यूपी में महागठबंधन यानी बिहारी बदले की चाल

- Author, नवीन जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
तो, बिहार की तर्ज़ पर यूपी में भी एक महागठबंधन बनाने की शतरंजी चाल चली जा चुकी है.
खुले तौर पर यह महागठबंधन यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए होगा. लेकिन इसका असली मक़सद मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से राजनीतिक बदला लेना है.
जनवरी के अंतिम दिन जेडी(यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने लखनऊ में महागठबंधन की अनौपचारिक घोषणा की. उसके दो दिन बाद नीतीश कुमार ने यूपी में अपनी पहली जनसभा कर उस तरफ़ क़दम भी बढ़ा दिए.

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नीतीश ने सभा के लिए जौनपुर को चुना. जौनपुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी के पड़ोस में है.
सभा में उन्होंने परोक्ष रूप से हमला भी भाजपा और मोदी पर किया, सपा को बख़्श दिया. पर, यूपी में नीतीश कुमार भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में नहीं हैं. यह ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ वाला मामला है. उनके निशाने पर मुलायम हैं.
इस राजनीतिक बदले की भूमिका बिहार चुनाव के दौरान ही लिखी जा चुकी थी.

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मुलायम सिंह यादव ने बिहार में जेडी(यू)-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन का साथ छोड़कर, तीसरा मोर्चा बना अलग से चुनाव लड़ने का दांव खेला था. तभी तय हो गया था कि यूपी के चुनाव में महागठबंधन भी पलटवार करेगा.
शरद यादव ने इसीलिए साफ़ कर दिया था कि यूपी के महागठबंधन में समाजवादी पार्टी को शामिल नहीं किया जाएगा. इसके अलावा 13 फ़रवरी को होने वाले विधानसभा उपचुनावों में अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल का समर्थन किया जाएगा.
रालोद के महागठबंधन में शामिल होने की पुष्टि बीते बुधवार को नई दिल्ली में नीतीश कुमार और अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी की मुलाक़ात में हो गई. जयंत को ज़िम्मेदारी दी गई है कि वे उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को मज़बूत बनाएं.

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नीतीश ने जौनपुर सभा के अगले ही दिन दिल्ली जाकर महागठबंधन में शामिल होने लायक़ दलों की तलाश शुरू कर दी थी.
साफ़ है कि मामला सिर्फ़ ज़ुबानी जमा ख़र्च तक सीमित नहीं है. वे अजित सिंह के घर पर शरद यादव के साथ जयंत से मिले. फिर अपना दल की नेता कृष्णा पटेल और पीस पार्टी के डॉ. अयूब से भी नीतीश की भेंट हुई.
रालोद को छोड़कर किसी दल के नेता से बातचीत का ख़ास मतलब नहीं है.
भाजपा से गठबंधन कर सांसद बनीं अनुप्रिया पटेल से विवाद के बाद उनकी मां कृष्णा पटेल अपना दल में हाशिए पर चली गईं हैं.
कुछ वर्ष पहले तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में लोकप्रिय रही डॉ. अयूब की पीस पार्टी भी अब लुटी-पिटी है. पिछले विधानसभा चुनाव में उनके पांच विधायक जीते थे, जिनमें से चार अब समाजवादी पार्टी के साथ हैं.

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कृष्णा पटेल और डॉ. अयूब दोनों ही बेहतर मंच की तलाश में हैं. वे महागठबंधन को कुछ देने की स्थिति में नहीं हैं.
जेडी(यू) और आरजेडी बिहार में व्यापक जनाधार वाली पार्टियां हैं, लेकिन यूपी में उनका कोई आधार नहीं है.
इन दलों की यूपी में वही स्थिति है, जो सपा की बिहार में है.
बिहार में बड़ी जीत हासिल करने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश कुमार का क़द बढ़ा, लेकिन यूपी के पिछड़ों या कुर्मियों में उनकी छवि चुनाव जिताने वाले नेता की नहीं है.
इसलिए यूपी में महागठबंधन को लालू-नीतीश से कोई मज़बूती नहीं मिलने वाली.

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रालोद के अलावा महागठबंधन में जान फूंकने वाली पार्टी कांग्रेस ही हो सकती है.
हालांकि यूपी कांग्रेस ख़ुद अपने वजूद के लिए जूझ रही है, लेकिन अपने बचे-खुचे वोट प्रतिशत से भी वह महागठबंधन को एक पहचान दे सकती है.
बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस इस गठजोड़ का हिस्सा बनेगी?
राहुल बिहार में भी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ना चाहते थे. वहां सोनिया और लालू की पुरानी राजनीतिक दोस्ती के कारण राहुल को झुकना पड़ा था.
यूपी में ऐसी कोई मजबूरी राहुल के सामने नहीं है. यूपी के कांग्रेसी भी किसी से गठबंधन नहीं चाहते. फ़िलहाल कांग्रेस की सारी तैयारियां अकेले चुनाव लड़ने की हैं. इस बार उसने प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया साल भर पहले ही शुरू कर दी है.

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सपा और बसपा यूपी में दो बड़ी राजनीतिक ताक़तें हैं, जिनके पास मज़बूत जनाधार है.
लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद स्वाभाविक रूप से भाजपा भी यहां बड़ी दावेदार बन गई है. तिकोने मुक़ाबले तय हैं. कई सीटों पर कांग्रेस चौथी ताक़त बनेगी. इसके बाद महागठबंधन के लिए कितनी गुंजाइश बचेगी?
बिहार में चुनावी लड़ाई सीधे-सीधे दो गठबंधनों में सिमट गई थी. इस वजह से मुलायम का तीसरा मोर्चा मैदान से ही ग़ायब हो गया.
यूपी में अगर मुक़ाबला तिकोना या चौतरफ़ा हुआ तो एक-एक वोट की बड़ी क़ीमत होगी. तब शायद महागठबंधन नुक़सान पहुंचाने के स्थिति में होगा.

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अभी तो साल भर में बहुत से समीकरण बनेंगे-बिगड़ेंगे.
फ़िलहाल, नीतीश और शरद नाममात्र के लिए ही सही, यूपी में एक महागठबंधन खड़ा तो कर ही सकते हैं. इसकी शुरुआत उन्होंने कर दी है.
मगर मुलायम सिंह यादव को इस पहल से कोई चिंता नहीं है. उन्होंने इसका नोटिस तक नहीं लिया. उनका ध्यान खींचने को मायावती और अमित शाह की चालें ही काफ़ी हैं.
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