आरक्षण हटाओ आंदोलन: क्या रिज़र्वेशन व्यवस्था पर फिर शुरू हो गई है बहस?

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आरक्षण के ख़िलाफ़ मुहिम अब सोशल मीडिया की बहस से निकलकर सड़कों तक पहुंच चुकी है.
सोशल मीडिया से शुरू हुई मुहिम 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' से जुड़े लोगों ने बीते शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया.
इस प्रदर्शन में इस मुहिम से जुड़े लोगों के अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों से सरकारी नौकरियों और शिक्षा में जाति के आधार पर आरक्षण का विरोध करने वाले लोग जुटे थे. इनमें कई हिंदुत्ववादी समूहों से जुड़े कार्यकर्ता भी शामिल थे.
दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी और शाम होते-होते प्रदर्शनकारियों को ज़बरदस्ती हटा दिया गया.
प्रदर्शनकारी मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा, जाति के बजाय आर्थिक आधार को प्राथमिकता देने और मेरिट आधारित व्यवस्था की मांग कर रहे हैं.
हरियाणा के पलवल से आंदोलन में शामिल होने आए कुलदीप कौशिक ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "मैं उस आरक्षण का विरोध करता हूं जो आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को जाति की वजह से मिल रहा है. जो लोग आईएएस-आईपीएस बन चुके हैं, सांसद-विधायक बन चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण मिलने का मैं विरोध करता हूं."
कौशिक कहते हैं, "आरक्षित वर्ग से आने वाले लोग प्रधानमंत्री बन रहे हैं, राष्ट्रपति बन रहे हैं, वरिष्ठ अधिकारी बन रहे हैं, इससे ज़्यादा और क्या बराबरी होगी? अब तक आरक्षण ले रहे इन लोगों को कहना चाहिए कि अब आरक्षण ग़रीबों के लिए हो."
यूं तो इस अभियान का नाम आरक्षण हटाओ आंदोलन है लेकिन प्रदर्शन में शामिल अधिकतर लोग सीधे आरक्षण को ख़त्म करने के बजाए आरक्षण व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे थे.
यहां आने वाले अधिकतर प्रदर्शनकारियों का एक ही तर्क था, 'आरक्षण आर्थिक आधार पर हो.'
सनातन सेवा परिषद नाम की संस्था के अध्यक्ष तेजस शांडिल्य ने इसी तरह का तर्क देते हुए कहा, "आरक्षण में सुधार हो, आरक्षण सिर्फ़ ग़रीबों के लिए हो."
भारत में आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है.
इस आंदोलन ने एक पुरानी बहस को नए सिरे से सामने ला दिया है कि क्या भारत में आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए?
या फिर जब तक जातिगत असमानता और भेदभाव पूरी तरह खत्म न हो जाए तब तक आरक्षण ज़रूरी है.
यही इस आंदोलन की मूल वैचारिक लड़ाई है.
प्रदर्शनकारी क्या चाहते हैं?

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आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारियों के बीच सभी मांगों को लेकर पूरी तरह एकरूपता नहीं है. लेकिन मौजूदा प्रदर्शनों में जाति आधारित आरक्षण की समीक्षा, आर्थिक आधार को अधिक महत्व देने, मेरिट को चयन का प्रमुख आधार बनाने और आरक्षण के लाभों के लगातार एक ही वर्ग तक केंद्रित होने पर सवाल उठाए गए हैं.
आंदोलन से जुड़े कुछ लोग सरकार से आरक्षण पर विस्तृत आंकड़ों के साथ एक श्वेतपत्र जारी करने की मांग भी कर रहे हैं.
हालांकि, इस प्रोटेस्ट के अगले ही दिन आयोजकों में से एक हर्ष दुबे ने यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ लखनऊ में प्रेस वार्ता की. इस प्रेस वार्ता में ब्रजेश पाठक ने कहा कि प्रदर्शनकारियों की मांग को व्यवस्थित तरीक़े से सरकार के समक्ष रखा जाएगा.
उन्होंने वादा किया था कि प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल की केंद्र सरकार के मंत्री से मुलाक़ात दो दिन के भीतर करवाई जाएगी, हालांकि ये समयसीमा बीतने के बावजूद ऐसी किसी मुलाक़ात के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं है.
इस प्रेस वार्ता ने आंदोलन के भीतर भी मतभेद उजागर कर दिए. आंदोलन का नेतृत्व करने का दावा कर रहे लोगों में शामिल अनुराधा तिवारी ने सार्वजनिक रूप से हर्ष दुबे और सरकार के बीच हुई बातचीत तथा दुबे की ओर से रखी गई मांगों से खुद को अलग किया है.
वहीं, सोशल मीडिया पर भी इस आंदोलन से जुड़े लोगों के अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं. अनुराधा तिवारी ने कहा है कि वह जल्द ही इस मुहिम को दिशा देंगी.
वहीं आयोजकों में से एक हर्ष दुबे ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान बीबीसी से कहा था, "जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जाएंगी, हम पीछे नहीं हटेंगे और आंदोलन जारी रहेगा."
हालांकि, इसके अगले ही दिन वो लखनऊ में यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के साथ नज़र आए थे.
आंदोलन को समर्थन कहां से मिल रहा है?

