कांग्रेस के लिए आज होने वाली इंडिया गठबंधन की बैठक कितनी अहम?

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- Author, रौनक भैड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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- पढ़ने का समय: 8 मिनट
8 जून को दोपहर 12 बजे नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की बैठक होनी है. लोकसभा चुनाव 2024 के बाद पहली बार इंडिया गठबंधन के कई बड़े नेता एकसाथ आने वाले हैं.
विपक्षी दलों की यह बैठक कांग्रेस के लिए सबसे अहम मानी जा रही है. ख़ासकर, क्षेत्रीय दलों के घटते प्रभाव को देखते हुए कांग्रेस अपने लिए संभावना तलाश रही है.
हालांकि, कुछ दलों ने इस बैठक से पहले कांग्रेस के ख़िलाफ़ मोर्चा भी खोल दिया है.
लिहाज़ा, कांग्रेस की उम्मीदें पूरी होंगी या नहीं, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि बैठक में कौन से दल आते हैं और कौन सी पार्टियां इससे दूरी बनाती हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह बैठक तभी सफल होगी, जब उनसे नाराज़ रहे दल इसका हिस्सा बनेंगे.
'बैठक में 23 राजनीतिक दल शामिल होंगे'

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कांग्रेस की राजनीति को लंबे समय से देख रहे पत्रकार आदेश रावल कहते हैं कि कांग्रेस ने ममता बनर्जी के आग्रह पर यह बैठक बुलाई है.
उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी ने वोट चोरी के मुद्दे पर पहले कांग्रेस पार्टी का कभी खुलकर समर्थन नहीं किया था, लेकिन इस बार बैठक का मुद्दा यही रहने वाला है."
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट कर बताया कि 23 राजनीतिक दल इस बैठक में शामिल होंगे. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ दलों ने इस बैठक में शामिल होने में असमर्थता जताई है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "23 राजनीतिक दलों ने सोमवार, 8 जून 2026 को दोपहर 12 बजे नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होने वाली 'इंडिया' जनबंधन की बैठक में भाग लेने की पुष्टि की है. कुछ दलों ने अपने-अपने कारणों से इस विशेष बैठक में शामिल होने में असमर्थता जताई है."
जयराम रमेश ने लिखा, "हालांकि, बैठक में शामिल नहीं होने वाले दलों ने मोदी सरकार की उन नीतियों और कार्रवाइयों का कड़ा विरोध ज़ाहिर किया है, जो लाखों भारतीयों से उनका वोट देने का अधिकार छीन रही हैं, रोज़ संविधान पर हमला कर रही हैं. जांच एजेंसियों के ज़रिए विपक्षी नेताओं को निशाना बना रही हैं, करोड़ों भारतीयों की रोज़ी-रोटी को गंभीर नुक़सान पहुंचा रही हैं."
कौन से दल आने वाले हैं और कौन से नहीं?

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इंडिया गठबंधन की इस बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, शिवसेना-(यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे शामिल हो सकते हैं.
इस बैठक में पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सुप्रीमो ममता बनर्जी भी हिस्सा ले सकती हैं.
ममता बनर्जी का शामिल होना अहम माना जा रहा है, क्योंकि बीते लोकसभा चुनाव और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ चुनावी समर में नहीं उतरी थी.
आम आदमी पार्टी (आप) और (द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम) डीएमके ने इस बैठक से पहले ही ख़ुद को अलग कर लिया है.

दरअसल, कांग्रेस ने तमिलनाडु में अपना पार्टनर बदल लिया है, डीएमके की बजाय जोसेफ़ विजय की टीवीके पार्टी के साथ गठबंधन हो गया है. वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि इस कारण डीएमके कांग्रेस से काफ़ी नाराज़ है.
उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि हाल-फ़िलहाल में डीएमके इंडिया गठबंधन में वापसी कर पाएगी. वह कांग्रेस से चोट खाई हुई है."
भले, कांग्रेस ने टीवीके के साथ गठबंधन कर लिया हो, लेकिन इस बैठक में टीवीके के शामिल होने की सूचना नहीं है.
वहीं, राज्यसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के भी कांग्रेस के साथ कुछ मतभेद सामने आए थे, ऐसे में उसके नेता बैठक में शामिल होंगे या नहीं, इस पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
हाल ही में केरल की सत्ता से हटी सीपीआई (एम) के शामिल होने पर भी संशय है. पार्टी के महासचिव एमए बेबी ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया कि उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को एक पत्र भेजा है.
उन्होंने कहा, "इंडिया गठबंधन के दलों को अलग-अलग राज्यों में चुनाव के दौरान एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ना पड़ सकता है, लेकिन इस दौरान भी कुछ मर्यादा बनी रहनी चाहिए."
"हम पर यह आरोप लगाना कि हमारा आरएसएस और बीजेपी के साथ कोई समझौता है, यह पूरी तरह बेबुनियाद है. लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस की ज़िम्मेदारी है कि वह विपक्षी गठबंधन के भीतर मर्यादा बनाए रखे."
उन्होंने स्पष्ट तौर पर शामिल होने की बात को न तो स्वीकार की और न ही इसे ख़ारिज किया. उन्होंने कहा कि संसद के बाहर मुद्दों के आधार पर राजनीतिक सहयोग की बात होगी तो हम उस पर फ़ैसला करेंगे.
रशीद किदवई कहते हैं, "लेफ़्ट पार्टियां इस बैठक में शामिल भी होंगी तो अनमने ढंग से ही आएंगी. उनकी शिकायत है कि केरल के चुनाव में कांग्रेस ने उनके लिए अच्छी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया."
कांग्रेस के लिए इस वजह से अहम है बैठक

