पाकिस्तान का इंडोनेशिया समेत तीन देशों से डिफेंस प्रोडक्शन पर समझौता, क्या भारत पर पड़ेगा असर?

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- Author, अभिषेक प्रताप सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
क़तर की राजधानी दोहा में बीते बुधवार को चार ऐसे देशों के रक्षा प्रतिनिधि एक मेज पर आए, जिनकी सैन्य ताक़त, आर्थिक क्षमता और जिओपॉलिटिक्स की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफ़ी अलग हैं.
ये चार देश हैं पाकिस्तान, तुर्की, क़तर और इंडोनेशिया.
इन देशों ने रक्षा उत्पादन, रिसर्च और डिफेंस टेक्नॉलजी के क्षेत्र में सहयोग के लिए जिस बहुपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं उसे 'बद्र समझौता ज्ञापन' या बद्र एमओयू नाम दिया गया है.
यह घटनाक्रम इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इससे कुछ ही हफ़्ते पहले पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' हुआ था.
मध्य-पूर्व में जारी संघर्षों और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच महज कुछ हफ़्तों के ये दो बड़े रक्षा समझौते अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक नई बहस छेड़ रहे हैं.
पाकिस्तान में जहाँ इसे रक्षा उद्योग के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है, वहीं भारत में भी इस नए समीकरण के सामरिक प्रभावों पर क़रीब नज़र रखी जा रही है.
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या खाड़ी देशों से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक कोई नया सैन्य ब्लॉक आकार ले रहा है?
'बद्र एमओयू' सऊदी अरब की अगुवाई वाले 'मक्का पैक्ट' से किस तरह अलग है और भारत के प्रमुख रक्षा साझेदार इंडोनेशिया का इस समझौते में शामिल होना भारत के हितों को कैसे प्रभावित करेगा?
'बद्र एमओयू' क्या है?

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क़तर की डिफेंस मिनिस्ट्री ने एक आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि, रणनीतिक साझेदारी और संयुक्त सहयोग को बढ़ाने की प्रतिबद्धता के तहत दोहा में 'बद्र' समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं.
इस अवसर पर क़तर के उप प्रधानमंत्री और रक्षा राज्य मंत्री शेख़ सऊद बिन अब्दुल रहमान बिन हसन अल थानी, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाज़ा मुहम्मद आसिफ़, तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलेर और इंडोनेशिया के उप रक्षा मंत्री भी मौजूद थे.
इस समझौते का सीधा मक़सद चारों देशों के बीच डिफ़ेंस प्रोडक्शन को बढ़ावा देना, टेक्नॉलजी ट्रांसफ़र करना और आधुनिक डिफ़ेंस ज़रूरतों के मुताबिक़ स्वदेशी डिफ़ेंस इंडस्ट्री को खड़ा करना है.
क़तर के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि यह समझौता वित्तीय नज़रिए से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चारों देशों की अलग-अलग क्षमताओं को एक साथ लाकर मित्र देशों की रक्षा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करेगा.
बीबीसी उर्दू के मुताबिक़, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाज़ा आसिफ़ ने एक्स पर लिखा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय और घरेलू क़ानूनों के दायरे में रहते हुए आत्मनिर्भरता, संयुक्त उत्पादन और टेक्नॉलजी ट्रांसफ़र के अवसरों का लाभ उठाने के लिए उत्सुक है.
चारों देशों की कितनी सैन्य ताक़त

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इस समझौते में शामिल चारों देशों की सामरिक क्षमता को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थाओं के आंकड़ों पर गौर करना ज़रूरी है.
ग्लोबल फ़ायरपावर इंडेक्स के अनुसार, इन चारों देशों में सबसे बड़ी सक्रिय सेना पाकिस्तान के पास है, जिसमें लगभग 6 लाख 60 हज़ार सक्रिय कर्मी हैं.
इसके बाद तुर्की में 4 लाख 81 हज़ार और इंडोनेशिया में 4 लाख से अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी हैं.
वहीं चौथे साझेदार क़तर के पास अन्य तीनों देशों की तुलना में काफ़ी कम, 26 हजार 550 सक्रिय सैनिक हैं.
सैन्य बजट और हथियार निर्यात के मामले में स्वीडन स्थित प्रतिष्ठित शोध संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं.
सिपरी के मुताबिक़, 2025 में तुर्की का रक्षा खर्च 30 अरब डॉलर था और वह दुनिया के सबसे बड़े रक्षा बजट वाले देशों में 18वें स्थान पर है.
पिछले पांच वर्षों में अपने रक्षा निर्यात में 122 प्रतिशत की वृद्धि के साथ तुर्की दुनिया का 11वां सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बन गया है, जो उसे इस समूह का मुख्य तकनीकी इंजन बनाता है.
सिपरी के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 11.9 अरब डॉलर रहा और वह दुनिया में 31वें स्थान पर है.
जबकि इंडोनेशिया ने 2025 में रक्षा पर 15 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए, जो 2024 की तुलना में लगभग 26 प्रतिशत अधिक है.
सिपरी पर उपलब्ध 2022 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, क़तर का रक्षा बजट 15.4 अरब डॉलर था, जो पाकिस्तान के कुल रक्षा बजट से भी अधिक है.
पाकिस्तान के लिए इसके मायने

