केरल में 'इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग' ने 22 सीटें जीतकर कैसे रचा इतिहास?

आईयूएमएल नेता सैयद सादिक़ अली थंगल

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    • Author, मिर्ज़ा एबी बेग
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

केरल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट (यूडीएफ़) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है.

हालांकि सबसे बड़ी सफलता इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) को मिली. उसने 27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे जिनमें 22 पर जीत दर्ज की.

यह आईयूएमएल की अब तक की सबसे बड़ी जीत है. 140 सीटों के लिए 9 अप्रैल को डाले गए वोटों की गिनती 4 मई को हुई, जिसमें सीपीएम के नेतृत्व वाले गठबंधन, लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एलडीएफ़) को बड़ा झटका लगा, जो पिछले दस साल से सत्ता में था.

कांग्रेस ने 63 सीटें हासिल कीं, जबकि सत्तारूढ़ सीपीएम को सिर्फ़ 26 सीटें मिलीं और सीपीआई ने 8 सीटें जीतीं. 1977 के बाद यह पहली बार है जब वामपंथी दल भारत के सभी राज्यों से सत्ता से बाहर हो गए हैं.

केरल की एक अनोखी बात यह है कि आईयूएमएल.. सीपीएम और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे अहम राजनीतिक पार्टी है.

कई दशकों से यह सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाती रही है और इस बार इसने इतिहास रच दिया है.

हालांकि पहली बार आईयूएमएल की किसी महिला उम्मीदवार ने चुनाव जीता है. पार्टी ने पहली बार दो महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था.

इनमें एडवोकेट फ़ातिमा तहलिया जीत गईं, जबकि एक दलित उम्मीदवार जयंती राजन राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार पीके प्रवीन से हार गईं.

आईयूएमएल से ऐसे नतीजों की उम्मीद पहले से थी क्योंकि पिछले साल 2025 में स्थानीय निकाय चुनावों में उसे रिकॉर्ड सफलता मिली थी.

पार्टी ने मालाबार इलाक़े के अपने मज़बूत गढ़ से बाहर भी अच्छा प्रदर्शन किया, ख़ासतौर पर मलप्पुरम ज़िले में. उसने 3200 से ज़्यादा सीटें जीतीं.

कहा जाता है कि पहली बार पार्टी ने राज्य के सभी 14 ज़िलों में कुछ हद तक स्तर पर जीत दर्ज की.

मौजूदा विधानसभा चुनावों में पार्टी ने 27 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. इनमें से 25 में से 15 सीटें ऐसी हैं जो वो पहले भी जीत चुकी थी.

उसका पिछला सबसे अच्छा प्रदर्शन 2011 के विधानसभा चुनावों में रहा था, जब उसने 20 सीटें हासिल की थीं. ये भी उल्लेखनीय है कि पार्टी ने तमिलनाडु में अपनी दो पारंपरिक सीटें भी बरकरार रखी हैं.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का गठन मार्च 1948 में मद्रास में हुआ था

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हालांकि यह पार्टी औपचारिक रूप से बंटवारे और आज़ादी के बाद भारत में बनी. हालांकि इसकी जड़ें आज़ादी से पहले की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग में हैं, जिसने दो राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर पाकिस्तान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी.

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की स्थापना 10 मार्च 1948 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुई थी.

उस समय केरल अलग राज्य नहीं था. मद्रास प्रेसिडेंसी के तहत त्रावणकोर, मालाबार और कोचीन, तीन क्षेत्र आते थे.

मुख्य रूप से केरल में प्रभाव रखने वाली इस पार्टी ने तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और भारत के दूसरे हिस्सों में भी अपनी मौजूदगी बनाए रखी और राज्य की राजनीति को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है.

भारतीय चुनाव आयोग ने आईयूएमएल को केरल में एक राज्य स्तरीय पार्टी के रूप में मान्यता दी है.

यह गठबंधन की राजनीति में लगातार सक्रिय रही है, ख़ास तौर पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ़ की अहम सहयोगी के रूप में.

पुरानी मुस्लिम लीग से कितनी अलग?

क़ायदे मिल्लत एम मोहम्मद इस्माइल

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बंटवारे के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग भारत में लगभग समाप्त हो गई थी. हालांकि दक्षिण भारत, ख़ास तौर पर उस समय की मद्रास प्रेसिडेंसी में, कुछ मुस्लिम नेताओं ने महसूस किया कि धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में मुसलमानों के हितों की नुमाइंदगी के लिए एक राजनीतिक मंच की ज़रूरत है.

