एक GIF जिसमें लड़की ऑनलाइन सब से जुड़ी है, फिर भी वह अकेले बैठकर सोच रही है

हमेशा ऑनलाइन. कभी-कभार ही कनेक्टेड.

आज के समय में तेजी से बढ़ रहे अकेलेपन को समझना

सिंगापुर में अपने छोटे से घर में बैठे शशांक के फोन पर परिवार से जुड़े ग्रुप में 'हैप्पी दिवाली' के मैसेज लगातार आ रहे हैं.

कुछ ही देर बाद शशांक की मां वीडियो कॉल करती हैं. स्क्रीन पर स्वाइप करते ही शशांक जैसे खुद को मुंबई वाले घर में महसूस करते हैं.

एक चहल-पहल भरा लिविंग रूम, जहां उनके रिश्तेदारों ने त्योहार वाले कपड़े पहन रखे हैं. साथ ही पटाखों की आवाज के बीच जोर-जोर से बात कर रहे हैं.

एक पल के लिए शशांक का सिंगापुर वाला कमरा भरा-भरा लगता है. लेकिन जैसे ही कॉल खत्म होती है, फिर से सन्नाटा छा जाता है.

"जो आमने-सामने के रिश्ते होते थे, वो अब लगभग ख़त्म हो गए हैं."

यह अनुभव शशांक के लिए नया नहीं है. वह बीते सात साल से पढ़ाई और काम के लिए सिंगापुर में अकेले रह रहे हैं.

इस दौरान वह कई त्योहारों पर घर नहीं जा पाए. मुंबई में दिवाली, होली या गणेश चतुर्थी का मतलब होता था, रिश्तेदारों का आना, अच्छा खाना, दोस्तों और पड़ोसियों के साथ खुशियां बांटना.

लेकिन सिंगापुर में उन्हें त्योहारों की सिर्फ तस्वीरों और फोन कॉल्स से ही सब्र करना पड़ता है.

वह कहते हैं, "कभी-कभी यह बात बहुत ज्यादा खलती है. लेकिन समय के साथ आप इसकी आदत डाल लेते हैं."

सिंगापुर में अपने शुरुआती दिनों में शशांक ने अकेलेपन से लड़ने के तरीके तलाशे. उन्होंने ऑफिस में ग्रुप लंच प्लान किए और अपने सहकर्मियों के खाने का खर्च भी उठाया, यह सोचकर कि जान-पहचान आगे चलकर अपना पन बन जाएगी.

लेकिन जल्द ही उन्हें समझ आया कि उम्र बढ़ने के बाद एक बड़े शहर में दोस्त बना पाना आसान नहीं होता. वह कहते हैं, "उन्हें परिवार जैसा समझना शायद मेरी नासमझी थी. हर किसी की अपनी ज़िंदगी होती है."

वह बताते हैं, "बेशक, आज तकनीक आपकी मदद करती है. आप अपने माता-पिता से वीडियो कॉल कर सकते हैं. लेकिन आस-पास होना मिस करते हैं."

शशांक जो महसूस करते हैं, उसके लिए रिसर्चर्स ने एक शब्द ईजाद किया है, 'सोशल स्नैक्स'.

ये डिजिटल बातचीत के छोटे-छोटे पल होते हैं, जो थोड़ी देर के लिए ध्यान तो खींचते हैं. लेकिन भरोसा, अपनापन और गहरे रिश्तों की जरूरत को पूरा नहीं करते.

ये सतही तौर पर जुड़ाव जैसा महसूस करवाते हैं. लेकिन असल में वैसा महसूस नहीं होता.

इसके असर दुनिया भर में देखे जा सकते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अकेलेपन को एक बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य समस्या माना है.

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, युवा, जो इतिहास की सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से जुड़े हुए पीढ़ी हैं, अकेलेपन की समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.

2014 से 2023 से बीच दुनिया में हर छह में से एक शख्स ने अकेलापन महसूस किया.

