बेटी को आंखों के सामने गोली मारी गई, अब मां विदेश में रहकर लड़ रही है इंसाफ़ की जंग

समीरा अब विदेश में छिपकर रह रही हैं.
इमेज कैप्शन, समीरा अब विदेश में छिपकर रह रही हैं
    • Author, बीबीसी पैनोरमा टीम
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  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

चेतावनी: इस रिपोर्ट में परेशान करने वाली बातें हैं.

समीरा कहती हैं कि पहले उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह बीबीसी पैनोरमा से कहती हैं, "मैं ईरान में सेल्स का काम करती थी. ब्यूटी प्रोडक्ट्स बेचती थी."

लेकिन जिस दिन ईरानी सुरक्षाबलों ने उनकी आंखों के सामने उनकी इकलौती बेटी को गोली मार दी, उस दिन सब कुछ बदल गया.

16 साल की सेवदा ईरान की सख़्त सरकार के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में शामिल थीं. ये प्रदर्शन इस साल पूरे देश में फैल गए थे. इसके बाद अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इन हमलों में देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई मारे गए.

समीरा कहती हैं कि बेटी की मौत का दुख बाद में ग़ुस्से में बदल गया. उनका आरोप है कि ईरानी अधिकारियों ने सेवदा का शव तलाशने में मदद करने के बजाय उनके रास्ते में रुकावटें खड़ी कीं.

वह कहती हैं, "मुझे एहसास हुआ कि सेवदा को तलाश लेना अंत नहीं था. इसके बाद मुझे जिस तरह परेशान किया गया, वह तो बस शुरुआत थी."

पैदल ईरान से निकलने का ख़तरनाक सफ़र

समीरा ख़तरनाक पहाड़ी रास्तों से पैदल चलकर ईरान से बाहर निकल गईं.

अब वह विदेश में छिपकर रह रही हैं. वह ख़ुद को "सरकार से लड़ रही अकेली महिला की सेना" बताती हैं.

बेटी की मौत के बाद वह इंसाफ़ चाहती हैं और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग कर रही हैं. वह उन सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों के नाम सामने लाने में जुटी हैं, जिन्हें वह प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों के लिए ज़िम्मेदार मानती हैं.

वह कहती हैं, "मुझे मारने से पहले वे मुझे मौत के क़रीब पहुंचा देंगे, लेकिन मुझे तलाशना आसान नहीं होगा. सामान्य ज़िंदगी में लौटना? अब वापस जाने का कोई रास्ता नहीं है."

समीरा उन कई ईरानियों में शामिल हैं, जिनसे बीबीसी ने इस साल की शुरुआत से बात की है.

इनमें से कुछ लोग अब भी ईरान में हैं. उन्होंने पैनोरमा से कहा कि ख़तरे के बावजूद वे अपनी बात सामने रखना चाहते हैं. उनका कहना था कि बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचले जाने के बाद उनके लिए उम्मीद बनाए रखना मुश्किल हो गया था.

लंदन स्थित ईरानी दूतावास ने पैनोरमा से कहा कि शांतिपूर्ण और जायज़ प्रदर्शनों को अमेरिका समेत विदेशी ताक़तों ने अपने हाथ में ले लिया था.

दूतावास के मुताबिक़, इन ताक़तों ने हिंसा को बढ़ावा दिया, हथियार और उपकरण उपलब्ध कराए और आम लोगों की सुरक्षा को ख़तरे में डाला.

मां और बेटी एक साथ प्रदर्शन में पहुंचीं

अस्पताल में समीरा, जहां उनकी बेटी को मृत घोषित किया गया था.
इमेज कैप्शन, समीरा उस अस्पताल में मौजूद थीं जहां उनकी बेटी को मृत घोषित किया गया था

सेवदा की मौत 9 जनवरी को हुई थी. उस दिन वह और समीरा राजधानी तेहरान के बाहरी इलाक़े में हो रहे एक बड़े प्रदर्शन में शामिल थीं.

ये प्रदर्शन एक महीने पहले देश की आर्थिक स्थिति को लेकर लोगों की नाराज़गी के साथ शुरू हुए थे. बाद में प्रदर्शनकारी देश में इस्लामी गणराज्य को ख़त्म करने की मांग करने लगे.

समीरा कहती हैं कि उस समय उन्हें राजनीति में ख़ास दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन उनकी बेटी की थी.