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इंडिया गठबंधन की बैठक कांग्रेस के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यह 2024 लोकसभा चुनावों के बाद विपक्ष का पहला बड़ा जमावड़ा है और इसमें 23 दलों की मौजूदगी कांग्रेस की नेतृत्व क्षमता को परखने का मौक़ा देगी.
लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया था, लेकिन इसके बाद एक के बाद एक राज्य इनके हाथ से निकलते चले गए.
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद कई क्षेत्रीय दल चुनाव हार चुके हैं या सत्ता गंवा चुके हैं.
पश्चिम बंगाल से टीएमसी, दिल्ली से आम आदमी पार्टी, केरल से सीपीआई (एम) सत्ता से बाहर हो गए हैं. राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) बिहार में विधानसभा चुनाव हार चुकी है. शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) को महाराष्ट्र में हार का सामना करना पड़ा.
पत्रकार आदेश रावल कहते हैं, "कई क्षेत्रीय दलों ने हार या सत्ता गंवाने के बाद राहुल गांधी को राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन का नेता मानने पर सहमति दी है."
"पहले ही कई नेता साइडलाइन हो चुके हैं. नीतीश ने पिछले चुनाव से पहले ही गठबंधन छोड़ दिया था. शरद पवार, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे क्षत्रपों का हार के बाद क़द सीमित रह गया है."
वो कहते हैं, "अब कांग्रेस को यह उम्मीद नज़र आने लगी है कि क्षेत्रीय दल उसकी अगुवाई में बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट होंगे."
कांग्रेस इस बैठक के ज़रिए क्षेत्रीय दलों को यह संदेश भी देना चाहती है कि वह अब भी उनके साथ खड़ी है.
रशीद किदवई कहते हैं, "दिल्ली, आंध्र प्रदेश और ओडिशा समेत सात राज्य ऐसे हैं, जहां पर कांग्रेस का वोट प्रतिशत दहाई के आंकड़े में भी नहीं है."
"इन राज्यों में 253 लोकसभा सीटे हैं, इनको माइनस कर दिया जाए तो कांग्रेस अपने बूते पर सत्ता में आ ही नहीं सकती. अब जिस तरह क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस की ज़रूरत है, ठीक उसी तरह कांग्रेस को भी क्षेत्रीय दलों का समर्थन चाहिए."
इंडिया गठबंधन के सामने ये चुनौती
इंडिया गठबंधन बनने के बाद अब तक छह बैठकें हुई हैं. पहली बैठक 23 जून, 2023 को बिहार के पटना में हुई थी. जबकि आख़िरी बैठक 1 जून, 2024 को हुई.
विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन के सामने जो चुनौतियां तब थीं, क़रीब-क़रीब वही अब भी हैं.
रशीद किदवई कहते कि भारत में आमतौर पर चुनाव के कुछ महीने पहले ही गठबंधन बनते हैं, लेकिन अब तो चुनाव 2029 में होने हैं, इसलिए तब तक इन दलों को एकजुट रखना चुनौती होगी.
किदवई ने कहा, "जब तक इस गठबंधन के पास कोई संयोजक नहीं होगा, तब तक इन दलों का एक साथ होना मुश्किल है. हालांकि, इसका एक बीच का रास्ता भी अपनाया जा सकता है. कांग्रेस अपनी ओर से एक संयोजक चुने और बाक़ी सभी दल अपनी ओर से."

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उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार के संयोजक बनने की चर्चा तेज़ हुई थी, लेकिन फिर मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे बढ़ाने की जानकारी सामने आई थी.
जेडीयू के तत्कालीन प्रवक्ता केसी त्यागी (वर्तमान में राष्ट्रीय लोकदल में हैं) ने कहा था, ''हमारे नेता (नीतीश) ने 'इंडिया' गठबंधन को बनाने के लिए कठिन परिश्रम किया. लेकिन कांग्रेस हमेशा घमंड में रही. उसने अपनी मज़बूत पकड़ वाले क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों को जगह नहीं दी, लेकिन उनकी बदौलत वह उन क्षेत्रों में बढ़त बनाना चाहती थी, जहां उसका अस्तित्व नहीं है. कांग्रेस की ज़िद ने नीतीश को उसे छोड़ने पर मजबूर किया.''
रशीद किदवई कहना है कि यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से अलग अपना संयोजक चुनते हैं, तो उन्हें यह भरोसा रहेगा कि उनका प्रतिनिधित्व हो रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
