(सोर्स- डब्ल्यूएचओ कमीशन ऑन सोशल कनेक्शन, 2025)

2014 से 2019 के बीच अकेलापन और सोशल आइसोलेशन को हर साल करीब 8 लाख, 71 हजार मौतों की वजह माना गया.

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करीब हर 5 में से 1 किशोर (13–17 वर्ष) खुद को अकेला महसूस करने की बात कहते हैं

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18 से 29 साल के युवा कई क्षेत्रों में अपने से बड़े उम्र के लोगों की तुलना में ज्यादा अकेलापन महसूस करते हैं. हालांकि, वे इतिहास की सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से जुड़े हुई पीढ़ी हैं.

ज्यादातर लोगों पर भरोसा किया जा सकता है', 1993 से 2014 के बीच ऐसा मानने वाले भारतीयों की संख्या में कमी आई है. {{beginHighlight-source}}(सोर्स- वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे, डब्ल्यूएचओ){{endHighlight}}
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ज्यादातर लोगों पर भरोसा किया जा सकता है', 1993 से 2014 के बीच ऐसा मानने वाले भारतीयों की संख्या में कमी आई है. {{beginHighlight-source}}(सोर्स- वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे, डब्ल्यूएचओ){{endHighlight}}
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ज्यादातर लोगों पर भरोसा किया जा सकता है', 1993 से 2014 के बीच ऐसा मानने वाले भारतीयों की संख्या में कमी आई है.

(सोर्स- वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे, डब्ल्यूएचओ)

“अकेलापन अब सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं रह गया है. इसका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है. हमेशा ऑनलाइन जुड़े रहने से यह जरूरी नहीं होता कि इंसान भावनात्मक रूप से अकेला महसूस न करे.”

डॉ. कृति आनंद, सीनियर कंसल्टेंट (मनोचिकित्सा), पारस हेल्थ हॉस्पिटल, पंचकूला

आज़ादी के विरोधाभास

आज़ादी के विरोधाभास

एक ओर जहां शशांक अपने घर को मिस करते हैं, वहीं यशोदा खुद को ऐसी स्थिति में पाती हैं, जहां जिस शहर को वह अपना घर मानती थीं, वह अब उनके लिए सुरक्षित जगह नहीं रह गया है.

जब यशोदा 2022 में मास्टर्स की पढ़ाई के लिए बर्लिन गईं, तो उन्हें लगा था कि उन्हें घर की याद आएगी. और बर्लिन में चुनौतियां भी थीं. जैसे- भाषा की दिक्कत, नई संस्कृति और परिवार व दोस्तों से दूर रहना.

लेकिन इस बात ने यशोदा को एक ऐसा मौका दिया, जो उन्होंने कभी दिल्ली में महसूस नहीं किया था. वो था- अपनी शर्तों पर शहर में घूमने की आज़ादी.

वह देर रात अकेले घर जा सकती थीं. मन करे तो कहीं भी जा सकती थी और बिना किसी डर के सार्वजनिक जगहों पर रह सकती थीं.

वह कहती है, "पहली बार मुझे एहसास हुआ कि पुरुष भी बस आम इंसान ही होते हैं."

लेकिन जब वह दिल्ली वापस आईं, तो उन्हें अकेलापन महसूस होने लगा. उनके पास जाने के लिए जगहें हैं, लेकिन रात का एक समय तय है जिसके पहले उन्हें घर लौटना पड़ता है.

उनके दोस्त भी हैं, यहां (दिल्ली) का सफर बर्लिन जितना आसान नहीं है और सड़कें भी उतनी सुरक्षित नहीं हैं.

वह कहती है, "मेरे पास यहां सब कुछ है, लेकिन मैं उसे पूरी तरह जी नहीं पा रही हूं."

बड़े होने के बाद का अकेलापन

बड़े होने के बाद का अकेलापन

ऋषभ के लिए सुरक्षित जगह तलाशना कोई समस्या नहीं है.

