गोदाम में भी आग लगा दी गई.
गृह मंत्री ने दावा किया कि 'कुछ नक़ाबपोश लोग आंदोलन में घुसकर अपने हित साधने की कोशिश कर रहे हैं.' उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सीमा पार से उकसावे के ज़रिए देश के निर्यात कारोबार और कपड़ा उद्योग के उत्पादन को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है.
उनके अनुसार, इसका मक़सद देश में अस्थिरता पैदा करना है.
बैठक के बाद श्रम मंत्री आरिफ़ुल हक़ चौधरी ने बीबीसी न्यूज़ बांग्ला से कहा, "यह साफ़ है कि अवामी फ़ासीवाद से जुड़े लोगों ने दिसंबर को ध्यान में रखकर ये गतिविधियां की हैं."
उन्होंने कहा, "इसी वजह से प्रधानमंत्री ने सभी संबंधित पक्षों को सतर्क रहने का निर्देश दिया है, ताकि कपड़ा उद्योग में उत्पादन प्रभावित न हो और देश में अस्थिरता पैदा न की जा सके."
हालांकि इन आरोपों पर आवामी लीग की कोई प्रतिक्रिया ज्ञात नहीं है.
ग़ौरतलब है कि दिसंबर 2025 में बांग्लादेश में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद भयंकर राजनीतिक हिंसा देखने को मिली थी. साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री और भारत में निर्वासन में रह रहीं शेख हसीना के इस दिसंबर में बांग्लादेश लौटने की भी संभावना है.
इन इलाकों में अचानक शुरू हुआ प्रदर्शन

इमेज स्रोत, ABDUL HAMID
बीबीसी न्यूज़ बंग्ला के स्थानीय रिपोर्टों के हवाले से बताया कि बांग्लादेश में 31 अक्तूबर से अचानक ये प्रदर्शन रिपोर्ट होने लगे जो मुख्य रूप से रेडीमेड गारमेंट्स फैक्ट्री से जुड़े हैं.
देश के महत्वपूर्ण औद्योगिक इलाक़ों सावर, अशुलिया, मीरपुर और गाज़ीपुर में रेडीमेड कपड़ा उद्योग के मज़दूर अचानक प्रदर्शन पर उतर आए.
वे 30 हज़ार टका न्यूनतम वेतन तय करने समेत कई मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं.
इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें दर्ज की गई हैं. पुलिस की ओर से आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठियां चलीं. साथ ही पुलिस के वाहनों में आग लगाने की घटनाएं भी हुईं. इन प्रदर्शनों के चलते शुरुआत में तीस फ़ैक्ट्रियों ने अपने यहां काम बंद होने की घोषणा की. रविवार को प्रभावित फ़ैक्ट्रियों की संख्या तेजी से बढ़कर 500 हो गई जहां प्रशासन ने ही एक दिन की छुट्टी घोषित कर दी.
अचानक हुए प्रदर्शन के पीछे उठ रहे सवाल
अचानक बढ़े असंतोष को लेकर बांग्लादेश की राष्ट्रीय मीडिया में सवाल भी उठ रहे हैं. बीबीसी न्यूज़ बंग्ला के मुताबिक़, इन रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि मौजूदा अचानक पैदा हुई अशांति के पीछे सिर्फ़ तात्कालिक मांगें ही नहीं हैं.
उनके अनुसार, मज़दूरी और बाज़ार में बढ़ती क़ीमतों के बीच बढ़ता अंतर और विभिन्न समूहों की ओर से की जा रही उकसावे की कोशिशें भी इसकी वजह हो सकती हैं.
रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि आख़िर मज़दूरों में अचानक यह असंतोष क्यों बढ़ा है.
क्या यह सिर्फ़ वेतन बढ़ाने की मांग है, या इसके पीछे कोई और मक़सद भी काम कर रहा है?
ढाका से प्रकाशित होने वाले बंग्ला समाचार पत्र बोनिक बार्ता के हवाले से बीबीसी न्यूज़ बांग्ला ने बताया है कि क़ानून-व्यवस्था एजेंसियों का कहना है कि ढाका और गाज़ीपुर में हुए हिंसक मज़दूर प्रदर्शनों में प्रतिबंधित अवामी लीग और उससे जुड़े संगठनों के नेता एवं कार्यकर्ता शामिल हैं.
एजेंसियों के अनुसार, प्रतिबंधित छात्र लीग की जगन्नाथ विश्वविद्यालय इकाई के संगठन सचिव सजमुल इस्लाम ने गाज़ीपुर के कालियाकैर में एक जुलूस का नेतृत्व किया था.
इससे जुड़ी तस्वीर सोशल मीडिया पर भी प्रसारित की गई है.
दूसरी ओर, रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री के मालिकों के संगठन बीजीएमईए और बीकेएमईए इस आंदोलन के दौरान हो रहे प्रदर्शनों, झड़पों और हिंसा को पूरी तरह सामान्य नहीं मानते हैं.
इन दोनों संगठनों के नेताओं ने रविवार को विभिन्न फ़ैक्ट्री मालिकों के साथ इस मुद्दे पर बैठक की.
बीकेएमईए के अध्यक्ष मोहम्मद हातेम का मानना है कि तैयार कपड़ा उद्योग में अचानक पैदा हुई अशांति की मुख्य वजह वेतन का मुद्दा नहीं है.
उनके अनुसार, इसके पीछे सरकार के ख़िलाफ़ कोई साज़िश हो सकती है.
उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "इस आंदोलन में असली मज़दूर शामिल नहीं हैं."
"अगर असली मज़दूर इसमें होते, तो यह पहले ही दिन ख़त्म हो जाता."
"इसके पीछे कोई और मक़सद है. सरकार को उस मक़सद का पता लगाना चाहिए."
उन्होंने दावा किया कि यह आंदोलन पिछले कुछ दिनों से चल रहा है.
उनके अनुसार, बाहरी लोग वहां विभिन्न फ़ैक्ट्रियों पर हमले कर रहे हैं.
30 हज़ार टका तक मजदूरी बढ़ाने की मांग कितनी सही
कपड़ा उद्योग के मालिक 30 हज़ार टका न्यूनतम वेतन की मांग को उचित नहीं मानते हैं.
बीकेएमईए के अध्यक्ष ने बीबीसी न्यूज़ बांग्ला से कहा, "2013 से 2023 के बीच तीन चरणों में मज़दूरी बढ़ाई गई है."
उन्होंने कहा, "इसके बाद अगर न्यूनतम वेतन बढ़ाकर 30 हज़ार टका कर दिया जाता है, तो कई फ़ैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी."
उनके अनुसार, कई नियोक्ता इतनी अधिक मज़दूरी देने में सक्षम नहीं होंगे.
बीकेएमईए के अध्यक्ष मोहम्मद हातेम ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "मज़दूर 30 हज़ार टका न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे हैं."
उन्होंने कहा, "सरकार ने इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया है. हम चाहते हैं कि यह बोर्ड सभी पक्षों की बातों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा वेतन तय करे, जिसे वह उचित समझे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.



