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दिल्ली में प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का एक बयान बार-बार पोस्ट किया जा रहा है जिसमें वो कह रहे हैं, "कान खोलकर सुन लो, भारतीय जनता पार्टी कभी रिज़र्वेशन को हटाने वाली नहीं है, इतना ही नहीं, आप हटाना चाहोगे तो आपको भारतीय जनता पार्टी हटाने भी नहीं देगी, ये कमिटमेंट भारतीय जनता पार्टी का है."
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के किसी बड़े नेता ने इस आंदोलन के समर्थन में अभी तक कोई बयान नहीं दिया है.
यही नहीं, इस आंदोलन को अभी किसी बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक दल का औपचारिक समर्थन हासिल नहीं है.
फिलहाल, इस आंदोलन के समर्थक मुख्य रूप से सामान्य वर्ग के युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, युवा पेशेवर और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग हैं, जिनमें अधिकतर तथाकथित अगड़ी जातियों से आते हैं.
हालांकि, सोशल मीडिया पर चर्चा में रहने वाले कुछ लोगों ने ज़रूर आरक्षण व्यवस्था की आलोचना की है. आनंद रंगनाथन और विवादित पत्रकार अजीत भारती जैसे नाम सार्वजनिक रूप से मेरिट और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं.
आरक्षण हटाओ आंदोलन के इंस्टाग्राम पेज को अभी तक 56 लाख से अधिक लोगों ने फॉलो किया है, हालांकि ज़मीन पर इसका कोई ख़ास समर्थन दिखाई नहीं देता. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल अधिकतर युवा भी जातिगत और हिंदुत्ववादी संगठनों से ही जुड़े थे.
आरक्षण क्यों आया था?

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इस बहस को समझने के लिए भारत के संविधान और स्वतंत्रता के बाद की सामाजिक स्थिति को समझना ज़रूरी है.
आरक्षण केवल गरीबी दूर करने की योजना के रूप में नहीं लाया गया था.
भारत में जाति के आधार पर लंबे समय तक कुछ समुदायों को शिक्षा, सत्ता, सार्वजनिक संस्थानों और रोज़गार से दूर रखा गया. संविधान निर्माताओं के सामने सवाल था कि क्या केवल क़ानून के सामने समानता दे देना पर्याप्त होगा.
इस सवाल के मूल में भारतीय समाज की असमान स्थितियां थीं जिनमें आबादी का एक बड़ा हिस्सा जाति की वजह से शोषण और उत्पीड़न का शिकार रहा था.
आरक्षण का उद्देश्य ऐसे समुदायों को शिक्षा, सरकारी रोज़गार और राजनीतिक संस्थानों में प्रतिनिधित्व देना था, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से इन क्षेत्रों से बाहर रखा गया था.
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर विवेक कुमार इसी अंतर को आरक्षण की बुनियादी अवधारणा बताते हैं.
प्रोफ़ेसर विवेक कुमार कहते हैं, "आरक्षण का मतलब है प्रतिनिधित्व."
वह कहते हैं कि जिन समाजों को लंबे समय तक सत्ता, शिक्षा और संसाधनों से वंचित रखा गया, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए शिक्षा और नौकरियों में प्रतिनिधित्व देना आरक्षण का उद्देश्य था.
यहीं से आरक्षण समर्थकों और विरोधियों के बीच मूल मतभेद पैदा होता है.
ग़रीबी और जातिगत भेदभाव