सेवदा दो दूसरी युवतियों को अपना आदर्श मानती थीं. इनमें से एक महसा अमीनी थीं. अनिवार्य हिजाब के नियम के कथित उल्लंघन के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया था, जहां उनकी मौत हो गई थी. इसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे.

दूसरी युवती नीका शाकरामी थीं. महिलाओं के पहनावे को लेकर ईरान के सख़्त इस्लामी नियमों के ख़िलाफ़ हुए बाद के प्रदर्शनों के दौरान उनकी मौत हो गई थी.

समीरा कहती हैं, "सेवदा उन्हें अपने ख़यालों में ज़िंदा रखती थी और हमेशा उनके विरोध के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती थी."

सेवदा की मौत से एक दिन पहले प्रदर्शनकारियों की संख्या काफ़ी ज़्यादा थी.

समीरा के मुताबिक़, ईरान के आख़िरी शाह के बेटे रज़ा पहलवी ने, जो देश से बाहर रह रहे हैं, लोगों से प्रदर्शन करने की अपील की थी. इसके बाद वह और सेवदा भी प्रदर्शन में शामिल हुई थीं.

वह कहती हैं, "सुरक्षाबलों ने नियंत्रण खो दिया था."

समीरा के मुताबिक़, प्रदर्शनकारियों की बढ़ती संख्या से ईरान की सरकार घबरा गई थी. अगले दिन देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किया गया, लेकिन उन्हें लगा कि यह सिर्फ़ एक खोखली धमकी है.

वह कहती हैं, "ईरान में उन्होंने इतने झूठ बोले थे कि हम इतने बड़े पैमाने पर लोगों के मारे जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे."

समीरा कहती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वादे से भी उन्हें भरोसा मिला था कि वह प्रदर्शनकारियों के साथ हैं.

ट्रंप ने 8 जनवरी को अमेरिकी मीडिया से कहा था, "मैंने ईरानी अधिकारियों को बता दिया है कि अगर उन्होंने लोगों को मारना शुरू किया, जैसा कि वे अपने यहां दंगों के दौरान करते हैं, तो हम उन पर बहुत कड़ा हमला करेंगे."

इसके बावजूद, समीरा के मुताबिक़, 9 जनवरी को प्रदर्शन में भीड़ पहले के मुक़ाबले कम दिखाई दे रही थी.

वह कहती हैं कि सेवदा को शायद ख़तरे का अंदाज़ा था. उसने अपने कानों की बालियां उतारकर अपनी नानी को दे दी थीं. उसने अपने फ़ोन का पासकोड भी समीरा को बता दिया था.

"उसकी आंखें अब भी मेरी ओर देख रही थीं"

ईरान से पैदल भागते समय समीरा ने अपना वीडियो बनाया था.
इमेज कैप्शन, ईरान से पैदल भागते समय समीरा ने अपना वीडियो बनाया था

मां और बेटी दूसरे प्रदर्शनकारियों के साथ वहां पहुंचीं. इसके बाद सेवदा कूड़ेदान पर खड़ी होकर लोगों से नारे लगवाने लगीं.

समीरा उस जगह का हाल बताते हुए कहती हैं, "ऐसा लग रहा था कि वहां लोगों से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी थे. मुझे नहीं पता कि उन्होंने एक ही दिन में इतने सारे बसीज और आईआरजीसी के जवान कैसे जमा कर लिए."

आईआरजीसी का काम देश की इस्लामी व्यवस्था की रक्षा करना है. बसीज रेज़िस्टेंस फ़ोर्स के सदस्य आईआरजीसी से जुड़े स्वयंसेवक होते हैं.

समीरा कहती हैं, "हमारे दाहिनी ओर एक इमारत की छत से स्नाइपर ने गोली चलाई. गोली शायद छत से ही आई थी. वह सेवदा के दिल को चीरते हुए निकल गई."

वह कहती हैं, "मैं चीख भी नहीं पाई. मैं बस सेवदा को देखती रही. उसका बेजान शरीर ज़मीन पर पड़ा था. उसके मुंह और नाक से ख़ून बह रहा था. मैं यक़ीन नहीं कर पा रही थी कि वह मर रही थी. उसकी आंखें अब भी मेरी ओर देख रही थीं."