मलयालम अख़बार 'माध्यमम' के न्यूज़ एडिटर एम फ़िरोज़ ख़ान ने बीबीसी को बताया कि दक्षिण भारत से पाकिस्तान जाने वालों की संख्या उत्तर भारत के मुक़ाबले बहुत कम थी, इसलिए जो मुस्लिम नेता भारत में रहे, उन्होंने भारत को एक ज़मीनी सचाई के रूप में स्वीकार किया और क्षेत्र के मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों की नुमाइंदगी के लिए आईयूएमएल की स्थापना की.

उन्होंने कहा, "यह बुनियादी तौर पर जिन्ना की मुस्लिम लीग से बिल्कुल अलग है. इसका चरित्र धर्मनिरपेक्ष है और यह राजनीतिक गतिविधियों के साथ सामाजिक सेवाएं भी करती है."

कोच्चि में वकील और आईयूएमएल के क़ानूनी सलाहकार एडवोकेट रफ़ीक़ ने कहा कि बंटवारे के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने दक्षिण भारत के मुस्लिम लीग नेताओं को कांग्रेस में शामिल होने का न्योता दिया था. हालांकि प्रमुख नेता एम मोहम्मद इस्माइल ने कांग्रेस में विलय के बजाय उसके साथ गठबंधन करने पर ज़ोर दिया.

रफ़ीक़ ने कहा, "हालांकि वह दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व को पूरी तरह राज़ी नहीं कर सके, लेकिन स्थानीय स्तर पर उन्होंने कांग्रेस के साथ एक तरह की कामचलाऊ समझदारी बना ली थी."

रफ़ीक़ के मुताबिक़, "मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान आने का न्योता दिया था और भारत में मुसलमानों के साथ होने वाले व्यवहार को लेकर चिंता जताई थी. इसके जवाब में 'क़ायदे मिल्लत' यानी एम मोहम्मद इस्माइल ने कहा था कि जब तक पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ अच्छा व्यवहार होता रहेगा, तब तक भारत के मुसलमानों को डरने की ज़रूरत नहीं होगी."

जहां जिन्ना को 'क़ायदे आज़म' (महान नेता) कहा जाता है, वहीं आईयूएमएल के नेता एम मोहम्मद इस्माइल को 'क़ायदे मिल्लत' (राष्ट्र के नेता) के नाम से याद किया जाता है.

अपनी पूर्ववर्ती पार्टी के उलट आईयूएमएल ने भारतीय संघ की संप्रभुता को स्वीकार किया और संवैधानिक ढांचे के भीतर काम करने की प्रतिबद्धता जताई. पार्टी ने मुस्लिम अधिकारों की सुरक्षा, शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित किया.

मुसलमानों के लिए सम्मानजनक पहचान

आईयूएमएल का झंडा

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आईयूएमएल की महिला विंग 'वनिता लीग' की पूर्व जनरल सेक्रेटरी नूरबीना रशीद ने कहा कि पार्टी की स्थापना मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों को सम्मानजनक पहचान दिलाने के लिए हुई थी और केरल में वह दूसरे राज्यों की तुलना में इसमें काफ़ी हद तक सफल रही है.

गौरतलब है कि उन्होंने हाल ही में अपने पद से इस्तीफ़ा दिया है. इससे पहले वह पिछले विधानसभा चुनावों में 25 साल बाद आईयूएमएल की पहली महिला उम्मीदवार बनी थीं.

मौजूदा चुनावों में पार्टी ने दो महिला उम्मीदवार उतारकर महिलाओं की अनदेखी करने की आलोचना का जवाब देने की कोशिश की.

नूरबीना रशीद ने कहा कि महिलाओं की भागीदारी से जुड़ी एक विंग 1990 के दशक से मौजूद थी, लेकिन 'वनिता लीग' की औपचारिक स्थापना 2012 में हुई.

विचारधारा और उद्देश्य

आईयूएमएल महिला लीग की पूर्व जनरल सेक्रेटरी नूरबीना रशीद

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आईयूएमएल की वेबसाइट के मुताबिक़, पार्टी का उद्देश्य भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के दायरे में रहकर मुसलमानों के हितों की नुमाइंदगी करना है. पार्टी मुसलमानों के लिए शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक कल्याण पर ज़ोर देती है.

पार्टी शासन में अल्पसंख्यकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए दूसरे धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ सहयोग को भी तरजीह देती है.

राष्ट्रीय राजनीति की तुलना में पार्टी केरल के सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों पर ज़्यादा ध्यान देती है. वह कोस्टल इलाक़ों के विकास, अल्पसंख्यक अधिकारों और सांप्रदायिक भाईचारे पर ज़ोर देती है.

पार्टी कट्टरपंथी भाषा से बचती है, अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक सुरक्षा की वकालत करती है और लगातार खुद को एक संतुलित राजनीतिक ताक़त के रूप में पेश करती है.