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दोहा में हुआ यह समझौता किसी शून्य से शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इन देशों के बीच पहले से ही कई द्विपक्षीय सैन्य परियोजनाएं चल रही हैं.
तुर्की की आधिकारिक समाचार एजेंसी अनादोलू एजेंसी के अनुसार, पाकिस्तान और तुर्की मिलकर पाकिस्तानी नौसेना के लिए 'मिलगेम बाबर श्रेणी' के चार युद्धपोत बना रहे हैं.
इनमें से पहले दो जहाज़ों का निर्माण इस्तांबुल में और शेष दो का निर्माण कराची शिपयार्ड में किया गया, जिससे कराची शिपयार्ड का आधुनिकीकरण हुआ और जहाज निर्माण की इंजीनियरिंग तकनीक पाकिस्तान को मिली.
इसी तरह, तुर्की की कंपनी एफ़एनएसएस और इंडोनेशिया की पीटी पिनडैड ने संयुक्त रूप से 'कपलान एमटी' टैंक का निर्माण किया है, जबकि अंकारा पहले से ही क़तर को ड्रोन, बख्तरबंद वाहन और फ़ास्ट अटैक बोट्स दे रहा है.
इसके अलावा, इस साल की शुरुआत में खबरें आई थीं कि इंडोनेशिया ने पाकिस्तान और चीन के संयुक्त उद्यम वाले लड़ाकू विमान 'जेएफ़-17 थंडर' को ख़रीदने में रुचि दिखाई है.
जनवरी में पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री रज़ा हयात हरज ने बीबीसी उर्दू से पुष्टि की थी कि जेएफ़-17 की बिक्री को लेकर कई देशों से बातचीत चल रही है.
मध्य पूर्व मामलों की जानकार आरजू काज़मी का मानना है कि बद्र एमओयू से आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान की स्थिति कुछ हद तक मजबूत हो सकती है, लेकिन इसे अभी पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव कहना थोड़ी जल्दबाजी होगी.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से उन्होंने कहा, "पाकिस्तान को यहाँ सबसे बड़ा लाभ डिफ़ेंस टेक्नोलॉजी नेटवर्क में मिल रही पहुँच है. ख़ासकर तब जब पाकिस्तान कई तरह की आर्थिक बाधाओं में फंसा हुआ है और उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा है."
काज़मी के मुताबिक़, "इन परिस्थितियों में पाकिस्तान को मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स में एक्सेस और बाहरी साझेदारियां मिल रही हैं, जिससे वह अपने पारंपरिक हथियारों के जखीरे को आधुनिक बनाने के बारे में ज़रूर सोचेगा और इस लिहाज से यह पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से एक लाभदायक एमओयू है."
वह कहती हैं, "यह समझौता इसलिए और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब पाकिस्तान केवल चीन पर निर्भर रहने के बजाय तुर्की, क़तर और इंडोनेशिया के साथ भी डिफ़ेंस इंडस्ट्रियल नेटवर्क बना सकता है."
उनके अनुसार, "चीन, तुर्की, खाड़ी के साझेदारों और इंडोनेशिया जैसी शक्तियों के साथ जुड़ने वाला यह एक फैलता हुआ रक्षा नेटवर्क है, जिसकी वजह से पाकिस्तान की रणनीतिक सौदेबाज़ी की क्षमता और कूटनीतिक विकल्प बढ़ सकते हैं."
बद्र एमओयू और मक्का पैक्ट में क्या है फ़र्क

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पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तुरंत बाद बद्र एमओयू के सामने आने के बाद कहा जा रहा है कि दोनों में कई बुनियादी फ़र्क़ हैं.
रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक़, "मक्का पैक्ट एक औपचारिक सुरक्षा संधि है, जिसमें किसी एक सदस्य देश पर बाहरी हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाने का सिद्धांत शामिल है. इसके उलट, बद्र एमओयू कोई सैन्य गठबंधन या युद्ध संधि नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से रक्षा उद्योग, हथियारों के सह-उत्पादन और तकनीक के आदान-प्रदान तक सीमित है."
अंकारा स्थित स्वतंत्र रक्षा पत्रकार लेवांत कमाल बीबीसी उर्दू से बातचीत में कहते हैं कि बद्र समझौता ज्ञापन 'मक्का समझौते' से किसी भी तरह से मिलता-जुलता नहीं है.
उनका कहना है कि खाड़ी क्षेत्र की अपनी अलग राजनीतिक गतिशीलता और प्राथमिकताएं हैं; इस राजनीतिक मानचित्र में कई ऐसी सीमाएं और विभाजन रेखाएं हैं जिन पर बाहरी पक्षों के लिए केवल समझौतों और गठबंधनों के माध्यम से प्रभाव डालना आसान नहीं है.
जिओपॉलिटिक्स पर क्या असर होगा

