नेपालः जारी रहेगी पशुओं की बलि

गढ़ीमाई मेले की तस्वीर
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पूरे विश्व में मंगलवार को ये ख़बर पहुंची कि नेपाल के बरियारपुर के मंदिर में अब पशुओं की बलि नहीं दी जाएगी.

मंदिर में होने वाले महोत्सव में देवी गढ़ीमाई को दसियों हज़ार जानवरों की बलि दी जाती है और ये परंपरा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता की वजह बनती है.

बलि पर प्रतिबंध लगाने के ऐलान का जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने स्वागत किया लेकिन तभी मंदिर के चेयरमैन ने बताया कि ये ख़बर सही नहीं है. तो असल में हुआ क्या?

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गढ़ीमाई मेले की तस्वीर

हर पांच साल में नेपाल के बारा ज़िले स्थित गढ़ीमाई मंदिर में मेला लगता है.

इस मेले के दौरान नेपाल और भारत से लोग जानवरों की बलि देने पहुंचते हैं.

इन जानवरों में भैंसे से लेकर चूहे तक होते हैं.

कई दिन चलने वाले मेले में हज़ारों भैंसों और दसियों हज़ार छोटे जानवरों की बलि चढ़ाई जाती है.

बलि या तो पुजारी चढ़ाते हैं या फिर दूसरे लोग मंदिर के आसपास के मैदानों में बलि देते हैं.

ये परंपरा क़रीब 250 साल पहले शुरु हुई. कहा जाता है कि एक पुजारी ने सपना देखा कि अगर वो शक्ति की देवी गढ़ीमाई को रक्त चढ़ाएगा तो कारागार से मुक्त हो जाएगा.

प्रतिबंध!

गढ़ीमाई मेले की तस्वीर

इसे लेकर ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल (एचएसआई)और एनिमल वेलफ़ेयर नेटवर्क नेपाल (एडब्लूएनएन)की ओर से जारी <link type="page"><caption> विज्ञप्ति</caption><url href="http://www.hsi.org/world/india/news/releases/2015/07/gadhimai-festival-animal-sacrifice-cancelled-indefinitely-072815.html?referrer=http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-33699136" platform="highweb"/></link> में कहा गया, "विक्ट्री! (जीत हुई) नेपाल के गढ़ीमाई मेले में पशुबलि पर प्रतिबंध लगा. 5 लाख जानवरों का जीवन बच गया."

विज्ञप्ति में बताया गया कि 'पुरज़ोर बातचीत' के बाद मंदिर 'पशुबलि को बंद करने' पर सहमत हो गया है और लोगों से आग्रह करेगा कि वो मेले में जानवरों को नहीं लाएं.

इस बयान में गढ़ीमाई मंदिर प्रशासन और विकास कमेटी के चेयरमैन रामचंद्र शाह के हवाले से बताया गया, "बलि और हिंसा की जगह शांतिपूर्ण पूजा और अनुष्ठान किए जाने का समय आ गया है."

इन संगठनों ने दिल्ली और बिहार में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जिनमें मुख्य पुजारी समेत मंदिर कमेटी के चार अहम सदस्यों ने हिस्सा लिया. हालांकि शाह इसमें मौजूद नहीं थे.

मंदिर ट्रस्ट के सचिव मोतीलाल प्रसाद ने समाचार एजेंसी एएफ़पी से कहा, "हमने पशुबलि की परंपरा को पूरी तरह से बंद करने का फ़ैसला किया है."

उन्होंने कहा,"मैंने महसूस किया कि जानवर काफ़ी कुछ हमारी तरह ही हैं और हमारी तरह ही दर्द महसूस करते हैं."

खंडन

गढ़ीमाई मेले में हिस्सा लेने के लिए जाते हुए लोग

वहीं ट्रस्ट के चेयरमैन रामचंद्र शाह ने कहा कि प्रतिबंध की ख़बर सही नहीं है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "आस्थावान हिंदुओं से देवी को बलि न चढ़ाने का आग्रह किया जा सकता है लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. इस परंपरा को भी प्रतिबंधित या फिर पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता "

ये साफ़ नहीं हो सका कि क्या वो जानवरों के लिए काम करने वाले संगठनों की ओर से इस्तेमाल किए गए अपने कथित बयान से इंकार कर रहे हैं.

लेकिन उन्होंने ये ज़रुर कहा कि दूसरे पदाधिकारियों के बयान को सही परिपेक्ष्य में नहीं समझा गया.

उन्होंने कहा कि उन्हें बलि के ख़िलाफ़ अभियान से कोई एतराज़ नहीं है.

उन्होंने कहा, "जहां तक मेले के दौरान पशुबलि देने की परंपरा की बात है तो उसमें कोई बदलाव नहीं होगा. वो चार लोग (प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले) क्या कहते हैं इसे लेकर चीज़ें नहीं बदलेंगी. ये हमारी पुरानी परंपरा है."

'हैरान हैं हम'

बलि के खिलाफ प्रदर्शन

एचएसआई की प्रवक्ता नवमिता मुखर्जी कहती हैं कि वो रामचंद्र शाह के बयान से 'हैरान और भ्रमित' हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि प्रतिबंध की ख़बर सही थी.

मुखर्जी ने कहा, "अगर ये ख़बर सही नहीं होती तो हम इस क़दम के ऐलान के लिए इतने बड़े पैमाने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित क्यों करते?"

एडब्लूएनएन के अध्यक्ष मनोज गौतम ने कहा कि मंदिर प्रशासन मंदिर के अंदर बलि को बंद करने के लिए तैयार हो गया था. मंदिर के बाहर दूसरों की ओर से दी जाने वाली बलि को रोकने को भी तैयार था.

मुख्य पुजारी का समर्थन अहम है. वो मेले के संस्थापक के वंशज हैं. उनका कहना है कि उनके बिना बलि स्वीकार नहीं होगी.

मतभेद?

पशुअधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता

मंदिर बोर्ड के सदस्य त्रिपुरारी शाह इस बात से इंकार करते हैं कि मंदिर ट्रस्ट के सदस्यों में मतभेद है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "यहां कोई अनबन नहीं है. मुझे लगता है कि शाह कहना चाहते हैं कि मंदिर के लाखों आस्थावान हैं. हमें उन तक अपनी बात पहुंचानी होगी और उन्हें जागरुक करना होगा."

उन्होंने कहा कि मंदिर पशुबलि रोकने के लिए अभियान चला रहा है और उन्हें उम्मीद है कि '2019 के मेले में ख़ून नहीं बहेगा.'

असर

बलि के लिए लाया गया पक्षी

गौतम कहते हैं कि हालिया बरसों में बलि की परंपरा ख़त्म सी हो रही है.

उनका संगठन मंदिर के साथ मिलकर अगले चार सालों में ये तय करने के लिए काम करेगा कि 2019 का मेला पूरी तरह 'रक्तविहीन' हो.

लेकिन दक्षिणी नेपाल में मेले के साथ कई लोगों की मान्यताएं और आस्था काफ़ी गहराइ तक जुड़ी है. वो मानते हैं कि ये परंपरा हाल फ़िलहाल बंद नहीं होगी.

(रिपोर्टर- अन्ना जोन्स, सुरेंद्र फुयाल और गीता पांडे)

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