सेक्युलर पहचान

आईयूएमएल

फ़िरोज़ ख़ान ने बताया, "हालांकि पार्टी के नाम में 'मुस्लिम' शब्द शामिल है और यह मूल रूप से समुदाय आधारित पार्टी है, लेकिन धर्मनिरपेक्ष समाज इसे सांप्रदायिक पार्टी नहीं मानता."

उन्होंने कहा कि इसकी वजह यह है कि दूसरी सांप्रदायिक संस्थाओं की तरह यह नफ़रत फैलाने वाली भाषा का इस्तेमाल नहीं करती और न ही दूसरे धर्मों या समुदायों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काती है. इसके अलावा पनक्कड़ परिवार के नेतृत्व में पार्टी मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथी विचारधाराओं की तरफ़ जाने से रोकने में भी सफल रही है.

उन्होंने कहा कि पार्टी का मुख्य मक़सद समुदाय को राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से मज़बूत बनाना है और उसने विभिन्न पिछड़ेपन के बावजूद केरल के मुस्लिम समुदाय को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है.

एडवोकेट रफ़ीक़ ने कहा कि बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान जब पूरे देश में ग़ुस्सा था, तब केरल में पार्टी के नेतृत्व ने मुसलमानों को हिंसक प्रतिक्रिया देने से रोकने में सफलता हासिल की.

हालांकि नूरबीना रशीद का कहना है कि अब पूरे देश में राजनीति बदल रही है और इसका असर केरल में भी दिखाई देने लगा है, जहां पारंपरिक रूप से राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण पर आधारित नहीं रही थी.

बदलता माहौल

आईयूएमएल के जनरल सेक्रेटरी और केरल विधानसभा में विपक्ष के डिप्टी लीडर पीके कन्हालिकुट्टी अपने निर्वाचन क्षेत्र मलप्पुरम में

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'द हिंदू' के मुताबिक़, कोझिकोड ज़िले की पेराम्ब्रा सीट से उम्मीदवार टीपी रामकृष्णन (एलडीएफ़) और फ़ातिमा तहलिया (यूडीएफ़) को चुनाव प्रचार में सांप्रदायिक तरीक़े इस्तेमाल करने के आरोप में निर्वाचन आयोग ने नोटिस जारी किया था.

पार्टी का संगठनात्मक ढांचा काफ़ी मज़बूत है. इसमें मुस्लिम यूथ लीग और मुस्लिम स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन जैसी सहयोगी इकाइयां शामिल हैं, जो युवाओं के बीच पार्टी को लोकप्रिय बनाने में मदद करती हैं.

पार्टी का झंडा हरे रंग का है, जिसके ऊपरी बाएं कोने में चांद और सितारा बना है, जबकि उसका चुनाव चिह्न सीढ़ी है, जो प्रगति का प्रतीक माना जाता है.

मुस्लिम यूथ लीग के महासचिव शिबू मीरान ने कहा, "आईयूएमएल इसलिए लोकप्रिय हुई क्योंकि उसने मुसलमानों में शैक्षिक पिछड़ेपन के मुद्दे को उठाया और हमें उम्मीद है कि इस बार हम और बेहतर प्रदर्शन करेंगे."

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हालांकि शुरुआत में आईयूएमएल पूरे देश में सक्रिय थी, लेकिन बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौरान उत्तर भारत में मुस्लिम विरोधी राजनीति की वजह से वह हाशिये पर चली गई. उन्होंने कहा कि आज धर्मनिरपेक्ष दल भी मुस्लिम मुद्दों को उठाने में हिचकिचाते हैं.

असम के मुख्यमंत्री की टिप्पणियों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, "उत्तर भारत में मुसलमान, पहचान के संकट का सामना कर रहे हैं, लेकिन आईयूएमएल केरल मॉडल को दोहराने और धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ सम्मानजनक गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही है."

मीरान ने आगे कहा, "आईयूएमएल का विज़न क़ायदे मिल्लत और डॉ बीआर आंबेडकर के सिद्धांतों पर चलते हुए अपने मक़सद को हासिल करना है."

यह उल्लेखनीय है कि आज़ादी से पहले डॉ. आंबेडकर को विधानसभा में पहुंचाने में मुस्लिम लीग की भूमिका थी. यही वजह है कि केरल में मुसलमान और हाशिये के हिंदू समुदाय एक-दूसरे से जुड़ाव महसूस करते हैं.

उन्होंने आईयूएमएल के पहले शिक्षा मंत्री एस मोहम्मद कोया का हवाला देते हुए कहा कि उनकी पार्टी की प्रतिबद्धता यह है कि किसी दूसरे समुदाय का छोटे सा छोटा अधिकार भी मुसलमानों के लिए हराम है, ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिम अधिकारों पर समझौता करना उनके लिए असंभव है.

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