समीरा किसी तरह सेवदा को अस्पताल ले गईं. वहां उन्हें बताया गया कि सेवदा का ऑपरेशन किया जा रहा है.

लेकिन तभी दरवाज़ा खुला और उन्होंने देखा कि सेवदा के शव को एक बैग में बंद किया जा चुका था.

इसके बाद सेवदा का शव वहां से ले जाया गया. समीरा कहती हैं कि अपनी बेटी को दोबारा तलाशने में उन्हें कई दिन लग गए.

कई दूसरे लोगों की तरह वह भी तेहरान के सबसे बड़े शवगृहों में से एक पहुंचीं.

वह रोते हुए कहती हैं, "किशोर लड़के और लड़कियां. इतने सारे लोग मारे गए थे."

वह आगे कहती हैं, "हर बैग की ज़िप खोलते हुए मुझे लग रहा था कि मैं ख़ुद मर रही हूं. मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी इतने शव नहीं देखे थे, लेकिन मैं हार मानने वाली नहीं थी."

आख़िरकार उन्हें अपनी बेटी मिल गई.

वह कहती हैं, "सेवदा के ऊपर तीन शव रखे हुए थे. हमने उसे इसी तरह तलाशा."

ईरानी अधिकारियों ने माना है कि प्रदर्शनों के दौरान तीन हज़ार से अधिक लोग मारे गए. हालांकि, उनका दावा है कि मरने वालों में सुरक्षाबलों के सदस्य भी शामिल थे.

मानवाधिकार संगठन एचआरएएनए का अनुमान है कि मरने वालों की संख्या सात हज़ार से अधिक है. संगठन के मुताबिक़, इनमें लगभग सभी प्रदर्शनकारी थे.

शव देने के लिए रखी गई शर्त

समीरा कहती हैं कि सेवदा का शव मिलना अधिकारियों के साथ उनकी लड़ाई की सिर्फ़ शुरुआत थी.

उनका कहना है कि सेवदा के शव को दफ़नाने के लिए ले जाने की अनुमति तभी मिली, जब वह यह कहने के लिए तैयार हुईं कि उनकी बेटी की मौत सुरक्षाबलों की गोली से नहीं, बल्कि "आतंकवादियों" की वजह से हुई थी.

वह कहती हैं, "उन्होंने 8 और 9 जनवरी को किए गए अपने कामों पर पर्दा डालने के लिए ऐसा किया. वे छिपाना चाहते थे कि उन्होंने कितने लोगों को मारा था."

वह आगे कहती हैं, "उन्होंने परिवारों से यह कहलवाकर उन्हें चुप कराया कि उनके अपनों को इसराइली या अमेरिकी आतंकवादियों ने मारा था."

इसके बावजूद, दफ़नाने के बाद समीरा को सेवदा की क़ब्र पर जाने या वहां क़ब्र का पत्थर लगवाने की अनुमति नहीं दी गई.

समीरा के मुताबिक़, उन्हें परेशान करने का सिलसिला जारी रहा.

ईरानी संस्कृति में किसी व्यक्ति की मौत के 40 दिन पूरे होने पर होने वाली रस्म का बहुत महत्व है. समीरा कहती हैं कि सेवदा की मौत के 40वें दिन की रस्म से कुछ दिन पहले स्थानीय ख़ुफ़िया मंत्रालय ने उन्हें बुलाया.

वह कहती हैं, "उन्होंने मुझसे कहा, 'आप हमें एक इंटरव्यू दें और कहें कि सेवदा बसीज की सदस्य थी और प्रदर्शनकारियों ने उसे मारा था. इसके बाद हम उसे शहीद घोषित कर देंगे. फिर आपको सुविधाएं, घर या जो कुछ आप चाहेंगी, वह मिलेगा.'"

समीरा को पूरा भरोसा है कि अधिकारियों ने डर की वजह से उन्हें यह प्रस्ताव दिया था.

इंटरनेट दोबारा शुरू होने के बाद उन्होंने लंदन से काम करने वाले एक ईरानी मीडिया संस्थान को सेवदा की मौत के बारे में बताया था.

वह कहती हैं, "उन्हें डर था कि मैं बाहरी नेटवर्क या ईरान से बाहर मौजूद लोगों के संपर्क में हूं."

