मेवाड़ की वो ब्राह्मणी डाक सेवा

    • Author, आभा शर्मा
    • पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

राजस्थान के मेवाड़ राज्य में अपनी डाक व्यवस्था थी. आपको यकीन भले नहीं हो लेकिन ये डाक व्यवस्था स्वतंत्रता के बाद भी काम करती रही.

इसका नाम भी बेहद दिलचस्प था- ब्राह्मणी डाक सेवा. इसे उदयपुर के महाराणा सज्जन सिंह ने शुरू किया था.

इस डाक सेवा से जुड़े दस्तावेजों को उदयपुर के आहड़ राजकीय संग्रहालय में आयोजित प्रदर्शनी में दर्शाया गया है.

स्वतंत्रता पूर्व शुरू हुई यह डाक सेवा मेवाड़ में वर्ष 1950 तक प्रभावी रही. जादूराम गौड़ (ब्राह्मण) इस डाक सेवा के प्रमुख थे और इसलिए इसका नाम “ब्राह्मणी डाक” रखा गया.

वे जयपुर रियासत में खेतड़ी के रहने वाले थे. जादूराम जनता और सरकारी कार्यालयों दोनों ही से डाक एकत्र करते थे.

यह व्यवस्था पुश्तैनी तरीके से चली जिसका जनता के लिए दो भीलवाड़ी पैसे (स्थानीय मुद्रा) प्रति पत्र शुल्क था जबकि यह ब्राह्मणी डाक सरकारी कार्यालयों के लिए निशुल्क थी.

जादूराम गौड़ को वर्ष 1932 से प्रतिवर्ष 1200 रुपए सालाना दिया जाता था जब वे निजी तौर पर इस डाक सेवा को चलाते थे. उस समय मेवाड़ रियासत का सालाना बजट बारह हज़ार रुपए था.

ब्राह्मणी डाक के मेवाड़ राज्य में 60 दफ्तर थे. हर चिट्ठी पर ठप्पा होता था “महसूल चुका” या “महसूली”. महसूली का ठप्पा उन चिट्ठियों पर लगता था जिनका शुल्क अदा नहीं किया हो. पर यह चिट्ठियां “बैरंग” नहीं मानी जाती थीं.

ब्राह्मणी डाक का मुख्यालय था उदयपुर जिसमें आठ कर्मचारी काम करते थे.

मेवाड़ की इस डाक व्यवस्था का ज़िक्र भारत के इम्पीरियल गजट 1908 के 26वें भाग में पृष्ठ 97-98 पर भी किया गया है.

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