मुंबई में रहने वाले एक पुरुष होने के नाते, जो कई भारतीय मेट्रो शहरों की तुलना में कम अपराध दर वाला शहर है, उन्हें बाहर जाने से पहले उतनी चिंता नहीं करनी पड़ती, जितनी दिल्ली में यशोदा को होती है.

फिर भी वह अकेलापन महसूस करते हैं. उनके लिए यह अकेलापन बीच-बीच में आता है, जैसे हर हफ्ते.

वह कहते हैं, "सोमवार से शुक्रवार तक तो ऑफिस रहता है, लेकिन वीकेंड पर समझ नहीं आता कि क्या करें."

जब वह काम के लिए मुंबई आए, तो दो करोड़ की आबादी वाले शहर में उनके दोस्त अलग-अलग जगह रहते थे. एक साथ प्लान बनाना महंगा भी पड़ता था और सबका टाइम मिलने में भी मुश्किल होती है.

उन्होंने एक सोशल लाइफ बनाने की कोशिश की, जैसे क्विज़ नाइट्स में जाना, बुक क्लब्स और कम्युनिटी ग्रुप्स से जुड़ना.

कई हफ्तों तक ऐसी गतिविधियों में भाग लेने के बाद कुछ अनजान लोगों से पहचान हुई और धीरे-धीरे दोस्त भी बन गए.

वह कहते हैं, "उन तीन घंटों के लिए मैं सब कुछ भूल जाता हूं."

अकेलापन कैसे पैदा होता है

अकेलापन कैसे पैदा होता है

शशांक, यशोदा और ऋषभ तीनों के लिए अकेलापन अलग-अलग रूपों में दिखता है. लेकिन उनकी कहानियों के पीछे एक जैसा पैटर्न छिपा है.

आज के शहरी जीवन में अकेलापन धीरे-धीरे हमारे लाइफस्टाइल का हिस्सा बनता जा रहा है.

शहर ऐसे बने हैं जहां काम सबसे अहम है, न कि लोगों के बीच जुड़ाव.
हर दिन का सफर, घंटों खा जाता है.
डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों को जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि समय काटने के लिए बने हैं.
दोस्तों और जान-पहचान का दायरा धीरे-धीरे कम होता जाता है.
और काम का दबाव ऐसा है कि अपने लिए समय ही नहीं बचता.

पूरे एशिया में करीब 18% लोग अकेलापन महसूस करते हैं, ये यूरोप के लगभग 10% के मुकाबले लगभग दोगुना है. यह जानकारी डब्ल्यूएचओ की एक स्टडी से मिली है, जिसमें 142 देशों के लोगों को शामिल किया गया था.

भारत में यह समस्या और ज्यादा गहराई से महसूस होती है, क्योंकि यहां संयुक्त परिवार प्रणाली टूट रही है, लोग बड़ी संख्या में शहरों की ओर जा रहे हैं और शहरी जीवन की भागदौड़ में पास रहने की बजाए सिर्फ ऑनलाइन जुड़ाव रह गया है.

एक ऐसी पीढ़ी के लिए जो हमेशा ऑनलाइन रहती है, सवाल अब यह नहीं है कि वे जुड़े हैं या नहीं. सवाल यह है कि क्या सच में कोई उनकी बात सुन रहा है.

विशेषज्ञ कहते हैं कि इसका समाधान यह है कि बिना झिझक के यह स्वीकार करने की हिम्मत हो कि कुछ कमी है.

“डिजिटल जुड़ाव आमतौर पर लोगों की संख्या तो बढ़ा देता है, लेकिन इसमें वह गहराई नहीं होती जो आमने-सामने के रिश्तों में होती है. बहुत से लोगों के पास सैकड़ों फॉलोअर्स या दोस्त होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि ये रिश्ते उतने गहरे नहीं हैं.”

डॉ. संदीप वोहरा, मनोचिकित्सक और भारत के पहले एआई-आधारित मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग टूल ‘इमोशनल वेलनेस इंडेक्स’ के डेवलपर