इस इंटरव्यू के लिए मजबूर किए जाने से बचने के लिए समीरा 40वें दिन की रस्म पूरी होते ही ईरान से भाग गईं.

वह कहती हैं, "मैं अपनी बच्ची के ख़ून का सौदा नहीं करना चाहती थी."

समीरा के मुताबिक़, लोगों को चोरी-छिपे सीमा पार कराने वालों ने उन्हें भागने में मदद की. सुरक्षित जगह तक पहुंचने के लिए उन्हें नदियां और पहाड़ पार करने पड़े.

भागते समय बनाए गए उनके एक वीडियो में उनका ग़ुस्सा साफ़ दिखाई देता है.

एक गहरी खाई के किनारे बने पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए वह कैमरे से कहती हैं, "इस घटिया सरकार और इन कमीनों ने मुझे बहुत परेशान किया है."

ईरान में मौजूद न होने पर भी मुक़दमा

समीरा कहती हैं कि विदेश पहुंचने के बाद भी उन्होंने विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देना जारी रखा.

इसके बाद ईरान में मौजूद न होने के बावजूद उन पर कई आरोप लगाए गए. इनमें "मोहारेबेह" यानी ईश्वर के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का आरोप भी शामिल है. इस अपराध के लिए मौत की सज़ा दी जा सकती है.

सेवदा के 17वें जन्मदिन पर उनके रिश्तेदारों और दोस्तों ने एक कार्यक्रम आयोजित किया. समीरा देश से बाहर रहते हुए इसे इंटरनेट पर लाइव देख रही थीं.

वह कहती हैं, "फिर अचानक प्रसारण बंद हो गया."

बाद में उन्हें पता चला कि कार्यक्रम पर छापा मारा गया था. उनका कहना है कि आईआरजीसी ने उनके कुछ रिश्तेदारों और दोस्तों को गिरफ़्तार कर लिया.

समीरा के मुताबिक़, अधिकारियों ने उनके परिवार को चेतावनी दी कि अगर वे सेवदा की क़ब्र पर जुटते रहे, तो उसके शव को खोदकर निकाल लिया जाएगा और कहीं दूसरी जगह ले जाया जाएगा.

अब समीरा इंटरनेट पर उन ईरानी सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों के नाम साझा करती हैं, जिन्हें वह 8 और 9 जनवरी के प्रदर्शनों के दौरान लोगों पर जानलेवा गोलियां चलाने के लिए ज़िम्मेदार मानती हैं. वह भी अपनी बेटी सेवदा के साथ इन्हीं प्रदर्शनों में शामिल हुई थीं.

वह कहती हैं, "मैं जिन लोगों के नाम सामने लाती हूं, उनमें से हर एक के ख़िलाफ़ कार्रवाई चाहती हूं, क्योंकि उन्होंने इतने सारे युवाओं को मारा है. मेरा मक़सद उनकी पहचान सामने लाना है, ताकि उन पर मुक़दमा चलाया जा सके."

समीरा ने जिन लोगों में से एक का नाम इंटरनेट पर साझा किया था, वह बाद में मृत पाया गया.

इसके बाद सरकार के एक समर्थक ने समीरा का ठिकाना बताने वाले को पांच हज़ार डॉलर यानी 3,732 पाउंड का इनाम देने की पेशकश की. उसने माना था कि उस व्यक्ति की मौत के लिए समीरा ज़िम्मेदार थीं.

ईरान के सरकारी मीडिया ने बाद में बताया कि इस मौत के मामले में नौ लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

इन ख़तरों के बावजूद समीरा चुप रहने को तैयार नहीं हैं.

वह कहती हैं, "सेवदा के बिना हर दिन और हर पल मेरे लिए बहुत मुश्किल है. मेरी हालत उस मां जैसी है, जिसने अपना दिल, अपना वजूद और अपनी ज़िंदगी खो दी हो."

वह आगे कहती हैं, "लेकिन सेवदा की सांसें थमने की बात ने ही मुझे अपने पैरों पर खड़े होने की ताक़त दी है. मैं उसकी ज़िंदगी और उसके रास्ते को सम्मान देने के बारे में सोचती हूं."

"सेवदा को तलाशते हुए मैंने जितने शव देखे और जितने बैग खोले, उन सबने मुझे अपनी आख़िरी सांस तक इस्लामी गणराज्य के ख़िलाफ़ लड़ने की ताक़त दी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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