कर्नाटक: हिजाब और जनेऊ जैसे धार्मिक प्रतीकों पर छूट के बाद अब क्या हैं चुनौतियां

- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
चार साल पहले हिजाब पहनने पर लगी पाबंदी की वजह से जिन छात्राओं की पढ़ाई में रुकावट आ गई थी, उन्होंने अब राहत की सांस ली है.
कर्नाटक सरकार के सिर को ढंकने वाले हिजाब की अनुमति दिए जाने के बाद उन्होंने फिर से पढ़ाई करने की नई योजना बनानी शुरू कर दी है.
दिलचस्प पहलू यह है कि इससे उन लोगों को भी राहत मिली है जिनके बच्चों को कुछ शिक्षकों ने जनेऊ पहनने से रोक दिया था. दक्षिण भारत में इसे जनीवारा कहा जाता है.
मंड्या के अपने कॉलेज में हिजाब विरोधियों को 'अल्लाह-हू-अकबर' के नारे लगाकर जवाब देने की वजह से मुस्कान ख़ान 'हिजाब गर्ल' कहलाने लगी थीं. वह अब अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की योजना बना रही हैं.
दूसरी ओर, सुवर्णा तीर्था उम्मीद कर रही हैं कि अन्य छात्रों को वह पीड़ा न झेलनी पड़े जो उनके बेटे आनंद एस तीर्था अभी झेल रहे हैं. उन्हें मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा केंद्र में जाने से पहले अपना जनेऊ उतारने के लिए कहा गया था.
सुवर्णा तीर्था ने बेंगलुरु में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "स्पष्ट निर्देश थे कि जनेऊ नहीं उतारना है. लेकिन यह पिछले साल भी हुआ और इस साल भी. वह अब भी बहुत परेशान है क्योंकि उसे भरोसा नहीं है कि उसने भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित में अच्छा किया है."
"उसने पीयूसी बोर्ड परीक्षा में 94 प्रतिशत अंक हासिल किए थे. अच्छे कॉलेज में प्रवेश के लिए पीयूसी बोर्ड परीक्षा के 50 प्रतिशत और सीईटी परीक्षा के 50 प्रतिशत अंक लिए जाते हैं."
कर्नाटक सरकार ने इस हफ़्ते की शुरुआत में 2022 में बीजेपी सरकार की ओर से लगाए गए हिजाब प्रतिबंध को रद्द करते हुए नया आदेश जारी किया.
नए आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "छात्रों को निर्धारित ड्रेस के साथ सीमित पारंपरिक और रीति-रिवाज़ आधारित प्रतीक पहनने की अनुमति है."
आदेश के अनुसार, "स्वीकृति योग्य ऐसे सामुदायिक और पारंपरिक प्रतीकों में पगड़ी, पवित्र धागे, शिव माला, रुद्राक्ष, हिजाब या अन्य समान सामुदायिक और पारंपरिक प्रतीक शामिल हो सकते हैं, जिन्हें छात्र आम तौर पर पहनते हैं. हालांकि, यह अनुशासन, सुरक्षा और छात्र की पहचान में बाधा नहीं डालना चाहिए."
मुस्कान ख़ान का अनुभव

मुस्कान ख़ान 8 फ़रवरी, 2022 की घटना को याद करती हैं, जब वह अपने स्कूटर पर कॉलेज पहुंची थीं.
कॉलेज के गेट पर कुछ छात्र और कुछ अज्ञात लोग मौजूद थे. जैसे ही उन्होंने स्कूटर पार्क किया, बाहर से आए लोगों का समूह उनसे हिजाब उतारने की मांग करने लगा.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "तभी मैंने 'अल्लाह-हू-अकबर' का नारा लगाया. फिर मुझसे पूछा गया कि मैंने यह नारा क्यों लगाया? आप कोई दूसरा नारा भी लगा सकती थीं."
"लेकिन जब महात्मा गांधी को गोली मारी गई थी, तो उन्होंने क्या कहा था: 'हे राम'. उसी तरह कोई भी इंसान उसी को पुकारेगा, जिस पर उसका विश्वास है."
उन्होंने अपने लेक्चरर और प्रोफ़ेसरों का आभार जताया, जिन्होंने उनकी मदद की और उन्हें कॉलेज के भीतर ले गए. वह कहती हैं, "उन्होंने मेरी बहुत मदद की."
उनके दोस्त भी उनके साथ खड़े रहे और आज भी संपर्क में हैं, "क्योंकि उन्होंने मुझे कई सालों से हिजाब में देखा है."