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आरक्षण हटाओ आंदोलन का बड़ा तर्क है कि आज किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को उसकी जाति से ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए.
लेकिन आरक्षण के समर्थक कहते हैं कि गरीबी और जातिगत भेदभाव अलग-अलग समस्याएं हैं.
प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, "आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है."
उनका तर्क है कि अगर किसी व्यक्ति की समस्या ग़रीबी है तो उसके लिए छात्रवृत्ति, फीस में छूट या आर्थिक सहायता जैसे उपाय किए जा सकते हैं. लेकिन आरक्षण का उद्देश्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और वंचितों को बराबरी पर आने का मौक़ा देना है.
प्रोफेसर लक्ष्मण यादव भी आर्थिक आधार को आरक्षण का विकल्प बनाने के तर्क पर सवाल उठाते हैं.
उनका कहना है, "शोषण, अन्याय और भेदभाव जाति के आधार पर है तो उसको ख़त्म करने का आधार आर्थिक कैसे हो सकता है?"
आरक्षण समर्थक विश्लेषकों के तर्क का आधार यह है कि अगर समस्या का मूल कारण जाति है तो उसके समाधान का आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं हो सकता.
आरक्षण की समीक्षा का सवाल

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आरक्षण का विरोध कर रहे लोगों की मुख्य मांग है आरक्षण की समीक्षा और इस व्यवस्था में सुधार.
प्रोफेसर लक्ष्मण यादव तर्क देते हैं कि किसी भी नीति में बदलाव आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए.
वो कहते हैं, "आरक्षण का विरोध कर रहे लोग रिफॉर्म की बात कर रहे हैं, लेकिन बिना ठोस डेटा के रिफॉर्म कैसे हो सकता है? "
वे कहते हैं कि जातिगत जनगणना से यह पता चलना चाहिए कि किस समुदाय की आबादी कितनी है, शिक्षा और रोजगार में उसकी स्थिति क्या है और संसाधनों तक उसकी पहुंच कितनी है.
उनका सवाल है कि बिना इन आंकड़ों के यह कैसे तय किया जा सकता है कि कौन सा समुदाय आरक्षण से बाहर निकलने की स्थिति में पहुंच चुका है.
प्रोफ़ेसर विवेक कुमार भी मानते हैं कि जब तक जातिगत भेदभाव ख़त्म नहीं हो जाता तब तक आरक्षण की समीक्षा किस आधार पर होगी?
'मेरिट' पर बहस
आरक्षण विरोधी आंदोलन में 'मेरिट' सबसे प्रमुख शब्दों में से एक है. प्रदर्शन के दौरान अधिकतर लोग एक जैसा ही तर्क देते हुए कहते हैं, "रिज़र्वेशन की वजह से मेरिट वालों को नौकरी नहीं मिल पा रही है."
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि चयन का आधार व्यक्ति की क्षमता और प्रदर्शन होना चाहिए, न कि उसकी जाति.
इसके जवाब में आरक्षण समर्थक सवाल करते हैं कि मेरिट पैदा कैसे होती है?
प्रोफ़ेसर यादव कहते हैं, "क्या दो छात्रों की प्रतियोगिता को समान माना जा सकता है जिनकी स्कूली शिक्षा, आर्थिक संसाधन, कोचिंग, सामाजिक वातावरण और अवसर बिल्कुल अलग रहे हों?"
यही कारण है कि आरक्षण समर्थक 'समान अवसर' को केवल परीक्षा के दिन की प्रतियोगिता से नहीं जोड़ते.
क्या आरक्षण ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया?