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प्रमुख अमेरिकी थिंक-टैंक अटलांटिक काउंसिल के फ़ेलो उमर समद की रिसर्च के अनुसार, "मक्का रक्षा समझौते के कुछ ही हफ्तों बाद हुए इस समझौते से मुस्लिम जगत में एक नए रुझान के उभरने का संकेत मिलता है."
उमर समद लिखते हैं, "अगर इन क़दमों को समग्र रूप से देखा जाए, तो ऐसा लगता है कि कई सुन्नी-बहुसंख्यक देश तनाव और अनिश्चितता के इस दौर में अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के नए तरीके तलाश रहे हैं."
हालांकि उन्होंने इसे 'मुस्लिम नेटो' की स्थापना की संभावना से इनकार किया.
वो लिखते हैं, "यह कोई कट्टरपंथी भू-राजनीतिक गठबंधन बनाने का प्रयास नहीं है; बल्कि यह स्थानीय क्षमताओं को विकसित करने, समान विचारधारा वाले साझेदारों के बीच सहयोग सुधारने और बाहरी महाशक्तियों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने का एक व्यावहारिक प्रयास है."
प्रतिष्ठित अमेरिकी थिंक-टैंक काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस (सीएफ़आर) और सेंटर फ़ॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज सीएसआईएस की रिसर्च के मुताबिक़, मध्य पूर्व में जारी अस्थिरता के बीच खाड़ी देश अब केवल अमेरिकी सुरक्षा गारंटी के भरोसे नहीं रहना चाहते.
वहीं अल जज़ीरा से बात करते हुए डिफ़ेंस एक्सपर्ट अर्दा मेवलुतोग्लू ने कहा, "दुनिया किसी एक सैन्य गठबंधन के बजाय, खाड़ी से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैले रक्षा उत्पादन और सुरक्षा व्यवस्थाओं के एक आपस में जुड़े हुए नेटवर्क इंटर कनेक्टेड नेटवर्क का उभार देख रही है."
भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?

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भारत के नज़रिए से इस समझौते में सबसे महत्वपूर्ण पहलू इंडोनेशिया की भागीदारी है.
भारत और इंडोनेशिया के बीच बेहद गहरे रणनीतिक संबंध हैं और हाल ही में दोनों देशों के बीच 630 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 5,953 करोड़ रुपये के दो बड़े रक्षा सौदों पर सहमति बनी है.
इसके तहत भारत जकार्ता को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्रॉ एयर-टू-एयर मिसाइल की आपूर्ति करेगा.
ऐसे में इंडोनेशिया का पाकिस्तान और तुर्की के साथ एक रक्षा उत्पादन समझौते में शामिल होना और पाकिस्तानी जेएफ़-17 विमानों में रुचि दिखाना नई दिल्ली में यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इससे संवेदनशील भारतीय रक्षा तकनीक की गोपनीयता प्रभावित हो सकती है.
हालांकि, भारतीय डिफ़ेंस एक्सपर्ट इसे किसी तात्कालिक ख़तरे के रूप में नहीं देखते.
भारतीय थिंक-टैंक सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ (सीएपीएसएस) के सीनियर फ़ेलो रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत के मुताबिक़, "किसी एमओयू को सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता. यह मुख्य रूप से रक्षा उत्पादन में काम के बंटवारे का प्रयास है और कतर व इंडोनेशिया दोनों के साथ भारत के संबंध बेहद मजबूत हैं."
वहीं, ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व सीईओ और एमडी सुधीर कुमार मिश्रा ने कहा है कि 'भारत के रक्षा निर्यात समझौतों में इंटेलेक्चुअल और डेटा सिक्योरिटी की बेहद सख़्त शर्तें होती हैं, जिनके तहत किसी तीसरे देश तक तकनीक के पहुंचने की कोई गुंजाइश नहीं होती.'
"फिर भी, कूटनीतिक स्तर पर यह समझौता पाकिस्तान को चीन के अलावा तुर्की की तकनीक और क़तर के निवेश तक जो पहुंच दे रहा है, वह लंबी अवधि में भारत की सुरक्षा रणनीति के लिए एक अहम निगरानी का विषय रहेगा."
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