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उस घटना के बाद क्या हुआ? वह अपने बी.कॉम पाठ्यक्रम के तीसरे सेमेस्टर की परीक्षा नहीं दे सकीं क्योंकि यह घटना ठीक उससे पहले हुई थी.
उन्होंने कहा, "हमें बहुत समस्याएं हुईं. मुझे कहीं भी एडमिशन नहीं मिल रहा था. मेरी मां मुझे बाहर जाने नहीं दे रही थीं. इसकी वजह से मैंने ओपन यूनिवर्सिटी में दाख़िला ले लिया. इसी तरह कई अन्य लड़कियों ने भी परीक्षा नहीं दी लेकिन दाख़िला ले लिया. देखिए, हिजाब का कभी कोई मुद्दा ही नहीं था. इसे बड़ा मुद्दा बना दिया गया."
वह कहती हैं, "कई लड़कियां हैं जो पढ़ाई करना चाहती हैं. इसी कारण उनकी शिक्षा प्रभावित हुई है. आज आदेश पारित हुआ है और हमें समझना होगा कि किस तरह से पारित हुआ है. विभिन्न समुदायों की धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए यह आदेश दिया गया है."
वह इस बात पर दुख जताती हैं कि पेशेवर पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षाओं में कई लड़कों से सीईटी परीक्षा केंद्र पर जनेऊ उतारने को कहा गया.
भविष्य में वह स्नातकोत्तर (पीजी) पूरा करके क़ानून की पढ़ाई करना चाहती हैं.
कहती हैं, "मैं अपने समुदाय की सेवा करूंगी ताकि शिक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया जा सके और हिंदुस्तान तरक़्क़ी करे. मैं एक मोटिवेशनल स्पीकर बनना चाहती हूँ, जिसमें मैं लड़कियों को समझा सकूं कि अपनी पहचान बनाए रखते हुए पढ़ाई जारी रखना संभव है. इस्लाम हमें ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति देता है."
आनंद तीर्था की कहानी

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आनंद की मां सुवर्णा तीर्था ने बताया कि उनका बेटा 12वीं की पढ़ाई कर रहा था और इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लेने के लिए बहुत उत्सुक था.
वह बताती हैं, "परीक्षा के बाद उसने सीईटी (कॉमन एंट्रेंस टेस्ट) की तैयारी शुरू कर दी थी. 24 अप्रैल को मेरे पति उसे परीक्षा केंद्र ले गए थे. माता-पिता को गेट पर ही रोक दिया गया था."
"जांच करने वाले कर्मचारी सभी की तलाशी ले रहे थे और उनसे चेन, घड़ी आदि उतारने को कह रहे थे. उन्होंने जनीवारा (जनेऊ) देखा और उसे उतारने को कहा. वह पिछले 10 साल से इसे पहन रहा है. उन्होंने कहा कि जनीवारा पहनकर उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलेगी. उसने अपने पिता को फ़ोन किया जो परीक्षा केंद्र के बाहर थे."
सुवर्णा तीर्था ने कहा कि आनंद ने प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स में अच्छे अंक प्राप्त किए थे.
वह कहती हैं, "सीईटी में, पीयूसी बोर्ड परीक्षा के परिणाम से 50 प्रतिशत और सीईटी परीक्षा से 50 प्रतिशत अंक लिए जाते हैं. हमने दोपहर में कॉलेज प्रिंसिपल से भी मुलाक़ात की. हमें समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ जबकि स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे (जनीवारा पहनने की अनुमति देने के लिए). पिछले साल भी सरकार ने निर्देश जारी किए थे लेकिन उन निर्देशों के बावजूद यह हुआ."
उन्होंने कहा, "वह (आनंद तीर्था) बहुत परेशान है. हमें परिणाम का इंतज़ार करना होगा. चार-पांच अन्य छात्र भी इसी तरह की कार्रवाई से प्रभावित हुए. उनका भविष्य सीईटी अंकों पर निर्भर है."
माता-पिता की दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 299 (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को या उसके धर्म या मान्यताओं का अपमान करके आहत करने के लिए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण के साथ किया गया काम) और धारा 302 (जानबूझकर किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से शब्द या इशारे करना) के तहत मामला दर्ज किया.
सुवर्णा तीर्था ने कहा, "हमने शिकायत केवल इसलिए दर्ज कराई ताकि ऐसी घटना किसी अन्य उम्मीदवार के साथ दोबारा न हो."
उनके पति सुधीन्द्र तीर्था ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "अगर उसे कुल मिलाकर 97 प्रतिशत या उससे अधिक अंक मिलते हैं, तो उसके प्रतिष्ठित कॉलेजों में बिना कैपिटेशन फ़ीस दिए दाख़िला लेने की संभावना है. हम कैपिटेशन फ़ीस वहन नहीं कर सकते."
आनंद तीर्था के माता-पिता (सुवर्णा और सुधीन्द) ने आश्चर्य जताया कि परीक्षा में नकल करने के लिए पवित्र धागे का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है.
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