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यह शायद मौजूदा मुहिम का सबसे अहम सवाल है.
प्रोफेसर विवेक कुमार सरकार से आरक्षण पर एक विस्तृत श्वेतपत्र जारी करने की मांग करते हैं.
प्रोफ़ेसर विवेक कुमार कहते हैं, "सरकार को बताना चाहिए कि पिछले सात दशकों में कितनी सरकारी नौकरियां पैदा हुईं, आरक्षण का कितना पालन हुआ, कितने पद खाली हैं और कितने भरे गए."
वे सवाल करते हैं, "तो प्रतिनिधित्व अभी 70 वर्ष में कहां पूरा हुआ? आप उठा के देख लीजिए."
दूसरी तरफ आरक्षण विरोधी पूछते हैं कि अगर आरक्षण को सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए बनाया गया था, तो इसकी कोई समय सीमा क्यों नहीं होनी चाहिए?
क्या एक ऐसी नीति, जिसे विशेष परिस्थितियों के लिए बनाया गया था, हमेशा जारी रहनी चाहिए?
यही वह सवाल है जिसका जवाब प्रदर्शनकारी सरकार से मांग रहा है.
1990 का मंडल और आज का आंदोलन

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आरक्षण विरोध कोई नया आंदोलन नहीं है.
1950 में संविधान लागू होने के बाद से ही आरक्षण को लेकर बहस और विरोध होता रहा है. लेकिन 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद यह विवाद राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया.
मंडल आयोग ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी.
इसके विरोध में देशभर में छात्र आंदोलन हुए.
1992 में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी फैसले ने ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखा और आरक्षण की व्यवस्था के लिए 50 फीसदी की सीमा तथा ओबीसी में क्रीमी लेयर जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए.
इसके बाद आरक्षण का स्वरूप बदलता गया. 2019 में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के लिए 10 फीसदी आरक्षण भी जोड़ा गया.
इस तरह आज की बहस केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण की नहीं है. इसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण का सवाल भी शामिल है.
आरक्षण समर्थक क्या कहते हैं?
आरक्षण समर्थकों का कहना है कि आज भी जातिगत असमानता मौजूद है.
प्रोफेसर लक्ष्मण यादव कहते हैं, "जब तक जातियां हैं तब तक जातिवाद है और जातिवाद है तो इससे खत्म करने का रास्ता रिज़र्वेशन से बेहतर दूसरा कोई नहीं."
उनके मुताबिक भारत का समाज पहले से विभाजित है. वह कहते हैं कि अगर इस विभाजन पर खुले तौर पर बहस होती है तो इससे डरने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन बहस आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए.
प्रोफ़ेसर यादव कहते हैं, "ओपन डिबेट होनी चाहिए. बशर्ते कि वो डिबेट डेटा बेस्ड हो."
उनका यह भी कहना है कि आज वंचित समुदाय पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक हैं.
"अब 90 के पहले का भारत नहीं है कि एससी, एसटी, ओबीसी को कुछ पता ही नहीं है. अब उनके भी लोग इंटेलेक्चुअल्स हैं."
वहीं सांसद चंद्रशेखर आज़ाद बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, "आरक्षण को ख़त्म करने का सबसे आसान तरीक़ा है समाज से जातियों को ख़त्म कर दिया जाए, जिस दिन ग़ैर बराबरी ख़त्म हो जाएगी उस दिन आरक्षण अपने आप ख़त्म हो जाएगा."
बीजेपी और विपक्ष का रुख़

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बीजेपी की आधिकारिक राष्ट्रीय नीति आरक्षण ख़त्म करने की नहीं रही है.
केंद्र सरकार एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के साथ-साथ आरक्षित पदों की रिक्तियां भरने पर ज़ोर दे रही है.
हाल में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने के विचार का विरोध भी किया है. सरकार का कहना है कि एससी/एसटी आरक्षण का आधार आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव है.
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा रिज़र्वेशन रिफॉर्म से जुड़े प्रदर्शनकारियों से बातचीत ने राजनीतिक बहस को ज़रूर तेज किया है.
विपक्षी दल इस मुद्दे पर अधिक स्पष्ट रूप से आरक्षण के विस्तार और जातिगत प्रतिनिधित्व के पक्ष में हैं.
कांग्रेस जाति जनगणना और 50 फीसदी की आरक्षण सीमा हटाने की बात करती रही है.
समाजवादी पार्टी जाति जनगणना और आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग करती है.
राष्ट्रीय जनता दल भी आरक्षण की सीमा बढ़ाने और निजी क्षेत्र में आरक्षण का समर्थन करती रही है.
बहुजन समाज पार्टी मौजूदा एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण को कमजोर करने के किसी भी प्रयास का विरोध करती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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